कहानी - ज़िंदगी धुआँ सी
मैंने अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ समाप्त करके, सेवानिवृत्ति के बाद इस छोटे शहर में बस जाने का फैसला किया। एक तो छोटे शहर के बड़े होने की उम्मीद हर समय रहती है और दूसरे जीवन उपयोगी वस्तुओं का उचित मूल्य या कभी-कभी सस्ते में मिल जाना सेवानिवृत्त व्यक्ति के लिए फायदे का सौदा होता है। तीसरी बात इस शहर में कोई ऐसी प्रसिद्ध इमारत, स्थल नहीं है जिसके दर्शनार्थ आकर मेहमान घर को लॉज बनाकर रहने लगें। इसका ऐसा अर्थ नहीं कि मैं अतिथि-सत्कार नहीं जानता परंतु बड़े शहर में रहकर, वक्त-बेवक्त बिना पूर्व सूचना के आकर कई दिनों रूकने वालों से अब इस उम्र में परहेज करने को मजबूत था।
मैं, संजीव दयाल और मेरी पत्नी सुलभा हम दोनों ने कई मुद्दों पर एकमत रखते हुए इस स्थान को चुना था। मेरे चुनावी मुद्दे तो मैंने कह दिए, सुलभा ने यहां की शांति और कामकाजी सहायिकाओं की उपलब्धि को पसंद किया। पास ही बाजार दुकान, सर्राफा, मेडिकल स्टोर्स और जनरल फिजिशियन के क्लीनिक इस उम्र में उसे आकर्षित कर रहे थे। खैर, मुद्दे जो भी थे उसमें हमारी इकलौती बेटी उत्तरा और दामाद जी की भी सहमति थी। उनके महानगर से सीधी ट्रेन और बढ़िया सड़क ने इस स्थान के लिए थी, जो उनका और हमारा सम्मिलित मुद्दा था। अपने इस नए घर को अपनी जरूरत और सुविधा के अनुसार सजाने में हम दोनों पति-पत्नी फिर एक बार फिर मशगूल हो गए थे। इस बीच उत्तरा और दामाद जी, दोनों नातियों को लेकर एक बार ही आ पाए थे।
टन-टन, टन-टन, टन-टन मंदिर की घंटियों का स्वर इस गोधूलि बेला में सबके कानों में रस बरसाने लगा। अभी कुछ ही क्षणों पहले सूर्यास्त हुआ है और सूरज ने अपने पीछे कुछ लाल मोती अंबर में बिखेर दिए हैं। बस, अब वही लाल मोती, नीले रंग के साथ मिलकर कुछ श्यामल हुए जा रहे हैं। मैंने अपने के भगवान घर की ओर कदम बढ़ाए। सुलभा प्रतिदिन दीपक में बाती-तेल डालकर तैयार कर जाती है।
"जब मंदिर से आरती की आवाज आए तो दीपक जला देना। मैं आकर तुलसी में दीपक रख दूंगी।" यह उसके रोज का काम था। मेरी सेवानिवृत्ति के बाद, थोड़ी निवृत्त वह भी हुई थी। घर के पास मंदिर होना, उसकी आकांक्षाओं को साकार कर रहा था।
माचिस की तीली जलाकर, तेल में डूबी बाती के दूसरे सिरे को स्पर्श कराया। शनै-शनै मध्यम पीत प्रकाश फैलने लगा। उसके आलोक में सर्वशक्तिमान ईश्वर की मूर्ति का मुख मंडल दैदीप्यमान हो गया। एक आनंद, एक आकर्षण उनके चेहरे में कि दृष्टि हटती नहीं थी। जगत बनाने वाले इस अप्रतिम कलाकार को मूर्त रूप देने वाले कलाकार की प्रतिभा मानने में मुझे कोई संकोच नहीं था। एक लय, एक समर्पण से जलती बाती अपने जीवन को सार्थक होते देख, बीच-बीच में मुस्कुराती भी थी।
डिंग-डोंग, डिंग-डोंग, डिंग-डोंग, डिंग-डोंग दरवाजे की घंटी बजी।
