शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

कहानी _ वो लाल बत्ती

कहानी _ "वो लाल बत्ती"

जीत ने ड्राइविंग सीट को जरा पीछे किया और दोनों भुजाओं को ऊपर करके शरीर को तानने की कोशिश की। ऑफिस से घर के रास्ते में ऐसे तीन बड़े सिग्नल हैं जिनको पार करने में रोज बहुत समय लग जाता है। जीत का पेशेंस रोज ही यहाँ चैक होता है। समाचार,खेल समाचार से बोर होकर उसने दुसरे बटन दबाए और गाना बजने लगा, "सज रही गली मेरी अम्माँ चूनर गोटे में।" गाने में तालियों की थाप का शोर तेज़ हो गया। जीत ने रेडियो बंद कर दिया। सिग्नल हरा हुआ और कछुए की गति से कार बढ़ने लगी। हार्न के शोर से परेशान होकर जीत खिड़की के शीशे चढ़ाने लगा। 
"सैलाब है इस शहर में लोगों का। हर लहर के साथ आदमियों को जलजला फेंकता है शायद समंदर।" बत्ती फिर लाल हो गई थी। पूरा चौक पार करने में दो-तीन बार तो लाल बत्ती का सामना करना पड़ता है। जीत ने गहरी श्वास भरी और फिर रेडियो चालू किया, "मुझे क्या हुआ था मैं पापी दिल से हारा।" गाना अपने अंतिम पड़ाव पर था। जीत की नज़र सड़क के दूसरी ओर पड़ी। गाड़ियों के शीशों के पास तालियां बजा बजाकर किन्नरों का समूह पैसे मांग रहा था। चार तो इधर-उधर घूम कर माँग रहे थे। एक चुपचाप सब देख रहा था।

जीत ने स्त्री वेशभूषा में खड़े उस किन्नर को गौर से देखा। सड़क किनारे की और गाड़ियों की लाइट में उसका चेहरा जाना पहचाना सा लगा। शीशा नीचे कर जीत उसको पहचानने की कोशिश करने लगा। 
उमसभरी कुछ बदबूदार हवा ने कार के अंदर की खुशबू पर अधिकार जमा लिया। 
"दे दे सेठ, तेरा कारोबार बढ़ेगा, नौकरी में प्रमोशन होगा, बाल बच्चे आबाद रहेंगे।" ताली ठोकता एक किन्नर उसकी ओर आने लगा और जीत ने शीशा चढ़ा लिया। 
जीत की निगाह उस छोर पर खड़े, कुछ पहचाने से व्यक्तिव पर अटकी थी। कुछ टैलीपैथी हुई और वह भी कार की ओर देखने लगा। एक क्षण को नज़र मिली, पहचान होती तब तक सिग्नल हरा हो गया। गाड़ी का एक्सीलेटर हौले से दबाकर जीत आखिरी सिरे तक उसको देखता रहा। तभी एक नाम मस्तिष्क में हथौड़ा चलाने लगा। 
"नहीं-नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है?" खुद से जूझते हुए जीत ने सर्कल पार कर लिया।

कार आगे चल रही थी और जीत सालों पीछे अपने बचपन में।
पापा का ट्रांसफर उस पहाड़ी जगह में हुआ था। कुछ दिनों तो पापा अकेले ही क्वार्टर में रहते थे परिक्षाओं के बाद हम सभी को साथ लेकर जाने का प्लान था।
"पापा, हमारे सारे दोस्त यहाँ हैं हमें नहीं रहना पूरे साल वहाँ।" मुझसे चार साल बड़ी राखी दीदी ने कहा था।
"मैं भी नहीं जाऊंगा।" मैंने हमेशा की तरह दीदी के समान ही बोला।
"हाँ-हाँ, कक्षा चार में तुम्हारे भी जिगरी दोस्त बन गए हैं क्या?" पापा ने हँसते हुए कहा था।
मम्मी बड़े उत्साह से तैयारियां कर रहीं थीं। सुंदर पहाड़ी शहर में  रहने का सुख उनके चेहरे पर नज़र आता था।
घर क्या था मानो हरी भरी पहाड़ियों के उतार-चढ़ाव और भटकते बादलों से हँसी-ठिठोली करता सपनों का महल था। बड़े बड़े कमरे, सामने झूला और बगीचे वाला आँगन। मम्मी का बहुत सारा समय, चटकीले रंग के तरह-तरह के फूलों के पौधों के साथ ही बीतता।

