कहानी- मेमसाब
"खड़ा-खड़ा क्या देख रहा है रे जगते, जा भाग कर घास का गट्ठा उठा ला।" दद्दा की आवाज़ से जगत सपनों से जाग गया।
हरे, सूखे घासों के गट्ठों को सिर पर उठाते समय, घास का एक नुकीला छोर उसके गर्दन पर टुचकने लगा। एक हाथ से उसे गर्दन से दूर हटाते, तेज़ कदमों से वह उस महलनुमा हवेली के द्वार में समा गया।
बड़े से परिसर के दोनों ओर लोहे की सलाखों वाली कोठरियों में पशुओं के लिए चारा भरना चालू है। बारिश के बाद उगी बड़ी घासों की कट्टी, हर पालतू मवेशी का मनपसंद चारा होता है।
अपने सिर पर से गट्ठा उतारते हुए जगत ने, एक हसरत भरी निगाह हवेली पर डाली। सामने की सड़क से तेज़ी से एक जीप और पीछे चार-पांँच मोटरसाइकिलें हवेली में घुस गईं। खेतों की ओर के हवेली के पिछले हिस्से में बने, लोहे के सलाखों वाले कमरों तक जगत की पहुँच थी। उसके माँ-दद्दा काम पड़ने पर हवेली के अंदर आते जाते रहते थे।
पंद्रह-सोलह गट्ठे पहुँचाकर पेड़ के नीचे, खेतों की मेड़ पर जगत पसर गया। खन्न-खन्न, खन्न-खन्न की चिर-परिचित ध्वनि पास आने लगी और जगत के पेट में दौड़ते चूहों की गति और बढ़ गई।
"माँ, आज देर कर दी तुमने, मुझे तो जोरों की भूख लग गई।" आँखें बंद किए किए ही जगत ने कहा।
"हाँ-हाँ, आज तो खूब गट्ठे उठाए रे जगते, भूख लगेगी ही। मीतो...आज अपने पुत्तर को एक रोटी ज़्यादा खिलाना।" करतार की आवाज़ सुनकर जगत उठ बैठा।
मीतो ने रोटी की टोकरी खोली। कपड़े की परत तले दबी रोटी ने खुलने पर अँगडाई ली और खुले आसमान की ओर देखने लगी। उसके पोर-पोर को छूकर बहने वाली हवा, सोंधेपन के किस्से सुनाने लगी। इस किस्से में अपना तेज, चटकीला प्रसंग जोड़ने में, आलू की तरकारी पीछे न रही। आम के सूखे अचार की फांकें और रहस्य की तरह परत दर परत खुलता प्याज़ का टुकड़ा, सचमुच माँ के खाने का तिलिस्म चारों ओर फैल गया था।
"धीरे से खा जगते, ठूँस मत। रोटी आराम से खानी चाहिए बेटे। इसी के लिए दिन-रात पसीना बहाया करें हैं हम, ये जमीन हमारी माँ है, लाख तकलीफें सहकर वो फसलें पैदा करती है, हमसे ज्यादा कौन समझेगा यह?" खेतों में लहलहाती फसल की ओर देखते हुए दद्दा ने कहा।
"सिर्फ़ मेहनत, पसीना अपना है जी, बाकी तो सब उनका ही है।" बड़ी हवेली की ओर अँगुली दिखाती मीतो बड़बड़ाई।
"रहन वास्ते घर, पक्की छत, दो टैम रोटी, मान-प्यार सब तो मिलता है मीतो, और क्या चाहिए तुझको?" करतार ने आसमान की ओर हाथ जोड़कर कहा।
"मैं चला अब घर, मास्टरनी जी ने खूब काम दिया है लिखने का, अब शाम ही आऊंगा, आपका सामान पकड़ने। आज रानी को भी लेता आऊंगा रोज दिमाग खाती है कि "खेतों पर ले चल" वीरा।" जगत ने रोटी की खाली टोकरी कपड़े में बाँधकर, घर की ओर कदम बढ़ा लिए।
"ना-ना पुत्तर, रानी को ना लाना, छोटी बच्ची है अभी से खेतों का काम नहीं डालना उस पर।" करतार और मीतो ने एक स्वर में कहा।
जगत को आश्चर्य हुआ कि उसको तो पाँच बरस की उम्र से माँ-दद्दा खेतों में साथ लेकर आते थे, अब रानी सात की है फिर भी छोटी है।
जमींदार के परिवार से जुड़कर करतार को कई बरस हो गए थे। परिवार के नाम पर पिता-पुत्र को ही देखा था उसने, बड़ी मालकिन तो छोटे मालिक के जन्म के समय ही गुजर गयी थीं।
आज भी वह सबकुछ करतार की आंँखों में घूमता है कि जब बड़े मालिक से उसकी पहली मुलाकात हुई थी।
