मंगलवार, 29 जुलाई 2025

कहानी - मेमसाब

कहानी-  मेमसाब

"खड़ा-खड़ा क्या देख रहा है रे जगते, जा भाग कर घास का गट्ठा उठा ला।" दद्दा की आवाज़ से जगत सपनों से जाग गया।
हरे, सूखे घासों के गट्ठों को सिर पर उठाते समय, घास का एक नुकीला छोर उसके गर्दन पर टुचकने लगा। एक हाथ से उसे गर्दन से दूर हटाते, तेज़ कदमों से वह उस महलनुमा हवेली के द्वार में समा गया।
बड़े से परिसर के दोनों ओर लोहे की सलाखों वाली कोठरियों में पशुओं के लिए चारा भरना चालू है। बारिश के बाद उगी बड़ी घासों की कट्टी, हर पालतू मवेशी का मनपसंद चारा होता है।

अपने सिर पर से गट्ठा उतारते हुए जगत ने, एक हसरत भरी निगाह हवेली पर डाली। सामने की सड़क से तेज़ी से एक जीप और पीछे चार-पांँच मोटरसाइकिलें हवेली में घुस गईं। खेतों की ओर के हवेली के पिछले हिस्से में बने, लोहे के सलाखों वाले कमरों तक जगत की पहुँच थी। उसके माँ-दद्दा काम पड़ने पर हवेली के अंदर आते जाते रहते थे।

पंद्रह-सोलह गट्ठे पहुँचाकर पेड़ के नीचे, खेतों की मेड़ पर जगत पसर गया। खन्न-खन्न, खन्न-खन्न की चिर-परिचित ध्वनि पास आने लगी और जगत के पेट में दौड़ते चूहों की गति और बढ़ गई।

"माँ, आज देर कर दी तुमने, मुझे तो जोरों की भूख लग गई।" आँखें बंद किए किए ही जगत ने कहा।
"हाँ-हाँ, आज तो  खूब गट्ठे उठाए रे जगते, भूख लगेगी ही। मीतो...आज अपने पुत्तर को एक रोटी ज़्यादा खिलाना।" करतार की आवाज़ सुनकर जगत उठ बैठा।

मीतो ने रोटी की टोकरी खोली। कपड़े की परत तले दबी रोटी ने खुलने पर अँगडाई ली और खुले आसमान की ओर देखने लगी। उसके पोर-पोर को छूकर बहने वाली हवा, सोंधेपन के किस्से सुनाने लगी। इस किस्से में अपना तेज, चटकीला प्रसंग जोड़ने में, आलू की तरकारी पीछे न रही। आम के सूखे अचार की फांकें और रहस्य की तरह परत दर परत खुलता प्याज़ का टुकड़ा, सचमुच माँ के खाने का तिलिस्म चारों ओर फैल गया था।

"धीरे से खा जगते, ठूँस मत। रोटी आराम से खानी चाहिए बेटे। इसी के लिए दिन-रात पसीना बहाया करें हैं हम, ये जमीन हमारी माँ है, लाख तकलीफें सहकर वो फसलें पैदा करती है, हमसे ज्यादा कौन समझेगा यह?" खेतों में लहलहाती फसल की ओर देखते हुए दद्दा ने कहा।
"सिर्फ़ मेहनत, पसीना अपना है जी, बाकी तो सब उनका ही है।" बड़ी हवेली की ओर अँगुली दिखाती मीतो बड़बड़ाई।

"रहन वास्ते घर, पक्की छत, दो टैम रोटी, मान-प्यार सब तो मिलता है मीतो, और क्या चाहिए तुझको?" करतार ने आसमान की ओर हाथ जोड़कर कहा।

"मैं चला अब घर, मास्टरनी जी ने खूब काम दिया है लिखने का, अब शाम ही आऊंगा, आपका सामान पकड़ने। आज रानी को भी लेता आऊंगा रोज दिमाग खाती है कि "खेतों पर ले चल" वीरा।" जगत ने रोटी की खाली टोकरी कपड़े में बाँधकर, घर की ओर कदम बढ़ा लिए।

"ना-ना पुत्तर, रानी को ना लाना, छोटी बच्ची है अभी से खेतों का काम नहीं डालना उस पर।" करतार और मीतो ने एक स्वर में कहा।
जगत को आश्चर्य हुआ कि उसको तो पाँच बरस की उम्र से माँ-दद्दा खेतों में साथ लेकर आते थे, अब रानी सात की है फिर भी छोटी है।

जमींदार के परिवार से जुड़कर करतार को कई बरस हो गए थे। परिवार के नाम पर पिता-पुत्र को ही देखा था उसने, बड़ी मालकिन तो छोटे मालिक के जन्म के समय ही गुजर गयी थीं। 

आज भी वह सबकुछ करतार की आंँखों में घूमता है कि जब बड़े मालिक से उसकी पहली मुलाकात हुई थी।

कुछ बच्चे मिलकर दस साल के करतार की पिटाई कर रहे थे। वह अकेला अपने आपको बचाने की कोशिश कर रहा था। तभी बाजू में खुली जीप, संग दो मोटरसाइकिल आकर रूकी। 
"क्यों मार खा रहा, क्या किया तैणे इनका।" ऊँची कद काठी, घनी मूँछे, साँवला रंग और रोबदार आवाज़ के मालिक, बड़े जमींदार जी ने उससे प्रश्न किया।
पिटाई करने वाले तो सब इधर-उधर भाग गए, करतार ने उत्तर दिया, "मैंने चायवाले की दुकान सुबह से अब तक काम किया। उसने चाय बिस्कुट खाने को दिया और एक रुप्पैया भी, ये बदमाश मेरा रुप्पैया छीनकर भाग गए। मैं छोड़ूंगा नहीं, मारूंगा एक-एक को।" जमींदार की नजरों से नजरें मिलाकर उत्तर दिया था उसने।
"तेरे माँ-बाप कहाँ हैं जो तू यूँ काम करता फिरे है मुंडे, उम्र तो कम लग रही तेरी, नाम तो बोल तेरा।" जमींदार का स्वर गूंँजा।

"माँ-बाप तो पता नहीं, बाजू के गाँव में था, भजन मंडली साथ आ गया इधर, नाम करतार है जी।" छोटे करतार का उत्तर था।

"जगीरा, जरा पता लगाना इस मुंडे के हालात का।" दोनाली पकड़े अपने कारिंदे से बोले थे जमींदार जी।
"जी मालिक, शाम तक सब बताता हूँ।" काले रंग के, लाल आँखों से घूरते जगीरे ने नम्र स्वर में कहा।
"हमारे पास काम करना हो तो सुबह उस मकान में आ जाना लड़के।" जमींदार ने कहा और जीप आगे बढ़ गई।

दूसरे दिन सुबह-सबेरे ही करतार उस बड़ी हवेली के सामने पहुँच गया। 
"क्या देख रहा बे दीदे फाड़ कर, कभी मकान नहीं देखा तैणे? चल भाग यहाँ से।" गेट पर खड़े चौकीदार ने अपना धर्म निभाया।
"मुझे मालिक ने बुलाया है, काम देंगे।" करतार की बात सुनकर चौकीदार सिर खुजलाने लगा।
"बित्ते भर का मुंडा, हवेली में काम करेगा। भाग जा, अपनी बेब्बे के नाल मालिक का नाम पूछ ले फिर काम करना।" उसकी खूँखार आवाज़ से डरकर करतार वापस होने ही वाला था कि कल‌वाला कारिंदा सामने दिख गया।

"ओ छोटे मालिक, ओ छोटे मालिक! बड़े मालिक ने कल बुलाया था ना, ये जाने नहीं देता,आप समझाओ ना।" करतार के अंतिम शब्द मुँह में ही रह गए।
जगीरे ने दौड़कर करतार के मुँह पर अपना पंजा रख दिया।
"अबे, पागल है क्या? मैनू छोटे मालिक पुकार रहा, मैं चाकर हूँ मालिक का, छोटे मालिक बाहर रहते हैं।" जगीरा और चौकीदार के बीच कुछ खुसुर-पुसुर हुई और फिर करतार को हवेली में प्रवेश मिल गया।

बड़े मालिक के चाकरों ने उसकी उम्र के हिसाब से उसे काम समझा दिया। खेतों की रखवाली, मवेशियों को पानी पिलाना, बैठकों में पानी, शर्बत ले जाना, कभी कभी बड़े मालिक उससे अपने पैर भी दबवाते थे।

पिछले अहाते में चाकरों के रहने के लिए खोलियाँ बनी थीं। एक छोटी सी, दो चारपाई रखने भर की जगह, करतार को मिल गई। इससे ज़्यादा की ज़रूरत थी ही नहीं उसे, रात ही सोने आता।  गर्मियों में तो खाट बाहर ही निकाल लेते थे सब।

धीरे-धीरे आसपास के कारिंदों और नौकरों के परिवार का हिस्सा बन गया था वह। उसकी दो समय रोटी की किसी ना किसी के घर लिखी रहती थी। मालिक का दिया अनाज वह इन्हीं लोगों के सुपुर्द कर देता था।

समय तो निरंतर चलता रहता है। उसे ना तो छत, ना रोटी और ना ही किसी बात की फ़िक्र होती है। किसी के आगे रूकना, झुकना उसने सीखा ही नहीं, मस्त मलंग अपनी रौ में बहे जाता है।

मालिकों की सेवा, हवेली के प्रति ईमानदारी से काम करते करतार जवान हो गया। करतार की मूँछें अपने हाथ-पैर फैलाने लगीं और बड़े मालिक की मूँछे रूई की मानिंद सफेद हो गईं। हवा यह थी कि छोटे मालिक ने विदेशी मेमसाब से विदेश में ही व्याह कर लिया था। इस साल वो हवेली की उस छोटी मालकिन को लाने वाले थे।

"करतारे, अब ब्याह कर ले तू, कब तक हम तेरी रोटी बनाएंगे। अब अपने लिए रोटी पानी करने वाली ले आ।" आसपास की चाचियांँ, मौसियांँ उलाहने देते कहने थीं।

"कौन करेगा मुझसे व्याह चाची, ना खुद का घर ना पैसों वाला काम। मालिकों के सहारे खुद की चला लेता हूँ।" करतार ने कहा।
"रिश्ते में भतीजी लगती है मेरी, नाम है मीतो। बड़ी अच्छी कुड़ी है, घर का सब काम-धाम जानती है करतारे, तेरी तरह उसके भी माँ-बाप नहीं हैं।" चाची ने करतार के मन में विवाह और परिवार के लिए जगह बना दी।

सत्ता, दौलत खिसकते हुए बड़े मालिक से छोटे मालिक की ओर बढ़ गई थी। अब हर बात छोटे मालिक ही सुनते सुलझाते। बूढ़े जगीरा ने, अपने बड़े मालिक से करतार के व्याह की बात पूछ ही ली और बड़े मालिक ने उसकी बात पर "हाँ" की मुहर लगा दी।

 विदेश में हवेली का वारिस पैदा हुआ और उसके अगले महीने ही मीतो करतार की दुल्हन बनकर, उसके घर आ गई। मालिक की दया से दो कमरे का, पक्का सीमेंट का मकान मिल गया था करतार को। मीतो ने मकान को घर बनाया, करतार के जीवन में खुशियों की बरसात होने लगी। मीतो रसोई बनाती, साफ-सफाई करती, करतार के लाए अनाज को संभालकर चलाती। 
"सुनते हो, अब सिर्फ़ अनाज से काम नहीं चलेगा। रुपए पैसों की भी जरुरत पड़ती है ना घर-गृहस्थी में। आगे बच्चे होंगे, खर्चा तो आएगा ना।" मीतों ने अपने मन की बात कही।
"मालिक ने मुझसे अनाज का वादा किया था मीतो, पैसों की बात नहीं थी।" करतार ने सिर झुका लिया।
"कोई ना जी, मैं भी चलूंँगी तुम्हारे साथ खेतों पर, मेरी रोजी पैसों की मांँग लेंगे।" मीतो ने कहा।
"तू जाएगी खेतों पर काम करने, क्यों? मीतो अनाज के बोरे उठाना, फसलों की देखभाल करना, मवेशियों को दाना-पानी खिलाना, चारे के गट्ठे ढोना कठिन है, न..तू ना कर पाएगी।" करतार ने सीधे मना कर दिया।

औरत, अपने घर, बच्चों के लिए बहुत दूर तक सोच लेती है। मीतो को पता था कि बच्चा आएगा तो उसके कपड़े, खिलौने, पढ़ने-लिखने के लिए पैसों की ज़रूरत पड़ेगी और करतार के लाए अनाज से सिर्फ़ काम नहीं चलेगा।

छोटी मालकिन अपने साल भर के पुत्तर को लेकर, महीने भर के लिए हवेली आई थीं। सुना कि वो अक्सर बड़े मालिक के पास बैठतीं, चाकरों से बातें करतीं और उनकी भाषा को समझने बोलने की कोशिश भी करतीं। बड़े मालिक अपनी इस विदेशी बहू के संस्कारों और स्वभाव से बहुत खुश थे। अपने पोते के साथ दिनभर खेला करते थे।बच्चे को आशीर्वाद, शगुन और न्यौछावर करने के लिए, मीतो भी चाची के साथ हवेली गई थी। 

मीतो के चेहरे की चमक, उभरते पेट को देखकर छोटी मालकिन ने पूछा -"टुम प्रैग्नैंट है?" भाषा अँग्रेजी हिन्दी की खिचड़ी थी।
"हहह" मीतो इधर-उधर देखने लगी।
हँसकर मालकिन ने मीतो  के पेट पर हाथ रख दिया और इशारे से पूछा।
चुन्नी के छोर से, मुँह छुपाते हुए मीतो ने, अपना पंजा फैला दिया।
"फाइव मंथ्स, वावव।" मालकिन ने भी अपनी पाँचों अँगुलियाँ फैला दीं।

वो झट से अंदर चली गई और हाथ में कुछ पैकेट ले आईं।
"टेक इट, यू शुड ईट ड्रायफ्रूट्स एवरी डे, फॉर योर बेबी।" उन्होंने मीतो के हाथों में काजू, बादाम और अखरोट के पैकेट पकड़ा दिए।
"बेबी नहीं मेमसाब, करतार जैसा मुंडा चाहिए मैनू।" मीतो बोल पड़ी।
"यस यस, यू ईट ड्रायफ्रूट्स एवरी डे‌।" मीतों भाषा तो नहीं समझी परंतु एक स्त्री का दूसरी के प्रति स्नेह, उसे समझ आ गया। 
"मेमसाब, इसको काम पर रख लो, सब चाकरी करेगी चार पैसे मिल जाएंगे मेमसाब। बच्चे के लिए तो चाहिए ना।" चाची ने आधी बातें बोलकर, आधी इशारों से अभिनीत कर दी।
मेमसाब ने दूसरे दिन से ही मीतो को काम पर बुला लिया। 
मेमसाब तो महीने भर बाद वापस चली गई परन्तु मीतो के लिए हर महीने बँधी रकम कहां इंतज़ाम कर गई।  
अब जगत के पैदा होने तक चार महीने के सौ रुपए जमा हो गए थे मीतों के पास। 
करतार सुखी था। पाँच-दस पैसों के लिए भटकने वाले बचपन को भोगा था उसने। अपने बेटे के सिर पर, मीतो का ममता भरा आँचल देखकर, वह रब का दिन-रात शुक्र अदा करता।

सवा महीने तक मीतो ने खाट पर लेटे, घी दूध खाते, जच्चा बनने का सुख लिया। आसपास का परिवार वाले कभी मामा-मौसी  बन जाते तो कभी सास-ननद, बुआ- चाचा। बच्चे की तबीयत ऊँच-नीच होती तो सारी रात सिरहाने बैठे, उसको घुट्टी पिलाते, पेट की हवा निकालने का उपाय करते। 

दो महीने के जगत को आँचल में समेटे मीतो काम पर जाने लगी। एक दिन बड़े मालिक ने बच्चे के लिए, करतार के हाथों से सूर्य के लॉकेट वाली चाँदी की चैन भेजी। 
मालिक का अपनेपन और आशीर्वाद आज भी जगत के गले में शोभा देता है।

जगत पाँच साल का हुआ और मीतो ने रानी को जन्म दिया। करतार को घर बुलाने के लिए, जगत पहली बार हवेली के अंदर गया।
बड़े बड़े कमरे, पीले सुंदर बल्बों की सजावट, नक्काशीदार कुर्सियांँ, झाड़-फानूस देखकर, बच्चे का मुँह खुला रह गया।

सामने एक वृद्ध बैठे थे। जगत ने पहली बार हवेली के बड़े मालिक को देखा था। सफेद मूँछें, थोड़े झुके कंधे और तेज़ नजरें।
"मालिक, मेरे दद्दा कहाँ हैं?" इस दुनिया के बादशाह से सीधा प्रश्न कर दिया था जगत ने।
"कौन है तू बच्चे?" सधी आवाज़ थी उनकी।
"मैं जगत, करतार मेरे दद्दा। वो घर पर छोटी बहन हुई है इस करके बुलाने आया।" जगत बोलता जा रहा था और उसकी आँखें, मालिक के सामने दूध से भरे कटोरे पर चिपक गई थीं।

चमकता, नक्काशीदार कटोरा, बेल-बूटे, मोर और  मीनाकारी किया, जगत के लिए दुनिया का सबसे सुंदर कटोरा।‌ उसमें भरे मेवे वाले दूध ने, उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा दिए थे।

"करतारे का पुत्तर है तू?" बड़े मालिक ने एक भरपूर दृष्टि उसपर डाली, जैसे अंदर तक सब देख लेना हो। गले में लटकती सूर्य के लॉकेट वाली चाँदी की चैन ने उसके करतार के  बेटे होने पर मुहर लगा दी।

जगत एकटक उनके बूढ़े परंतु रोबीले चेहरे को देखता रहा फिर कमरे से बाहर निकल आया। गलियारे में ही था कि सामने से इस हवेली के वर्तमान कर्ता-धर्ता, छोटे मालिक आ गए।

"कौन है बे तू, अंदर कैसे घुस आया कमबख़्त? एक भी मुलाजिम तैनात नहीं जो हवेली के आने-जाने वाले ऐसे घुसपैठियों पर नज़र रखे।" नशे में धुत्त सामने खड़े उस व्यक्ति ने जगत का हाथ पकड़ लिया।