"नई जगह, नया स्कूल है जरा बच्चों की पढ़ाई भी देख लिया करो।" पापा ने कहा बस फिर हम दोनों भाई-बहन की आफ़त ही आ गई।
दीदी ने तो अपनी नोटबुक पूरी कर ली थी परंतु मेरी अधूरी कापियों पर लाल लाल निशानों ने मम्मी का पारा चढ़ा दिया।

"बता नहीं सकते थे कि स्कूल में इतना आगे हो गया और तुमने किसी की कापी ही नहीं ली।" अब मम्मी को क्या बताता कि मुझे किसी से कापी मांगना पसंद नहीं था।

जाँच- पड़ताल के बाद मम्मी ने कुछ ही दूरी पर रहने वाले एक सहपाठी का पता खोज लिया और मुझे लेकर उनके घर चली गईं। अपने स्वभाव के अनुसार मम्मी ने नीला आंटी से दोस्ती कर ली और उनके बेटे गगन की कापी भी ले आईं। नीला आंटी-अंकल, गगन की दादी उस घर में रहते थे। 
मम्मी ने व्हील चेयर पर बैठी दादी को भी प्रणाम कर लिया था। 

अब मुझको और मम्मी, दोनों को दोस्त मिल गए थे। कुछ शांत, कम बोलने वाला था गगन। वो बाहर निकलकर खेलता ही नहीं था। उसके बड़े से कमरे में ही दुनिया भर के खिलौने थे। उन खिलौनों में भी ज़्यादा रूचि नहीं थी उसकी। 
"चलो बाहर गेंद खेलते हैं गगन, आज मौसम भी अच्छा है।" पहाड़ियों पर मौसम के बदलते रंग से परेशान था मैं।
"नहीं, मैं बाहर नहीं खेलूंगा, चलो हम गाने लगाकर डांस करतें हैं।" उसने अपने कमरे का टेलीविजन चालू कर दिया। 
चूड़ियों और चूनर का किसी गाने पर मटक मटक कर नाचने लगा। मुझे तो बाहर खेलना था इसलिए मैं मुँह फुलाए उसका बेकार सा डांस देखता रहा।
गाने की आवाज सुनकर, व्हील चेयर पर बैठी गगन की दादी कमरे में आ गई। एक ही मिनट में उन्होंने टेलीविजन बंद कर दिया।
"ये क्या कर रहे हो?" उनकी आँखों में गुस्सा देख मैं तो अपने घर वापस आ गया।
गगन की दादी को गुस्से में पहली बार देखा था मैंने। बाद में धीरे-धीरे मैंने उसके घर जाना बंद कर दिया। वो भी हमारे घर कभी नहीं आता था।
करीब एक महीने बाद घर के सामने कार रूकी। नीला आंटी के साथ गगन आया था। कार से उतरकर वह मेरे सामने खड़ा हो गया।

"अब खड़े ही रहोगे क्या, हाथ मिलाओ और खेलो साथ में।" नीला आंटी ने उसका हाथ मेरे हाथों में दे दिया। उसकी आँखों की तरह सूखे, कड़क से हाथ थे। 
"पता नहीं दोनों का किसी बात पर झगड़ा हो गया था शायद। जीत आया ही नहीं घर इसलिए आज मैं गगन को ले आई।" नीला आंटी मम्मी से बता रहीं थीं। वो दोनों बाहर रखी चेयर पर बैठकर, मम्मी की बागवानी का लुत्फ़ उठा रहे थे। 

हमेशा की तरह गगन को कमरे में ही खेलना था। मेरा और दीदी का कमरा एक ही था। पलंग पर दीदी के कपड़े बिखरे पड़े थे। वो स्कूल गई थी तो घर में पहने हुए कपड़े पलंग पर फेंक जाती थी। मम्मी रोज उठाकर रखती। आज मम्मी शायद इस कमरे में आई ही नहीं थीं।