कुछ बच्चे मिलकर दस साल के करतार की पिटाई कर रहे थे। वह अकेला अपने आपको बचाने की कोशिश कर रहा था। तभी बाजू में खुली जीप, संग दो मोटरसाइकिल आकर रूकी।
"क्यों मार खा रहा, क्या किया तैणे इनका।" ऊँची कद काठी, घनी मूँछे, साँवला रंग और रोबदार आवाज़ के मालिक, बड़े जमींदार जी ने उससे प्रश्न किया।
पिटाई करने वाले तो सब इधर-उधर भाग गए, करतार ने उत्तर दिया, "मैंने चायवाले की दुकान सुबह से अब तक काम किया। उसने चाय बिस्कुट खाने को दिया और एक रुप्पैया भी, ये बदमाश मेरा रुप्पैया छीनकर भाग गए। मैं छोड़ूंगा नहीं, मारूंगा एक-एक को।" जमींदार की नजरों से नजरें मिलाकर उत्तर दिया था उसने।
"तेरे माँ-बाप कहाँ हैं जो तू यूँ काम करता फिरे है मुंडे, उम्र तो कम लग रही तेरी, नाम तो बोल तेरा।" जमींदार का स्वर गूंँजा।
"माँ-बाप तो पता नहीं, बाजू के गाँव में था, भजन मंडली साथ आ गया इधर, नाम करतार है जी।" छोटे करतार का उत्तर था।
"जगीरा, जरा पता लगाना इस मुंडे के हालात का।" दोनाली पकड़े अपने कारिंदे से बोले थे जमींदार जी।
"जी मालिक, शाम तक सब बताता हूँ।" काले रंग के, लाल आँखों से घूरते जगीरे ने नम्र स्वर में कहा।
"हमारे पास काम करना हो तो सुबह उस मकान में आ जाना लड़के।" जमींदार ने कहा और जीप आगे बढ़ गई।
दूसरे दिन सुबह-सबेरे ही करतार उस बड़ी हवेली के सामने पहुँच गया।
"क्या देख रहा बे दीदे फाड़ कर, कभी मकान नहीं देखा तैणे? चल भाग यहाँ से।" गेट पर खड़े चौकीदार ने अपना धर्म निभाया।
"मुझे मालिक ने बुलाया है, काम देंगे।" करतार की बात सुनकर चौकीदार सिर खुजलाने लगा।
"बित्ते भर का मुंडा, हवेली में काम करेगा। भाग जा, अपनी बेब्बे के नाल मालिक का नाम पूछ ले फिर काम करना।" उसकी खूँखार आवाज़ से डरकर करतार वापस होने ही वाला था कि कलवाला कारिंदा सामने दिख गया।
"ओ छोटे मालिक, ओ छोटे मालिक! बड़े मालिक ने कल बुलाया था ना, ये जाने नहीं देता,आप समझाओ ना।" करतार के अंतिम शब्द मुँह में ही रह गए।
जगीरे ने दौड़कर करतार के मुँह पर अपना पंजा रख दिया।
"अबे, पागल है क्या? मैनू छोटे मालिक पुकार रहा, मैं चाकर हूँ मालिक का, छोटे मालिक बाहर रहते हैं।" जगीरा और चौकीदार के बीच कुछ खुसुर-पुसुर हुई और फिर करतार को हवेली में प्रवेश मिल गया।
बड़े मालिक के चाकरों ने उसकी उम्र के हिसाब से उसे काम समझा दिया। खेतों की रखवाली, मवेशियों को पानी पिलाना, बैठकों में पानी, शर्बत ले जाना, कभी कभी बड़े मालिक उससे अपने पैर भी दबवाते थे।
पिछले अहाते में चाकरों के रहने के लिए खोलियाँ बनी थीं। एक छोटी सी, दो चारपाई रखने भर की जगह, करतार को मिल गई। इससे ज़्यादा की ज़रूरत थी ही नहीं उसे, रात ही सोने आता। गर्मियों में तो खाट बाहर ही निकाल लेते थे सब।
धीरे-धीरे आसपास के कारिंदों और नौकरों के परिवार का हिस्सा बन गया था वह। उसकी दो समय रोटी की किसी ना किसी के घर लिखी रहती थी। मालिक का दिया अनाज वह इन्हीं लोगों के सुपुर्द कर देता था।
समय तो निरंतर चलता रहता है। उसे ना तो छत, ना रोटी और ना ही किसी बात की फ़िक्र होती है। किसी के आगे रूकना, झुकना उसने सीखा ही नहीं, मस्त मलंग अपनी रौ में बहे जाता है।
मालिकों की सेवा, हवेली के प्रति ईमानदारी से काम करते करतार जवान हो गया। करतार की मूँछें अपने हाथ-पैर फैलाने लगीं और बड़े मालिक की मूँछे रूई की मानिंद सफेद हो गईं। हवा यह थी कि छोटे मालिक ने विदेशी मेमसाब से विदेश में ही व्याह कर लिया था। इस साल वो हवेली की उस छोटी मालकिन को लाने वाले थे।