"अरे आज आरती चल ही रही है और सुलभा आ गई।" मन ही मन सोचते हुए मैं दरवाजा खोलने गया। दरवाजा खुला तो सामने करीब ग्यारह-बारह साल का एक लड़का खड़ा था। उसके हाथ में एक थैली थी और उसने तुरंत झुककर थैली से सामान बाहर निकालना शुरू किया। कुछ चार-पांच पैकेट थे जो उसने देहरी पर रख दिए। खड़ा होकर मुझे एकटक देखने लगा जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो कि सामान सही घर, सही आदमी को दिया है या नहीं।
मैंने ध्यान से उसकी ओर देखा गेहुँआं रंग, रुखे-उलझे बाल, टी-शर्ट जिसमें कोई कार्टून बना था, घुटने तक की फिट पैंट, पैरों में चप्पल जो एक दृष्टि में लड़कियों की चप्पल लगती थी। गुलाबी रंग की तितली बनी चप्पल मैंने तो किसी लड़के को कभी पहना नहीं देखा था।
"चप्पल तुम्हारी है?" कैसा बेतुका सवाल पूछा मैंने।
क्षण भर वो मुझे घूरता रहा फिर बोला, "मानस सोसाइटी वाली मैडम ने अपनी छोकरी की चप्पल दी है गर्मी में मेरे पैर जलते थे इसीलिए।"
"ओह! अच्छा-अच्छा।" मैंने कहा और वह पलट कर जाते हुए बोला,"आंटी ने सामान खरीदा और बोला घर पहुंचा देना, वह मंदिर गई है।" उसने अपनी जेब से एक चॉकलेट निकाली और मुँह में डालता हुआ बेफिक्री से सीढ़ी से उतर गया।
सामान उठाकर मैंने रसोई के प्लेटफार्म पर रख दिया। मेरा मन कहीं उड़ जाने को बेचैन हो रहा था। सांसें कुछ बेकाबू होने लगीं और मैं बालकनी में रखी कुर्सी पर बैठ गया। वह लड़का सामने के गेट को पार करके, सड़क के दूसरी ओर चला गया था। कुछ हल्का सा लंगड़ा रहा था वह शायद उसकी चप्पल बेसाइज़ थी और उसके लिए आरामदायक नहीं थी।
एक-दो दिनों से मानसूनी बादलों ने मुँह दिखाई शुरू कर दी थी। शाम से ही हवा तेज़ चलती, कुछ धूल के गुबार आसमान की ओर उठते और बचपन वाले की "भूत" का अस्तित्व साकार कर देते। बालकनी से सटा सोसाइटी का आम का पेड़ जिसकी एक बड़ी शाखा हमारी बालकनी पर नत थी। हवा से खिलवाड़ करते आम की शाखों और पत्तों में सरसराना शुरू किया मेरे हृदय की धड़कनों ने भी उस बेचैनी को महसूस किया।
आज उस लड़के के हावभाव, वेशभूषा, उम्र और काम ने मुझे कई सालों पुराने वाक़ये की ओर धकेल दिया। पहली पोस्टिंग थी मेरी। विवाह करके सुलभा को साथ लेकर गया था वहाँ। दूर-दूर बने घर, बीच में बड़े बगीचे और संकरे लंबे मकान। बरामदा, बैठक, बीच का एक कमरा,रसोई, पीछे आँगन, साइड में पानी की टंकी, स्नान घर, बर्तन साफ करने की जगह और पिछला दरवाजा। ग्रामीण बैंक में नौकरी लगी थी मेरी और बैंक के बाबू का मान था उस कस्बे में । पाठशाला के अध्यापकों, सरकारी अस्पताल के डॉक्टर और बैंक के कर्मचारियों को पूरा गांव पहचानता था।
मैं तो बैंक के कामकाज, स्टाफ के सहयोग से अपने काम को ठीक से करने में लग गया परंतु सुलभा अपने समय का उपयोग मकान को घर बनाने में करती रही। कामकाज में सहायता के लिए उसे हमउम्र उर्मिला मिल गई थी। एक दिन उसके साथ बाजार जाकर सुलभा ने सिलबट्टा खरीद लिया।
"मिक्सी मिली है ना शादी में उसका क्या करोगी?" मैंने पूछा था।