"दद्दा को बुलाने आया था, करतार मेरे दद्दा। घर पर बहन हुई है इस करके आया था।" रुआंसे जगत ने अटक-अटक कर उत्तर दिया।
"अपने बाप को ढूँढते आ गया मालिक, माफ़ कर दीजिए, बच्चा है। हवेली के नियम जानता नहीं।" सिर और चेहरे पर चुन्नी ढांकते हुए एक कामवाली बोली।
"हवेली अब आने-जाने का रास्ता बन गई है क्या? चल भाग यहाँ से वरना टांगें तोड़ दूँगा।" छोटे मालिक ने झटके से हाथ छोड़ा और जगत गिर पड़ा।
उठकर बेतहाशा हवेली से घर की ओर भागने लगा, रास्ते में खड़े अपने पिता पर भी उसका ध्यान नहीं था।
"जगत..ऐ जगते! पुत्तर कहाँ गया था, भाग क्यूँ रहा है तू?" करतार ने दौड़कर उसका पीछा किया।
जगत के पैरों में ब्रेक लग गए, वह अपने पिता के पेट से चिपक गया।
"दद्दा, छोटी बहन हुई है, माँ ने बुलान वास्ते भेजा था। मैं हवेली में चला गया, बड़े मालिक के सामने।" वह साँस लेता और फिर बड़बड़ करता, "बड़े मालिक के सामने बड़ा सुंदर, मोर वाला कटोरा था, उसमें दूध भरा था। दद्दा, मेरे वास्ते लाओगे वैसा कटोरा..बोलो ना..।" जगत अपने को पड़ी डाँट-फटकार और तो और छोटी बहन को भी भूल गया था।

रानी, यही नाम रखा था सबने जगत की बहन का। दो-तीन महीने की रानी, जगत के लिए खिलौना बन गई थी।‌

हवेली की हवा बदलने लगी थी। पुराने कई लोगों को निकालकर, छोटे मालिक नए चेहरों को हवेली का काम सौंपा था। बड़े मालिक के चंद वफ़ादारों को वो नहीं निकाल सकते थे, यही बड़े मालिक का हुक्म था। बड़े मालिक की हालत दिन ब दिन ख़राब होती जा रही थी और छोटे मालिक के रंग-ढंग।

मीतो और करतार अपने बढ़ते परिवार की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त रहने लगे।
एक सुबह हवेली में मातम छा गया। बड़े दिलवाला एक जमींदार दुनिया छोड़ कर चला गया था।‌ उस मालिक के जाने के ग़म में किसी चाकर के घर चूल्हा न जला जिसने सब नौकर-चाकरों से प्रेम, विश्वास और संवेदनाओं का रिश्ता बनाया था। आज उसने ईश्वर के साथ हमेशा के लिए रिश्ता जोड़ लिया था। 
छोटे मालिक ने हवेली का रवैया ही बदल दिया, अब मालिक का चाकरों से सिर्फ डर और दबाव का रिश्ता रहा गया था।
वर्चस्व देखने वाली हवेली सूनेपन से भर गई थी। लगता था बड़े मालिक के साथ सारी रौनकें चली गई थीं।

"सुना है विदेशी छोटी मालकिन ने मालिक को छोड़ दिया है। वो अब कभी नहीं आएंगी, अपने पुत्तर को भी न छोड़ेंगी मालिक के पास।" बूढ़ी, पुरानी सज्जो चाची ने समाचार दिया।
"ओह! बड़ी अच्छी जनानी है मेमसाब तो, जाने क्या हुआ। पुत्तर तो माँ के पास ही रहे तो चंगा है।" मीतो ने दुःख से कहा। नेकदिल मालकिन की खुशी के लिए मीतो हाथ जोड़ रही थी।

"रौशन नाम रखा है छोटी मालकिन ने अपने पुत्तर का, सुना है कि बड़े मालिक ने रखवाया था।" सज्जो का अंदर बैठक तक बड़ा आना-जाना था।

तूफानों को झेलकर, समय और बलवान होता जाता है। उसकी गति, निरंतरता स्वयं को चुनौती देती है। अपनी चाल के परिणामों से अनभिज्ञ बनता हुआ, वह स्वयंमुग्धता से गतिमान रहता है।

हवेली छोटे मालिक के रंग में रंग गई। सुरसा के मुँह के समान बढ़ते छोटे मालिक के खर्चों ने, हवेली के रखरखाव, नौकरों को दिए जाने वाले अनाज और पैसों को निगलना शुरू कर दिया। विदेशी शराब, सिगरेट, महंगे इत्रों से आलमारियांँ कसमसाने लगीं और बाप-दादाओं की ज़मीनें, टुकड़ों में बिकने को मजबूर हो गईं। विदेशी मालकिन ने, बेटे को पिता के साथ भेजना स्वीकार नहीं किया, अलबत्ता मालिक साल में एक-दो बार जाकर बेटे से मिल आते।
पुराने बुरे अनुभव के कारण बारह-तेरह साल का जगत, हवेली में जाने से घबराता और रानी को तो माँ- बाप ने मनाही कर रखी थी।

इस बीच गाँव भर हवा फैल गई कि विदेशी मेमसाब अपने पुत्तर के संग अंतिम बार आने वाली हैं। कोई कहता हवेली का हिस्सा लेने, कोई कहता बड़े मालिक की इच्छा पूरी करने, चाहे जो हो मीतो तो उनके आने के समाचार से फूली न समाती थी। आखिरकार उन्होंने ही तो उसे काम दिया था और मेवे में भरकर उसके होने वाले बच्चे के लिए प्यार, कैसे भूल जाती मीतो? 

उनके कमरे की साफ-सफाई, पर्दे, चादर बदलने और सजावट का काम मीतो ने ले लिया था। जाती हुई ठंडक के पग चिह्नों को, रंग-बिरंगे फूलों से सजाती बसंत आ रही थी। मेमसाब के कमरे में पीली चादर, पीले पर्दे और पीले फूलों से सजावट करने को उत्सुक मीतो ने जगत से कहा, "झाड़ियों के बीच सूरजमुखी के फूल खिले हैं जगते, आठ-दस तोड़ लाना हवेली में आज। डंडी लंबी रखना, फूलदान में सजाना है। मेमसाब आएंगी कल-परसों में तो खुश हो जाएंगी।" कहती हुई मीतो काम पर चली गई।
"अरे माँ, मुझे नहीं आना वहाँ।" जगत की आवाज़ को अनसुना कर वह निकल गई।
शाम के पहले ही सात-आठ फूलों को सुतली से बाँधकर, जगत हवेली की ओर चल पड़ा।
"जगते, किधर चला तू?" ट्रैक्टर पर बोरे लादते करतार ने आवाज़ दी।
जवानी की पहली सीढ़ी में कदम रखते जगत ने अपने बाप को देखा। पसीने से लथपथ, भरी बोरियाँ उठाते उनकी आँखें प्रेम और विश्वास से लबालब थीं। अपने जवान होते बेटे की नाक के नीचे पड़ी हरी लाइन से, भविष्य में मूँछदार गबरू जवान की कल्पना मात्र ने पिता की थकान दूर कर दी।

"माँ ने फूल मंगवाए थे, कहती थी विदेशी मेमसाब आने वाली हैं सो सजावट वास्ते चाहिए।" कहता हुआ वह हवेली की ओर कदम बढ़ाने लगा।
"आराम से जा पुत्तर, माँ को फूल देकर तुरंत घर वापस जाना, रानी अकेली होगी।" कहता हुआ करतार माथे का पसीना पोंछकर वापस बोरी उठाने लगा।

हवेली की खूबसूरती देखते, गलियारे को पार करते हुए जगत के पैर खुद ब ख़ुद बड़े मालिक के कमरे की ओर चल पड़े।
डिजाइन वाली लाल कालीन, झाड़ फानूस, लकड़ियों पर खुदाव वाली बड़ी-बड़ी कुर्सियांँ और मेज़। कोने पर की जालीदार लकड़ी की तिपाई और उसपर रखा लट्टू वाला लैंप। जगत की आँखें इस सुंदर दुनिया को निहारते हुए, इस कमरे की बेशकीमती, सुंदरतम वस्तु पर जम गईं। 

कोने की मेज़ पर शान से इठलाता नक्काशीदार, बेल-बूटे, मोर और मीने से जड़ा वह कटोरा रखा था। सारी दुनिया की सुंदरता सिमट कर उस कटोरे में मानो समा गई थी। जगत का मस्तिष्क शिथिल हो गया, और पैरों ने चलकर उसे कटोरे तक पहुँचा दिया। हथेलियों के बीच जगत की सारी दुनिया आ गई। बचपन में बड़े मालिक का इस कटोरे में दूध रोटी खाना, उसकी आँखों के सामने घूमने लगा। एक झनझनाहट सी उसके पूरे बदन में तैर गई और वह एक-एक नक्काशी, मीनाकारी को अपनी आँखों से दिल में उतारने लगा।

"कौन है बे यहाँ? क्या चुरा रहा था साले? तेरी इतनी मज़ाल की इस कमरे में घुसकर सामान चोरी करे।" लड़खड़ाते कदमों से आए छोटे मालिक की आवाज़ से कंपकंपा कर जगत के हाथों से कटोरा छूट गया। 
"ठन्न.. ठन्न..!" इस आवाज़ ने समय को रोक दिया।
"खानदानी कटोरा चुराने आया था। अरे जग्गा..दलेर..कहाँ मर गए सबके सब। पकड़ो इसे, भागने न पाए।" छोटे मालिक की आवाज़ जगत के कानों तक जा रही थी परंतु आगे सबकुछ शून्य हो गया था।
दो मिनट में सारे नौकर-चाकर जमा हो गए और सबसे पीछे थी मीतो।
"नसीब अच्छा था कि मैं समय पर आ गया वरना तो हाथ साफ करके भाग गया होता ये हरामी का पिल्ला।" छोटे मालिक की लाल-लाल आंँखें, गाल तक आने की भरसक कोशिश कर रही थीं।

"मालिक, मेरा पुत्तर है यह। मेमसाब के कमरे को सजाने वास्ते फूल ले आया है मालिक। गलती से इस कमरे में घुस गया मालिक, माफ़ कर दो।" चुनरी से सिर मुँह ढांकती हुई मीतो, छोटे मालिक के पैरों के पास बैठ गई।
"ग़लती से आ गया था या चोरी सिखा रही अपने पिल्ले को साली।" चाकरों को दी जाने वाली, विभिन्न विशेषणों से युक्त गालियों का पिटारा खोल दिया उस आदमी ने।

"माफी दे दो मालिक, छोटी मालकिन ने काम पर रखा था, बड़े मालिक ने आसरा दिया, ये चोर नहीं है मालिक।" रोती हुई मीतो ने जगत के मुँह पर, पीठ पर घूंँसे, थप्पड़ों की बौछार कर दी।
"मार डालेगी क्या बेटे को? मालिक आपके पुत्तर के उम्र का बच्चा है, आपका पुत्तर वारिस इस खानदान का, उसको रब सब खुशी देंगे मालिक। इसको माफ‌ कर दो।" बूढ़ी सज्जो ने हिम्मत दिखाई, वही बड़े मालिक के करीबी कामवाली भी थी।

कटोरा पोंछकर जगह में रख दिया गया। बिखरे फूलों को उठाकर मीतो ने, जगत का हाथ पकड़ा और मालिक को झुककर अभिवादन करती हुई बाहर निकल गई।

"इस महीने का अनाज, पैसा नहीं मिलेगा इसको। आगे एक महीने अपनी सूरत न दिखाना इस हवेली में।" मीतो ने सिर झुका कर सब स्वीकार कर लिया और हवेली से बाहर निकल आई।

इस घटना का मुख्य पात्र वह कटोरा, मौन मूक यथास्थान विराजमान हो गया था। घर जाती मीतो की नजरें करतार को ढूँढ रही थीं और जगत का सारा ध्यान उस कटोरे से गिरे एक खूबसूरत मीना पर था जो छिटक गया था। कटोरे के एक ओर बने मोर की पीठ का लाल मीना, जिसे हरे, नीले मीनों की कलाकारी ने घेर रखा था। इस मीने के गिरने का भान सिर्फ जगत को था और वह उस कटोरे के अंग-भंग होने पर मुस्कुराने लगा।

"नालायक, किस बात की खुशियांँ मना रहा है। मेरे प्राण निकल गए थे, चल तेरे बाप को बताती हूँ।" उसे घसीटती हुई मीतो घर ले आई।

उधर मंडी से आने पर करतार को पता चला और वो भागा भागा घर आ गया। पैसा, अनाज ना मिलने का ग़म, बेइज्जती के दुःख से हल्का था। मीतो ने दोनों बच्चों के साथ खुद को जैसे घर तक कैद कर लिया था। करतार का खाना भी उसके साथ ही बाँध देती थी वह।

छोटी मालकिन अपने पुत्तर संग आ गई थीं।
"गोरा-गोरा, ऊँचा, बड़ा सुंदर जवान है मेमसाब का पुत्तर। बात कम करे, हँसता रहता है‌।" सज्जो बड़े मालिक की सबसे वफादार सेविका, बड़े मालिक के वारिस की तारीफ न करती तो क्या करती।

"फल, मेवे,दूध, मलाई खाने वाले ऐसे ही रहते हैं चाची, हमारे तुम्हारे जैसे नहीं।"  छोटे मालिक के रवैये की चोट, मेमसाब के रौशन तक पहुँचा दी थी मीतो ने।

मीतो, मन ही मन मेमसाब की तारीफ करती जिसने विदेशी होकर भी बड़े मालिक की अंतिम इच्छा पूरी की। अपने पुत्तर संग पूजा पाठ किया। उनके अपने बेटे (छोटे मालिक) ने तो भूल से भी इस बारे में कभी सोचा नहीं, अपनी अय्याशियों में ही मशगूल रहे।

एक शाम जगत पढ़ाई कर रहा था, मीतो वहीं खाट पर बैठी रानी की चोटियाँ बना रही थी। खेतों की ओर से कुछ लोग उसकी तरफ़ आते दिखाई दिये। उसका मन काँप गया, अगले दो दिनों में उसके सज़ा की मियाद पूरी होने वाली है तो अब क्यों इधर आ रहे लोग?

रानी के बालों में कंघी घुमाते हुए, चुन्नी चेहरे पर डाले, नीची नजर नहीं से उस दिशा में देखती थी।

"कैसी हो मीटो?" सामने विदेशी मेमसाब और उनका पुत्तर खड़े थे। जग्गा, सज्जो चाची और करतार भी साथ थे।
"मेमसाब, आप खेतों से चलकर क्यों आईं, मुझे बुलवा लिया होता हवेली में?" अचकचाती हुई मीतो बोल पड़ी।
"शी इज योर डॉटर..? एम आई राइट?" बरसों पहले की वहीं प्रेम भरी आवाज़, मुस्कुराता चेहरा।

"रानी, मेरी बेटी मेमसाब। मेरा पुत्तर जगत..ऐ जगते.. आ बाहर, देख मेमसाब आई हैं।" अपने दोनों बच्चों को मेमसाब के पैर पड़ने का संकेत किया मीतो ने।

"नो..नो, आय एम नॉट गॉड।" मेमसाब ने उन दोनों को कंधों से पकड़ लिया।
"रौशन आपका पुत्तर मेमसाब, बिल्कुल आपके जैसा गोरा-गोरा, सुंदर है।" मीतो ने जगत से "सुंदर" के लिए अँग्रेजी शब्द पूछा।
"ब्यूटीफुल" जगत ने कहा तो मेमसाब और रौशन हँसने लगे।

अपने पुत्तर के साथ मालकिन चारपाई पर बैठ गई।‌ चाकरों के घरों में अजीब सी खुशी थी, आज उनके बड़े मालिक का वारिस उनके आँगन तक चलकर आया था। आज तक हवेली से कोई इस तरह आया नहीं था।

"सनफ्लावर्स..वेरी ब्यूटीफुल, यू डिड नाइस डेकोरेशन मीटो।" उसने बिना कुछ समझे सिर हिला दिया।
 "मैं वापस जा रही हू मीटो... अपने देश। नेक्सट कब आउगी, डोंट नो।‌ आय लव यू ऑल।" कहते हुए उनकी हरी-हरी पुतलियों वाली आँखें तरल हो गईं। 
भावों को भाषा की जरूरत नहीं होती। सबकी आँखें नम हो रही थीं।
"गो एनी वेयर मीटो करटार। अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए, गो एंड डू अदर वर्क।" मेमसाब ने कुछ रूपए मीतो को पकड़ा दिए।

करतार के आँखों के सामने बरसों पहले की, बड़े मालिक से हुई उसकी पहली मुलाकात की स्मृति ताजी हो गई। उनके ऐसे ही प्रेम, विश्वास भरे शब्दों और सहारे ने एक अनाथ बच्चे की ज़िंदगी को दिशा दिखाई थी। उसे लगा बड़े मालिक की बातें, छोटी मालकिन के शब्दों से दोबारा उसके बच्चों के जीवन के लिए नई राह बना रहे हैं।

हवेली का वारिस, मेमसाब का पुत्तर भी तो पहली बार आया था, उसे कुछ शगुन तो देना चाहिए था, क्या था मीतो के पास। 
मीतो ने जगत को अंदर बुलाया। उसके गले की सूर्य लॉकेट वाली चाँदी की चैन निकाल लिया उसने। बड़े मालिक की निशानी उन्हीं के वारिस को सौंप सकती थी और तो कुछ था नहीं उसके पास। 

अपने हाथों से रौशन को पहना दिया मीतो ने। 
"इट्स ब्यूटीफुल आंटी, थेंक यू।" अपने लॉकेट को देखता हुआ वह खुशी से बोला।
"मेमसाब, आप जाओगी परंतु मैं हवेली में नहीं आ सकती, छोटे मालिक का हुक्म है।" नज़रें नीची करके मीतो ने कहा।
"आई नो मीटो..मे आई ना मिलने।"  मेमसाब उठ खड़ी हुईं।
खेतों के अन्तिम छोर तक मीतो उनको विदा करने आई थी। ना जाने क्यों उस विदेशी मेमसाब के जाने पर मीतो का दिल कसकने लगा था।