"करतारे, अब ब्याह कर ले तू, कब तक हम तेरी रोटी बनाएंगे। अब अपने लिए रोटी पानी करने वाली ले आ।" आसपास की चाचियांँ, मौसियांँ उलाहने देते कहने थीं।
"कौन करेगा मुझसे व्याह चाची, ना खुद का घर ना पैसों वाला काम। मालिकों के सहारे खुद की चला लेता हूँ।" करतार ने कहा।
"रिश्ते में भतीजी लगती है मेरी, नाम है मीतो। बड़ी अच्छी कुड़ी है, घर का सब काम-धाम जानती है करतारे, तेरी तरह उसके भी माँ-बाप नहीं हैं।" चाची ने करतार के मन में विवाह और परिवार के लिए जगह बना दी।
सत्ता, दौलत खिसकते हुए बड़े मालिक से छोटे मालिक की ओर बढ़ गई थी। अब हर बात छोटे मालिक ही सुनते सुलझाते। बूढ़े जगीरा ने, अपने बड़े मालिक से करतार के व्याह की बात पूछ ही ली और बड़े मालिक ने उसकी बात पर "हाँ" की मुहर लगा दी।
विदेश में हवेली का वारिस पैदा हुआ और उसके अगले महीने ही मीतो करतार की दुल्हन बनकर, उसके घर आ गई। मालिक की दया से दो कमरे का, पक्का सीमेंट का मकान मिल गया था करतार को। मीतो ने मकान को घर बनाया, करतार के जीवन में खुशियों की बरसात होने लगी। मीतो रसोई बनाती, साफ-सफाई करती, करतार के लाए अनाज को संभालकर चलाती।
"सुनते हो, अब सिर्फ़ अनाज से काम नहीं चलेगा। रुपए पैसों की भी जरुरत पड़ती है ना घर-गृहस्थी में। आगे बच्चे होंगे, खर्चा तो आएगा ना।" मीतों ने अपने मन की बात कही।
"मालिक ने मुझसे अनाज का वादा किया था मीतो, पैसों की बात नहीं थी।" करतार ने सिर झुका लिया।
"कोई ना जी, मैं भी चलूंँगी तुम्हारे साथ खेतों पर, मेरी रोजी पैसों की मांँग लेंगे।" मीतो ने कहा।
"तू जाएगी खेतों पर काम करने, क्यों? मीतो अनाज के बोरे उठाना, फसलों की देखभाल करना, मवेशियों को दाना-पानी खिलाना, चारे के गट्ठे ढोना कठिन है, न..तू ना कर पाएगी।" करतार ने सीधे मना कर दिया।
औरत, अपने घर, बच्चों के लिए बहुत दूर तक सोच लेती है। मीतो को पता था कि बच्चा आएगा तो उसके कपड़े, खिलौने, पढ़ने-लिखने के लिए पैसों की ज़रूरत पड़ेगी और करतार के लाए अनाज से सिर्फ़ काम नहीं चलेगा।
छोटी मालकिन अपने साल भर के पुत्तर को लेकर, महीने भर के लिए हवेली आई थीं। सुना कि वो अक्सर बड़े मालिक के पास बैठतीं, चाकरों से बातें करतीं और उनकी भाषा को समझने बोलने की कोशिश भी करतीं। बड़े मालिक अपनी इस विदेशी बहू के संस्कारों और स्वभाव से बहुत खुश थे। अपने पोते के साथ दिनभर खेला करते थे।बच्चे को आशीर्वाद, शगुन और न्यौछावर करने के लिए, मीतो भी चाची के साथ हवेली गई थी।
मीतो के चेहरे की चमक, उभरते पेट को देखकर छोटी मालकिन ने पूछा -"टुम प्रैग्नैंट है?" भाषा अँग्रेजी हिन्दी की खिचड़ी थी।
"हहह" मीतो इधर-उधर देखने लगी।
हँसकर मालकिन ने मीतो के पेट पर हाथ रख दिया और इशारे से पूछा।
चुन्नी के छोर से, मुँह छुपाते हुए मीतो ने, अपना पंजा फैला दिया।
"फाइव मंथ्स, वावव।" मालकिन ने भी अपनी पाँचों अँगुलियाँ फैला दीं।
वो झट से अंदर चली गई और हाथ में कुछ पैकेट ले आईं।
"टेक इट, यू शुड ईट ड्रायफ्रूट्स एवरी डे, फॉर योर बेबी।" उन्होंने मीतो के हाथों में काजू, बादाम और अखरोट के पैकेट पकड़ा दिए।
"बेबी नहीं मेमसाब, करतार जैसा मुंडा चाहिए मैनू।" मीतो बोल पड़ी।
"यस यस, यू ईट ड्रायफ्रूट्स एवरी डे।" मीतों भाषा तो नहीं समझी परंतु एक स्त्री का दूसरी के प्रति स्नेह, उसे समझ आ गया।