"मिक्सर में पिसी चटनी बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, तो कभी-कभी चटनी और मसाला सिल पर ही पीस लिया करूंगी। अरे, एक्सरसाइज भी हो जाएगी और स्वादिष्ट खाना भी मिलेगा" सुलभा पक्की गृहिणी बनने के राह पर निकल पड़ी थी।
खैर, सात-आठ महीने हो गए थे और आसपास के लोगों से हमारी जान पहचान भी हो गई। मैंने लोन पर एक स्कूटर ले ली थी तो पंचर वाला, पेट्रोल पंप, किराने की दुकान, दर्जी सबसे राम-राम हो जाती थी। घर से कुछ दूरी पर एक पुराना होटल और उसी के सामने गन्ना रस बेचने वाला बैठता था। होटल पुरानी इतनी की दीवारों का असली रंग अब अपनी अस्मिता खो चुका था। बेंच और टेबल भी जगह-जगह छिल गए थे परंतु सेवा भाव से डटे थे। काउंटर पर जो बैठता उसके बाल और दाढ़ी का मेल चेहरे पर हो रहा था। आँखों में रंगीन चश्मा लगाए, अपनी तोंद को कमीज़ से छुपाए रखने का भरसक प्रयास करता हुआ वह आदमी हमेशा पान चबाते रहता था। उसके सामने काँच की शो केस में लड्डू, बर्फी, मैसूर पाक, पेड़े और पेठे सदियों से सजे दिखते थे।
ऐसा वर्णन पढ़कर आप यह ना समझना कि वहाँ सिर्फ मक्खियांँ भिनभिनाती थीं, वहाँ ग्राहकों की भी भीड़ हुआ करती थी। हलवाई सुबह-शाम गरम समोसे, कचौड़ी, जलेबी बनाता तो कद्रदान तीन-तीन, चार-चार दोने खा जाते। उसके होटल में साफ-सफाई, बर्तन उठाना, टेबल पर कपड़ा मारने के लिए कुछ तीन-चार लड़के दिखते थे। मैं तो बैंक से आते-जाते कभी-कभी सुलभा के लिए गरम समोसे, जलेबी बँधवा कर ले जाता था। मैं खुद बैठकर कभी नहीं खाता था इसलिए इन काम वालों से मेरा कोई सरोकार नहीं था।
कुछ दिनों से सुलभा की तबीयत ठीक नहीं लग रही थी। चक्कर आने, उल्टी होने से कमजोरी आ गई थी उसे।
"सुलभा, तुम अगर खुद अपना ध्यान नहीं रखोगी तो मैं तुम्हें माँ के पास छोड़ आऊंगा। क्या जरूरत है दिनभर काम करने की और इस सिलबट्टा को तो मैं रख ही देता हूंँ उठाकर।" तीसरा महीना लगने पर मैंने सुलभा को खूब डांटा-समझाया कि वह अपना खुद से ध्यान रखे।
सहायिका उर्मिला बहुत मदद करती थी। सब्जी-भाजी साफ कर देती, गेहूँ पिसवा लाती और दुनिया जमाने की बातें सुलभा के साथ करके उसको बहलाये रखती थी। एक दिन सुबह देर तक सुलभा उठी नहीं, मैंने उसे लेटे रहने की सलाह दी और चाय बना कर दिया। बैंक जाते-जाते खुद भी दो समोसे खा लिए और सुलभा के लिए गन्ना रस, कचौड़ी ले जाने की सोचने लगा।
"कचौड़ी को आधे घंटे और लगेंगे बाबू, आपका घर नंबर बता दो छोकरा दे आएगा।" हलवाई ने कहा।
मैंने सोचा रुक तो बैंक में देर हो जाएगी और सुलभा ने कुछ खाया भी नहीं है। वह आजकल कचौड़ी बहुत पसंद कर रही है। एक शीशी दिया था उसने कि गन्ना रस ले आना तो शीशी हलवाई के पास छोड़ कर, पैसे देकर मैं बैंक चला गया।
शाम को घर आया तो सुलभा तरो-ताजा लग रही थी।
बोली, "सुबह की गरम कचौड़ी और गन्ना रस बेहद स्वादिष्ट थे। खाने के बाद मैं सब पचा गई और शाम के लिए कढ़ी-चावल भी बना कर रखें हैं।" मुझे बहुत अच्छा लगा, मैंने कहा, "गन्ना रस पसंद हो तो रोज ही शीशी दे दिया करो मैं शाम को आते हुए ले आया करूंगा।