अपने हिस्से का बंटवारा करके, पैसे और बेटे को साथ लेकर छोटी मालकिन वापस चली गई थीं। बड़े मालिक के चंद वफ़ादारों को, गाँव में स्कूल बनवाने के लिए मालकिन ने अपने हिस्से की कुछ जमीन और पैसे दे दिए थे।
जाते वक्त हवेली के हर एक नौकर के परिवार के लिए, उपहार और पैसे दिए थे उन्होंने। 

"मीतो, तेरे वास्ते भी मेमसाब ने कुछ भेजा है। एक ख़त भी दिया है।" सज्जो चाची ने एक कागज का पुर्जा और एक उपहार का बक्सा मीतो को पकड़ा दिया।

"जगत...ऐ जगते! पढ़ जरा मेमसाब ने क्या संदेसा भेजा है?" मीतो ने जगत को बुलाया।
जगत कागज़ पर लिखी पंक्तियों को पढ़ने लगा। अँग्रेजी और टूटी-फूटी हिंदी में लिखा था।

मीटो,

योर चिल्ड्रेन आर वेरी स्मार्ट, उनको बोत पढ़ाना। शहर जाओ, मैं मनी दिया, वर्क मिलते तक इसे यूज़ करना।

योर फ्रेंड 
मैरी

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आज पहली बार सबने छोटी मालकिन का नाम सुना।
"मीतो, मेमसाब ने हमको भी कपड़े, सौगातें और पैसे दिए। बड़ी भली है वो।" जगीरे की पत्नी और सज्जो चाची ने बताया।

जगत और रानी ने उपहार का बक्सा खोल लिया। 
सुंदर नक्काशी, बेहतरीन मीनाकारी का नमूना 'वह कटोरा' सामने चमचमा रहा था। जगत की आँखें फैली रह गईं, मोर के निकले उस मीने के अलावा आज भी वह कटोरा, दुनिया का सबसे सुंदर कटोरा लगता था।

साथ में एक पेपर कुछ रुपए थे।

"अपने बेटे रौशन को उसके दादाजी की ओर से मिला यह नक्काशीदार कटोरा, हम मीतो और करतार के बेटे जगत को उपहार में देते हैं।

मैरी एवं रौशन

नीचे सरकारी ठप्पा और स्याही से दस्तख़त थे।
कटोरे की हर एक नक्काशी से, बड़े दिल वाली छोटी मालकिन मुस्कुरा रही थी।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र) 

शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

अगले जनम मोहे...ही कीजो (व्यंग्य)

अगले जनम मोहे....ही कीजो (व्यंग्य)

हल्की बारिश में सुबह देर तक बिस्तर का आनंद लेते बांकेलाल को,  पड़ोसी के कुत्ते के लगातार भौंकने से क्रोध आ गया।
"कुत्ता वो पालें परेशानी हम सहें, कैसा जमाना है?" करवट बदलते हुए वे बड़बड़ाए।
"वो कुत्ता नहीं, शेरू नाम है उसका।‌" पत्नी ने बांके की चादर खींचते हुए कहा।
"जाओ भी, रोज कहते हो सुबह चलना शुरू करना है, आज नहीं गए तो खाना-पीना बंद।" आँखें तरेरती हुई वो बोली।
मरता क्या न‌ करता, तैयार होकर बांके गली में निकल गए।‌

उनको देखकर नियमित चलने वालों की आँखें फैल रही थीं। सबने एक से बढ़कर एक बढ़िया ब्रांड के जूते पहने थे। अपने थोड़े मटमैले, पुराने जूतों को देख बांके ने गहरी सांस भरी। 
जूते आपको चलाते हैं। जिसके जूते जितने मार्डन, ब्रांडेड उसकी चाल उतनी ही ठसन भरी। बांके ने गौर किया कि नब्बे प्रतिशत के साथ उनके कुत्ते भी थे।

"आंटी अपने कुत्ते को संभालो ना, कैसे झपट रहा है।" एक अधेड़ महिला को एक जवान लड़के ने टोका।
"ऑस्कर, डोंट डू बेटा, नॉटी बॉय।" कुत्ते को कहकर वो लड़के की ओर पलटी, "हमारे बेटे को कुत्ता कहने की हिम्मत कैसी हुई तुम्हारी। पढ़े-लिखे दिखते हो पर दिमाग बिल्कुल नहीं है।" खुद के लिए आंटी के संबोधन का ज्वालामुखी सा फट पड़ा।‌ उन्होंने अपने उस बेटे को ऊनी मोजे, रंगीन शर्ट पहना रखा था।

उनके महाभारत में धृतराष्ट्र बनकर बांके ने आगे कदम बढ़ा लिए।
आगे चलने का कौतूहल बढ़ता जा रहा था।‌‌ छोटे-बड़े, मंझोले कद के, सफेद, लाल, काले, भयानक, क्यूट, आलसी फुर्तीले कई प्रकार के कुत्तों से नजरें दो-चार करते बांके चल रहे थे।
एक कुत्ता अपने मालिक के कंधों पर चढ़कर दुनिया का मेला देख रहा था।

बांकेलाल अपने बचपन में घूम आएं जब वो अपने बाबूजी के कांधों पर बैठकर मेला देखा रहते थे। बचपन में गाँव-घर, खेत-खलिहान में घूमते कुत्ते भी बरबस स्मृति में भौंकने लगे। बासी रोटी खाते और गला फाड़कर भौंकते, ईमानदार रखवाले थे वो।

विकास की तरह तेजी से बढ़ते बांकेलाल के कदम, अचानक  रुक गए। दो लड़कियांँ अपने आधे फुट के क्यूट से कुत्ते को बीच सड़क शौच करते देख, रूक गईं। बड़े प्रेम से एक ने पर्स से कागज़ निकाला, मल उठाकर आगे कूड़ेदान में डाल दिया और कुत्ते को फिर गोद में चढ़ा लिया।

"नमस्कार बांकेलाल जी! आज सूरज आपको देखकर उगा है क्या?" अगले मोड़ पर मोहल्ले के दो निवासियों ने बांकेलाल को रोका। बांके रूककर कुछ बातें करते कि उनके कुत्ते उन्हें आगे खींचकर ले गए।

आज तो बांकेलाल ने कुत्तों के नाम, नस्लों का इतना सामान्य ज्ञान अर्जित कर लिया था कि उनकी मार्निंग वॉक, डॉग वॉक में बदल गई। पामेरियन, अल्सेशियन, बीगल, जर्मन शेफर्ड, लैब्राडोर और न जाने क्या-क्या! मालिकों के द्वारा उनकी स्तुति से, बांकेलाल के मस्तिष्क पटल पर वो घर के बजट की तरह अंकित हो गए।

इन सब कुत्तों से अलग, दुबले-पतले सड़क छाप कुत्ते को देखकर, बांकेलाल ओरिजिनल ब्रांड को पुचकारने लगे और वो कुकीयाने लगा।

बस, आसपास के तुनकमिजाज, नकचढ़े, रईस बेटों को बुरा लग गया और वे रोने लगे।
"आप इस गंदे कुत्ते को प्यार कर रहे हैं, मेरे बेबी को यह पसंद नहीं आ रहा।" एक मैडम जी ने कहा।
"ये भी कोई डॉग है, हमारे बच्चों को नुक़सान पहुँचाएगा।" एक आदमी ने अपने कुत्ते को झट गोद में बिठा लिया।

बेचारे, देसी कुत्ते ने अपनी दुम दबाई और नौ दो ग्यारह हो गया। बांके को भागे हुए उस कुत्ते का प्रेमी जानकर, लोगों के मुँह विकृत हो गए।

घर वापस लौटते हुए बांकेलाल ने मन ही मन, एक देसी कुत्ते को अपने घर में स्थान देने का मन बना लिया।

घर पहुँचे तो देखा पत्नी अपने गोद में एक श्वेत, झब्बे बालों वाले कुत्ते को उठाए बाहर खड़ी थीं।
"हमने इसे अपने घर में रखने का निश्चय किया है। कितना प्यारा है ना...आज इसके खाने-पीने, इंजेक्शन और देखरेख की जानकारी के लिए डॉक्टर से मिलने जाना है।" कुत्ते के बालों पर स्नेह से अंगुलियाँ फेरती हुई वो बोली, "प्यारा शीबू बेटा, तुम्हारे लिए पापा कपड़े, जूते सब लाएंगे।"
"कब ले आईं तुम कुत्ता? एक बार बताया भी नहीं।" तवे पर फैलते आमलेट की तरह, बांके की पुतलियां फैल गईं।

"खबरदार जो हमारे बेटे को कुत्ता कहा। हमने तुम्हें इसके पापा का ओहदा दिया और तुम..!" हिकारत से वो बेटे को सीने से लगाए अंदर चली गई।

इस आज पैदा हुए बेटे के लिए साज साम्रगी की सूची देख, अपने पुराने जूतों को देख बांके गुनगुनाने लगे, "अगले  जनम मोहे...ही कीजो।"

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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585

सोमवार, 21 जुलाई 2025

मौसमी अचार बनाम मौसमी चुनाव (व्यंग्य)

मौसमी अचार बनाम मौसमी चुनाव 


फलों, सब्जियों की आम उपलब्धि को देखकर, मौसमी अचार बनते हैं। पहले तो सिर्फ़ घरों में ही बनते थे अब तो फैक्ट्रियों, कंपनियों में खास बनाए जाते हैं। अचार की तरह देश में  विविध मौसमों में, विविध क्षेत्रों में, विविध स्तर के चुनाव मुँह बाए खड़े मिलते हैं। जैसे अचार आम के, मूली के, गाजर मटर के, नींबू के, आंवले के, मिर्च के, कटहल के होते हैं वैसे ही चुनाव लोकसभा, विधानसभा, विधान मंडल, विधान परिषद, स्थानीय निकायों, नगर निगम, नगर पालिका, ग्राम पंचायत और कभी-कभी मध्यावधि होते हैं।

बांकेलाल ने घर से बाहर कदम रखा ही था कि पत्नी की आवाज़ आई, " बढ़िया आम ले आना, अचार बनाना है।" 
बांके ने सब्ज़ी वाले से "बढ़िया आम" मांग लिए।
हँसते हुए उसने कहा, "साहब, आम बढ़िया कब से हो गए, बढ़िया तो बस खास होते हैं।" 

चौक पर चुनावी बैनरों में घमासान मचा था, किसका नेता कितना बढ़िया। उस ओर नज़र घुमाकर बांके ने सब्ज़ी वाले से कहा, "चुनावी बारिश में भीगकर, मेंढ़क की तरह टर्रा रहे हो। आम हो, आम जैसे काम करो।" 

 अचार के लिए कटे, रंग-बिरंगे मसालों में इठलाते फलों सब्जियों के टुकड़ों को देखकर, रंग-बिरंगी, उत्साही  चुनावी रैलियांँ स्मृति पटल पर चटखारे लेने लगती हैं।

फलों और सब्जियों को एक-दूसरे के साथ मिलाकर, मिश्र अचार बनता है। आम में कटहल, नींबू में मिर्च, गोभी में गाजर मटर और जब महागठबंधन की सरकार बनानी हो तो गोभी, नींबू, मिर्च, आम, गाजर, अदरक सब एक साथ एक बरनी में समा जाते हैं। बाद में अपनी तासीर, अपने टिकाऊपन से वो गठबंधन को बिगाड़ने पर आमादा हो जाते हैं।

खैर, एक आम आदमी को इन खास बातों से क्या लेना-देना, उसकी तो ज़िंदगी अचार बनते बनाते बीत जाती है।

बांकेलाल सोच में पड़ गए कि जब तक कोई फल, सब्ज़ी खास रहती है वो आम घरों में अचार बनाने के लिए अवैध करार दी जाती है। जैसे-जैसे वह आम की श्रेणी में आने लगती है, घरों की बरनियों में सजने लगती हैं। एक आम आदमी, चुनाव जीतने के बाद खास हो जाता है और फिर आम लोगों के लिए उसके सिर्फ़ दूरदर्शन होते हैं।

अचार तो सिर्फ़ आम फलों और सब्जियों का बनता है।‌ खास गाजर, मटर, गोभी की जब रईसी उतरने लगती है तब वो अचार रूप में आम घरों की शोभा बढ़ाती हैं। विभिन्न स्तरों के विजयी नेता सांसद, विधायक, वार्ड मेंबर, सरपंच अपनी समयावधि खत्म होने के समय ही आम लोगों की ओर दौड़ते हैं।

अचार बनाने का निठल्ला काम, अब तो बड़ी बड़ी कंपनियाँ कर रही हैं। ताम-झाम वाले विज्ञापनों से प्रभावित होकर  एक आम आदमी दुकानों, मॉल और ऑनलाइन, इन अचारों को खरीदकर अपने को खास समझने लगता है।

बड़े-बड़े पोस्टरों, बैनरों में कई छोटे छोटे चेहरों के बीच, एक भव्य बड़ा चेहरा आम लोगों के सामने परोसा जाता है। कभी दूसरों के द्वारा तो कभी उस भव्य व्यक्ति के स्वयं के द्वारा विरदावली गाई जाती है।‌ आम आदमी अपने को सिंहासन पर विराजमान राजा समझने लगता है और ईनाम में अपना मत दे देता है। 

सादे भोजन में स्वाद का तड़का अचार से लगता है तो देश की गति में चुनाव उत्प्रेरक का काम करते हैं। खास आदमी, इन चुनावों को ऐसा परोसते हैं कि आम जनता की थाली में ये खास नहीं बल्कि "आम चुनाव" का चटखारा देने लगते हैं। गौर करने की बात यह है कि तमाम खास फलों, सब्जियों के अचार भी "आम" के अचार की जगह नहीं ले सकते।‌ आखिर कार, अचारों और लोकतंत्र का राजा तो आम ही है।


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शर्मिला चौहान (अट्टहास व्यंग्य पत्रिका के लिए भेजी)

रविवार, 20 जुलाई 2025

2212 1212 पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 

फ़िलबदीह - 46
पहला चरण 

2212 1212

डूबे जो तेरे प्यार में 
जाना नहीं था पार में।।1।।

हैं मुझमें ऐब इतने तो
दाने नहीं अनार में।।2।।

अपना ही मोल पूछता
अब आदमी बज़ार में ।।3।।

झांका करें हैं लोग अब
औरों की ही दरार में।।4।।

खुद को बनाने खास वो
अब खुद लगे प्रचार में।।5।।

होता कहाँ गुज़ारा अब
बस कोरे इक पगार में।।6।।

 बोली की धार इतनी है
जितनी नहीं कटार में।।7।।

तरही मिसरा-

जीवन का सुख लिए नहीं 
थे खुद ही के हिसार में।।

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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

मुँह खोले पर न बोले (व्यंग्य)

मुँह खोले पर न बोले" (व्यंग्य)

इच्छाएं सुरसा की तरह मुँह फाड़े, आदमी को अपने में समेट लेना चाहती हैं। बांकेलाल भी परिभाषित आदमी हैं तो आजकल एक ही इच्छा पाले हुए हैं, एक पत्नीव्रत की तरह इकलौती इच्छा। खूब बोलने की, लगातार बोलने की, बोलते रहने की... बड़े मंच से। गृहस्थ आश्रम में आने के बाद जो वाणी घुटते घुटते घुट गई, वो अब जीवन चाहती है।

टेलीविजन पर लगातार चलने वाले वाक् युद्ध और भाषणों ने, बांकेलाल की प्रसुप्त इच्छा को जाग्रत कर दिया।

"हम बोलने की ऑनलाइन क्लास लगा रहें हैं। बंद कमरे में आराम से सीखेंगे और प्रेक्टिस करेंगे।" रसोई में हलुआ बनाती पत्नी से बांके ने कहा।
"पचास की उम्र तक क्या मौनी बाबा बने थे जो अब नर्सरी स्कूल में भर्ती होना है। बैठे बिठाए नए चोचले कहाँ से ले आते हो?" टेढ़ी नजर से देखती पत्नी ने, हलुए में दोगुना शक्कर डाल‌ दिया।
यह देखकर ही डायबिटीज के मरीज बांकेलाल को हिचकी चालू हो गई।

"हमें धुआंधार भाषण देना है, मंच से बड़ी सभा में बोलना है जहाँ खूब भीड़ हो।" टेलीविजन पर देश के प्रधानसेवक की वाक् पटुता, सधी आवाज से प्रभावित बांके ने कहा।

"अच्छा-अच्छा, तो यह बात है। आजमा लीजिए, हमें क्या?" स्वाद के लिए एक चम्मच हलुआ बांके के हिस्से डाल, अपना कटोरा भर कर पत्नी झूले पर बैठ गई।
"मंच पर वही लोग बोलते हैं जिनके घरों में पत्नी प्रजाति का जीव न हो या उसका स्वरयंत्र कम विकसित हो।" मन ही मन बुदबुदाते बांकेलाल ने अपने को कमरे में कैद कर लिया।

पलंग पर बैठ कर, सामने तकिए पर अपनी ही तरह के मॉडल वाले फोन को विराजमान किया। फोन में दिए लिंक से जुड़े तो देखा, दुनिया में उनकी तरह बोलने को उतावले कई लोग हैं।
अलग-अलग कई आवाजें सुन रहे थे बांके।

"बांकेलाल जी, कृपया अपना कैमरा चालू कीजिए। फोन पर कैमरे का निशान बना है उस पर क्लिक कीजिए, आप हम सबको दिखाई नहीं दे रहे हैं।" बहुत ही सधी, प्यारी आवाज़ की मालकिन ने उन्हें बताया।

बांके को फोन धूमिल दिख रहा था। 
"अब क्या हमें आज ही मोतियाबिंद का अटैक हो गया है।" सोचते हुए उनका चेहरा सफेद पड़ने लगा। 
"बांकेलाल जी, कृपया कैमरा ऑन कीजिए।" बार-बार बोलती हुई वो आवाज़, अब बांके को उतनी अच्छी नहीं लग रही थी।
तब बुद्धि में तड़ित चमकी और चश्मे की नामौजूदगी का आभास हुआ। आसपास, कमरे के बाहर, कुर्सी-मेज, रसोई में सब तरफ़ घूमने के बाद, पत्नी की आँखों में अपने चश्मे को चढ़ा देखकर, बांके ने झपटकर चश्मा खींच लिया।