"मेमसाब, इसको काम पर रख लो, सब चाकरी करेगी चार पैसे मिल जाएंगे मेमसाब। बच्चे के लिए तो चाहिए ना।" चाची ने आधी बातें बोलकर, आधी इशारों से अभिनीत कर दी।
मेमसाब ने दूसरे दिन से ही मीतो को काम पर बुला लिया।
मेमसाब तो महीने भर बाद वापस चली गई परन्तु मीतो के लिए हर महीने बँधी रकम कहां इंतज़ाम कर गई।
अब जगत के पैदा होने तक चार महीने के सौ रुपए जमा हो गए थे मीतों के पास।
करतार सुखी था। पाँच-दस पैसों के लिए भटकने वाले बचपन को भोगा था उसने। अपने बेटे के सिर पर, मीतो का ममता भरा आँचल देखकर, वह रब का दिन-रात शुक्र अदा करता।
सवा महीने तक मीतो ने खाट पर लेटे, घी दूध खाते, जच्चा बनने का सुख लिया। आसपास का परिवार वाले कभी मामा-मौसी बन जाते तो कभी सास-ननद, बुआ- चाचा। बच्चे की तबीयत ऊँच-नीच होती तो सारी रात सिरहाने बैठे, उसको घुट्टी पिलाते, पेट की हवा निकालने का उपाय करते।
दो महीने के जगत को आँचल में समेटे मीतो काम पर जाने लगी। एक दिन बड़े मालिक ने बच्चे के लिए, करतार के हाथों से सूर्य के लॉकेट वाली चाँदी की चैन भेजी।
मालिक का अपनेपन और आशीर्वाद आज भी जगत के गले में शोभा देता है।
जगत पाँच साल का हुआ और मीतो ने रानी को जन्म दिया। करतार को घर बुलाने के लिए, जगत पहली बार हवेली के अंदर गया।
बड़े बड़े कमरे, पीले सुंदर बल्बों की सजावट, नक्काशीदार कुर्सियांँ, झाड़-फानूस देखकर, बच्चे का मुँह खुला रह गया।
सामने एक वृद्ध बैठे थे। जगत ने पहली बार हवेली के बड़े मालिक को देखा था। सफेद मूँछें, थोड़े झुके कंधे और तेज़ नजरें।
"मालिक, मेरे दद्दा कहाँ हैं?" इस दुनिया के बादशाह से सीधा प्रश्न कर दिया था जगत ने।
"कौन है तू बच्चे?" सधी आवाज़ थी उनकी।
"मैं जगत, करतार मेरे दद्दा। वो घर पर छोटी बहन हुई है इस करके बुलाने आया।" जगत बोलता जा रहा था और उसकी आँखें, मालिक के सामने दूध से भरे कटोरे पर चिपक गई थीं।
चमकता, नक्काशीदार कटोरा, बेल-बूटे, मोर और मीनाकारी किया, जगत के लिए दुनिया का सबसे सुंदर कटोरा। उसमें भरे मेवे वाले दूध ने, उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा दिए थे।
"करतारे का पुत्तर है तू?" बड़े मालिक ने एक भरपूर दृष्टि उसपर डाली, जैसे अंदर तक सब देख लेना हो। गले में लटकती सूर्य के लॉकेट वाली चाँदी की चैन ने उसके करतार के बेटे होने पर मुहर लगा दी।
जगत एकटक उनके बूढ़े परंतु रोबीले चेहरे को देखता रहा फिर कमरे से बाहर निकल आया। गलियारे में ही था कि सामने से इस हवेली के वर्तमान कर्ता-धर्ता, छोटे मालिक आ गए।
"कौन है बे तू, अंदर कैसे घुस आया कमबख़्त? एक भी मुलाजिम तैनात नहीं जो हवेली के आने-जाने वाले ऐसे घुसपैठियों पर नज़र रखे।" नशे में धुत्त सामने खड़े उस व्यक्ति ने जगत का हाथ पकड़ लिया।
"दद्दा को बुलाने आया था, करतार मेरे दद्दा। घर पर बहन हुई है इस करके आया था।" रुआंसे जगत ने अटक-अटक कर उत्तर दिया।
"अपने बाप को ढूँढते आ गया मालिक, माफ़ कर दीजिए, बच्चा है। हवेली के नियम जानता नहीं।" सिर और चेहरे पर चुन्नी ढांकते हुए एक कामवाली बोली।
"हवेली अब आने-जाने का रास्ता बन गई है क्या? चल भाग यहाँ से वरना टांगें तोड़ दूँगा।" छोटे मालिक ने झटके से हाथ छोड़ा और जगत गिर पड़ा।
उठकर बेतहाशा हवेली से घर की ओर भागने लगा, रास्ते में खड़े अपने पिता पर भी उसका ध्यान नहीं था।
