शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

"जैसा ढूँढत मैं फिरा, वैसा मिला ना कोय" (हास्य व्यंग्य)

"जैसा ढूंँढत मैं फिरा, वैसा मिला ना कोय" (हास्य व्यंग्य)



हमारे अच्छेलाल, अपने नाम को सार्थक करने में रत्ती भर कम नहीं पड़ते थे। सूरज-चाँद की तरह उनकी गति, नियमितता और पेड़ों की तरह दूसरों को सुख देने का जज्बा ही उनको अच्छे बनाता।‌ पत्नी और अम्माँ के तानों-उलाहनों के आगे भी, उनकी अच्छाइयों ने घुटने नहीं टेके।

 सभी का मुँह बंद करने की आज अच्छे ने मन में ठान ली थी। गाँव के वकील साहब तो अच्छे को देखकर, प्रेमिका की तरह मुँह फुलाकर निकल जाते।

अब तो उनके पैसों से चाय पकौड़े खाने वाली मित्रमंडली भी, उनके किराएदारों के रवैए पर बरसाती मेंढ़कों की तरह टर्राने लगी थी। शहर से नाता ना रखकर, अपने गाँव में सुखी रहने वाले अच्छे, आज दूल्हे की तरह सज-धजकर  शहर के लिए निकल पड़े।

"आज सुबह-सुबह सवारी कहाँ के लिए निकल पड़ी?" पीछे से शत्रु ने गोली दागी।
"तुम्हारी टोक से ही हमारे काम बिगड़ जाते हैं, जाते समय तो अपना मुंँह बंद रखा करो।"  पत्नी उमा को घूरते हुए अच्छे घर से निकले।

सफेद कुर्ता पायजामा, गले में रेशम किनारी वाला इकलौता गमछा, पैरों में लखनवी चप्पल और होंठों पर खालिस दूध सी शुद्ध मुस्कान लिए अच्छेलाल ने सालों बाद शहर की कचहरी में प्रवेश किया।

मोर के समान चारों ओर गर्दन घुमाते, नपी तुली अदा से पैर उठाते हुए  जेराॅक्स की एक दूकान के सामने खड़े हो गए। 

"ओह बेचारा, बंडल के बंडल खाली पेपरों पर छाप रहा है।  कितना पेपर रंगवाते हैं लोग। "उस बीस-इक्कीस के जवान छोकरे के माथे पर उभरती बूंदों से भीग गए थे अच्छेलाल।

"अरे ओ भाई! आसपास कितनी दुकानें हैं जाकर वहांँ रंगवा लो यार। इस गरीब के पीछे काहे पड़े हो?" अच्छेलाल का अच्छा दिल पिलपिला गया।

"अरे कौन है तू भाई? मेरे पुराने कस्टमर्स को तोड़ रहा है, अजीब पागल आदमी है।" जेराॅक्स करने वाले लड़के की सहनशीलता, क्रिकेट के बाॅल की तरह सीमा पार कर गई थी।
वह नया बंडल खोलने लगा और बढ़ती हुई भीड़ में, अच्छे थाली पर लुढ़कती सरसों की तरह लुढ़क कर बाहर आ गए।

"अजीब लोग हैं, भले की बात पर हमारा ऐसा हाल किया। मज़ाल है कि हमारे गाँव में कभी हमारे साथ ऐसा हुआ हो।" सफेद कुर्ते पर पड़ी शहरी मिट्टी को झड़ाकर, अच्छे उठ खड़े हुए। 

सफ़ेद कमीज़, काले कोट में बड़ी शान से घूमने वाले देवदूतों के पीछे लोग भाग-दौड़ रहे थे। 
"कितना रूतबा है इस काले कोट का। हम तो बैसाख की सुबह दस बजे ही पसीने में भीगे जा रहें हैं पर वाह.. इस मौसम में काले कोट पहनें इन देवदूतों देख कलेजा ठंडा हो गया। सूरज को चुनौती देते उनके काले कोटों को मन ही मन प्रणाम कर लिया अच्छे ने।

"एक गाँव के हमारे  वकील हैं, हजार बार कह चुके कि किराएदारों से घर खाली करवा दो या किराया बढ़वा दो  परंतु उनके कानों में जूंँ नहीं रेंगती। इधर घर में चीन और पाकिस्तान हर समय बम गिराने को तैयार रहतें हैं। आज तो अपना काम खुद ही करवाकर जाएंगे, अब हम भी दिखा देंगे कि हम अच्छेलाल ऐसे ही नहीं हैं।" दृढ़ निश्चय पक्के इरादे के साथ अच्छे सामने वाली कैंटीन में घुस गए जहाँ सभी वकील चाय पी रहे थे।

"वकील साहब, गाँव में हमारा पुराना बड़ा मकान है। बाबू के ज़माने से चार परिवार किराए पर हैं। ना किराया बढ़ाते ना मकान खाली करते।" आँधी तूफान की तेजी थी।

"केस किसके पास है?" सभी वकीलों ने एक साथ प्रश्न किया।
"किसके क्या, हमारे पास है। घर हमारा तो केस किसका, क्या भाई इतना भी नहीं जानते।" अपनी होशियारी पर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे अच्छे।