कैमरा ऑन किया तो सजे-संवरे लोगों को देखकर झट कैमरा बंद कर लिए। कमरे में टंगी लाल टी-शर्ट पहन, बालों में कंघी फेरकर फिर कैमरा चालू किया।
"बांकेलाल जी, आज कक्षा का पहला दिन है और आपने कैमरा बंद चालू करके समय व्यर्थ किया है। मैं मधुरा, आपकी सहायता करूंगी।‌ अब सब लोग एक दो मिनट, लगातार बोलकर दिखाइए, मुझे पता चलेगा कि समस्या कहाँ हैं?" कहती हुई उस महिला ने नाम लेना शुरू किया।
जिसका नाम बुलाया जाता वो बड़ी शिद्दत से बचपन की कविता, कोई संस्मरण, कोई अन्य जानकारी देता।‌ दो मिनट में जी-जान लगाकर वे मधुरा जी के, मधुर होंठों से झरती मधुर वाणी से, मधु रूप शाबाशी पाने को लालायित थे।

ज्यों ही बांके का नाम पुकारा त्यों ही दरवाजा खुला और तूफान आया।

"आधे घंटे से मुँह छिपाए बैठे हो, हमें लगा हमेशा की तरह बाथरूम में घुसे हो। किराना वाला सरजू आया है। कह रहा तीन हजार की उधारी कर रखे हो। न जाने पैसा कहाँ उड़ा रहे हो आजकल..! अच्छा..तो ये चल रहा कमरा बंद करके फोन पर। ये चक्कर में पैसा फूँककर, उधारी चढ़ा लिए हो।" कमर पर हाथ धरी वह कैमरे के ठीक सामने आ गई।

एक मिनट बांके को घूरती रही। अधपके खिचड़ी से बाल, सालों पुरानी टी-शर्ट से बाहर झांकती तोंद, बाबा आदम के ज़माने को मोटी फ्रेम वाले चश्मे को देखकर, अपने भविष्य के प्रति वह आश्वस्त हो गई।

"सिखाइए मैडम सिखाइए, आप जितनी भी मेहनत कर लो इनका बोलना नामुमकिन है।" बांके की ओर पलटकर बोली, "पहले तीन हजार रूपए दो फिर ये नौटंकी करना।" मुँह बिचकाती वो बांके को लगभग खींचती हुई बाहर ले गई।‌

अपमान का घूँट चाय की तरह गटक कर, जब बांके ने कैमरे की वापस मुँहदिखाई की तो, देखा वो समूह से बाहर फेंक दिए गए थे।

अन्यमनस्क बैठे बांके की अंगुलियाँ आदतन फेसबुक को ऊपर-नीचे खंगालने लगीं। अंतर्यामी फेसबुक ने बांके के हाल पर दया की और भाषण के नुस्खे, अच्छा बोलने के उपाय बताने लगा।
गले की भाप सिकाई, नमक पानी के गरारे, अदरक के रस में शहद घोलकर पीना, जीभ को बाहर-भीतर करके स्वरयंत्र को व्यायाम कराने जैसे नुस्खों ने, बांके के दिल के बुझते दीपक में जैसे दो-चार बूँदें उम्मीदों के भर दिए।

रसोई में जाकर अदरक कुचलने लगे।
"आज से हमारा खाना सादा रहेगा। ज़्यादा तेल, नमक-मिर्च, मसाले वाला मत बनाना।" कहते हुए बांके ने पत्नी को टेढ़ी नज़रों से देखा।
"कहो तो खाना ही न दें, वैसे भी एक-दो महीने न खाने का, सेहत पर कोई फर्क पड़ने से रहा।" पत्नी ने बांके को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा।

"वैद्य विद्या में भी हाथ आजमाने की सोच रहे हो क्या?" बांके द्वारा छोटे खल-बत्ते का उपयोग किए जाने पर उनकी  पत्नी ने प्रश्न किया।
"अदरक के रस में, शहद, काली मिर्च मिलाकर चाटने से आवाज़ खुलती है, गला साफ होता है।" बांके ने बताया।
पत्नी ने अधकुचली अदरक उनके हाथों से, बाउंड्री से बाहर जाती क्रिकेट की गेंद की तरह लपक लिया।

"यह इकलौता टुकड़ा है जो सब्जी के मसाले में डलेगा। अपनी आवाज़ के लिए चाहिए तो जरा बाजार तक चहलकदमी कर आइए, और हाँ..करेले भी लाइएगा। जब शहद की मिठास बढ़ेगी तो उसके ऊपर करेले का रस भी पीना पड़ेगा।" 

"काश! ईश्वर ने इस प्राणी के स्वरयंत्र की एक चौथाई ऊर्जा भी हमारे को दे दी होती, तो आज ये दिन न देखना पड़ता।" हताश, निराश बांके बालकनी में खड़े हो गए।

सामने बगीचे में लोग व्यायाम, प्राणायाम कर रहे थे। आशा की एक किरण फिर चमकी और उन्होंने जीभ को बाहर-भीतर करना शुरू कर दिया। एक यही उपाय अब उन्हें, उनके लक्ष्य तक ले जा सकता था। अभी हल्की सी आवाज के साथ कुछ ही बार जिव्हा को अंदर-बाहर किया था कि पड़ोसी शीतला कुमार जी ने आवाज़ लगाई।
"क्या हुआ बांकेलाल जी, बारिश का मौसम है फूड पॉइजनिंग का भी। लगता है कल रात सुदर्शन जी के घर की पार्टी में छककर खाएं होगे।" तनिक ठहरकर बोले, "पार्टी दूसरों की परंतु पेट तो अपना है ये कैसे भूल गए।" उन्होंने अपनी बत्तीसी निपोर दी।

"हम तो पार्टी में गए ही नहीं थे, न किसी का बुलावा आया था।" बांके बस इतना ही कह पाए।
"अरे! बुरा मान गए आप तो, हम तो सिर्फ़ पता कर रहे थे कि हमें तो नहीं बुलाया और किस-किस को बुलाया सुदर्शन ने।" कहते हुए वो अपने घर में घुस गए।

इधर-उधर होने के बाद टेलीविजन चालू किया तो वहाँ हाथ-पैर, जुबान सब एक साथ चलाकर, वाक् क्षेत्र में जीत का शंखनाद करने हेतु तैयार लोगों को भिड़ते देखकर, बांके के पसीने छूट गए।

स्वतंत्रता दिवस के दिन मोहल्ले के चौक पर, तिरंगा फहराया जाता है। उस दिन सभी उपस्थित लोगों से दो शब्द कहने का आग्रह करने की परंपरा है। बांके ने कभी अपना देशप्रेम जाहिर नहीं किया क्योंकि ये जुबान लोगों को देखकर ही झूमने लड़खड़ाने लगती है। इस बार तय कर लिया कि बस, बोलना है तो बोलना है।

आइने के सामने खड़े रहते, कुछ वाक्य याद आ जाते और कुछ हिरण की तरह कुलांचे भरते दूर निकल जाते। 

करत करत अभ्यास के... आखिरकार पंद्रह अगस्त की सुबह श्वेत वस्त्र धारण किए बांकेलाल, चौक पर होने वाले ध्वजारोहण में शामिल हुए।

आज उन्होंने परंपरा तोड़ दी। कुछ बोलने के लिए कहा तो बहुत कुछ बोल गए। बोलते हुए स्वतंत्रता दिवस कब गणतंत्र दिवस में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला। मुख्यमंत्री को प्रमोट करके प्रधानमंत्री ही बना दिए। एक साथ सब कुछ बोलकर, माथा पोंछते वे भीड़ में घुस गए।

घर आए तो पत्नी को अपनी भाषण कला की कुछ बातें बताते कि उनकी निगाह अपनी सास पर पड़ी।
"प्रणाम अम्माँ।" कहते हुए उनके चरणों में झुक गए।

"आते-आते चौक पर तुम्हारा भाषण सुना दामाद जी, हम भी कन्फ्यूजिया गए कि सारे देश में तो स्वतंत्रता दिन है पर आपके चौक में गणतंत्र दिन मना रहे थे आप।" प्रणाम का उत्तर इस प्रकार देती हुई वो आगे बोलीं, "हमारी बिटिया ही थी जो निभा गई दामाद जी, पचास में सत्तर सी याददाश्त है तुम्हारी।"

बांकेलाल ने अपनी जिव्हा को खूब उकसाया, हिलाया, पूरी शक्ति लगा दी परंतु वह टस से मस नहीं हुई। आज तक बेटी के सामने न चली तो आज तो साक्षात उनकी जननी खड़ी थी, सिर पर हाथ रखे बांके ने अपने कमरे की शरण ले ली।


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शुभ तारिका के लिए भेजी

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

कहानी - दिल दीवाना

कहानी - "दिल दीवाना"

टेलीविजन पर गाना चल रहा था, "आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे.."

गाने के साथ सुर मिलाती हुई शिखा, हॉल में घूम-घूमकर नाच भी रही थी। सचमुच जब से उसका रिश्ता पक्का हुआ है, अरमानों के पँख लगाए वो उड़ती ही रहती है।
बैंगलोर की एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर है उसका वैभव। ऊँचा, हैंडसम और मिलनसार लड़का।
"अब अरेंज मैरिज में इतनी अच्छी जोड़ी बने तो कोई लव के चक्कर में क्यों पड़े?" उसके साथ की शिक्षिकाएं उसे चिढ़ाती रहतीं।
शिखा दिल्ली के एक प्रायवेट स्कूल में अँग्रेजी पढ़ाती है, उसने इस विषय में एम.ए. किया है।
"नौकरी छोड़नी होगी बेटा, बाद में बैंगलोर में कोई नौकरी देख लेना।" एक बार में शिखा ने स्वीकार कर लिया क्योंकि वैभव उसे अच्छा लगने लगा था।

धूमधाम से विवाह हुआ और दुल्हन बनी शिखा चेन्नई, अपने ससुराल आ गई।‌ वैभव के माँ-बाबा और छोटा भाई विनय ने जी भरकर उसका स्वागत किया।
उसी के परिवार की तरह छोटा सा परिवार मिला उसे। 
दो दिनों बाद पापा आ गए और वो पगफेरे के लिए मायके चली गई। उन दो दिनों में वैभव के कितने कॉल‌ आ गए कि कब आओगी वापस। 
"तुम जब लेने आ जाओ तब आ जाऊंगी।" शिखा ने कहा दिया।

अगली शाम वैभव ससुराल पहुँच गया और दूसरे दिन विदा कराकर वो चेन्नई की फ्लाइट में बैठ गए।
"तुम तो तुरंत लेने आ गए।" उसके कंधों पर सिर टिकाती शिखा ने उलाहना भरे स्वर में कहा।
"यह तो दिल्ली है मेरी जान, तुम्हारे लिए तो मैं स्वर्ग से भी आ जाऊंगा।" वैभव अपनी रौ में बोल गया और शिखा ने अपनी हथेली से उसका मुँह बंद कर दिया।
"कुछ भी बोल रहे हो अब तुम!" उसकी ओर देखते हुए शिखा बोल‌ पड़ी।
"दो-तीन दिनों माँ-बाबा के साथ रहकर, बैंगलोर भी तो जाना है मैडम जी। आगे हनीमून के लिए भी छुट्टियांँ ली हैं तो एक सप्ताह काम करना पड़ेगा ना।" वैभव ने शिखा की आँखों में झाँकते हुए कहा।

चेन्नई एयरपोर्ट से अपने निवास स्थान तक, दोनों ने टैक्सी कर ली। सुंदर सड़कें, साथ-साथ चलती समुद्र तट पट्टी, खुला साफ आसमान, हरियाली की शॉल ओढ़ी प्रकृति, मनभावन लग रही थी।
"अब तक उत्तरी भारत की सुंदरता ही देखी थी मैंने, दक्षिण भारत कितना खूबसूरत है।" लगातार खिड़की से बाहर देखती शिखा बोल‌ रही थी।
"ओहहह...! मैंने तो हनीमून के लिए शिमला की टिकट बुक करा ली, मुझे लगा तुम्हें उत्तर की जगहें पसंद करोगी।" वैभव ने मुँह उतार लिया।
"कोई बात नहीं, तुम्हारे साथ शिमला बहुत आनंद देगा।" शिखा ने उसके हाथों को अपने हाथ में ले लिया। 
"हम तो हमारी शिखा के पसंद की दक्षिण भारतीय जगहें ऊटी, कुर्ग जा रहे हैं। तुम्हें कोडई बहुत पसंद आने वाला है।" कहते हुए वैभव मुस्कुराने लगा।
"अच्छा, तो जनाब मुझे उल्लू बना रहे थे।" आँखें तरेरती शिखा को देखकर वैभव ने अपने कान पकड़ लिए।

चेन्नई में रहते हुए शिखा को लगा कि वो अपने मायके में ही है। सब कुछ अपनापन से भरा हुआ। दोनों जब बैंगलोर के लिए निकलने लगे तो माँ ने मसाले, अचार, कुछ ज़रुरत की चीजें पैक कर दिया। 
"बस बस माँ, अब बाकी जब आप लोग आओगे तब ले आना।" डिक्की और कार की पिछली सीट को भरी देख वैभव कहने लगा।
"हाँ-हाँ माँ, मेरे फाइनल पेपर्स हो जाएंगे तब आएंगे हम।" विनय ने कहा।

लवबर्ड्स अपने घोंसले में आ गए। नया शहर, नए लोग, नई भाषा बोली और नया घर-संसार। पाँचवीं मंजिल पर दो बेडरूम का, सुंदर हवादार फ्लैट लिया था वैभव ने। 
"बहुत साफ-सुथरा, व्यवस्थित घर रखा है तुमने।" सुंदर और व्यवस्थित घर देखकर शिखा कहने लगी।
"ये साफ-सफाई, खाना और रसोई सब गायत्री आंटी का काम है।" गायत्री आंटी का ज़िक्र पहले भी वैभव ने किया था।

लड़कियांँ वो फसलें हैं जिन्हें उगाया, बढ़ाया जाता है और जब जड़ें मजबूत होने लगती हैं उन्हें उखाड़कर किसी दूसरे आँगन में रोप दिया जाता है। जिन आँगनों की मिट्टी प्रेम अपनापन लिए उन्हें स्वीकार करती है उनमें वो पल्लवित पुष्पित होती हैं।‌ जहाँ उन्हें जमीन नहीं मिलती वो अमरबेल सी जी लेती हैं।‌ शिखा अपने भाग्य पर इठला रही थी।
गायत्री आंटी ने शिखा के स्वागत में खीर बनाई थी।‌ 
 सोमवार से शुक्रवार वैभव को ऑफिस जाना था।‌ शनिवार से अगले पूरे सप्ताह उनका हनीमून प्लान था।
सोमवार को शाम सात बजे घर आकर वैभव‌ ने बताया, "शुक्रवार को एक मीटिंग और ट्रेनिंग सेशन रखा है कंपनी ने। बैंगलोर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर, हमारा ही ब्रांच है वहांँ जाना है।" 
"अरे..! तुमने तो शनिवार ऊटी चलने को कहा था ना, ऑफिस में नहीं बताया था?" ऊटी देखने की प्रबल इच्छा के कारण शिखा बोलती चली गई।
"छुट्टी ली है जान‌ परंतु शुक्रवार को तो करना पड़ेगा ना काम।" वैभव ने कहा, "तीन लोग जा रहें हैं नए लोगों को ट्रेनिंग देने के लिए। जल्दी आ जाएंगे, अरे बाबा शनिवार को सुबह ही चलेंगे तुम्हारे उस पसंदीदा ऊटी झील को देखने।" फिर कुछ याद करते बोला,"कौन सा गाना बताया था तुमने...हहहह।" वैभव सोचने लगा और शिखा ने गाना शुरू कर दिया, "दिल‌ दीवाना बिन सजना के माने ना..!" दोनों का कोरस गूँजने लगा।

शुक्रवार की सुबह तैयार होकर, अपनी एक एक्स्ट्रा टी-शर्ट बैग पैक में डालकर, वैभव टैक्सी से ऑफिस के लिए निकल रहा था।
"आज टैक्सी से जा रहे हो?" शिखा ने पूछा।
"हाँ, कार और ड्राइवर कंपनी का है। तुम अपनी तैयारी ठीक से कर लेना, मेरा सूटकेस तो करीब-करीब तैयार हो गया है।" टैक्सी के आँखों से ओझल होते तक शिखा देखती और हाथ हिलाती रही। 

सूटकेस को एक बार फिर फैला लिया। कौन सा सूट किस दिन पहनना है, कब गाउन और कब जींस टॉप पहनना है। पीले रंग की एक साड़ी उसने बड़े ही सावधानी से रख लिया।
ऊटी की झील देखने के समय तो उसे यही साड़ी पहननी है और वैभव के लिए भी पीली शर्ट या एक जैकेट ढूंढने लगी।
आलमारी के कपड़ों को उलटते-पलटते वह अपना पसंदीदा गाना गुनगुना रही थी।

"ओहो..इतने सारे मैडल, ट्रॉफी मिले हैं जनाब को कभी बताया भी नहीं कि बाइक रेसिंग, कार रेसिंग का इतना शौक है।" हाथ ही कैमरा रखा था और कई खूबसूरत फोटो एक बॉक्स में मिलीं।
सुंदर प्रकृति की सुंदरतम तस्वीरें, छलछलाती नदियांँ, सड़क पार करते जानवरों के झुंड, नहाते हुए हाथी और पर्वतीय क्षेत्रों के झरनों के सौंदर्य को कैमरे में कैद किया था वैभव ने।

"सोअ.. ब्यूटीफुल कैप्चर!" शिखा वैभव के गुणों की कायल होते जा रही थी।

गायत्री आंटी ने आज बिसीबेले भात बनाया था उसके लिए, खाकर उसने मम्मी-पापा, माँ-बाबा से बात की। उन्हें बताया कि कल सुबह जल्दी ही वो ऊटी के लिए निकल जाएंगे। 

शाम को पैकिंग फायनल की तभी वैभव‌ का फोन आया।
"डिनर करके यहाँ से निकलेंगे। रात को ट्रैफिक भी हो सकती है। तुम खाना खाकर सो जाना, सुबह फिर जल्दी भी निकलना है। बाय..!" कहते हुए वैभव ने फोन बंद कर दिया।
ऊटी की कल्पनाओं में डूबती-उतरती शिखा, नींद की बाँहों में समा गई।

