मंगलवार, 26 मार्च 2024

व्यंग्य - नारी निंदा न करो, नारी रतन की खान

व्यंग्य _"नारी निंदा न करो, नारी रतन की खान"



"सुनते हो, अगले सप्ताह हमारी माँ आ रहीं हैं। ननकू के पास से वापसी के समय, हमने ही रुकने को कह दिया था।"  हाथ में हलुए की कटोरी पकड़ाते हुए, हलुए से भी  मीठे स्वर में उमा बोली।‌

असली घी की खुशबू नथुनों से होती हुई, दिल में समाने लगी।‌ आँखें बंद करके, सूँघकर ही आधी तृप्ति अच्छेलाल ने हासिल कर ली।‌

सहसा, उमा के शब्दों को तौलने लगा।‌
"अभी-अभी कुछ दिनों पहले ही तो आईं थीं तुम्हारी माँ, फिर आ रहीं हैं?"  हलुए में पड़े घी से अच्छेलाल की ज़ुबान चिकनी हो गई थी।

"हे भगवान! कैसे आदमी से पाला पड़ा हमारा।‌  हमारी मांँ दो महीने पहले आईं थीं, ननकू के घर जाने के टाइम।"   उमा के स्वर में आए तीक्ष्ण बदलाव से, अच्छेलाल को आने वाले दिनों में अपना राशिफल साफ दिखने लगा।

"अम्माँ भी तो तीर्थ से कल-परसों आने वालीं हैं।" बेमतलब की बात अक्सर अच्छे के मुँह से फिसल ही जाती है। 
"तो... आएंगी तो हम क्या उनको रोक रहें हैं। आएं, रहें।‌ घर तो उनका ही है।‌  हमारी छाती पर मूँग दलने को तो  तुम्हारा पूरा खानदान है।" एक क्षण में ही अच्छे, बच्चे और अम्माँ सब दूसरे खानदान में आ गए।

माँ, मायके की ताक़त देखकर अच्छेलाल‌, खुद को मैदान के दोनों पालों के बीच लुढ़कती फुटबॉल सा अनुभव करने लगे।
सामने बरामदे में पिताजी की तस्वीर लगी थी।‌ रौबदार चेहरा, मूँछों की सघन‌ संरचना , आँखों से एक्स-रे निकाल लेने की क्षमता, फोटो से महसूस होती थी। ऐसा इंसान ही हमारी अम्माँ के साथ घर गृहस्थी करके, गाँव मोहल्ले के लिए काम करके, इतनी खेती-बाड़ी, घर जायदाद बनाकर दुनिया से गए। अच्छेलाल ने‌ अपने अच्छे, शांतिपूर्ण और आरामदायक जीवन का श्रेय पिताजी को देते हुए, उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

"पिताजी, आप सब कर पाए क्योंकि आपकी सास नहीं थी। दो-दो नाव पर सवार होना आसान नहीं है।" बड़बड़ाते हुए अच्छे कमरे में चले गए।

अगली दोपहरी अम्माँ वापस आ गईं। शाम तक उनसे मिलने, तीर्थयात्रा की जानकारी लेने के लिए लोग आते रहे। बिना दूध की, कम शक्कर की चाय पीकर, वे उमा के हैल्थी चाय को कोसते चले गए।
रात को अम्माँ के पैरों पर अच्छे ने तेल लगाया, पैर दबाया और अम्माँ ने आशीर्वादों की झड़ी लगा दी।‌ अच्छेलाल अपनी अम्माँ में  आए अप्रत्याशित बदलाव से अचंभे में पड़ गए।‌ आशीर्वादों की हर बूँद को समेटते कि उससे पहले अम्माँ बोल पड़ीं।

"तीर्थ कर आए हैं हम।‌ पूजा-पाठ करके गाँव के लोगों के लिए खाना-प्रसाद रखना है। अब किराएदारों ने किराया भी बढ़ा दिया है, अनाज तो हमारे खेतों का ही है।" अम्माँ ने स्थिर, शांत स्वर से कहा।
"हाँ- हाँ अम्माँ, जरुर करेंगे।" पिताजी की तस्वीर की ओर देखते हुए अच्छे ने फिर हाथ जोड़ लिए।

कमरे की देहरी में, नरसिंह अवतार सी खड़ी उमा को पार करने की कोशिश भी नहीं की अच्छे ने। 
भेदी दृष्टि से उमा ने उसे खंगाला, "कोई शादी-ब्याह कर रहे हो क्या? गाँव भर का खाना, मुँह उठाकर बोल दिए, दाल आटे का भाव मालूम है यहाँ किसी को?" अम्माँ की ओर अस्सी प्रतिशत इशारा था।