"जगत..ऐ जगते! पुत्तर कहाँ गया था, भाग क्यूँ रहा है तू?" करतार ने दौड़कर उसका पीछा किया।
जगत के पैरों में ब्रेक लग गए, वह अपने पिता के पेट से चिपक गया।
"दद्दा, छोटी बहन हुई है, माँ ने बुलान वास्ते भेजा था। मैं हवेली में चला गया, बड़े मालिक के सामने।" वह साँस लेता और फिर बड़बड़ करता, "बड़े मालिक के सामने बड़ा सुंदर, मोर वाला कटोरा था, उसमें दूध भरा था। दद्दा, मेरे वास्ते लाओगे वैसा कटोरा..बोलो ना..।" जगत अपने को पड़ी डाँट-फटकार और तो और छोटी बहन को भी भूल गया था।
रानी, यही नाम रखा था सबने जगत की बहन का। दो-तीन महीने की रानी, जगत के लिए खिलौना बन गई थी।
हवेली की हवा बदलने लगी थी। पुराने कई लोगों को निकालकर, छोटे मालिक नए चेहरों को हवेली का काम सौंपा था। बड़े मालिक के चंद वफ़ादारों को वो नहीं निकाल सकते थे, यही बड़े मालिक का हुक्म था। बड़े मालिक की हालत दिन ब दिन ख़राब होती जा रही थी और छोटे मालिक के रंग-ढंग।
मीतो और करतार अपने बढ़ते परिवार की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त रहने लगे।
एक सुबह हवेली में मातम छा गया। बड़े दिलवाला एक जमींदार दुनिया छोड़ कर चला गया था। उस मालिक के जाने के ग़म में किसी चाकर के घर चूल्हा न जला जिसने सब नौकर-चाकरों से प्रेम, विश्वास और संवेदनाओं का रिश्ता बनाया था। आज उसने ईश्वर के साथ हमेशा के लिए रिश्ता जोड़ लिया था।
छोटे मालिक ने हवेली का रवैया ही बदल दिया, अब मालिक का चाकरों से सिर्फ डर और दबाव का रिश्ता रहा गया था।
वर्चस्व देखने वाली हवेली सूनेपन से भर गई थी। लगता था बड़े मालिक के साथ सारी रौनकें चली गई थीं।
"सुना है विदेशी छोटी मालकिन ने मालिक को छोड़ दिया है। वो अब कभी नहीं आएंगी, अपने पुत्तर को भी न छोड़ेंगी मालिक के पास।" बूढ़ी, पुरानी सज्जो चाची ने समाचार दिया।
"ओह! बड़ी अच्छी जनानी है मेमसाब तो, जाने क्या हुआ। पुत्तर तो माँ के पास ही रहे तो चंगा है।" मीतो ने दुःख से कहा। नेकदिल मालकिन की खुशी के लिए मीतो हाथ जोड़ रही थी।
"रौशन नाम रखा है छोटी मालकिन ने अपने पुत्तर का, सुना है कि बड़े मालिक ने रखवाया था।" सज्जो का अंदर बैठक तक बड़ा आना-जाना था।
तूफानों को झेलकर, समय और बलवान होता जाता है। उसकी गति, निरंतरता स्वयं को चुनौती देती है। अपनी चाल के परिणामों से अनभिज्ञ बनता हुआ, वह स्वयंमुग्धता से गतिमान रहता है।
हवेली छोटे मालिक के रंग में रंग गई। सुरसा के मुँह के समान बढ़ते छोटे मालिक के खर्चों ने, हवेली के रखरखाव, नौकरों को दिए जाने वाले अनाज और पैसों को निगलना शुरू कर दिया। विदेशी शराब, सिगरेट, महंगे इत्रों से आलमारियांँ कसमसाने लगीं और बाप-दादाओं की ज़मीनें, टुकड़ों में बिकने को मजबूर हो गईं। विदेशी मालकिन ने, बेटे को पिता के साथ भेजना स्वीकार नहीं किया, अलबत्ता मालिक साल में एक-दो बार जाकर बेटे से मिल आते।
पुराने बुरे अनुभव के कारण बारह-तेरह साल का जगत, हवेली में जाने से घबराता और रानी को तो माँ- बाप ने मनाही कर रखी थी।
इस बीच गाँव भर हवा फैल गई कि विदेशी मेमसाब अपने पुत्तर के संग अंतिम बार आने वाली हैं। कोई कहता हवेली का हिस्सा लेने, कोई कहता बड़े मालिक की इच्छा पूरी करने, चाहे जो हो मीतो तो उनके आने के समाचार से फूली न समाती थी। आखिरकार उन्होंने ही तो उसे काम दिया था और मेवे में भरकर उसके होने वाले बच्चे के लिए प्यार, कैसे भूल जाती मीतो?
