फ़िलबदीह क्रमांक 11
प्रथम चरण
1/2/24
मिसरा-ए-तरह -
कई दिनों से मुझे भी तेरा ख़याल नहीं
1212 1122 1212 112
ऐ ज़िंदगी कभी तुझसे किया सवाल नहीं
जो भी मिला वो सही है, मुझे मलाल नहीं।।1।।
दिखाता चाँद कलाएंँ बदलता रूप वो नित
धरा की चाल है ये चाँद का कमाल नहीं।।2।।
सभी सिमट से गये खुद के दायरों में ही बस
पराये दुख का किसी को यहांँ ख़याल नहीं।।3।।
निकलता चंद दिनों में जो कच्चा रंग हो गर
जहाँ में प्यार से पक्का मिले गुलाल नहीं।।4।।
लदी हो खूब फलों से रहा करें चिडियांँ
मेरी नज़र में तो ऐसी कहीं भी डाल नहीं।।5।।
गिरह का शेर-
झटक के हाथ मेरा साथ जो छुड़ाया तूने
कई दिनों से मुझे भी तेरा ख़याल नहीं।।
शर्मिला चौहान
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