"हाँ हाँ, अपनी माँ को खिलाने के लिए असली घी का डिब्बा ले आई, तीर्थ प्रसाद के लिए तुम्हारी नानी मर रही है।" उमा का तीर सही निशाने पर लगा।
दालान‌ में बैठी अम्माँ को, रसोईघर में रखे असली घी के डिब्बे की भनक कैसे लगी, उमा इस विचार में डूबी और अच्छेलाल देहरी पार करके बिस्तर में घुस गए। 

कालचक्र की गति उस समय थम गई, जब उमा की माँ समय से पहले ,अपने सुपुत्र ननकू को ले पधार गईं।‌ 
"राम राम समधन, अब क्या करूँ मेरा मन आपकी तरह कठोर नहीं कि बाल-बच्चों को छोड़कर तीर्थ यात्रा कर लूँ। मुझे तो अपनी बेटी, नाती-नातिन से मिलने की जल्दी थी, सो ननकू को कहा कि पहुँचा दे।" एक क्षण समधन के चेहरे के भावों को ताड़ा और पैर छूने का अधूरा प्रयास करते हुए कहा, "जोग-संन्यास  की ना उम्र है हमारी ना ही कोई इच्छा।"

"सोलह साल सा श्रृंगार पटार बनाए घूमती हो, उसी में रमी रहो, भावभक्ति तुम्हारे बस की बात नहीं।" इतना उत्तर तो अपेक्षित था।

आज दो ध्रुव चलकर, अच्छेलाल के आँगन की विषुवत रेखा पर मिल रहे थे। विहंगम दृश्य, अलौकिक समय का अनुभव करने के लिए सारी प्रकृति दम साध कर खड़ी थी।
"आओ माँ! ननकू कहाँ रह गया?" अपने भाई को साथ ना देखकर उमा ऐसे घबरा गई जैसे ननकू पाँच साल का हो।

"रिक्शा के लिए चिल्लर करवा रहा है बाहर। पाँच सौ के नोट का खुला मिलना भी कठिन है इस गाँव में।" मुँह बनाकर अपने दामाद की ओर देखा उमा की माँ ने।
"मैं दे देता हूँ चिंता ना कीजिए।" अपने गाँव की लघुता को अपने अच्छे स्वभाव से छुपा लेने को मजबूर थे अच्छेलाल।
अच्छे ने जेब टटोली, सिक्कों के ढ़ेर में एक कड़कते नोट  के स्पर्श ने उनमें हिम्मत जगा दिया। 
बाहर रिक्शावाला व्याकुल हो रहा था, सामान रिक्शे से उतार ननकू कोने के पान ठेले पर छल्ले उड़ाते नज़र आए।
"कितना देना है भाई?" अच्छे ने पूछा।
"अच्छे बाबू, आपके घर के मेहमान थे सो ले आया। धूप दोपहरी में ऐसी सवारी कौन ढ़ोता है?" अपने नाम से परिचित किसी को देखकर अच्छे की नन्ही मूँछें फड़कने लगीं।‌ ननकू और अपनी सास की विस्तृत, सुगठित काया का ध्यान आते ही अच्छे ने पचास का कड़कता नोट रिक्शे वाले को दे दिया।
"ये लोग एक समय कम भी खाएं तो कुछ ना बिगड़ेगा अच्छे बाबू‌। यही हाल रहा तो यमदूत भी खींच ना सकेंगे।  एक पूरा बड़ा पैकेट समोसा कचौड़ी मिनटों में चट कर गए, नाक को सूँघने का भी समय ना दिया।" पसीना पोंछते हुए वह रिक्शा लेकर निकल गया।

दरवाजे पर पड़े सूटकेस, बैग का आकार, आने वालों की काया के अनुरूप था अतः अच्छे करीब घसीटते हुए ले जाने लगे।  
"प्रणाम जीजा।"  घुटनों को टच करने की रस्म अदा करके ननकू आँधी की तरह दरवाजे के अंदर समा गया। 
"मेहरारू की माँ का सामान ढो रहे हो बेटवा, ढोओ खूब ढोओ।"  अम्माँ शतरंज की बिसात पर एक चाल हार चुकीं थीं।
"अब का करें अम्माँ, ननकू सारा सामान बाहर छोड़ कर अपनी दीदी से मिलने भाग आए। क्या करते सामान बाहर छोड़ आते?" 