उनके कमरे की साफ-सफाई, पर्दे, चादर बदलने और सजावट का काम मीतो ने ले लिया था। जाती हुई ठंडक के पग चिह्नों को, रंग-बिरंगे फूलों से सजाती बसंत आ रही थी। मेमसाब के कमरे में पीली चादर, पीले पर्दे और पीले फूलों से सजावट करने को उत्सुक मीतो ने जगत से कहा, "झाड़ियों के बीच सूरजमुखी के फूल खिले हैं जगते, आठ-दस तोड़ लाना हवेली में आज। डंडी लंबी रखना, फूलदान में सजाना है। मेमसाब आएंगी कल-परसों में तो खुश हो जाएंगी।" कहती हुई मीतो काम पर चली गई।
"अरे माँ, मुझे नहीं आना वहाँ।" जगत की आवाज़ को अनसुना कर वह निकल गई।
शाम के पहले ही सात-आठ फूलों को सुतली से बाँधकर, जगत हवेली की ओर चल पड़ा।
"जगते, किधर चला तू?" ट्रैक्टर पर बोरे लादते करतार ने आवाज़ दी।
जवानी की पहली सीढ़ी में कदम रखते जगत ने अपने बाप को देखा। पसीने से लथपथ, भरी बोरियाँ उठाते उनकी आँखें प्रेम और विश्वास से लबालब थीं। अपने जवान होते बेटे की नाक के नीचे पड़ी हरी लाइन से, भविष्य में मूँछदार गबरू जवान की कल्पना मात्र ने पिता की थकान दूर कर दी।
"माँ ने फूल मंगवाए थे, कहती थी विदेशी मेमसाब आने वाली हैं सो सजावट वास्ते चाहिए।" कहता हुआ वह हवेली की ओर कदम बढ़ाने लगा।
"आराम से जा पुत्तर, माँ को फूल देकर तुरंत घर वापस जाना, रानी अकेली होगी।" कहता हुआ करतार माथे का पसीना पोंछकर वापस बोरी उठाने लगा।
हवेली की खूबसूरती देखते, गलियारे को पार करते हुए जगत के पैर खुद ब ख़ुद बड़े मालिक के कमरे की ओर चल पड़े।
डिजाइन वाली लाल कालीन, झाड़ फानूस, लकड़ियों पर खुदाव वाली बड़ी-बड़ी कुर्सियांँ और मेज़। कोने पर की जालीदार लकड़ी की तिपाई और उसपर रखा लट्टू वाला लैंप। जगत की आँखें इस सुंदर दुनिया को निहारते हुए, इस कमरे की बेशकीमती, सुंदरतम वस्तु पर जम गईं।
कोने की मेज़ पर शान से इठलाता नक्काशीदार, बेल-बूटे, मोर और मीने से जड़ा वह कटोरा रखा था। सारी दुनिया की सुंदरता सिमट कर उस कटोरे में मानो समा गई थी। जगत का मस्तिष्क शिथिल हो गया, और पैरों ने चलकर उसे कटोरे तक पहुँचा दिया। हथेलियों के बीच जगत की सारी दुनिया आ गई। बचपन में बड़े मालिक का इस कटोरे में दूध रोटी खाना, उसकी आँखों के सामने घूमने लगा। एक झनझनाहट सी उसके पूरे बदन में तैर गई और वह एक-एक नक्काशी, मीनाकारी को अपनी आँखों से दिल में उतारने लगा।
"कौन है बे यहाँ? क्या चुरा रहा था साले? तेरी इतनी मज़ाल की इस कमरे में घुसकर सामान चोरी करे।" लड़खड़ाते कदमों से आए छोटे मालिक की आवाज़ से कंपकंपा कर जगत के हाथों से कटोरा छूट गया।
"ठन्न.. ठन्न..!" इस आवाज़ ने समय को रोक दिया।
"खानदानी कटोरा चुराने आया था। अरे जग्गा..दलेर..कहाँ मर गए सबके सब। पकड़ो इसे, भागने न पाए।" छोटे मालिक की आवाज़ जगत के कानों तक जा रही थी परंतु आगे सबकुछ शून्य हो गया था।
दो मिनट में सारे नौकर-चाकर जमा हो गए और सबसे पीछे थी मीतो।
"नसीब अच्छा था कि मैं समय पर आ गया वरना तो हाथ साफ करके भाग गया होता ये हरामी का पिल्ला।" छोटे मालिक की लाल-लाल आंँखें, गाल तक आने की भरसक कोशिश कर रही थीं।
"मालिक, मेरा पुत्तर है यह। मेमसाब के कमरे को सजाने वास्ते फूल ले आया है मालिक। गलती से इस कमरे में घुस गया मालिक, माफ़ कर दो।" चुनरी से सिर मुँह ढांकती हुई मीतो, छोटे मालिक के पैरों के पास बैठ गई।
"ग़लती से आ गया था या चोरी सिखा रही अपने पिल्ले को साली।" चाकरों को दी जाने वाली, विभिन्न विशेषणों से युक्त गालियों का पिटारा खोल दिया उस आदमी ने।