मेरे खिलौनों में रेसिंग कार, बाइक, हीमैन और बहुत कुछ था। गगन को कुछ भी पसंद नहीं आ रहा था।  मैं अपनी कार दौड़ा रहा था और उसने पलंग से उठाकर दीदी की फ्रॉक पहन ली। आलमारी में लगे आइने को देखकर, खुशी से गोल गोल घूमकर नाचने लगा।
उसके मुँह से हँसी की आवाज़ें सुनकर मैंने उसकी ओर देखा। मुझे कुछ समझ नहीं आया।

"गगन, ये क्यों पहना? ये मेरी दीदी की फ्रॉक है पागल, लड़के फ्रॉक नहीं पहनते।" मैंने अपनी बुद्धि का पूरा प्रयोग किया।‌

वह झटके से रूक गया। मुझे एकटक देखता रहा और फिर फ्रॉक उतार कर, उसे अच्छी तरह तह करके पलंग पर रख दिया। उसकी ओर देखता हुआ वो बाहर चला गया।

पांँच मिनट बाद गगन अपनी मम्मी के साथ कार से वापस जा रहा था।
मैंने वह बात किसी को नहीं बताई‌। छिमाही परीक्षा पास आ गई थी और हम दोनों भाई-बहन उसकी तैयारी में जुट गए थे। 


जीत की कार के सामने अचानक एक कुत्ता आ गया और जीत ने ब्रेक लगा दिया। विचारों की वह श्रृंखला भी टूट गई। अब उसने धीमी गति से कार को आगे बढ़ाया।‌ कम रफ़्तार कभी कभी सुकून देती है। दिल, दिमाग, रक्त वाहिनियां, नाड़ी तंत्र सब आराम का अनुभव करतें हैं।  आसपास की सब चीजें बहुत साफ दिखने लगतीं हैं। कोई धुंध नहीं, कोई भ्रम नहीं, कोई स्पर्धा नहीं।
जीत ने समय देखा, अभी करीब पंद्रह मिनट और लगने वाले थे। ऑफिस के टाइम और ट्रैफिक के बीच बढ़िया जुगलबंदी रहती है। 
कार की धीमी गति ने जीत को फिर से पहाड़ों पर बिताए उन तीन सालों की ओर ढकेल दिया।

परीक्षा खत्म हुई और ठंड की छुट्टी घोषित हो गई थी। पहाड़ी ठंड का पहला साल, सभी पर भारी पड़ रहा था। घर से बाहर निकलना कम ही होता था। घर पर भी अलाव जलाकर रात में मम्मी रूम गरम रखतीं थीं। 

मुझे बहुत बुरा लग रहा था। ऐसी कैसी ठंडी की छुट्टियों का कोई मतलब नहीं। मम्मी को मनाकर मैंने गगन के घर जाने की अनुमति ले ली। कपड़ों पर कपड़ों की पर्त चढ़ाए, मैं अपने दोस्त से मिलने पहुँचा।

घर के बरामदे में ही कुछ अजीब सी पोशाक, रंग-रूप वाले लोग बैठे थे। वो सब इतनी ठंड में नीचे ही बैठे थे।  उन्होंने साड़ी, सलवार कुर्ते पहन रखे थे परंतु आवाज़ एकदम मोटी, भरभरी सी थी। गगन की दादी और पापा कुर्सियों पर बैठे थे। 

अचानक मुझे देखकर दादी के चेहरे का रंग उड़ गया। उस दिन मुझे गृह-प्रवेश नहीं करने दिया। 
"अभी जाओ, बाद में फिर कभी आना।" गगन के पापा ने कुछ कठोरता से कहा और मैं उल्टे पांव वापस आ गया। करीब भागते हुए आया, ठंड, रास्तों की ऊँच नीच से मैं खूब हांफ रहा था।

"क्या हुआ? तुरंत वापस आ गया? वो लोग घर पर नहीं हैं क्या? इतना हांफ क्यों रहा है?" मम्मी ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।