"घर-द्वार के पेपर, किराए की रसीदें, गवाह सबूत तो रहे तभी आवेदन करते हैं ना।" वकीलों को अपनी कसौटी पर खरे उतरते इस आदमी में, आज के सार्थक दिन की संभावना नज़र आ रही थी।

"आज सुबह से नाश्ता का भी ठिकाना नहीं, यहाँ आओ तो काम ही काम। बिना खाए-पिए आदमी सोचेगा कैसे?" आपस में वो ठहाके लगाने लगे। 
जेब में रखे पैसों से परोपकार, जनसेवा करने की भावना, अच्छे के हृदय में हिलोरें मारने लगीं। 
"अरे भाई, तो करिए ना चाय-नाश्ता, हम तो रोज ही अपने दोस्तों को कराते हैं।‌ अब आप सब भी तो हमारे दोस्त ही हैं।" अच्छे की अच्छाइयों ने सीमा तोड़ किनारों पर बहना शुरू कर दिया।
"दो भाई, जो जो खाएंँ खिलाओ, आपका भी पाला अच्छेलाल से पड़ा है किसी ऐरे गैरे से नहीं।" कैंटीन के छोकरे को देखकर अच्छे ने अपने तेल चुपड़े बालों में कंघी घुमा ली।

थोड़ी देर बाद अच्छे के देवदूत मित्र जीम रहे थे। प्लेटों में इडली-साँभर, पाव-भाजी, चीन से आए खूबसूरत गोले और उनकी लच्छेदार कमर मटकाती सहेली इठला रहे थे। अच्छे की दुनिया तो पकौड़ों पर ही खत्म होती थी, परंतु यहाँ के पकौड़े मुन्ना की टपरी की तरह करारे नहीं लगे अच्छे को।

अपने अपने केसों की बातें करते, खाकर वे सब उठ खड़े हुए। कैंटीन के छोकरे ने हवा में हिलाते हुए, 'बिल' नाम का   कागज का छोटा परंतु शक्तिशाली टुकड़ा उनके सामने धर दिया।

एक बार, दो बार, तीन बार पढ़ा अच्छे ने।  कक्षा दो में दो साल बिताकर ही शाला छोड़ी थी उन्होंने तो इतना पढ़ना आता था कि बिल पर लिखा छह सौ पचास रूपया पढ़ गए।
"पाँच आदमी के नाश्ते का इतना रूपया? क्या लूट मची है? हमको गाँव का सीधा सादा आदमी समझ रखा है क्या? रोज खिलाते हैं अपने दोस्तों को समोसा पकौड़े, कभी इतना पैसा नहीं दिया।"  सुबह उमा द्वारा दिए हजार रुपयों से बचे, जेब में  रखे आठ सौ रुपयों पर उनकी आत्मा व्यथित हो गई। वैसे अच्छे पैसे कौड़ी से मोह करने वाली नस्ल के प्राणी नहीं हैं परंतु अपनी खाली जेब के वो आदी भी नहीं थे।

"आर्डर किया था तब साथ ही रेट लिखा था, वही लगाया है। धंधें का टाइम खोटा मत करो। यहां सभ्य लोग आते हैं। ना जाने कहाँ से आ जाते हैं सुबह-सुबह।" काउंटर पर बैठा मोटे चश्मे वाला, थुलथला आदमी गरजा।

दुनिया का ऐसा रुप देखकर अच्छे का दिल व्यथित हो गया। उसके देवदूत मित्र तो कब के साथ छोड़कर अपने अपने रास्ते निकल गए थे।
मरता क्या न करता, जेब से सात सौ रुपए निकालकर, अच्छे ने एक बार भारी मन से उनको श्रद्धांजलि दी और उस  बिल पर अर्पण कर दिया। कुछ देर बाद बचे पचास का नोट, सौंफ के साथ टेबल पर फड़फड़ा रहा था।  काम करने वाला लड़का उनको घूरता खड़ा था मानो कैंटीन से बाहर पहुँचाकर ही दम लेगा।

"इस कैंटीन में टीप भी देते हैं साहब।" उस लड़के ने अपने मोतियों से झक दाँतों को, बाहर की दुनिया देखने की खुली छूट दे दी।
"टीप..ये कौन सी बला है। टपरी पर कभी नहीं सुनी।" अच्छे हड़बड़ा गए।
"नहीं देना है तो मत दो साहब, नाटक क्यों कर रहे हो? खाने के बाद बीस-पचास तो कोई भी देता है।" वह बड़ी अदा से मुस्कुरा रहा था।
"अच्छा!" अच्छे ने कौतूहल से कहा और लड़के ने हरा सिग्नल देख नोट उठाकर जेब के हवाले कर लिया। अब लड़का ज़ोर ज़ोर से टेबल पर कपड़ा मारने लगा।

कपड़े की फटकार ऐसी थी कि अच्छेलाल के दिमाग की सारी नसें हिल गईं।‌ कहीं ये सालों पुराना, मैला कपड़ा उनपर अपनी छाप न छोड़ दे, झटके के साथ उठकर अच्छे बाहर आ गए।