डोरबेल बजी और शिखा ने उठकर दरवाजा खोला।
"बाप रे! दो बजने वाले हैं वैभव। इतनी देर अब सुबह जल्दी कैसे निकलेंगे?" उसका बैग पैक रखती हुई शिखा बोली।
"बस, दस मिनट में फायनल पैक करके सो जाता हूँ। तुम सो जाओ।" हाथ-मुँह धोते हुए वैभव‌ ने कहा।
"अब चलो, साथ में मिलकर करते हैं तैयारी।" कहती हुई शिखा उसके साथ सूटकेस जमाने लगी।
"ऊटी जाने की एक शर्त है मेरी।" वैभव शिखा की उनींदी आँखों में झाँकने लगा।
"शर्त...कैसी शर्त!" शिखा की आँखों से नींद उड़ गई।
"हनीमून में हम दोनों ही जाएंगे और कोई नहीं।" कपड़े रखते हुए वैभव ने कहा।
"तो हम दोनों ही तो जा रहें हैं तीसरा कौन है?" शिखा को आश्चर्य हुआ।

"अरे तीसरा है मोबाइल फोन। जब देखो लोग कॉल करते रहते हैं। तुम तो पूरे समय फोन पर ही रहोगी।" वैभव ने अपना फोन उठाया और बंद करते हुए कहने लगा।

"देखो, मैंने तो अपना फोन स्विच ऑफ कर दिया है।" 
"ओके, मैं भी बंद कर देती हूँ अपना फोन। अब कोई तीसरा नहीं होगा।" शिखा ने भी फोन स्विच ऑफ कर दिया और दोनों सो गए।

निशा का आँचल अभी भी फैला हुआ था और ऊषा ने अपने एक-एक पग बढ़ाने शुरू कर दिए। वैभव पूरे मूड से सीटी बजाते हुए ड्राइविंग कर रहा था। 
कार आगे फिसलती जा रही थी और शिखा का मन तो उड़कर ही ऊटी पहँचने को आतुर था। 
"दिल दीवाना बिन सजना के माने ना...!" वो गुनगुनाने लगी। 
दो घंटे तक राष्ट्रीय अभ्यारण्य की सड़कों का आनंद लेते, सुबह पशु-पक्षियों का भोर राग सुनते वो करीब छह घंटे में ऊटी के प्रवेश द्वार पर थे।

"सचमुच, कितनी बढ़िया कार चलाई तुमने, मुझे तो हिल स्टेशन में कभी इतने अच्छे से जाने का अनुभव नहीं है।" घुमावदार रास्तों में शिखा को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।
"अब कार रेसिंग हर जगह नहीं करता हूँ शिखा जी। तेज़, नियंत्रित, व्यवस्थित सभी प्रकार से चलाना आना चाहिए ना।" कहते हुए वैभव ने आँखों से बाहर इशारा किया।
चाय बागान में कुछ औरतें अभी-अभी अपनी टोकरियांँ लिए, दिनभर की दिहाड़ी की शुरुआत कर रहीं थीं। बागानों के बगल से उतरते, टेढ़े-मेढ़े रास्तों के दोनों ओर कॉटेजेस बने थे।

"कितने सुंदर कॉटेज हैं, वाहहह..क्या हम यहीं रूकेंगे?" शिखा ने चमकती आँखों से वैभव की बाँह पकड़ ली।
"जहांँ हमारी जान बोलेगी, वहीं रुक जाएंगे। हम तो गुलाम हैं आपके।" वैभव ने इस अंदाज से कहा कि शिखा को हँसी आ गई।
संकरे रास्ते से कूदती-उछलती कार, सबसे किनारे के कॉटेज के सामने रुक गई।

"अब तुम रिसेप्शन में पूछो कि जगह है क्या? बाद में मैं कार पार्किंग में लगा लूंगा।" वैभव की बात सुनकर शिखा, अपना पर्स लेकर फुर्ती से उतर गई।
एक ही कमरा खाली था जिसके लिए शिखा ने रजिस्टर की औपचारिकता पूरी की और सामने कार में बैठे वैभव को इशारे से बुला लिया।
कमरे की चाबी और सूटकेस उठाए एक आदमी आगे आगे चल रहा था। झुकी कमर, कंधे से नीचे तक जटा बने बाल, लंबी और अधपकी दाढ़ी। उसने ढीला बड़ा सा कुर्ता ही पहना था शायद झुकी कमर से परेशान था।

"यह कमरा कितने दूर है रिसेप्शन से, तभी खाली है।" शिखा ने कहा और वह पलटकर उसे घूरने लगा। आँखें बिल्कुल शून्य, भेदकर पार निकल जाए ऐसी दृष्टि।
"नए जोड़े ही रुकते हैं इस कमरे में, जिनको दुनिया से कुछ लेना-देना नहीं रहता।" उसने शुद्ध हिन्दी में, खरखराती आवाज़ से उत्तर दिया और पलटकर आगे चलने लगा।

शिखा उसे बोलना चाहती थी कि उसकी हिन्दी बहुत अच्छी है परंतु उसके तेवर, चाल-ढाल देखकर चुप हो गई। कार लगाकर वैभव भी आता दिखाई दिया।

हरियाली के बीच में छोटा-सा सुंदर कॉटेज। दोनों ने चाय आर्डर किया तो चाय लेकर वही आया, झुकी कमर और लाल आँखों से घूरते हुए चाय टेबल पर रख दिया।‌ दो मिनट देखता रहा फिर चला गया।
"बहुत अजीब सा है। यहाँ रहता है परंतु हिन्दी एकदम शुद्ध बोलता है।" शिखा ने वैभव को बताया।

"ओह, लगता है तुमसे बात हो गई। देखना, कहीं  तुम्हारा दीवाना न बन जाए फिर वो गाता फिरेगा..दिल दीवाना बिन शिखा के माने..!" और वह जोर-जोर से हँसने लगा।

"अब मुँह मत फुलाओ चलो, आज सबसे पहला हनीमून स्पॉट मेरी शिखा की प्रिय ऊटी झील।" वैभव ने उसे बाँहों में भरते हुए कहा।

"आज ही चल रहें हैं। चलो, मैं पीली साड़ी पहन लेती हूँ और देखो मैंने तुम्हारी आलमारी से, यह पीली टी-शर्ट भी ढूँढ लिया।" अपने सूटकेस में से साड़ी और वैभव की टी-शर्ट निकाल कर बेड पर रख दिया शिखा ने।
"इतनी पुरानी टी-शर्ट! जब नौकरी नई-नई थी तब‌ कंपनी के स्पोर्ट्स दिन की है।" वैभव ने खींचतान कर पहन ही लिया।

सामने पीली साड़ी में खड़ी शिखा को एकटक देखने लगा।
"अब कहीं मोगरे का गजरा मिलेगा तो लगा लूंगी। मालूम है..।" शिखा को बीच में रोककर वैभव ने कहा, "मालूम है कि पिक्चर में उस हीरोइन ने लगाया था।" सुनकर शिखा शरमा गई।

क्या ही यादगार शाम! 
झील किनारे बैठी एक महिला से शिखा के खरीदे गजरों को पिन की सहायता से, बड़ी ही कुशलता से वैभव ने उसके बालों में सजा दिया। झील में मचलती लहरें और नवयुगल का आपसी प्रेमालाप, बोटिंग करते हुए, स्नेह से भरी जलबूँदों को एक-दूसरे पर उड़ेलते, वो गाने लगे।

"दिल दीवाना बिन सजना के माने ना...!"
कैमरा अपना काम कर रहा था। वैभव ने हर कोने से शिखा की खूब फोटो खींची।
"अरे, हम दोनों की भी तो लो फोटो।" शिखा ने वैभव के हाथ पकड़ लिया।

एक बड़े पत्थर पर कैमरे को सैट किया और फिर अलग-अलग प्रकार से फोटो खींच लीं। किनारे पर चलने वाले रेस्टोरेंट से पसंद का खाना खाकर, उन्होंने ऑटो रिक्शा कर लिया।

"बड़ी ही संकरी सड़क है और पथरीली भी, ऑटो लेना ही ठीक रहा। कार का आना-जाना कठिन है।" कॉटेज के कुछ पहले उतरकर वो एक-दूसरे से चिपटे हुए पैदल जाने लगे।
"बहुत अँधेरा है, एक बड़ी लाइट भी नहीं।" शिखा ने कहा और किसी ने उसके मुँह पर टॉर्च की रोशनी फेंकी। 
अचानक मुँह पर लाइट आने से दोनों कुछ घबरा गए, शिखा की तो चीख निकल गई।
झुका हुआ वह आदमी बिल्कुल सामने आ गया था। वैसी ही शून्य सी घूरती आँखें‌
"क्या कर रहे हो? मुँह पर ऐसे रोशनी डालते हैं क्या?" घबराहट में शिखा बड़बड़ाने लगी।

"अपने कॉटेज के लोगों को पहचान कर फिर रास्ता दिखाता हूँ।" शुष्क आवाज़ में कहकर वो पलटकर टॉर्च दिखाते हुए आगे चलने लगा।

रात को ही शिखा ने वैभव से किसी दूसरी जगह रुकने के लिए कहा और सुबह तैयार होकर, कार और सामान लेकर वे निकल गए। शिखा की नजरें उस आदमी को ढूँढ रहीं थीं परन्तु वह कहीं दिखाई नहीं दिया।
"बेचारा, कुछ टिप ही मिल जाता उसको, तुम्हारे चीखने से डर गया होगा।" वैभव ने उसे चिढ़ाया।

कुछ देर तो वो सुंदर चाय बागानों को देखते, कभी किनारे कार खड़ी करके उतर जाते, आजू-बाजू से गुजरते बादलों को मुट्ठी में हमेशा के लिए कैद करती शिखा की फोटो लेते वैभव अपनी फोटोग्राफी का लुत्फ़ ले रहा था। अब दोपहर होने वाली थी, प्यास से शिखा का गला सूखने लगा था।
"उस साइड छोटी सी दूकान और पीछे रेस्टोरेंट है। पानी लेते हैं ना बहुत प्यास लगी है।" शिखा ने कहा और मोड़ पर किनारे वैभव ने कार रोक लिया।
"तुम ले आओ पानी, आगे कुछ दूरी पर एक बढ़िया सड़क छाप ढाबा है, वहीं खाएंगे लंच‌।" वैभव ने कहा और पर्स लिए शिखा नीचे उतर गई।
सड़क पार करके उसने पानी के लिए पूछा तो उसके पास छोटी बोतल थी। उसने बताया कि एक लीटर वाली बोतल रेस्टोरेंट में है।

शिखा ने पलटकर कार की ओर देखा, बादल नीचे उतर रहे थे। ड्रायविंग सीट पर बैठा वैभव उसे ही देख रहा था। शिखा ने उसे रेस्टोरेंट का इशारा करते हुए हाथ हिलाया और रेस्टोरेंट में घुस गई। 

काउंटर पर पानी की बोतल मांगकर, वह इधर-उधर देखने लगी। सामने टेलीविजन लगा था, खाते पीते लोग समाचार भी देख रहे थे। शिखा को लगा कितने दिनों बाद वह  टीवी देख रही है। निगाहें सामने चलते समाचार पर चिपक गईं।
शुक्रवार को बैंगलोर के हाइवे पर  रात डेढ़ बजे हुए रोड़ हादसे को बार-बार दिखा रहा था। खाई में गिरी उस कार को, शनिवार खोजकर निकाला गया।

"तीन आईटी इंजीनियर और कार चालक की दुर्घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गई है। कुछ परिजन पहुँच गए और कुछ से संपर्क किया जा रहा है। इंजीनियर वैभव जिनकी अभी-अभी शादी हुई थी, उनकी पत्नी से अब तक संपर्क नहीं हो पाया है। वह अपने घर में नहीं हैं।" समाचार वाचक बोल रहा था और स्क्रीन पर चारों की तस्वीरें, आई डी कार्ड दिखाया जा रहा था। 
"मैडम पानी।" वेटर ने बोतल सामने किया।

शिखा शून्य में, मूर्तिवत टीवी में गुम थी जहाँ वैभव की तस्वीर, उसका नाम पता दिखा रहा था।
वैभव सक्सेना 
तीस वर्ष 
सीनियर इंजीनियर 
माता-पिता का नाम 

बाद में उसके पार्थिव शरीर के साथ मम्मी-पापा, माँ-बाबा, शिखा और वैभव दोनों के छोटे भाइयों को देखकर, वह पसीने से लथपथ हो गई। सारी दुनिया घूमने लगी, गिरने ही वाली थी कि टेबल को पकड़ लिया। 
सब कुछ धुआँ-धुआंँ सा, आँखें और दिल पथरा गए।‌ गिरते संभलते बाहर आने लगी, बोतल का पानी लिए वेटर पूछने लगा, "मैडम, क्या हुआ? तबीयत ठीक तो है ना।" 

शिखा अपनी धुन में बाहर आ रही थी। सड़क के उस पार बादलों ने कार को अब पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया था। आँखें गडाए, लड़खड़ाती हुई वो कार की ओर बढ़ने लगी। उसने कार की ओर ध्यान से देखा, ड्रायविंग सीट खाली थी। अर्धचेतन सी शिखा ने पर्स से अपना बंद पड़ा फोन निकाला, तभी तेज़ी से एक ट्रक, बादलों के उस धुएं से अचानक बाहर आया और शिखा को कुचलता हुआ निकल गया। कुचली हुई जवान लड़की के चारों ओर भीड़ लग गई। 

कार चालू थी, लोगों ने सुना उस खाली कार से गाने की आवाज़ आ रही थी..
"दिल दीवाना बिन सजना के माने ना....!" 


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शर्मिला चौहान

सोमवार, 14 जुलाई 2025

कॉफी हाउस - कहानी (मुट्ठी भर क्षितिज)

कहानी - "कॉफी हाउस"


काॅफी हाउस, शहर की वह प्रसिद्ध जगह जहाँ हर मौसम, हर समय भीड़ रहती है। सर्दियों में तो बाहर खड़े होकर काॅफी पीने वाले भी होते हैं, जिनके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। शाम का माहौल काफी खुशगवार होता है मानो जिंदगी अपनी रंगीनियाँ बिखेर दिया करती है। काम से वापस आने वाले, काॅलेज के युवा, घूमने आए परिवारों, महिलाओं के झुंड और जीवन के अंतिम पड़ाव से गुजर रहे बुजुर्गों की यह पसंदीदा जगह है। कितने लोग और कितने चेहरे।  मुस्कुराते चेहरे, व्यग्र और आतुर चेहरे, चिंतामग्न, दुःखी चेहरे, उत्साहित और प्रफुल्लित चेहरे, ठहाके लगाते तो कुछ अनमने से। यह एक जगह अनेक प्रकार के लोगों से भरी रहती है।

आज उसे सिन्हा ने बुलाया है पर वह खुद कभी समय पर आता नहीं। वेटर चेहरे पर चिर-परिचित मुस्कान लिए कॉफी का प्याला मेज़ पर रख कर कहता है, "सिन्हा साहब भी आएँगे क्या?" मीरा ने सिर्फ सहमति में सिर हिलाया।  पहले भी वह सिन्हा से यहाँ तीन-चार बार मिल चुकी है।

कॉफी से उठता धुआंँ नथुनों में समा रहा था। इस खुशबू को वह अंदर तक पी लेना चाहती है। ना जाने क्या जादू है कि वह काॅलेज के जमाने से कॉफी हाउस के कॉफी की प्रशंसक है और जब आने का मौका मिलता है जरूर आती है।

आँखें बंद करके इस खुशबू में डूब जाना चाहती थी, उसी समय सिन्हा की खरखराती आवाज ने ध्यानभंग कर दिया।
"ज्यादा इंतजार तो नहीं करना पड़ा आपको। अरे... मैं निकला तो ठीक समय पर ही था मगर.!"
"अब बस भी कीजिए सिन्हा जी, आज कोई नई बात नहीं है। हर बार और कितने बहाने ढूँढेंगे। एक महिला को आपने बुलाया और आप ही देर से आ रहे हैं।" मीरा ने शिकायत भरे लहजे में कहा।
"साहब, आपकी कॉफी तैयार है। कुछ और लेंगे साथ में?" वेटर ने मुस्कुराते हुए कहा।
"भई, बिना समोसे के कॉफी का क्या मजा? "अरे...तुम्हारा बेटा कैसा है अब? बुखार तो नहीं आता ना उसको?" सिन्हा ने कुछ ऊंँची आवाज में वेटर से पूछा।

"नहीं साहब, बिल्कुल भला-चंगा है अब। आपकी मेहरबानी से बहुत मदद हुई। बड़ी सुविधा मिली अस्पताल में उसे। अब तो स्कूल भी जा रहा है।" अदब और कृतज्ञता से वेटर ने बताया।
"अरे भाई .. कुछ मदद-वदद नहीं की। तुम तो गरमागरम समोसे ले आओ।" सिन्हा ने हँसते हुए कहा।

"कैसे याद किया आज आपने?"  मीरा ने छोटा-सा प्रश्न किया।
"वकील और लेखक दोस्त नहीं हो सकते क्या? " प्रश्न का उत्तर प्रश्र से ही देते हुए सिन्हा ने कहा।
"एक बहुत रोचक केस आया है। मुझे लगा कि आपके लेखों के लिए अच्छा हो सकता है। कुछ लिखने पर मजबूर कर देगा।"

"कहिए, कौन सा किस्सा आया है आपके दरबार में?" मीरा ने उत्सुकता जताई।
"एक औरत का केस है। सैंतीस-अड़तीस की होगी। कम पढ़ी-लिखी लगती है, पर दिखने में एकदम हीरोइन है। उस पर उसके पति की हत्या का आरोप है। वकील के लिए पैसे नहीं हैं और सरकारी वकीलों पर लगता विश्वास नहीं है उसको। मुँह से कुछ बोलती नहीं।" एक ही सांस में कह गए सिन्हा जी।

"साहब, आपका गरमागरम समोसा हाजिर है। कुछ और लगे तो आवाज देना।" विनम्रता से वेटर ने कहा।
"अब यार, तुम्हारे हाॅटल में आएँ हैं तो तुमसे ही कहेंगे, खुद जाकर तो नहीं बना लेंगे ना।" ठहाका मारकर सिन्हा ने कहा। साथ ही सारे वेटर भी मुस्करा रहे थे। वह वेटर झेंपते हुए अंदर चला गया।

