"ढाई आखर प्रेम का" (व्यंग्य)
सरकारी सूचना के अनुसार, कार्यालय में हिंदी सप्ताह का आयोजन करना तय हुआ। मधुर के अनुभवहीन कंधों पर, इस आयोजन की जिम्मेदारी डाल, कार्यालय प्रबंधन ने खुद राहत की सांँस ले ली।
बैताल सी कठोर ज़िम्मेदारी कंधों पर लाद, मधुर अपनी लक्ष्य प्राप्ति के इंतजा़म के लिए निकल पड़ा। अँग्रेजी माध्यम में पढ़ा-लिखा मधुर, अब अपनी राजभाषा को हृदय से आत्मसात करने को लालायित था।
सड़क के किनारे बैठे रद्दी वाले के पास, खूबसूरत आवरण से सजी हिंदी की पुस्तकें पानी के दाम बिक रहीं थीं।
"सारे ज़माने का कचरा घर पर उठा लाए, दिमाग में कोई नया फितूर चल रहा है क्या?" मधुर की पत्नी कोकिला की जासूसी नज़र से धूल भरी पुस्तकें बच ना सकीं।
"यही तो खराबी है, अपनी भाषा की पुस्तकें तुम्हें कचरा दिखाई दे रहीं हैं।" पहले से ही विभिन्न भाषाओं की मोटी पुस्तकों से भरी आलमारी को देख मधुर का सिर घूम गया।
"घूरकर उन बेचारियों को भस्म नहीं कर सकते तुम। पुस्तक मेले, प्रदर्शनियों और बुक स्टॉल से उन्हें तुम ही घर ले आए थे।" नाम के विपरीत कर्कश स्वर में कोकिला को सुन, मधुर को हैरत नहीं हुई।
"ठीक है, अँग्रेजी की पुस्तकें बैठक की अलमारियों में रखना, हाई सोसायटी में स्टेटस सिंबल हैता है।" सिटपिटाता हुआ मधुर अपनी लाई पुस्तकों को साफ कर, करीने से रखने लगा।
"इस वीकेंड दो-तीन तो पढ़ ही लूँगा।" मन ही मन दृढ़ संकल्प करता हुआ मधुर नहाने चला गया।
नाश्ता करके उसने एक पुस्तक पढ़ने उठा ली। पुस्तक कौन सी पढ़ी जाए, निर्णय करने आसान था। जिस पुस्तक का मुख्य आवरण कला और सुंदरता से लबरेज था, वह नंबर वन बनकर उसकी हथेलियों में इठला रही थी।
हाथ में पकड़ी पुस्तक दर्शनीय थी। एक कमनीय स्त्री अपने लंबे खुले बालों को मोगरे की लड़ियों से समेटे, दूर अस्तगामी सूर्य को निहार रही थी।
"ऐसी सुंदर स्त्री सचमुच होती है क्या?" उस स्त्री के लावण्यमयी सादगी पर एक क्षण के लिए मधुर मुग्ध हो गया। उसे अपने पर रह रहकर क्रोध आ रहा था कि उसने पहले ऐसे सुंदर उपन्यास, कहानियों की पुस्तकें क्यों नहीं पढ़ीं। मशहूर उपन्यासकार का प्रेम पर आधारित यह उपन्यास, आज उसके दिल में अपनी जगह बना लेने को तैयार था।
अपनी साहित्य साधना शुरू करता कि मौसम ने रंग बदला। बादलों ने सूर्य को अपनी गिरफ्त में ले लिया और प्रेम रुप बूँदों की छनकार गूँजने लगी।
मधुर ने पुस्तक छाती पर रखकर अपनी आँखें मूँद लीं। सावन का कोई फिल्मी गीत गुनगुनाते हुए वह आनंद लेने लगा।
"इस बिन मौसम बरसात की तरह तुम्हें भी कभी कोई शौक चर्रा जाता है। जरा शटर बंद कर देते तो कौन सी साहित्य साधना अधूरी रह जाती।" कहती हुई कोकिला ने पूरे जोर से शटर बंद कर दिया।