दो मिनट साँस लेकर मैंने गगन के घर की सारी बातें मम्मी को बता दीं। मम्मी की आँखों में बहुत से प्रश्नों को  तैरता छोड़ मैं अपने कमरे में वीडियो गेम खेलने चला गया।

पहाड़ों पर हर मौसम का रंग बिल्कुल अलग सा जान पड़ता था। ठंड की विदाई से पहले वसंत के आने के चर्चे आम हो रहे थे। छुट-पुट जमी बर्फ ने पहाड़ियों का साथ छोड़ दिया और सूरज की नर्म किरणों में समाने लगीं थी। 

मौसम के खुशगवार होने पर एक दिन मम्मी गगन के घर गईं। घर में सिर्फ दादी थी इसलिए पाँच मिनट की औपचारिक बात के बाद शायद उन्होंने मम्मी को रोका नहीं और वे घर आ गईं।

अगले साल तो गगन का परिवार चला ही गया। मुझे उसकी बहुत याद आया करती थी। उसकी वो सुस्त, रूकी हुई सी आँखें भी मेरे सामने घूमतीं। 
तीन साल के बाद हमारा परिवार भी दूसरी जगह आ गया। पापा की नौकरी, तबादलों के कारण मम्मी ने इसी जगह पर रहने का पक्का कर लिया। दीदी और मेरी पढ़ाई के लिए, मम्मी हमेशा हमारे पास रहतीं, पापा छुट्टियों में आया जाया करते।

समय का पहिया घूमता रहा और पापा सेवानिवृत्त हो गए। दीदी की शादी हो गई और वो अपने पति बच्चों के साथ विदेश में रहने लगीं। पापा-मम्मी और पत्नी रीना के साथ मैं इस शहर में रहता हूँ। 

"आज बहुत देर हो गई, क्या ट्रैफिक ज़्यादा थी? आज तो रीना भी शाम ५ बजे से आ गई है।" कार पार्क करते ही मम्मी ने बताया।
"ओहो! मम्मी..आपने जीत को दरवाजे से ही बता दिया। मैं तो सरप्राइज देने जल्दी आई थी परंतु आज वही लेट हो गया।" रीना ने तुनकते हुए कहा।

खाना खाते समय मैंने मम्मी पापा को बताया कि आज मुझे गगन दिखा था।‌ दोनों के चेहरे पर सोचने के भाव देखकर मैंने याद दिलाया।
"हम तीन साल मसूरी में थे, तब हमारे पड़ोसी थे ना। गगन, उसके पापा मम्मी और दादी।" 

"अरे वो! इसी शहर में रहते हैं क्या  वो लोग? क्या करता है गगन? सब ठीक तो है ना?" आदतन मम्मी ने कई धाराप्रवाह सवाल कर दिए।
"मम्मी, मेरी उससे बात तो नहीं हुई सिर्फ देखा था उसको।" मैं भी अभी तक  कुछ असमंजस में ही था।

मैंने गगन को जिस रूप में देखा था, अपने घर में उसके ज़िक्र करने में हिचकिचाहट महसूस कर रहा था। उसकी बचपन वाली सुस्त शांत आँखों में एक आग सी दिखी थी मुझे। कुछ दूरी से देखने के बावजूद, उस आग की ताप मुझे जान पड़ी थी। 