"आपने क्या नतीजा निकाला? क्या वह औरत कसूरवार है?" मीरा सीधे परिणाम पर आ गई।
"अभी तक तो सारे सबूत उसके खिलाफ हैं। सारे गवाहों के बयान भी उसी की तरफ इशारा कर रहे हैं।" आराम से बैठते हुए सिन्हा कह रहा था।
"क्या आप उस औरत से मिले हैं कभी?" जिज्ञासा से मीरा ने पूछा।

"हाँ , मिला हूँ। पहली बार जब वह कटघरे में खड़ी थी और बाद में पुलिस कस्टडी में भी। बला की खूबसूरत है वो। गोरा रंग, बड़ी आँखें, लंबे बाल और तीखे नैन-नक्श। बदन तो बस पच्चीस-तीस का लगता है।" जिक्र करते हुए मानो सिन्हा उस औरत की सुंदरता में डूब गए उनकी आँखों की चमक और चेहरे के भाव से मीरा को ऐतराज़ हो रहा था।

क्यों आदमी औरत में सिर्फ शारीरिक सुंदरता देखते हैं। जवान-बूढे़, पढ़े-लिखे, अनपढ़, आदमी सिर्फ आदमी होता है। औरत को देखने का नजरिया बदल पाना, उसके लिए कठिन है।
"क्या आप उसकी खूबसूरती से प्रभावित होकर गए थे या उसकी मदद करने का इरादा था?" अनजाने ही मीरा ने एक तेज-तर्रार प्रश्न दाग दिया।

"हा..ऽ..हा ऽहाऽ.. आपकी कॉफी ठंडी हो रही है। आप भी पीजिए और मैं समोसा खा लेता हूँ।" एक चालाक वकील ने झट पैंतरा बदल दिया।

कॉफी पीते हुए मीरा ने महसूस किया कि आसपास बैठे आदमी उसे घूर रहे हैं। नवयुवकों के जोड़े अपने आप में मग्न थे। बूढ़ों का समूह भी सड़क से आती-जाती लड़कियों और औरतों के कपड़ों पर अपने विचार व्यक्त किए जा रहे थे। कभी-कभी दबी जुबान से कुछ कहकर ठहाके लगा लेते।

पचास साल की प्रौढ़, अनुभवी लेखिका है मीरा। लोगों की आँखों से मन तक झाँकना आता है उसको। उसके लेख, विचार और कहानियाँ, समाज का प्रतिबिंब होती हैं। कुछ जान-पहचान के लोग उसे प्रतिष्ठित लेखिका जानकर, ज्वलंत मुद्दों और कचहरी में आए  मामलों की जानकारी देते रहते थे, ये सिन्हा साहब भी उनमें से एक हैं।
"मुझे इस केस के बारे में पता है सिन्हा जी। मैं भी मधु से मिल चुकी हूँ। बड़ी शांत और सभ्य महिला है।" कॉफी के प्याले को सहलाते हुए मीरा ने कहा।
"अच्छा ऽऽ!" मानो सिन्हा जी चीख पड़े। मेज़ साफ करते वेटर, लड़के-लडकियाँ,  सारे बूढ़े समूह की आँखें सिन्हा पर टिक गई।
एक क्षण के लिए ही सही सिन्हा ने थोड़ी शर्म महसूस किया।
"हां, मैंने अपने स्तर पर कुछ जानकारियांँ भी हासिल की हैं। मैं खुद को कहीं ना कहीं इससे जुड़ी हुई पातीं हूँ।" आराम से मीरा ने अपनी बात पूरी की।
सिन्हा की प्रश्नवाचक निगाहों को देखते हुए मीरा ने बताया, "एक तो मैं औरत हूंँ, दूसरे आप मर्दों के इस समाज में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हूँ और एक बेटी की माँ भी हूँ।" मीरा ने गहरी सांँस ली।
"अरे.. मुझे मालूम नहीं था कि आप इस केस के बारे में जानकारी रखतीं हैं। मैंने आपका समय खराब किया और इंतजार भी करवाया।" घूरते हुए सिन्हा ने औपचारिकता पूरी की।

"नहीं-नहीं सिन्हा जी, ऐसी बात नहीं है। मुझे आपके विचार पता चले। किसी भी विषय पर लिखने से पहले, संबंधित लोगों के विचार, नजरिया, दृष्टिकोण जानना एक लेखक का काम है। आप एक वकील हैं और मैंने आपके विचार जानने का प्रयास किया।" मीरा ने कहा।

बाजू की टेबल पर एक युवा जोड़ा  बैठा आपस में इतना व्यस्त हैं कि उन्हें आसपास की दुनिया से कोई सरोकार नहीं।  इस उम्र का आकर्षण ही ऐसा है कि इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
कुछ आँखें उनको ही घूरने में लगीं  हैं।
उन बूढ़ों का समूह भी अपनी सभा खत्म कर रहा है और अपने हिस्से के पैसों का हिसाब कर रहा है। जाते हुए उन्होंने सौंफ खा भी लिए और थोड़ी जेब में रख लिए।
मीरा ने अपना ध्यान सिन्हा पर केन्द्रित किया जो बैचैन नजर आ रहा था।
"और क्या-क्या जानतीं हैं आप इस औरत के बारे में?" अजीब सी दृष्टि डालते हुए सिन्हा पूछ रहा था।
"उतना ही जितना एक औरत दूसरी के बारे में जानती है वो भी तब जब वह उसके साथ कुछ समय बीता चुकी है।" मीरा ने सिन्हा के चेहरे पर निगाह गडा़ते हुए कहा। 

"सिन्हा जी, मधु आज से दस-बारह साल पहले  मेरे  घर काम करती थी। तीन साल काम किया उसने। मेरे पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद मैंने वो घर छोड़ दिया और उसका काम छूट गया।" मीरा कहती गई।
"ओह!"  सिन्हा की आँखें फैलती चली जा रही थी जैसे थाली में पानी फैल जाता है। इस बार उसने ध्यान रखा कि आवाज ज्यादा ऊँची ना होने पाए।

बुजुर्गो की खाली हुई जगह में अब चार-पाँच औरतों ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। पैंतीस से चालीस के उम्र की, अपने रोजमर्रा की जिंदगी से थोड़ा सा वक्त निकालकर आईं हैं, आते ही उन्होंने एक-दो फोटो ले लीं। फिर क्या खाना है और कितना, इस पर बहस करने लगीं। ना जाने क्यों मीरा को बहुत अच्छा लग रहा था कि एक बार फिर वो अपनी दोस्ती का रिश्ता निभाना शुरू कर रहीं हैं।

एक उड़ती हुई नजर से सिन्हा ने सबको ताड़ लिया। मीरा की तरह खुल कर देखने की जुर्रत ना कर पाए। मीरा की नजर में यह उनका शरीफ़ बनने का असफल प्रयास था।

"सिन्हा जी, मधु का केस मैं लड़ रही हूंँ  शायद आपको पता नहीं कि मैंने आपसे तीन साल पहले वकालत पास  की थी। कभी कोई केस लड़ी नहीं, क्योंकि शादी के बाद पति का स्थानांतरण होता रहता था। अपनी क्षमता लेखन में डाल दी और फिर पूरी तरह उसमें ही डूब गई। अब मुझे मधु ने आवाज दी है, मुझे उसके लिए लड़ना होगा। उसको मैंने तीन सालों में जितना समझा, दुनिया नहीं समझ सकती।"
आत्मविश्वास से भरी हुई औरत बोल रही थी।
"अरे.. आप तो छुपी-रूस्तम निकलीं। बहुत कुछ जानती हैं आप मधु के बारे में परंतु सारे सबूत और गवाह उसके खिलाफ हैं। क्या कर लेंगी आप?" एक वकील अपने पेशे पर आ गया।

"सच्चाई को सामने लाना ही एक वकील और लेखक, दोनों की जिम्मेदारी है। रोज़ दम तोड़ने वाले गवाह और सबूत बहुत बिकते हैं पर सच बिकाऊ नहीं होता और .. मुझे सच्चाई का पता है, वह मैं साबित कर लूँगी।" मीरा ने आत्मविश्वास से भरे शब्द कहे।

उनके बीच सन्नाटा छा गया जिसको तोड़ते हुए वेटर ने कहा, "साहब जी कुछ और मंगाना है आपको या बिल लाऊँ?"
बिना कुछ बोले सिन्हा ने मीरा की ओर देखा।
"सुदर्शन, तुम्हारा बेटा बीमार था। उस बड़े अस्पताल में उसका इलाज हुआ। मेरी सहेली वहाँ बच्चों के विभाग की मुख्य है, उसने मेरे कहने पर मदद की। उस दिन जब सिन्हा से तुमने बताया था तभी मैंने सुनीता से बात करके, सिन्हा को अस्पताल के बारे में बताकर, तुम्हारे लिए खबर दी थी। हम कॉलेज में थे तब भी यहाँ आते थे ‌ तब तुम छोटे बच्चे थे। हमें बहुत बुरा लगता था कि तुम काम करते हो।"
सहसा, किसी के मुँह से अपना नाम सुनकर सुदर्शन खुश हो गया क्योंकि यहांँ तो लोग उसको "वेटर" ही बुलाया करते हैं।

उसने अपने दिमाग पर जोर दिया तो तीन-चार लड़कियों की धुँधली  तस्वीर घूम गई। "ओह! तो वह बड़ी डॉक्टर वही लड़की थी जिसने एक बार उसके हाथ में काँच लग जाने पर अपने पास रखी पट्टी बाँधी थी।" सोचते हुए उसकी आँखें झिलमिलाने लगीं।

भरी आँखों से सुदर्शन ने हाथ जोड़ लिए, प्रत्युत्तर में मीरा ने भी।
"सिन्हा जी, आपने सुदर्शन से बताया नहीं कि एक महिला दोस्त की दोस्त ने मदद की।" हँसते हुए मीरा ने कहा ।
वेटर सिर झुकाकर, बिल लाने चला गया। सोच रहा था कि इस महिला के बारे में वो कितना गलत सोच रहा था। सिर झटककर वह मीरा की तेज तर्रार, बिंदास और पुरुषों के साथ घूमने वाली औरत की छवि को हटा देना चाहता था।

सहसा, मीरा ने बैग में से फोन निकाला और अगले ही क्षण एक चिरपरिचित, खरखराती आवाज की रिकॉर्डिंग गूँज रही थी, "मिनी, मैं आज ही सुबह आया हूँ। काम था कुछ यहांँ। मैं और तुम्हारी मम्मी अच्छे दोस्त हैं। उन्होंने तुम्हारे लिए कुछ भेजा है। यदि कोई काम ना हो तो चलो घूम आते हैं और बाहर खाना भी खा लेंगे।"  फोन पर से आई खुद की आवाज से सिन्हा के दिल की धड़कन चौगुनी हो गई। माथे पर पसीना आ गया।
"नहीं अंकल, मेरे छात्रावास में ऐसा नहीं होता। मैं सिर्फ मम्मी के साथ ही जाती हूंँ। और हाँ .. मम्मी ने मुझे कभी आपके बारे में ना ही बताया ना आपके आने के बारे में फोन किया।" यह मीरा की बीस वर्षीय बेटी मिनी की आवाज थी।
"मम्मी की भेजी हुई चीज मैं रख लेती हूँ। अगले बार आप मम्मी के साथ ही आना जिससे  हम बाहर जा सकें।" मीरा ने फोन बंद कर दिया।

घूरती हुई आँखें सिन्हा पर टिकाते हुए, एक छोटी सी, पतले कपड़े की फ्राॅक निकाल कर मेज़ पर पटक दिया।
अपनी कॉफी के पैसे निकाले और सुदर्शन के हाथों में रख दिए।
बैग उठाते हुए बोली, "अभी चलती हूँ  कोर्ट में ही मुलाकात होगी। अपना हश्र तो समझ ही गए होगे, जिसकी बेटी ने तुम जैसे शातिर की आवाज कैद कर ली, उसकी मांँ क्या कर सकती है।"
कुर्सी सरकाकर एक हिकारत भरी निगाह सिन्हा पर डालते हुए वह उठ गई। कॉफ़ी हाउस का मुख्य द्वार खोल कर, सुदर्शन झुक कर मानो मीरा के सफलता की कामना कर रहा था।

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यह मेरी मौलिक, स्वरचित कहानी है।(नरेंद्र परिहार को दी आज दिल्ली के लिए)

लेखिका - शर्मिला चौहान 
१४ मई २०१८

गुरुवार, 10 जुलाई 2025

योग करे दुःख होय - व्यंग्य (इंदौर समाचार 11/7/25)

योग करे दुःख होय-  (व्यंग्य) 

वैसे तो बांकेलाल को और  उनके शरीर को व्यायाम, भागदौड़ ने कभी प्रभावित नहीं किया परंतु आजकल योग उनके दिलो-दिमाग में छाया रहता है।
पंद्रह दिनों से फोन, अखबार और टेलीविजन पर योग दिवस की तैयारियाँ देखकर ही उनकी आँखों का मोतियाबिंद, कुछ कम होने लगा था। रही-सही कसर चौराहे पर लगे बड़े पोस्टर ने पूरी कर दी। सफेद कुर्ते नुमा शर्ट पहने लोग, हष्ट-पुष्ट योगगुरु की तस्वीर, योगदिवस पर आम लोगों को आमंत्रित कर रही थी।

बांकेलाल ने अपने व्यक्तित्व का जायज़ा लिया। काले किए बाल, खाती-पीती तोंद, बरसाती चप्पल और हाथ में चार साल पुराना बढ़िया छाता, कुछ खास तो था नहीं अर्थात आमंत्रण अपने लिए जानकर उन्होंने आने का समय जाँच लिया। आम आदमी थे सो मुफ्त के प्रमाणपत्र और नाश्ते के लोभ का संवरण नहीं कर पाए।

वैसे भी सालों पहले स्कूल का प्रमाणपत्र मिला था, बड़के दद्दा ने अपने प्राचार्य दोस्त से कहकर, सभी खेलों, वाद-विवाद प्रतियोगिता, भाषण का बढ़िया सा प्रमाण पत्र दिलवा दिया था। कॉलेज में तीन साल की डिग्री छह में लिए और प्रमाणपत्र आठवें में हाथ आया था। योग दिवस पर मुफ्त प्रमाणपत्र का योग बन रहा है, यह संयोग ही था बांके के लिए।

योग दिवस पर सुबह साढ़े छह बजे, बांकेलाल जी सपत्नीक चौराहे पर पहुंँच गए। मंच पर विराजमान फिट काया वाले व्यक्ति को योगासन करते देख पत्नी ने बांके पर आँख तरेरी।
"रोज योग करते तो पेट मटका न बनता।" अवसर न छोड़ने वाले विपक्ष की तरह पत्नी ने तीर छोड़ा।

भीड़भाड़ में बांकेलाल ने उनको इग्नोर कर दिया, घर में तो संभव नहीं होता।‌ 
खैर, डेढ़-दो घंटे आड़े-खड़े, लेटे-बैठे, गीत दोहराते बाँकेलाल की सांसें बुलेट ट्रेन की स्पीड पकड़ रही थीं। मांसपेशियों में समोसे, कचौड़ी, गुलाबजामुनों की जकड़न चढ़ी थी, उसने ढीली होने की शुरुआत कर दी थी।

"प्रमाणपत्र शाम को ले जाना, अभी नाम लिखवा दो और नाश्ते की लाइन में लग जाओ।" एक कार्यकर्ता भीड़ संभाल रहा था। 
ऐसे नाश्ते से तो कुछ न खाना अच्छा होता, अंकुरित मूंग, एक केला और हरा कोई पेय। सपनों का हकीकत में बदलना कितना दुखदाई हो सकता है, यह बांकेलाल से ज्यादा कौन समझेगा।

घर आकर सोफे पर शरीर को फैलाते कि बेटे ने आवाज़ दी।
"पापा-मम्मी, आप दोनों आओ।‌ आज परिवार के साथ योग करते हुए वीडियो भेजना है ऑफिस, योग दिवस है ना।" बेटे की मनुहार से बांकेलाल जी ने सोफ़ा त्याग दिया।
परफेक्शनिस्ट बेटे ने, योगासनों की मुद्राओं को सुधरवाने हुए, कई बार आसन करवाए। वीडियो बनकर तैयार हुआ और बांकेलाल ने वापस सोफ़ा संभाल लिया।

दरवाजे की घंटी सुनकर बेटे ने दरवाजा खोला।
"पापा, आपको अंकल लोग बुला रहे हैं।" कहते हुए वह अंदर चला आया।
अपनी अस्त-व्यस्त पड़ी काया को समेटते, माथे पर पड़ी रेखाओं को हटाने का प्रयास करते बांकेलाल दरवाजे पर पहुंचे।

"भाई सोसायटी की नोटिस नहीं देखे क्या? चलो जल्दी, कार्यक्रम शुरू हो गया है। योगशाला के‌ विद्यार्थियों को बुलाया है आज दिन विशेष पर।" सफेद शर्ट, नीली फिट पैंट और चटाई साथ लेकर बांकेलाल मैदान में जा डटे।

दस सूर्य नमस्कार का एक पहला राउंड, पाँचवें में ही बांकेलाल ने, बादलों में छुपे सूर्य को नमस्कार कर कुर्सी पकड़ ली। अपनी सोसायटी के लोगों को बिजली की गति से आसन करते देख, बांकेलाल को योग पर अटूट श्रद्धा हो गई।
"अरे अंकल, पहला राउंड तो पूरा कर लीजिए।" सोसायटी की एक बच्ची ने बांकेलाल को कुर्सी से उठाते हुए कहा। बांकेलाल ने देखा, फोटोग्राफर उसी एंगल से फोटो ले रहा था, वो अचकचा कर उठ गए।

घर जाकर, दो रोटी खाई और सोफे पर पसर गए। हड्डियों का हर जोड़ कराह रहा था।
"पाँच बज गए, चलो अपना प्रमाणपत्र ले आएं।" सजी-धजी पत्नी सामने खड़ी थी।
"कोई प्रमाणपत्र नहीं लाना, कोई पुरस्कार मिला है क्या?" अब अपने शरीर को किसी भी प्रकार की आज्ञा नहीं देना था बांकेलाल को।