कोकिला के हाथों और जुबान की कार्यकुशलता देख कर मधुर चकित रह गया।
अब अपना समय इस स्त्री पर व्यर्थ करना मधुर को बिल्कुल गंवारा नहीं था, अतः उसने पुस्तक के मुख्य पृष्ठ की उस कोमलांगी पर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया।
"प्रेम बंधन" की इस कोमलांगी से बस ज़रा सी कम थी 'वो'। कॉलेज के द्वितीय वर्ष की परीक्षा के समय, पतझड़ के पत्तों सी 'वो' सामने आ गई थी।
"खुद देख कर नहीं चलती और मुझे गालियांँ दे रही हो।" साइकिल के सामने आ टकराई उस अनिंद्य सुन्दरी के सौंदर्य से मधुर का मन आज भी बेचैन हो गया।
अपने हिंदी ज्ञान की गहराइयों से, एक दोहा समेट कर गुनगुनाने लगा, "ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"
दिमाग पर बल डालकर प्रथम पंक्ति याद करने की पुरजोर कोशिश की मधुर ने, असफल होने पर सिर झटक लिया।
सामने देखा तो हाथ में झाड़ू लिए, साफ-सफाई करने वाली अधेड़ उम्र की शांता मौसी उसे घूर रही थी।
उनकी अनुभवी दृष्टि और कुटिल मुस्कान से मधुर को लगा मानो किसी ने उसे चोरी करते रंगे हाथों पकड़ लिया है।
उसने उपन्यास के मुख्य पृष्ठ की कोमलांगी को, अपनी हथेलियों से ढंक दिया। आई हुई आपदा ने अपने विशेष अंदाज में, झाड़ू पटक पटक कर कमरा साफ किया और उसे तिरछी निगाहों से देखती हुई बाहर चली गई।
"सबको पढ़ा लिखाकर सरकार ने कुछ खास अच्छा नहीं किया।" मन ही मन सोचता हुआ मधुर अपने मन को पुनः प्रेमबंधन में बाँधने का प्रयास करने लगा।
"घंटे भर से सिर्फ़ इसका मुखड़ा निहारते बैठे हो, अच्छा है कि पुस्तक में छपी है जीती जागती सामने होती तो तो ना जाने क्या करते?" कोकिला के कर्णभेदी स्वरों से मधुर भीतर तक घायल हो गया।
"तुम्हें साहित्य की कोई समझ होती तो ऐसा कभी नहीं कहतीं, खैर मुझे अभी तुमसे हवाई किले नहीं बनवाना है।" कहते हुए उसने अपनी दृष्टि फेर ली।
"हा हा हा.. उपन्यास पढ़ने से पहले सादे मुहावरे तो सीख लेते। मुँह ना लगना, माथापच्ची नहीं करना, जुबान नहीं लड़ाना, इतने मुहावरे छोड़कर बोल रहे हवाई किले नहीं बनाना।" कोकिला की विद्रूप हँसी, कानों में गूंँज रही थी।
कोकिला के हिंदी ज्ञान पर मधुर के पसीने छूट गए।
"हिंदी मीडियम में पढ़ी हो तो इतना तो आएगा ही, अँग्रेजी में बताकर दिखाओ तो जानूँ।" कहकर सामने देखा तो उत्तर की प्रतीक्षा के लिए कोकिला के पास समय नहीं था और आँगन में एक नवयुवती को प्रतीक्षारत पाया।
"कोकिला, जरा देखना।" ना जाने क्यों बड़े ही धीमे लहजे में कहा उसने।
हाथ में बैग, कंधे पर पर्स, पतली छरहरी काया, हल्के आसमानी रंग का सलवार कुर्ता और हाँ काले घने लंबे खुले बाल। पुस्तक की उस लावण्यमयी सुंदरी के साथ, सामने खड़ी इस युवती का अस्तित्व एकाकार हो गया।