अब मैं रोज़ उसी रोड़ से आता-जाता और उन सिग्नलों पर मेरी नज़र उसे ढूँढने लगती। उस दिन के बाद फिर मुझे वो दोबारा कभी नहीं दिखा। 
ज़िंदगी की दौड़ में लगे रहते रहते कब बालों में सफेदी आ गई, पता नहीं चला। इस बीच मम्मी हम सबको छोड़कर चलीं गईं। पापा के साथ हम दूसरे घर में शिफ्ट हो गए। ये शहर से थोड़ा बाहर, बड़ा घर था। दोनों बेटों, पापा,  रीना और मेरे लिए  अलग-अलग बेडरूम थे। बाहर लॉन, झूला भी था। दीदी भी सपरिवार एक महीने के लिए आती तो उस फ्लैट में जगह कम हो जाती। दीदी के आने से, चारों बच्चों को साथ मिलते देखकर, मैं और दीदी अपने बचपन का आनंद ले लेते थे।
मेरा बड़ा बेटा इंजीनियरिंग के दूसरे साल में है और छोटा बारहवीं में।
आज ही सुबह सुबह बड़े बेटे ने पुस्तकों की लिस्ट हाथ में थमाते हुए कहा, "पापा, ऑफिस से आते हुए रास्ते में, लाइन से पुरानी पुस्तकों की दूकानें हैं। आप प्लीज़ इनमें से जो मिलें ले आना।" बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए वो नहाने चला गया।
फूलों की क्यारी के पास कुछ झुककर पापा, पुरानी, सूखी पत्तियांँ तोड़ रहे थे। कई  बार मैंने उन्हें नम आँखों से फूलों को स्पर्श करते देखा था।

शाम को ऑफिस से ज़रा जल्दी निकल गया ताकि पुस्तकें खरीद सकूँ। गाड़ी पार्किंग में लगाकर, सड़क के दूसरी ओर पुरानी पुस्तकों की एक  दूकान में गया। पुस्तकें नहीं मिलीं। उस लाइन में कई  दूकानें थी इसलिए जल्दी ही दूसरी दूकान में जा पहुँचा।

बहुत से छात्र-छात्राएं अपने लिए पुस्तकें लेने आए थे। स्कूल -कालेजों की पुस्तकें, रिफ्रेंस बुक्स, विषय विशेषज्ञों की किताबें, डिजाइन, कला विविध विषयों पर  पुस्तकें वहां उपलब्ध थीं। इस दूकान पर एक पुस्तक मिल पाई।

आगे की दूकान पर और मिलने की आशा बढ़ गई।
"भाई,  ये पुस्तकें मिलेंगी क्या?" पुस्तकों की लिस्ट वाला पेपर आगे करते हुए मैंने पूछा।
दुकानदार की पीठ मेरी तरफ थी, वह पुस्तकों पर कपड़ा  झटक रहा था जिससे धूल हट जाए। 
कपड़ा एक ओर उछाल कर वो मेरी ओर मुखातिब हुआ। 
उसने लिस्ट के लिए हाथ बढ़ाया और मैंने उसकी ओर भरपूर निगाह डाली। ढीला ढाला पठानी कुर्ता पायजामा, माथे पर तिलक, सिर पर बाल नहीं के बराबर। आँखों की बात दिल तक पहुंच गई परंतु जुबान ने हड़ताल कर दी। 
दिमाग ने सालों पहले वाली छबि से, आज सामने खड़े व्यक्ति को मिलाना शुरू किया। स्त्री वेशभूषा को पुरूष के रूप में स्वीकार करने में दो मिनट लग गए।

"गगन..!" होंठ बुदबुदाए।
मुझे देखकर उसकी आँखों में चमक आ गई। मेरे हाथ से लिस्ट लेकर, मुझे पास वाली कुर्सी पर बैठने का आग्रह किया। उसने मेरी आँखों के कौतूहल, प्रश्न और स्नेह को पढ़ लिया था।

"हम उस घर को छोड़कर किसी अलग सी जगह में रहने चले गए थे। उस दिन तुम आए थे, मैंने खिड़की से देखा था परन्तु मुझे बाहर आने से रोक दिया गया था।  नई जगह में हमें कोई पहचानता नहीं था। यही तो उद्देश्य था मेरे परिवार का क्योंकि समाज मेरी पहचान, मेरे अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता।"