"जाएंगे कैसे नहीं, मुझे उस पोस्टर के साथ सैल्फी लेना है, प्रमाणपत्र को फेसबुक, व्हाट्स एप स्टेट्स पर लगाना है।" गृह लक्ष्मी के बदले तेवर को भांपकर, बांकेलाल जी अपने भारी बदन, हड्डियों की टूटने को समेटते हुए, उनके पीछे हो लिए।


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लेखिका - शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)




सोमवार, 7 जुलाई 2025

कहानी - ट्यूबलाइट

कहानी - "ट्यूबलाइट"

"हजारों बार बताया था कि सुभाष को अकेले बाहर मत जाने दिया कर, परंतु तू तो उसे सामान्य बच्चा ही समझती है आज तक। अब जा, ढूँढ कर ला उसे।" दिन भर काम करके आए भूषण ने, गुस्से से अपनी पत्नी सुनंदा से कहा।

"अब ग्यारह-बारह साल के लड़के को घर में कितना बंद रखूँ, जानती हूंँ मेरा ही जिम्मा है वो।" साड़ी ठीक करती सुनंदा बाहर निकल गई और भूषण भी पानी पीकर उसके पीछे निकल गया।

महानगर से सटा, भीड़ वाले ‌शहर के कुछ बाहरी मोहल्लों में से एक है यह बस्ती।‌ 
सुनंदा याद करने लगी कि शादी के कुछ महीनों बाद ही, वो और भूषण इस मोहल्ले में रहने आए थे। पहले छोटा सा किराए का घर लिया था, बाद में म्हाडा का घर मिला। भूषण एक कंपनी की शिफ्ट में काम करता था और मैट्रिक पास सुनंदा ने भी गृहोपयोगी वस्तुएं केंद्र से लेकर घर-घर बेचने का काम सीख लिया था। शहर में चार पैसे कमाना उसे जरूरी लगा। गाँव में भूषण के सेना से सेवानिवृत्त ड्राइवर पिता अब अकेले रहते थे। वो खुद अपना काम करते और खुश रहते थे।
तीन साल बाद जब सुनंदा गर्भवती हुई तब उन्होंने, उन दोनों को गाँव बुलाया, खूब उत्सव किया। 
"हमारी कई पीढ़ियों ने देश की सेवा की है बेटा। स्वतंत्रता संग्राम में, सेना में रहे। सिर्फ भूषण ने अपना रास्ता बदल लिया। अब अपने पोते को देशसेवा में भेजूंगा मैं।" उनकी खुशी की सीमा नहीं थी।

"अब तू काम में मत जाया कर सुनंदा। बस, लोकल ट्रेन में जाना पड़ता है, इतना भारी बैग लेकर चढ़ना उतरना ठीक नहीं है।" पाँचवे महीने में भूषण ने कहा और सुनंदा  ने अगले महीने छोड़ने का निर्णय लिया।

बाबा भी आ गए। उन्होंने सुनंदा के कमरे में वीर महापुरुषों की, देशभक्तों की तस्वीरें लगा दीं।
"मैं अपने पोते को देशसेवा करने की शिक्षा दूँगा।" उनकी बातें गर्भस्थ शिशु तक पहुँचतीं।
सुनंदा भी पेट में हलचल होने पर, बचपन की बाल भारती में पढ़ी कविताएं गाने लगती और लगता जैसे शिशु शांत होकर सुन रहा है।

"मुझे तोड़ लेना वनमाली, देना उस पथ पर तुम फेंक।"
फिर लगता लड़की हुई तो.."खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।" 
 
अचानक उसके पैर पत्थर से टकरा गए और विचारों की श्रृंखला टूट गई। बस्ती के छोर तक आ गई थी। मैदान में कुछ बच्चे खेल रहे थे।
"सुभाष को देखा क्या बच्चों?" उसने उनसे पूछा।
"कौन सुभाष आंटी, हम नहीं पहचानते। यहाँ खेलने आता है क्या?" एक लड़के ने पूछा।
"अबे, वो पागल.. थोड़ा कम दिमाग लड़का है ना, वही।" दूसरे लड़के ने एक माँ के सामने उसके बेटे की पहचान बताई।

सत्य कभी सुंदर नहीं होता और उसे किसी भी आवरण से ढांकना कठिन है। किसी माँ के लिए यह सत्य हृदय फाड़ने वाला था।
"पागल नहीं है वो, अलग है बस। तुमसे ज्यादा समझदार है किसी को ठेस तो नहीं पहुँचाता।" डबडबाई आँखों से निकल गई सुनंदा पीछे  बच्चों की आवाजें उसका पीछा कर रहीं थीं जो उस लड़के को डाँट रहे थे।

आगे गली के बाईं ओर मुड़ गई जहाँ चाय की टपरी और पान ठेला था।
"क्यों जाने दिया मैंने उसे और अब तो बहुत समय हो गया।" खुद को कोसती हुई सुनंदा चारों तरफ देखती जा रही थी।

इस बच्चे ने हमेशा ही उसकी परीक्षा ली है।गर्भावस्था में एक दिन उसके पेट के निचले हिस्से में दर्द हुआ, उसने हल्के हाथों से मालिश करके, उस दिन आराम किया।
दूसरे दिन दर्द बहुत तेज हो गया। बाबा और एक पड़ोसन के साथ वह अस्पताल आ गई, भूषण को खबर भेज दिया था।
सरकारी अस्पताल में बिस्तरों की कमी या मरीजों की बहुलता से, फर्श पर बिछे गद्दों पर रोगी थे।
"डॉक्टर साहब, मेरी बहू को देख लीजिए, बहुत तकलीफ़ में है।" महिला डॉक्टर से बाबा ने प्रार्थना की।
"सब तकलीफ़ में ही अस्पताल आते हैं दादा, नंबर निकालो और बैठो।" अकेली डॉक्टर परेशान हो चुकी थी।
एक इमरजेंसी प्रसव करवाने के बाद जब बाहर आई तो अर्द्धमूर्छित पड़ी सुनंदा को देखकर, उसकी कलाई पकड़ लिया।
"नर्स, इसको पहले लो अंदर, स्ट्रेचर लाओ।" कहती हुई डॉक्टर वापस उसी कमरे में चली गई।
"दादा, अभी आपरेशन करके बच्चे को निकालना होगा। इनके पति को बुलाओ।" डॉक्टर ने कहा।
"अभी तो सातवाँ महीना है ना मैडम, दो माह बचे हैं।" अचानक ऐसे समाचार से बाबा भी घबरा गए।
तभी भूषण सामने से आते दिखा।
"क्या हुआ मैडम जी?" भूषण ने सारी बातें सुनकर, उस फ़ार्म पर हस्ताक्षर कर दिए।

बच्चे की मंद पड़ती गति, अविकसित अंगों के कारण उसे जन्मते ही केयर यूनिट में रखना था, उसे रूलाने में ही काफी प्रयास करने पड़े डॉक्टर को।

लड़का पैदा हुआ था परंतु कोई खुशी नहीं, उसके जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी को मापती आँखों में सर्वत्र भय का साम्राज्य फैला था।
चौथे दिन डॉक्टर ने बताया कि बच्चा अब सामान्य गति से श्वास ले रहा है, सभी अंग अपना काम ठीक कर रहें हैं।  उसके बाद उन्होंने सुभाष के जीवन के उस सत्य को उजागर किया जिसका हर पक्ष अँधेरे में लुप्त था।

"बच्चे के मस्तिष्क के एक हिस्से का पूर्ण विकास नहीं हो पाया है। उसकी सीखने, समझने, सोचने और काम करने की क्षमता, सामान्य बच्चों से कम रहेगी। ऐसे बच्चों को विशेष प्रकार के बच्चों की श्रेणी में रखते हैं।"  डॉक्टर बोल रही थी और बच्चे के भविष्य में छाए अंधेरे के अहसास मात्र से, सुनंदा पर बेहोशी छा गई थी।

आज की बेतहाशा दौड़ती ज़िंदगी में, उसका अपना बेटा ज़िंदगी के साथ चलने में भी असमर्थ होगा इसकी कल्पना से वह खुद को धिक्कारने लगती। 
स्त्रियांँ अपने आपको खुद ही दोषी के कटघरे में ला खड़ा करती हैं। 

इस बात का झटका, बाबा के हृदय को लगा। अब सुनंदा अपने सपनों को छोड़, बाबा‌ और छोटे बच्चे के बीच समर्पित हो गई। जीवन के इस निर्णय को स्वीकार करते हुए भूषण ने अपने आपको काम में झोंक दिया। कंपनी के काम में जाने से पहले, अखबार बाँटना, रविवार को किसी समूह के साथ काम करके वो अतिरिक्त पैसे जुटाने लगा।

बाबा की हालत सुधर गई और बच्चे के नामकरण का समय तय किया। बाबा की इच्छा के अनुसार, उनके प्रिय सेनानी के नाम पर बच्चे का नाम "सुभाष" रखा गया। समय के साथ साथ, वृद्ध व्यक्ति के हृदय के तार अबोध शिशु के साथ जुड़ते चले गए। उन्होंने उसके स्नेह से बंधकर, उसकी कमियों को अपनी ओर से कम करने का प्रयास चालू कर दिया।
बाबा झूला हिलाते तो राष्ट्रप्रेम गीत गाते, दो साल की उम्र में उसे सेना की बहादुरी के किस्से सुनाते।‌ सुभाष भी चुपचाप सुनता, तालियाँ बजाने की कोशिश करता। सामान्य बच्चों से अलग था वो, एक साथ हाथ, आँख, मुँह के बीच तालमेल बिठाने में ही कई महीने लग गए तब पहली बार रोटी मुँह में सही रख पाया था। सुनना, समझना और करना इनमें सामंजस्य उसके जीवन का लक्ष्य बन गया था। दो साल के बच्चे का काम, वह छह की उम्र में कर रहा था।

जब से चॉक पकड़ना सीख गया था,  फर्श पर आकार, आकृतियां बनाता। स्लेट पर फिर रंगीन पेंसिलों से सुंदर चित्र बनाने लगा।

पाठशाला में दाखिला मिला तो बाबा उसका बैग लिए साथ आते-जाते। रास्ते में उसे किसी भी चीज की जानकारी देते चलते, वह सुनता रहता समझता कितना था भगवान ही जाने।
एक सेवानिवृत्त सेना कर्मचारी ने अपनी अतृप्त इच्छाओं के बीजों का रोपण, छोटे सुभाष के आर्द्र मस्तिष्क और हृदय में करना शुरू कर दिया था।
सुनंदा को याद है कि सुभाष का स्कूली जीवन बहुत कठिन रहा। दूसरों के साथ तालमेल नहीं बैठा पाना, उनसे बातें न कर पाना, चीज़ों को समझने-करने में ज्यादा समय लगाने से, बच्चे उसकी हँसी उड़ाते। उसे.."ढीला" और "ट्यूबलाइट" जैसे नामों से पुकारते।

"मम्...मी, सब..हँ..स ते हैं।" वह दुखी रहने लगा।
"अरे, अच्छे लोगों पर तो सब हँसते हैं।" कहते हुए बाबा उसको कोई नीति वाली कहानी सुना देते।
उसे लिखने में भी कठिनाई होती थी, शब्दों का आकार बड़ा हो जाता, लाइनों में लिखने का प्रयास, प्रयास ही रह जाता। 

दो साल के बाद स्कूल ने उसे विशेष बच्चों के स्कूल में भेजने की सलाह देकर निकाल दिया।
बाबा को दिल का दूसरा दौरा पड़ा और सुभाष का हाथ पकड़े उन्होंने दुनिया छोड़ दी। 

सामने से आते भूषण को देखकर सुनंदा ने आवाज़ लगाई।
"कहीं नहीं दिखा वो।‌ सब तरफ देख लिया, पता नहीं कहाँ चला गया बच्चा?" भूषण के स्वर से डर झलक रहा था।
"हे भगवान! मेरे बच्चे की रक्षा करना।" सुनंदा ने ऊपर आसमान की ओर देखते हुए, अपने हाथ जोड़ लिए।

सामने की दीवार पर वृक्षारोपण से संबंधित चित्र बने थे। 
"सुभाष इससे सुंदर बना लेता है। फोटो फ्रेम में लगी हम दोनों की फोटो को हु-ब-हू कॉपी में बनाया था। जो देखता है उसे याद रखकर बना लेता है।" सुनंदा बेटे के हुनर को पति के सामने बताकर, मन शांत कर रही थी।
"चल, अब पुलिस चौकी में जाकर रिपोर्ट करते हैं।" भूषण के कहने पर सुनंदा उसके पीछे-पीछे चलने लगी।

पुलिस चौकी के चारदीवारी के आगे, जीपें, कांस्टेबलों को खड़े देखकर दोनों थोड़े सहम गए।
हिम्मत करके अहाते में प्रवेश किया तो सामने कुर्सी पर चिप्स खाते सुभाष को देखकर दोनों दौड़ते हुए उसके पास आ गए।
"कब से ढूंढ रहे थे बेटा, यहाँ कैसे आ गया?" सुनंदा ने उसे गले से लगा लिया।
"हम भी पता लगवा ही रहे थे कि किसका बच्चा है? कुछ देर पहले इसने सुनंदा कहा था।" पुलिस ऑफिसर ने बताया।

भूषण और सुनंदा ने देखा, फर्श पर चॉक से बड़ा चित्र उकेरा गया था। एक टूटा-फूटा खंडहर, तालाब, हथियार, गोला-बारूद के ढेर के साथ तीन नकाबपोश।
सुनंदा और भूषण इस तस्वीर को समझने की कोशिश करने लगे।

"हैलो... हैलो। इंस्पेक्टर यादव बोल रहा हूँ। सर, बच्चे की जानकारी सही थी, एरिया के अंत में तालाब के पास जो तीन-चार खंडहर हैं, उनमें दो लोगों को हथियारों, गोला-बारूद की बड़ी मात्रा के साथ टीम ने पकड़ा है।" वायरलैस पर गूँजती, घरघराती आवाज़ से, पुलिस चौकी में खुशी की लहर दौड़ गई।
बड़े पुलिस अधिकारी ने सुभाष की पीठ थपथपाई। सब उससे हाथ मिलाने लगे।
थोड़े ही समय बाद पुलिस चौकी परिसर में, पुलिस विभाग के बड़े बड़े अधिकारी, नेताओं, कार्यकताओं की भीड़ लग गई। 
फोटोग्राफरों ने सुभाष और उसके माता-पिता, पुलिस दल के सभी अधिकारियों के साथ सुभाष की कई फोटो खीचीं। 

पुलिस चौकी का सारा अहाता लोगों और लाइटों से चमक रहा था। 
सुभाष को ईनाम की राशि के साथ ही, सरकारी खर्चे पर विशेष बच्चों के स्कूल में पढ़ाने की घोषणा की गई।

सुभाष तेजी से चलता हुआ चौकी के अंदर चला गया। महात्मा गांधी और सुभाष चन्द्र बोस जी की तस्वीरें लगी थीं। उसने सामने खड़े होकर उन्हें सैल्यूट किया।

तस्वीरों के ऊपर लगी ट्यूबलाइट जो बहुत दिनों से खराब पड़ी, जलती-बुझती रहती थी आज अचानक पूरी रौशनी बिखेरने लगी।


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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 1 जुलाई 2025

कहानी - फैसला (शब्दकार प्रतियोगिता)

कहानी- "फैसला"


"रोज ही देर हो जाती है, चाहे सुबह से कितनी भी जल्दी करो।"  ड्राइविंग सीट पर बैठकर, सामने रखे गणपति बप्पा को हाथ जोड़ती सुगंधा ने झटके से ऑटो को सड़क पर निकाल लिया। नई, चिकनी, काली सड़क पर ऑटोरिक्शा फिसलता जा रहा था।

स्टैंड पर लगाने के पहले ही, एक वृद्ध दंपत्ति ने उसे रोक लिया और कभी वे उसकी ओर देखते कभी ऑटो की ओर।
"काका, अच्छा चलाती मैं ऑटो, टेंशन नई लेने का।  किधर जाना है, बैठो।" औरत के ऑटो चलाने पर संशय से देखने वाली नज़रों को रोज ही देखती थी वो।
दोनों बैठ गए और कोर्ट नाका छोड़ने की बात करके, अपने दस्तावेज जमाने लगे।

उसके आई-बाबा के उम्र के थे, पता नहीं किस केस मुकदमे में फंस गए थे बेचारे। उसके आई-बाबा तो अब घर संभालते हैं और वो ऑटोरिक्शा चलाकर सबके लिए दो समय की रोटी जुटाती है। 

कपड़ा मिल में काम करते थे बाबा, उसी की चॉल में सब मजदूरों के घरों में से एक उनका भी था। आई, उस क्षेत्र के सबसे धनी, बहुत बड़े भूखंड के मालिक के बंगले पर खाना बनाती थी। मिल की जिस दिन छुट्टी होती, बाबा भी बंगले पर जाकर उनके बगीचे, लॉन की साफ-सफाई कर आते। सुगंधा और उसका छोटा भाई मयूर, मराठी पाठशाला में पढ़ते थे।
"ताई, बड़ी होकर तू क्या बनेगी?"  मयूर उससे पूछता।
 
"मैं हवाई जहाज उड़ाऊंगी, कार रेसिंग वाली बनूंगी। तू क्या बनेगा?" अपने भाई से वह भी पूछती।

"मैं बड़ा डॉक्टर बनूंगा, जो मेरे जैसे बच्चों को अच्छा कर दें।" घुटने से नीचे, बेजान पड़े अपने पैरों को देखकर मायूसी से बोलता वो और सुगंधा उसे गले से लगा लेती।

दस बजे ऑफिस का समय सड़क पर ट्रैफिक भी बहुत होता है। कोर्ट नाका पर दोनों को उतारकर फिर ऑटो को यू-टर्न कर लिया।

ऑटो को लाइन में खड़ा करके, वो आते-जाते हुए लोगों, परिवारों को देखने लगी और अपने बचपन में खो गई। 

मयूर को रिक्शे से स्कूल भेजते थे, वहाँ भी दो आया बाई उसे कक्षा तक ले जातीं। गरीब परिवार में पोलियो ग्रस्त बच्चा दे दिया भगवान ने, किस्मत के सहारे ही छोड़ दी थी जीवन नैया।