कैसा संयोग, प्रेम की इस पुस्तक के आरंभ से पहले ही, प्रेम के कई इंद्रधनुषी रंग आसपास बिखरते जान पड़ रहे थे।
पुस्तक टेबल पर रख कर मधुर सामने निकल गया। दिल चाह रहा था पूछ ले, "मोगरे की लड़ियांँ क्यों नहीं सजाई बालों में।"
"आइए, कैसे आना हुआ?" गुड़ की खालिस मिठास थी उसकी आवाज़ में।
"भैया, मैडम ने बुलाया था। कुछ चीजों का आर्डर था लेकर आई हूँ। उन्हें भेज दीजिए।" अपने बैग को आँगन में रखती वह बोली।
छन छन छनाक.."भैया" का हथौड़ा मधुर का नाज़ुक दिल झेल नहीं पाया।
"कोकिला, जाओ बाहर। जब कोई घंटी बजाता है तो खुद क्यों नहीं जाती। इस घर में सब तुम्हारे ही लोग आते हैं।" मधुर की आवाज़ में अप्रत्याशित कर्कशता से दोनों स्त्रियाँ चौंक गईं।
"काहे का प्रेम और काहे का बंधन। इस निष्ठुर दुनिया को इसका एक अक्षर भी नहीं मालूम तो ढाई क्या सीखेंगे।" आवेश में मधुर बड़बड़ रहा था।
मानसिक थकावट, हिंदी सप्ताह के आयोजन के बैताल ने आँखों पर अपनी सत्ता जमा ली। कमरे में एलेक्सा गा रही थी, "एक डाल पर तोता बोले, एक डाल पर मैना।"
कॉलेज के रंगीले दिन, खूबसूरत शामों में मधुर का अवचेतन भटकने लगा। टपरी पर खड़े रहना, आती-जाती लड़कियों को छेड़ना और उनकी वो मीठी झिड़कियांँ। वाह! पूरे साल ही वसंत छाया रहता था। प्रेम का पंछी कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल पर डेरा जमा लिया करता।
"सो गए क्या? हो गई तुमसे इस मोटी पुस्तक की पढ़ाई। चाय पी लो। मुझे शाम को पड़ोस में कार्यक्रम में जाना है। " चाय का कप पकड़ाया नहीं, हाथ में ढकेल ही दिया कोकिला ने।
"अरे! अड़ोस-पड़ोस की बात है, प्रेम संबंध बनाए रखना चाहिए। आज मेरी छुट्टी है मैं भी चलता हूँ।" मधुर के मन में प्रेम के ढाई आखर की लहरें फिर मचल उठीं थीं।
"गुप्ता जी की बहू की गोद भराई है। महिलाओं का कार्यक्रम है। " विचित्र नज़रों से घूरती हुई कोकिला तैयार होने चली गई।
"प्रेम तो जगत व्याप्त है। खुद कान्हा ने प्रेम संदेश दिया। नासमझ लोग इसकी अवहेलना कर रहें हैं।" सोचते हुए मधुर पास पड़ी उस "प्रेमबंधन" को देखने लगा।
मुख्य पृष्ठ पर की उस युवती में अब वो कशिश नहीं थी जो उसे बाँध सके। मधुर का दिल पंचर हुए टायर की तरह पिचक गया था। बिना खुले ही पुस्तक ने उसे प्रेम का यथार्थ रूप दिखा दिया था।
एलेक्सा की आवाज़ भरभरा रही थी, "तोता मैना की कहानी हाय कितनी पुरानी हो गई।"
तैयार होकर मधुर हिंदी आयोजन के बैताल को, कंधों से उतार फेंकने के लिए बरगद की तलाश में निकल गया।
शर्मिला चौहान
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