"माफी दे दो मालिक, छोटी मालकिन ने काम पर रखा था, बड़े मालिक ने आसरा दिया, ये चोर नहीं है मालिक।" रोती हुई मीतो ने जगत के मुँह पर, पीठ पर घूंँसे, थप्पड़ों की बौछार कर दी।
"मार डालेगी क्या बेटे को? मालिक आपके पुत्तर के उम्र का बच्चा है, आपका पुत्तर वारिस इस खानदान का, उसको रब सब खुशी देंगे मालिक। इसको माफ कर दो।" बूढ़ी सज्जो ने हिम्मत दिखाई, वही बड़े मालिक के करीबी कामवाली भी थी।
कटोरा पोंछकर जगह में रख दिया गया। बिखरे फूलों को उठाकर मीतो ने, जगत का हाथ पकड़ा और मालिक को झुककर अभिवादन करती हुई बाहर निकल गई।
"इस महीने का अनाज, पैसा नहीं मिलेगा इसको। आगे एक महीने अपनी सूरत न दिखाना इस हवेली में।" मीतो ने सिर झुका कर सब स्वीकार कर लिया और हवेली से बाहर निकल आई।
इस घटना का मुख्य पात्र वह कटोरा, मौन मूक यथास्थान विराजमान हो गया था। घर जाती मीतो की नजरें करतार को ढूँढ रही थीं और जगत का सारा ध्यान उस कटोरे से गिरे एक खूबसूरत मीना पर था जो छिटक गया था। कटोरे के एक ओर बने मोर की पीठ का लाल मीना, जिसे हरे, नीले मीनों की कलाकारी ने घेर रखा था। इस मीने के गिरने का भान सिर्फ जगत को था और वह उस कटोरे के अंग-भंग होने पर मुस्कुराने लगा।
"नालायक, किस बात की खुशियांँ मना रहा है। मेरे प्राण निकल गए थे, चल तेरे बाप को बताती हूँ।" उसे घसीटती हुई मीतो घर ले आई।
उधर मंडी से आने पर करतार को पता चला और वो भागा भागा घर आ गया। पैसा, अनाज ना मिलने का ग़म, बेइज्जती के दुःख से हल्का था। मीतो ने दोनों बच्चों के साथ खुद को जैसे घर तक कैद कर लिया था। करतार का खाना भी उसके साथ ही बाँध देती थी वह।
छोटी मालकिन अपने पुत्तर संग आ गई थीं।
"गोरा-गोरा, ऊँचा, बड़ा सुंदर जवान है मेमसाब का पुत्तर। बात कम करे, हँसता रहता है।" सज्जो बड़े मालिक की सबसे वफादार सेविका, बड़े मालिक के वारिस की तारीफ न करती तो क्या करती।
"फल, मेवे,दूध, मलाई खाने वाले ऐसे ही रहते हैं चाची, हमारे तुम्हारे जैसे नहीं।" छोटे मालिक के रवैये की चोट, मेमसाब के रौशन तक पहुँचा दी थी मीतो ने।
मीतो, मन ही मन मेमसाब की तारीफ करती जिसने विदेशी होकर भी बड़े मालिक की अंतिम इच्छा पूरी की। अपने पुत्तर संग पूजा पाठ किया। उनके अपने बेटे (छोटे मालिक) ने तो भूल से भी इस बारे में कभी सोचा नहीं, अपनी अय्याशियों में ही मशगूल रहे।
एक शाम जगत पढ़ाई कर रहा था, मीतो वहीं खाट पर बैठी रानी की चोटियाँ बना रही थी। खेतों की ओर से कुछ लोग उसकी तरफ़ आते दिखाई दिये। उसका मन काँप गया, अगले दो दिनों में उसके सज़ा की मियाद पूरी होने वाली है तो अब क्यों इधर आ रहे लोग?
रानी के बालों में कंघी घुमाते हुए, चुन्नी चेहरे पर डाले, नीची नजर नहीं से उस दिशा में देखती थी।
"कैसी हो मीटो?" सामने विदेशी मेमसाब और उनका पुत्तर खड़े थे। जग्गा, सज्जो चाची और करतार भी साथ थे।
"मेमसाब, आप खेतों से चलकर क्यों आईं, मुझे बुलवा लिया होता हवेली में?" अचकचाती हुई मीतो बोल पड़ी।
"शी इज योर डॉटर..? एम आई राइट?" बरसों पहले की वहीं प्रेम भरी आवाज़, मुस्कुराता चेहरा।
"रानी, मेरी बेटी मेमसाब। मेरा पुत्तर जगत..ऐ जगते.. आ बाहर, देख मेमसाब आई हैं।" अपने दोनों बच्चों को मेमसाब के पैर पड़ने का संकेत किया मीतो ने।
"नो..नो, आय एम नॉट गॉड।" मेमसाब ने उन दोनों को कंधों से पकड़ लिया।
"रौशन आपका पुत्तर मेमसाब, बिल्कुल आपके जैसा गोरा-गोरा, सुंदर है।" मीतो ने जगत से "सुंदर" के लिए अँग्रेजी शब्द पूछा।
"ब्यूटीफुल" जगत ने कहा तो मेमसाब और रौशन हँसने लगे।