"भोला ला देगा ना, बहुत अच्छा बच्चा है।" उसने मुझसे कहा।
"कौन भोला?" मैंने आश्चर्य से पूछा।
"वही जो कचौड़ी गन्ना रस दे गया था।" उसने बताया।
"तुमने नाम पता भी जान लिया, मैं तो पहचानता भी नहीं।" मैं आश्चर्य से कहा ।
"ग्यारह-बारह साल का बच्चा खाना लेकर आएगा तो क्या उसका नाम नहीं पूछूंगी? मैंने तो उसे केला भी दिया था पर उसने लिया नहीं।" कहते हुए सुलभा उदास हो गई।
अब कभी गन्ना रस, कभी गरम जलेबी, पोहा जो सुलभा का मन होता, मैं बैंक जाते वक्त पैसे दे जाता और होटल वाला घर पहुँचा देता। सुलभा खुश तो रहती परंतु उस बच्चे के कुछ नहीं लेने से उदास हो जाती थी। "उस लड़के के लिए एक जोड़ी चप्पल या सैंडल ला दोगे, बेचारा नंगे पैर आता जाता है।" एक दिन सुलभा ने कहा। बस वह पीछे ही पड़ गई तो मैं सैंडल की जोड़ी खरीद लाया।
छठवां महीना था और गांँव में मांँ ने सुलभा के सातवें महीने की गोद भराई का कार्यक्रम रखा था। उनकी चिट्ठी आई थी कि बहू को ले आओ सातवें महीने में बस ट्रेन से यात्रा करना ठीक नहीं होता। हमने सोचा शनिवार-रविवार को गांँव चले जाएंगे और घर में पहले अतिरिक्त सामान को सुलभा व्यवस्थित करने लगी। कुछ बचे हुए मिर्च-मसाले अच्छी तरह से धूप में रखकर वह पैक करने लगी।
सब तैयारी हो गई तब उर्मिला को घर के साफ-सफाई की हिदायत देकर, सभी निर्देश मुझे सुनाकर ही सुलभा ने घर के बाहर कदम बढ़ाया।
"ओहहो! भोला के लिए सैंडल लाए थे मैं तो देना भूल ही गई और इस सप्ताह हमने होटल से कुछ मंगवाया भी नहीं।" उसके चेहरे पर उदासी और माथे पर बल पड़ गए थे।
"अब चलो भी ट्रेन का समय हो रहा है वापस आकर मैं दे दूंगा उसे।" मैंने बात संभाली।
आसपास की महिलाओं ने उर्मिला के साथ सुलभा को बाहर तक विदाई दी। उसके मुंँह में दही शक्कर खिलाकर, शुभ समाचार भेजने की बात कही।
कैसी नियति है ईश्वर की रक्त संबंध तो नहीं होता परंतु रक्त बनाने वाले की सब संतान है यही नाता हमारी संस्कृति का पोषक है। अपनापन, प्रेम भाव की नींव पर ही समाज का सुंदर ढांचा खड़ा है जहां स्वार्थ की रेत आ जाती है तो कंपन जन्म लेता है। सुलभा को छोड़कर दो-तीन दिन में ही मैं वापस आ गया था। उसके बिना घर सिर्फ मकान था, उसकी उपस्थिति का एहसास मुझे हर वक्त होता रहता। मन को समझा लेता कि सुलभा गांँव में परिवार के बीच रहेगी तो उसे अच्छा लगेगा फिर अगले महीने गोद भराई में तो मैं कुछ दिनों के लिए जाऊंगा ही। कुछ ही महीने बाद इस घर में बच्चों की किलकारियां गूंजेंगी।
दो-तीन दिनों में मुझे आदत पड़ने लगी। सुबह उर्मिला झाड़ू पोंछा कर जाती, चाय के बर्तन धो जाती। मैं कभी चाय के साथ डबल रोटी खा लेता तो कभी बिस्किट का पैकेट खत्म कर देता। कुछ और बनाने का समय ही नहीं रहता था। शाम को दाल-भात या खिचड़ी बनाने में मुझे बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। इस बीच मैंने कई प्रकार की खिचड़ियां बनाईं।