उसकी आंँखों में पानी तैर गया। 

"कुछ सालों तक दादी का साया रहा, मम्मी तो असमय ही साथ छोड़ कर चलीं गईं थीं। दादी के जाते ही पापा ने मुझे मेरी ही तरह के लोगों के साथ रख दिया। पैसे भेजते रहे हमेशा, खुद कभी न मिलने की शर्त लेकर।‌"
"पापा अपने बिजनेस में, अपनी दुनिया में रमे रहे और मैं नए लोगों के साथ अपनी इस नई दुनिया में।  अपने जैसे कुछ अधूरे से लोगों के साथ रहकर मुझे खुशी होती थी या दुख मुझे कभी पता नहीं चला।" एक गहरी श्वास लेकर उसने मेरे चेहरे पर अपनी नज़र गड़ा दी। शायद मेरी लकीरों को पढ़ने का प्रयास कर रहा था।‌ उसे लगा कि मैं उसके बचपन का वह हिस्सा हूँ जिसने उसका हर रूप देखा है और  उसने अपनी बात फिर शुरू की।

"मैं अच्छे घर का, अच्छी स्कूल में पढ़ने वाला लड़का था जिसके पिताजी पैसे भी भेजते थे, बस सब जल्दी ही मुझे पहचानने लगे।‌ मैं धीरे धीरे उनके साथ, उनके धंधे पर जाने लगा।‌ मेरी सादगी, अँग्रेजी बोलने की कला से उनका धंधा चमक गया, बहुत से पैसे आने लगे और मैं सबकी पसंद बनते गया।" बोलते हुए वो अपनी पुरानी दुनिया में गुम हो गया।

"और फिर, पापा के पैसे बंद हो गए। उस दिन से मैं इस भरी दुनिया में एकदम अकेला था।" एक टीस सी थी आवाज़ में।

"अंकल-आंटी कैसे हैं? दीदी कैसी है? तुम सब कहाँ रहते हो? तुम्हारे कितने बच्चे हैं?" उसने एक ही सांँस में पूछ लिया।
उसको सब जानकारी देते हुए मुझे भी आंतरिक खुशी मिल रही थी।

अचानक, उसने पास के दूकान में बैठकर पढ़ते एक लड़के को आवाज़ दी, "मान, इधर आ बेटा।" 
१७-१८ साल का लड़का, पहली बार देखने पर थोड़ा  अलग सा लगा।

"ये मेरा बेटा है। ये ४ साल का था और हमारे लोगों के बीच आया। मैंने इसे गोद ले लिया था। अब बदलते हुए इस नए ज़माने में इसकी अपनी पहचान है, पढ़ता है। इस साल बारहवीं में है। बहुत होशियार है, आगे प्रतियोगी परीक्षाओं में जाकर समाज के लिए, देश के लिए अच्छा करना चाहता है।" मान की ओर देखते हुए गगन की आँखों में वात्सल्य, स्नेह भर गया।
बच्चे ने हाथ जोड़कर मुझे नमस्कार किया।‌ मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और खूब पढ़ने लिखने का आशीर्वाद दिया।

"इसके लिए ही अपनी बिरादरी का वो काम छोड़कर मैंने पुरानी पुस्तकें खरीदकर, उसे आधी कीमत पर बेचने का काम पकड़ लिया। आज पूरे समय बच्चों से घिरा रहता हूँ और मान भी मेरे इस काम से बहुत खुश रहता है।" मान मेरे लिए पानी का गिलास भरकर खड़ा था।
मैंने पानी पिया और ५००/ उसे पकड़ा दिए। गगन के इशारा करने पर उसने वो नोट रख लिया।

मेरी लिस्ट में से दो पुस्तकें उसके पास थीं। उसने पैक करते हुए, मेरा फोन नंबर लिख लिया। 
"आसपास देखता हूँ, मेरे पास आईं तो तुम्हें फोन करूँगा।" कहते हुए उसने पैक मेरे हाथों में पकड़ा दिया। आज उसके हाथों का स्पर्श आत्मविश्वास से भरा था।

पैक पर मेरे बेटे का नाम और  नीचे लिखा था- 

"सस्नेह भेंट
गगन चाचा।"

 वापस लौटते समय मैं अपने आपको हल्का महसूस कर रहा था। एक हम-उम्र, सहपाठी को अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़कर जीतते जो देख लिया था। 
सिग्नल की हरी बत्ती दूर तक खुला रास्ता दिखा रही थी।


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शर्मिला चौहान

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