सुगंधा आठवी में आई, किशोरावस्था की सुगंध सब तरफ बिखरने लगी। चिकनी होती काया, बालों को घंटों संवारना, स्कूल जाते समय चेहरे पर पावडर फेर लेना, बार-बार आइने में खुद को देखते रहना, सुगंधा को भाने लगा था। पँख लग गए थे उसको और कल्पना के खुले आसमान में, दिन रात उड़ने की आजादी भी। 

बढ़ते उम्र के साथ मयूर में चिड़चिड़ापन, असुरक्षा और हीनता बढ़ने लगी थी। स्कूल से भी शिकायतें आने लगी थीं कि वो चीजें फेंक कर बच्चों को मारता है। 

स्कूल से आते-जाते एक लड़का रोज़ साइकिल से, सुगंधा के आगे-पीछे होता। एक दिन पेपर खत्म हुआ और वो अकेली घर लौट रही थी तब उसने एक लाल कागज़ उसकी ओर उछाल दिया। 
"क्यों पीछा करता है, कौन है?" सुगंधा ने पूछा।
"तू अच्छी लगती है मेरे को। अवि मेरा नाम है।" कहते हुए वह चला गया।

पहला प्रेमपत्र, इतनी बार पढ़ा सुगंधा ने कि हर शब्द याद हो गया।‌ अब तो स्कूल के बाद, आगे पीछे उनका मिलना चालू हो गया। बात एक-दूसरे का हाथ पकड़ने से लेकर अब बाँहों में भर लेने तक आ गई।
एक दिन उसने फिल्मी हीरो के अंदाज में, लाल गुलाब देते हुए कहा,  "तू मेरे को अच्छी लगती है। शादी करेगी मेरे से?" 
आठवीं पढ़ने वाली लड़की, शरमाकर भागते घर आ गई थी।

अचानक पीछे वाली ऑटो का हार्न बजने लगा।
"गाड़ी तो आगे करो मैडम, पीछे लाइन बढ़ गई है।" आगे के एक ऑटो को सवारी मिल गई और जगह ख़ाली हो गई थी।
"हो भाऊ, आत्ताच पुढे घेते।" कहकर उसने अपनी ऑटो आगे सरका ली।

सुगंधा सोचने लगी कि कैसी उम्र थी, कैसा नशा था वो। मयूर अपने बढ़ते शरीर, परनिर्भरता से दिनों दिन चिड़चिड़ा, गुस्सैल और कभी-कभी तो हिंसक हो जाता।  स्कूल वालों ने बड़ी विनम्रता से उसे घर पर रखकर पढ़ाने या विशेष स्कूल में भेजने की सलाह देकर अपना काम पूरा कर दिया।

बेचारे आई-बाबा, हमेशा उसी के बारे में सोचते कि क्या होगा आगे?  बंगले वालों को, आई के हाथ के बने महाराष्ट्र के सभी व्यंजन, शाकाहारी-मांसाहारी भोजन बहुत पसंद थे। छोटी पार्टियों में तो एक काउंटर पूरणपोली का रखते ही थे। कभी कभी सुगंधा खुद भी जाती थी आई के साथ मदद करने। 

आगे से एक ऑटो और निकल गई, अब अगला नंबर उसी का था। 
सुगंधा उस दिन की याद करके सिहर गई जब आइने में स्वयं को निहारती, बाल बनाती, गाना गुनगुनाती सुगंधा को मयूर के चीखने चिल्लाने की आवाज़ आई।
"क्यूँ इतना चिल्ला रहा है? आराम से बता ना क्या चाहिए, बेमतलब दिनभर बोमा-बोम करता है।" सुगंधा ने उसे डाँटते हुए कहा।

"मैं हल्ला करता हूँ, तू क्या करती है मेरे को सब कुछ मालूम है। दिन भर सजती है, चिट्ठी लाकर छुप छुपकर पढ़ती है, स्कूल में ये नाटक करने जाती है ना?" पैर के नीचे की जमीन खिसक गई थी उसकी। काटो तो खून नहीं, दिव्यांग छोटे भाई का मुँह नोचने का मन हुआ।
"खुद घर में बैठा है तो फालतू बात करेगा ना। ऐसा गुणवान था तो आगे पढ़ा क्यों नहीं, क्यों शाला बंद करवाए तेरी?" भुनभुनाती हुई वो घर से निकल गई।

शाम को परिणाम सामने था, बाबा ने जीवन में पहली बार उसे मारा। बाबा और आदमियों के जैसे नहीं थे, वो कभी-कभार ही शराब पीते थे उस रात उन्होंने खूब शराब पी। देर रात तक गालियांँ देते, रोते हुए सो गए। आई अपनी बेटी को दुनिया की ऊँच-नीच समझा रही थी और मयूर निर्विकार भाव लिए अपनी कुर्सी पर चिपका था।

अब सुगंधा पर निगरानी कड़ी कर दी गई थी। उम्र का पंछी ऐसा चंचल कि जितना पिंजरा मजबूत, उतने ही तीक्ष्ण चोंच से उसको तोड़ने की कोशिश करता। स्कूल में एक लड़की ने उसे अवि का पत्र दिया। शौचालय में उसने पत्र का एक-एक अक्षर पढ़ा और फिर फाड़कर फेंक दिया।

"पोस्ट ऑफिस जाना है, चलोगी?" एक लड़की ने ऑटो के बाजू से झाँकते हुए पूछा।
सुगंधा ने ऑटो स्टार्ट करते हुए उसे बैठने का इशारा किया। सुंदर, सांवली, नए जमाने की जींस-टॉप पहनी लड़की बैठ गई।

अब वाहनों और लोगों को पार करता ऑटो आगे भाग रहा था और सुगंधा का मन अतीत में। आज भी सोच रही है तो रोएं खड़े हो जाते हैं।‌ छोटी उम्र में इतनी हिम्मत कैसे कर ली थी उसने? 

अवि के बताए पते पर पहुँचने के लिए स्कूल बैग में दो कपड़े, बाबा की आलमारी में जमा रखे पैसे, आई का बड़ा मंगलसूत्र, अपनी चैन सब भरकर तैयार कर लिया था उसने।‌ रोज के समय से पहले ही चोटी करके, शाला पोशाक पहनकर तैयार हो गई थी।

"कहाँ चली इतना सज धज कर, पढ़ने तो जाएगी नहीं।" मयूर ने उससे प्रश्न किया।
"हाथ-पैर से अपंग, मुँह बहुत चलता है तेरा। तेरे कारण सब खराब हो गया घर का। मर भी नहीं जाता कि पीछा छूटे।" कहते हुए उसे बाहर से सांकल चढ़ाकर वह निकल गई। उसे बाहर से बंद करने का पिछले कुछ महीनों से शुरू किया था वरना वह घर के सामान भी बाहर फेंक कर लोगों को मारने लगता।

सिग्नल लाल हो गया और अचानक ब्रेक लगाना पड़ा।

उस दिन स्कूल के रास्ते थोड़ी आगे तक चलकर, योजना के अनुसार विपरीत गली में चलती गई थी। चुनरी से सिर ढंककर, पीठ पर बैग लिए, तेज़ कदम से चलती रही। गली के अंतिम मोड़ पर अवि मोटरसाइकिल लेकर खड़ा था। 

"आजा जल्दी, ये पहनकर पीछे बैठ जा।" उसने अपने पास से एक बुर्का दिया।
"ये क्यों पहनूँ मैं?" आश्चर्य से सुगंधा ने पूछा था।
"सुरक्षित रहेगी, कोई पहचान नहीं पाएगा इसीलिए।" उसने कारण बताया।
"मैंने चुन्नी से सिर मुँह ढंक लिया है ना।" वह कहती रही परंतु उसने वह लबादा उसे ओढ़ा ही दिया।
उसके पीछे मोटरसाइकिल पर बैठकर, सपनों के आसमान में उड़ने लगी वह। फिल्मी स्टाइल में भागना, मंदिर में सात फेरे, दूर पहाड़ियों में छोटा सा घर, गाना नाचना और बस, सुख और खुशियों की बरसात। 
कुछ किलोमीटर दूर अवि ने मोटरसाइकिल खड़ी कर दी।
"सब लाई है ना घर से तू। सुन, यहीं रूक पेड़ के नीचे। मेरा दोस्त आएगा, उसके साथ जाकर ये मोटरसाइकिल छोड़कर, एक कार ले आता हूँ। दोस्त भी साथ चलेगा, हम दोनों को दूसरे शहर छोड़कर, वापस आ जाएगा।" सुगंधा का हाथ अपने हाथ में ले लिया।

तभी सड़क पर एक मोटरसाइकिल आकर रुकी और उस लड़के ने आवाज़ दी।
"इरफ़ान, चल आ जल्दी।" 
अवि दौड़ता हुआ उसकी ओर चला गया और सुगंधा का दिमाग घूम गया।
"इरफ़ान, इरफ़ान...अवि है या इरफ़ान।" अब उसके मन में कई प्रश्न उठने लगे। दो मिनट की सोच और फिर एक फैसला।

काले रंग का वह लबादा उतार फेंका, सूर्य की किरणें उसे भविष्य का रास्ता साफ दिखा रही थीं। भागती चली गई, विपरीत दिशा में। कितनी दूर, कितने देर भागती रही पता नहीं। जब एक बड़ी सड़क आ गई तो सामने जाते एक रिक्शे को रोक लिया।

घर का पता बताकर बैठ गई।
"बहुत दूर है तुम्हारा पता।" रिक्शेवाले ने पैडल मारते हुए कहा।
चुन्नी लपेटे, आते-जाते लोगों, मोटरसाइकिल, कारों से मुँह छिपाते अपने घर से कुछ पहले उतर गई।

"आज जल्दी आ गई स्कूल से या छुट्टी हो गई सुगंधा?" उसे असमय घर आते देखकर बाजू वाली काकू पूछी।
"स्कूल पहुँची तो पेट दर्द होने लगा काकू, वापस आ गई।" कहती हुई घर के अंदर जाने लगी।
"तू आराम कर मैं नींबू पानी बनाकर लाती हूँ।" उसे दरवाजे की सांकल खोलते देखकर काकू भी आंँगन में आ गई। 
दरवाजा खुला और दोनों की चीख निकल गई। कुर्सी पर मयूर निढ़ाल पड़ा था, टेबल कुर्सी के चारों ओर उसके खून का ताल बना हुआ था। उसकी कलाई की नस खून बहाकर शांत हो गई थी।
डॉक्टर को बुलाया, आई-बाबा रोते-बिलखते आए, सब कुछ शांत हो गया था। अतृप्त, कुंठित, जीवन का अधूरापन झेलती किशोर की आत्मा की मुक्ति के लिए पूजा-पाठ, पिंडदान, दान क्रियाकर्म किए गए। घर में तीन प्राणी रह गए और एक उदासी। पता नहीं, आई ने उस दिन पैसे जेवर लेकर, सुगंधा के भाग जाने की बात का कुछ अंदाजा लगा लिया था। बार-बार अपने मंगलसूत्र के साथ लिपटे उसकी चैन को देखती और उसे मौन घूरती रहती। एक दिन सुगंधा ने अपना वो अपराध कबूल लिया, दो औरतों के बीच यह राज, सीख और फैसला बनकर रह गया।

सामने पोस्ट ऑफिस देखकर सुगंधा ने ऑटो किनारे लगा दिया। युवती‌ उतर गई, पैसे दिए और सुगंधा के कंधे पर थपकी देकर चली गई। 

मुस्कुराती हुई सुगंधा ने अपने पुराने मोहल्ले की ओर जाने वाली सड़क पर ऑटो बढ़ा ली। मिल बंद हो जाने के बाद, उसके सामने की सड़कों का पक्कीकरण, छोटी दुकानें, रेस्टोरेंट खुल गए। अपनी धुन में सुगंधा आगे बढ़ती जा रही थी।

"भाभी... श्वेता भाभी।" बस स्टॉप के आगे खड़ी एक स्त्री को देख, सुगंधा ने ब्रेक लगा दिया।

'आई' इन्हीं के बंगले पर काम करती थी। भाभी की शादी बड़े धूमधाम से, मालिक ने उनके रिसोर्ट से की थी। चार दिनों खूब खाना पीना, बढ़िया नाच-गाना, लेन-देन किया था। 
"श्वेता भाभी, पहचाना नहीं, मैं सुगंधा। आपके बंगले में आई‌ खाना बनाती थी, बाबा मिल में काम करते थे।" सुगंधा उत्साह से बोल रही थी।
"हाँ-हाँ याद आया, तुम्हारा एक छोटा भाई था ना जिसने...।" कहते हुए भाभी चुप हो गई।

सुगंधा अचकचा गई फिर पूछी, "भाभी, गाड़ी ड्राइवर कहाँ हैं, आप ऐसे अकेली क्यों खड़ी हो?" 
उत्तर के उत्तर में भाभी, ऑटो की पिछली सीट पर बैठते हुए बोली, "कौशल्य हॉस्पिटल ले चलो‌ ना।"
ऑटो शुरू करती सुगंधा के मन में कई प्रश्न थे।
"तुम्हारे घर में सब कैसे हैं सुगंधा?" भाभी ने मौन तोड़ा।
"सब अच्छे हैं भाभी। आप लोगों ने जो जमीन आई को दी थी उसे बेचकर ये ऑटो लिया और म्हाडा का एक घर मिला उसे भी बनवाए। चारों बहुत अच्छे से रहते हैं।" सुगंधा ने बताया।
"अच्छा अच्छा, तुम्हारी शादी हो गई होगी। मैं तो पूछना भूल गई।" भाभी ने कहा।

"नहीं भाभी, शादी नहीं हुई पर मेरी दो साल की एक बेटी है। अनाथ आश्रम से लिया है, घर पर आई-बाबा उसकी देखभाल करते हैं और मैं इस ऑटो से, सबकी।" 

मिरर से देखा सुगंधा ने, भाभी के चेहरे पर आश्चर्य था।
"अरे वाह, बहुत हिम्मती हो तुम।" सचमुच उनकी आँखों में चमक आ गई।

"आप सब कैसे हो भाभी? आप अकेले अस्पताल क्यों जा रही हो?" सुगंधा ने प्रश्न किया।
"मम्मी पापा अच्छे हैं। उनके दोनों बेटे भी ठीक हैं। मेरी देवरानी भी है, सब अच्छा है।" कहती हुई भाभी ने आगे बताया, "मैं तीसरी बार माँ बनने वाली हूँ इसीलिए अस्पताल जा रही हूँ।" 
"अरे वाह, मैंने तो आपके बच्चों के बारे में पूछा ही नहीं। बधाई हो आपको। पहले दोनों कितने बड़े हैं?" खुशी से भरी सुगंधा ने पूछा।
"दो बार गर्भवती हुई पर माँ नहीं बनी सुगंधा। दोनों बार गर्भपात करवा दिया।" भाभी के स्वर की वेदना कोई माप नहीं सकता था। 
"क्यों भाभी, आपको तकलीफ़ थी कुछ?" बिन ब्याही माँ, एक अधूरी माँ से पूछ रही थी।
"मुझे नहीं, मेरे परिवार को, उस घर की पीढ़ियों से चलने वाली उस परंपरा को जिसमें पहला बेटा पैदा करना, अनिवार्य है।" भाभी बोलती जा रही थी, "स्वस्थ बेटियांँ थीं गर्भ में, चार महीने मैं जिनको महसूस करती, उनकी मांँग पर खाना खाती, गुलाबी सपनों में उन्हें साथ सैर कराती, सब ख़त्म कर दिया।" आँसू रोकने के प्रयास में, खारापन गले में उतर गया, आवाज़ भरभरा गई।

"हे भगवान! हमारी तो बहुत मदद की आपके परिवार ने, आपके दुःख को क्यों नहीं समझा। आपने कितनी तकलीफ़ सही भाभी।" दुःख की आँच से औरत का हृदय मोम की तरह पिघलने लगा।
"आई-बाबा को आज बताऊंगी, हम सब रोज प्रार्थना करेंगे कि इस बार बच्चा आपकी गोद में खेले।" गणपति बप्पा के आगे सिर झुकाती सुगंधा बोली।
अचानक भाभी ज़ोर ज़ोर से हँसने‌ लगी। सुगंधा मुँह  बाए देखती रही कि क्या ग़लत बोल गई वो।

"इस बार तो लड़का है लड़का सुगंधा। डॉक्टर ने बताया कि कच्चे गर्भाशय में पनप गया है, पूरा नहीं है। अधूरा है वो शारीरिक और मानसिक रूप से, शायद मेरी तरह अधूरा।" सुगंधा के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
"इस बार घर वालों को दिव्यांग, अक्षम बच्चा भी चाहिए क्योंकि वह लड़का है। कहते हैं कुर्सी पर बैठे-बैठे सारा जीवन चल जाएगा, बहुत पैसा है उनके पास।" सामने कौशल्य हॉस्पिटल की बड़ी बिल्डिंग दिखने लगी।

भाभी उतर गई और पर्स खोलने लगी। सुगंधा ने उनका हाथ पकड़ लिया।

"सुगंधा, तुमने कितने बड़े फैसले लिए हैं, तुम ज़रूर मेरे फैसले को समझोगी। तुमने एक दिव्यांग बच्चे के जीवन की अनुभूत किया है, तुमसे ज्यादा कौन समझेगा?" भाभी का चेहरा मातृत्व से दमक रहा था।
"मैंने इस बच्चे को, दुनिया में नहीं लाने का फैसला किया है। कानून मुझे अधिकार देता है तो आज मैं एक बार अपनी मर्ज़ी से उस प्रार्थना पत्र पर दस्तखत करने आई हूँ, जिस पर पहले दूसरों के कहने पर किया था। विश्वास है मेरा अजन्मा मुझे क्षमा कर देगा।" संतुलित कदमों से भाभी अस्पताल के अंदर चली गई। उनकी बातों ने कई प्रश्न, कई आरोप फिर एक बार इस  समाज पर साबित कर दिया था।


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प्रमाणपत्र - मैं प्रमाणित करती हूँ कि "फैसला" मेरी मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित कहानी है। 


 शर्मिला चौहान
निवास - ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585

शब्दकार कहानी, लघुकथा, कविता पुरस्कार प्रतियोगिता में भेजा है।