सप्ताह भर बाद मुझे अचानक उसे सैंडल का ध्यान आया। दूसरे दिन बैंक जाते समय मैंने होटल में नाश्ता किया और पैसे देने के समय उस रंगीन चश्मे वाले से पूछा, "वह लड़का है ना जो मेरे घर सामान दे जाता था, क्या नाम है उसका… भोला, उसे आज शाम को घर भेज देना।" रंगीन चश्मे वाले ने मुंँह से कुछ कहा नहीं उसकी तोंड थरथराई तो पता चला वह हंँस रहा है। शाम को मैं घर पहुंचा तो देखा रसोई के फर्श में सारा दूध फैला था। मैंने शायद खिड़की खुली छोड़ दी थी और दूध का पतीला जाली वाली अलमारी में रखना भूल गया था।
"अरे यार! यह तो बड़ा काम हो गया अब इसे साफ करना पड़ेगा फिर खिचड़ी बनाई जाएगी।" ऑफिस के कपड़े बदलकर मैंने लूंगी लपेट ली और पोंछा लगाने लगा। दरवाजे की सांकल खड़खड़ाई।
"अब कौन है भाई इस समय!" मैं लुंगी ठीक करता हुआ बाहर निकला।
सामने वही होटल वाला बच्चा खड़ा था। दुबला-पतला, गोरा परंतु मैला, उलझे रुखे-सूखे बाल जो माथे से लटक कर आंँखों में घुसे जा रहे थे। लाल-धूसर सी कमीज़ जिसके बटन कुछ टूटे, कुछ खुले थे। पेंट तो इतनी चौड़ी कि उसमें उस जैसे दो समा जाएं। मैंने होटल में उसे देखा था परंतु इतने गौर से कभी नहीं। उसकी नज़रें नीचे थीं। मैंने उसे अंदर बुलाते हुए कहा, "तुम्हारे लिए कुछ लाया हूंँ देना था इसीलिए बुलवाया है। अंदर आ जाओ और दरवाजा टिका दो नहीं तो बिल्ली आ जाएगी।" कहता हुआ उसे बैठक में छोड़कर मैं अंदर वाले कमरे में चला गया।
करीब तीन-चार मिनटों बाद मैं वापस बैठक में पहुंचा। वहां का दृश्य देखकर मेरे हाथों से सैंडल का डिब्बा नीचे गिर गया। वह लड़का अपने कपड़े उतार कर, नंगा, दीवार की तरफ मुंँह करके खड़ा था। मेरे हाथ पैर सुन्न पड़ गए और शरीर पसीने से नहा गया। मैं उस पसीने के बहाव से बाहर आने के लिए छटपटाने लगा और जितना छटपटाता उतना ही मस्तिष्क विचारों के दलदल में फँसता चला जा रहा था। कुछ मिनटों तक शून्य में विचरते मस्तिष्क को अपनी मास्टरी का ख्याल आया। संवेदनाओं के तार झनझनाए और आदेश जिह्वा पर आ गया।
"क्या कर रहे हो पागल हो गए हो क्या? किसने यह सिखाया तुमको? तुम्हारा नाम भोला ही है ना! उठाओ अपने कपड़े पहनो!" मैं गुस्से, अनजाने भय और दुख से उस लड़के पर चिल्लाया।
दो मिनट तक सब कुछ शांत रहा। मैं सिर पर हाथ रखकर सोफे पर बैठ गया। वह धीरे-धीरे मेरे करीब आया और उसने पैंट पहन ली। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, दृष्टि ऊपर की ही नहीं थी उसने। पूरे कपड़े पहनकर सर झुकाए खड़ा था।
" तुमने ऐसा क्यों किया? पहले भी ऐसा किया है कभी?" मैंने दूसरा प्रश्न क्यों पूछा पता नहीं। उसके यंत्रवत व्यवहार से एक वयस्क आदमी कैसे पूछ सकता था यह प्रश्न।
"हांँ।" पहली बार उसने मुंँह खोला। नज़रें अभी भी नीचे जमीन पर थी।