अपने पुत्तर के साथ मालकिन चारपाई पर बैठ गई। चाकरों के घरों में अजीब सी खुशी थी, आज उनके बड़े मालिक का वारिस उनके आँगन तक चलकर आया था। आज तक हवेली से कोई इस तरह आया नहीं था।
"सनफ्लावर्स..वेरी ब्यूटीफुल, यू डिड नाइस डेकोरेशन मीटो।" उसने बिना कुछ समझे सिर हिला दिया।
"मैं वापस जा रही हू मीटो... अपने देश। नेक्सट कब आउगी, डोंट नो। आय लव यू ऑल।" कहते हुए उनकी हरी-हरी पुतलियों वाली आँखें तरल हो गईं।
भावों को भाषा की जरूरत नहीं होती। सबकी आँखें नम हो रही थीं।
"गो एनी वेयर मीटो करटार। अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए, गो एंड डू अदर वर्क।" मेमसाब ने कुछ रूपए मीतो को पकड़ा दिए।
करतार के आँखों के सामने बरसों पहले की, बड़े मालिक से हुई उसकी पहली मुलाकात की स्मृति ताजी हो गई। उनके ऐसे ही प्रेम, विश्वास भरे शब्दों और सहारे ने एक अनाथ बच्चे की ज़िंदगी को दिशा दिखाई थी। उसे लगा बड़े मालिक की बातें, छोटी मालकिन के शब्दों से दोबारा उसके बच्चों के जीवन के लिए नई राह बना रहे हैं।
हवेली का वारिस, मेमसाब का पुत्तर भी तो पहली बार आया था, उसे कुछ शगुन तो देना चाहिए था, क्या था मीतो के पास।
मीतो ने जगत को अंदर बुलाया। उसके गले की सूर्य लॉकेट वाली चाँदी की चैन निकाल लिया उसने। बड़े मालिक की निशानी उन्हीं के वारिस को सौंप सकती थी और तो कुछ था नहीं उसके पास।
अपने हाथों से रौशन को पहना दिया मीतो ने।
"इट्स ब्यूटीफुल आंटी, थेंक यू।" अपने लॉकेट को देखता हुआ वह खुशी से बोला।
"मेमसाब, आप जाओगी परंतु मैं हवेली में नहीं आ सकती, छोटे मालिक का हुक्म है।" नज़रें नीची करके मीतो ने कहा।
"आई नो मीटो..मे आई ना मिलने।" मेमसाब उठ खड़ी हुईं।
खेतों के अन्तिम छोर तक मीतो उनको विदा करने आई थी। ना जाने क्यों उस विदेशी मेमसाब के जाने पर मीतो का दिल कसकने लगा था।
अपने हिस्से का बंटवारा करके, पैसे और बेटे को साथ लेकर छोटी मालकिन वापस चली गई थीं। बड़े मालिक के चंद वफ़ादारों को, गाँव में स्कूल बनवाने के लिए मालकिन ने अपने हिस्से की कुछ जमीन और पैसे दे दिए थे।
जाते वक्त हवेली के हर एक नौकर के परिवार के लिए, उपहार और पैसे दिए थे उन्होंने।
"मीतो, तेरे वास्ते भी मेमसाब ने कुछ भेजा है। एक ख़त भी दिया है।" सज्जो चाची ने एक कागज का पुर्जा और एक उपहार का बक्सा मीतो को पकड़ा दिया।
"जगत...ऐ जगते! पढ़ जरा मेमसाब ने क्या संदेसा भेजा है?" मीतो ने जगत को बुलाया।
जगत कागज़ पर लिखी पंक्तियों को पढ़ने लगा। अँग्रेजी और टूटी-फूटी हिंदी में लिखा था।
मीटो,
योर चिल्ड्रेन आर वेरी स्मार्ट, उनको बोत पढ़ाना। शहर जाओ, मैं मनी दिया, वर्क मिलते तक इसे यूज़ करना।
योर फ्रेंड
मैरी
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आज पहली बार सबने छोटी मालकिन का नाम सुना।
"मीतो, मेमसाब ने हमको भी कपड़े, सौगातें और पैसे दिए। बड़ी भली है वो।" जगीरे की पत्नी और सज्जो चाची ने बताया।
जगत और रानी ने उपहार का बक्सा खोल लिया।
सुंदर नक्काशी, बेहतरीन मीनाकारी का नमूना 'वह कटोरा' सामने चमचमा रहा था। जगत की आँखें फैली रह गईं, मोर के निकले उस मीने के अलावा आज भी वह कटोरा, दुनिया का सबसे सुंदर कटोरा लगता था।
साथ में एक पेपर कुछ रुपए थे।
"अपने बेटे रौशन को उसके दादाजी की ओर से मिला यह नक्काशीदार कटोरा, हम मीतो और करतार के बेटे जगत को उपहार में देते हैं।
मैरी एवं रौशन
नीचे सरकारी ठप्पा और स्याही से दस्तख़त थे।
कटोरे की हर एक नक्काशी से, बड़े दिल वाली छोटी मालकिन मुस्कुरा रही थी।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)