बाहर की तपती धूप, जेब में अचानक आई ठंडक ने वातावरण को उमस भरा कर दिया। इस शहर ने घंटे दो घंटे में सात सौ रुपए लिए और डकार तक नहीं ली। 

सारे प्रागंण में तथाकथित देवदूत अपना काम करने में लगे थे। 
"ओ वकील साहब, हमारा काम कब होगा?" सामने उस वकील पर अच्छे की नज़र पड़ी, जिसने अभी अभी डबल मक्खन वाली पाव-भाजी को अपने लटके पेट में स्थान दिया था।
"अजीब आदमी हो, न केस फाइल, न कोई जानकारी खामखां पीछे ही पड़ गए । कैंटीन में भी दिमाग खाते रहे।" अपना कोट को झटकता वह उनकी आँखों से ओझल हो गया।
गरमी की तपन से व्याकुल अच्छे ने गमछा सिर पर बाँध लिया। आँखों पर हथेली का छज्जा बनाते हुए उनकी निगाहें, सामने छोटी छोटी मेज़ गादी पर कुछ लिखते लोगों पर पड़ी। 

अर्जी निवेश कह रहे थे लोग उनको, वे ‌लोगों की अर्जियाँ लिख रहे थे।
"अब आए हो अच्छे सही जगह।" अच्छे उनकी ओर लपक लिए।
"भाई, हमें हमारे किराएदारों से मुक्ति दिला दो, मदद करो हमारी।" उस व्यक्ति के सामने आलथी पालथी मार कर अच्छेलाल विराजमान हो गए।

"हम यहाँ मदद करने के लिए ही बैठे हैं भाई। मुक्ति के लिये फीस होती है।" उसने अपने‌ कागज, कलम को सहेजते हुए कहा।
"हाँ हाँ, सौ रुपए हैं ना हमारे पास।" कहते हुए अच्छे ने अपने जेब परिधि में, अँगुलियों को घुमाया। कड़क नोट का कोई स्पर्श नहीं मिला। झटके से उठकर अच्छे ने अपनी जेब पलट दी। कागज के पुराने तुड़े मुड़े पुर्जे, सौंफ सुपारी के सप्ताह पहले के टुकड़े और एक दो सिक्के मुँह बाए नीचे गिर पड़े। 

"अभी तो था जेब में, वही तो इकलौता बचा था।" अपने इकलौते कड़क सहारे के न मिलने से दुखी हो कर अच्छे ने कहा।

"ऐसा तो यहाँ रोज़ होता है तमाशा। बिना पैसों के स्याही के, मेरी कलम एक कदम नहीं चलती भाया। जा, बोहनी खोटी मत कर।" कहते हुए उसने मुँह मोड़ लिया।

सामने गन्ना रसवाला ताज़ा, ठंडा गन्ना रस गिलास भर भरकर लोगों को बेच रहा था। अच्छे ने अपनी जीभ की लार को गटक कर, गला गीला कर लिया। बस स्टैंड पर खड़े अच्छेलाल को जो चाहिए था वो‌ नहीं मिला, ऊपर से धोखा और अपमान मिला। 

अब दुनिया के सारे रंग सही नज़र आ रहे थे।

वाह रे वाह! साठ-पैंसठ की अम्माँ, मार पावडर लाली कर के सोलह की बनीं हुई हैं।
छोटे-छोटे बच्चों के पीठ पर भारी बैग लटका कर माँ बाप निश्चिंत छोड़ रहे।

कितना भीड़, कोई किसी से बोलता बतियाता भी नहीं। आदमी हैं या मशीन।
एक बस आते दिखी और लोगों के धक्के से अच्छे भूमि पर चारों खाने चित्त पड़ गए।
भागते दौड़ते लोगों को, एक गिरा हुआ आदमी नज़र नहीं आया और अच्छेलाल खुद ब खुद अपने पैरों पर खड़े हो गए। शहरी मिट्टी को अपने कुर्ते से झटक झटक कर निकाल ही रहे थे कि सामने से स्कूटर पर एक जाना पहचाना व्यक्ति आते दिखा।

"अरे अच्छे, तुम यहाँ, इस जगह। कैसे भाई आज तुम्हें मित्रमंडली से फुर्सत मिल गई।" गांँव के वकील साहब को सामने देख, एक बार काले कोट में फिर अच्छे को देवदूत के दर्शन होने लगे।

"चलो, घर ही जा रहे हो ना। आओ हमारी स्कूटर पर बैठो, अरे बस का किराया हमें ही दे देना। हाँ अपनी वो दूर पड़ी चप्पल जरूर पहन चलना वरना चौक से उतरकर बिना चप्पल ही घर पहुँचोगे।" वकील साहब जोर जोर से हँसने लगे।

"हे देवदूत, तुम्हें प्रणाम करता हूँ।" हाथ जोड़कर अच्छेलाल ने वकील साहब को प्रणाम किया और लपककर पीछे की सीट पर जम गए।

"देवदूत!" आश्चर्य से अच्छे की ओर देखते हुए वकील साहब ने स्कूटर आगे बढ़ा दी।


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शर्मिला चौहान

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