"क्यों? कौन बोलता है करो, मैंने तो कुछ बोला ही नहीं और तुमने कपड़े उतार लिए। ऐसा कौन करता है?" मैंने कुछ आवेश से कहा।
"जो मुझे कुछ देता है वह सब लोग ऐसा करते हैं।" उसका स्वर सपाट था।
"ऐसा कौन बोलता है बताओ मुझे।" मैं सब कुछ जान लेना चाहता था।
वह चुप था। मैंने उसे पास बुलाया और सोफे पर बिठाया। मेरी उंगलियांँ उसके बालों पर फिरने लगीं। मेरी आंँखों से आंसू टपक कर उसके रूखे बालों को नम कर रहे थे।
"हे ईश्वर! इतने छोटे बच्चे पर इतना अत्याचार! कैसे और कब तक सहेगा यह?" मेरे दिल ने भी आँसू बहाना शुरू कर दिया था।
वह खड़ा हो गया।
"मालिक को क्या बोलूं?" उसका कातर स्वर मेरे दिल में कतरा-कतरा कर टपकने लगा।
"तेरे मालिक को सब पता है? वह रंगीन चश्मे वाला आदमी ना?" मैंने उससे पूछा।
"हाँ। वह मेरी सौतेली मांँ का यार है। वही गांँव से लाया मेरे को। तीन-चार और लड़के हैं उसके पास। आपसे कल रुपया मांगेगा नहीं तो मेरे को खूब मारेगा। होटल में आपने ही मुझे शाम को भेजने कहा था ना।" पहली बार उसने नज़रें उठाईं।
सफेद आँखें लगता था पानी जमकर बर्फ बन गया है और कुछ समय बाद पुतलियांँ भी हिमखंडों में धंस जाएंगी।
"क्या करूं, यह कैसी विडंबना आ गई भगवान!" मैंने दिमाग पर जोर दिया और उस बच्चे से कहा, "तुम्हें तुम्हारा नाम, गांँव, पता सब मालूम है ना, हम पुलिस के पास जाएंगे।" एक आशा की किरण थी।
"हम तीन-चार लड़के हैं तो पुलिस वालों के पास रोज एक जाता है। वह मालिक फोकट में मिठाई-नमकीन हमारे से भेजता है पुलिस के पास।" उसकी आवाज ने सारे रास्ते बंद कर दिए।
अब मुझे अपनी नौकरी, अपनी इज्जत, इस कस्बे में अपने परिवार को रखने की सोच कर ही निर्णय लेना था। आखिरकार, मैं भी साफ-सुथरी छवि बनाए रखने वाला, पारिवारिक, संस्कारी आदमी होने में ही भलाई समझता था।
"अपने मालिक से कहना कि मैं घर पर नहीं था। भाग जा, यह सैंडल ले जा मैडम ने तेरे लिए मंगवाए थे और दोबारा कभी इस घर में मत आना।" मैंने सैंडल उसके हाथों में पकड़ाया और उसकी ओर पीठ करके खड़ा हो गया। कुछ देर बाद दरवाजा खुलने और फिर बंद होने की आवाज आई। गेट की हल्की सी चरमराहट भी मुझे सुनाई दी।
मैं थोड़ा सा दरवाजा खोला और बाहर देखा। सड़क की बत्ती में उसे एक नियंत्रित मशीनी-चाल से चलते हुए अंधेरे में विलीन होते देखा। मेरे जीवन में भूकंप आया था इसके झटके शायद कई सालों तक मुझे हिलाते रहेंगे। उस रात मैंने छटपटाते हुए बिताई। मन में डर भी था कि वह मोटे रंगीन चश्मे वाला मुझ पर कोई आरोप ना लगा दे। सुबह-सुबह जब नींद लगी तो दूधवाले ने सांकल खटखटाई।
नींद में ऊंघता, बर्तन लिए मैं दूध लेने लगा।
"कल से दूध मत लाना। आज तक का पैसा ले जाओ, गांव जा रहा हूंँ। आने के बाद उर्मिला से खबर भेज दूंगा।" मेरे मुंह से निकलता गया। पैसे लेकर डिब्बा उठाए वह चला गया।
बैंक में मैंने सुलभा की तबीयत खराब होने की बात कहकर, गांँव जाने की तैयारी कर ली। शाम को सब पैक करके उर्मिला को बाहर आंँगन की सफाई करने की बात समझा कर मैं बस से निकलने के लिए तैयार ही था कि आंँगन में वह लड़का खड़ा था। उसकी नज़रें मुझ पर टिकी थीं। मैं एक क्षण के लिए घबरा गया था। उस एक क्षण में कई विचार मेरे मन में तूफान उठने लगे थे।
"मैंने मालिक से बताया कि मैडम ने मुझे यह सैंडल दी है आप घर पर नहीं थे। मालिक ने मुझे चैक किया और आपको गंदी गालियां दी कि आपने उसकी कमाई खराब कर दी।" उसने वह सैंडल अपनी छाती से लगा लिया जैसे कोई नायाब हीरा मिल गया हो। उसके आंँखों की बर्फ पिघलने लगी थी। पुतलियांँ नमी में नहाकर चमकने लगी थीं। वह चला गया। मैं भी बस में बैठकर गांँव आ गया। मेरे अनमने रंग-ढंग को देखकर भाभी और चाचियांँ मुझे ताने मारने लगीं। सुलभा ने भी गुस्सा किया, "इतनी जल्दी क्यों आ गए? यहां सब क्या बोलेंगे?"
किसी को क्या समझाता, कैसे बताता मेरी मानसिक स्थिति मुझे परेशान कर रही थी। गांव में ही रहते हुए मैंने स्थानांतरण की अर्जी भेज दी। सुलभा की अवस्था, पारिवारिक ज़िम्मेदारियों का हवाला देकर तीन-चार महीने बाद मुझे दूसरी जगह का आदेश मिल गया। इस बीच में बैंक के किसी बैचलर मित्र के यहां रहकर समय निकलता और बैंक के कुछ जरूरी काम निपटा कर वापस गांँव आ जाता था।
उत्तरा के जन्म के बाद मांँ को साथ लेकर हम पोस्टिंग वाली नयी जगह चले गए। सुलभा बच्ची के पालन-पोषण में व्यस्त होती गई और मैं अपने बैंक के कार्यभार में। समय ने उस घटना को धुंधलाना शुरू कर दिया था।
"उत्तू के लिए चींचीं बजने वाली सैंडल लाना है, चलेगी तो खूब मजा आएगा।" सुलभा ने कहा और अचानक उसे कुछ याद आया।
"भोला के लिए सैंडल लाए थे, दिया था उसको? बेचारे के नंगे पैरों को देखकर बहुत बुरा लगता था तुमने?" वह भोला और उर्मिला को याद करने लगी।
"दे दिया था, बहुत खुश था वह।" मैंने कह तो दिया परंतु उस घटना का जिक्र मैंने सुलभा से कभी नहीं किया। जो भोला के पैरों के जलन, उसके दुख से दुखी हो जाती थी, उसके अंग-अंग के दोहन का सुनकर शायद दिमागी संतुलन ही खो देती।
"डिंग-डोंग, डिंग-डोंग!" डोर बेल बजी और मैं आज की दुनिया में वापस आ गया।
दरवाजे से घुसती सुलभा बड़बड़ाई , "पाँच-छह बार घंटी बजाई पर तुम्हें सुनाई ही नहीं देता।" वह बाथरूम की ओर बढ़ गई।
"बालकनी में बैठा था, यहां आवाज कम ही आती है ना।" मैंने उत्तर दिया।
तुलसी के पास दीपक जलाती हुई वह बोली, "मंदिर जाते समय कुछ किराना सामान लेकर भेज दिया था जीतू से, लाया था ना?" उसने पूछा।
"दे गया था और अब किसी से घर तक सामान मंगवाने की जरूरत नहीं है। मैं रिटायर हो गया हूंँ खुद ले आऊंगा। महीने भर के लिए सामानों की सूची बना लिया करो, सब ले आएंगे एक साथ यदि कुछ कम पड़ता है तो मैं ला सकता हूंँ।" मैंने अपना निर्णय रख दिया।
मेरे सेवानिवृत्त जीवन में काम की जरूरत को समझ कर, दीपक के आलोक में सुलभा के हल्के झुर्री पड़े गाल अनायास ही फैल गए।
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