"दामाद जी, सुबह से चाय पीकर चले थे, दोपहरी हो गई, ननकू भूखा गया था। हम तो सह भी लिए उससे भूखा नहीं रहा जाता।" अपने सामान दामाद को ढोते देख, थोड़ी आत्मसंतुष्टि के साथ उमा की माँ बोली। 
"आओ आओ माँ, हम अभी गरम पूड़ियाँ तल देते हैं। आलू की सब्जी बनाए थे, आपको पसंद है ना।" उमा अपनी माँ का हाथ पकड़े घर के अंदर घुस गई।

अम्माँ तो पहले ही मोर्चा छोड़ अपने कमरे में चलीं गईं थीं। अच्छेलाल अपनी सास के भूखे रहने की सच्चाई की गहराई को, उस रिक्शे वाले  के आँखों देखी से  मापने लगे।

मैदान खाली देख अच्छेलाल ने भी मैदान छोड़ बाहर का रास्ता पकड़ लिया।‌
छुट्टन और हरिया से भी बात करने का मन नहीं था अच्छे का इसीलिए दोनों से बचते, गाँव के किनारे पर पीपल की चौपाल पर बैठ गए। 
पीपल की सरसराहट कानों में रस घोल रही थी। मंद बयार एक एक रोमछिद्र से घुसकर आत्मा तक को शीतल कर रही थी। पलकों को मींचे अच्छे, अपने घर के वर्तमान और भविष्य के बीच गोते लगाने लगे। 
"अच्छे भैया, हमने सुना है कि भौजी ब्यूटी पार्लर खोल रहीं हैं।" कुछ अंटर-पंटर जो छुटाए नहीं छोड़ते, हरिया उनमें से ही था।
कंधे पर गिरे बैताल की तरह उसके हाथ, अच्छे के हटाने से भी टस से मस ना हुए।
"का बक रहे हो बे, हमरी मेहरारू हमसे ना बताएगी, तुमसे कहेगी का?" बेवक्त, बेकार की बात सुनने के मूड में नहीं थे अच्छे आज।
गमछा को दूसरे कंधे में डाल, जरा पास चिपककर बैठते हुए हरिया ने कहा, "कल जमुनिया कह रही थी कि उमा भौजी, सजने संवरने का कोर्स करतीं हैं। वो जो गाँव की अँग्रेजी सकूल की मास्टरनी है ना, वही सिखाती है कहे।" हरिया और उसकी पत्नी ने कब उसके और उमा के बीच सेंध लगा ली, पता ही नहीं चला।
"बिना होली भांग खा लिए हो का हरिया, उल्टा-सीधा बके जा रहे हो।"  हरिया को डपट कर, बिना चाय पिलाए अच्छे कच्चे मन से, उस घर कहलाने वाली जगह पर वापस आ गए।

घर की दहलीज़ लांघी ही थी अच्छे ने की बस, "हाय राम! कैसी बेसरम दुनिया हो गई भगवान। पता होता ये दिन देखना है तो कभी ना आते तीर्थ से वापस, वहीं गंगा में प्राण त्याग देते।" अम्माँ के विलापी स्वरों से अच्छे की आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा।

"अम्माँ, ऐसा मत बोलो, ये घर द्वार सब तुम्हारा है, खेती - जमीन तुम्हारी, तुम काहे मरोगी जाकर। जो हमारी अम्माँ को दुःख दिया है वही जाएगा।" ब्यूटी पार्लर की बात को दिमाग से नहीं हटा पाए थे अच्छे।
अम्माँ ने एक लंबी सांँस ली, सास का सामान उठाने वाला बेटा, अब उनके लिए  सब कुछ करने को तैयार था। विजेता होने का गर्व छिपाती हुई अम्माँ ने बात पूरी की।

"बेटा, तुम्हारी मेहरारू कोई दूकान बना रही घर में, कहे कि लुगाइयों को सुंदर बनाएगी‌ लो भला, भगवान ने बनाया है अब ई का मुँह चमकाएगी।" अम्माँ का स्वर थर्मामीटर के पारे की तरह चढ़ा हुआ था।
"इनका नहीं बेटवा, इनकी माँ की सीख है सब। वही आग लगाय रहीं हैं। आखिर फसल तो वही होगी जो जमीन उगलेगी।" अम्माँ ने दनादन गोले दाग दिए।

"काहे उमा, तुमने सारे मोहल्ले को बताया कि तुम ब्यूटी पार्लर खोल रही हो, हमसे बताना ठीक नहीं समझा तुमने।  हम पति हैं तुम्हारे, क्यों छुपाया हमसे, कहो?" पिताजी की लटकती तस्वीर का कड़कपन आवाज़ में भरकर अच्छे ने उमा से पूछा। मूँछ तो बंजर में उगी विरल घास थी, सो अपने तेल लगे बालों पर बाल फेर लिया था अच्छे ने।

"अब देखो बाबू, आखिर कार बाप-दादा की जायदाद पर कब तक चलेगा। चार पैसों की आवक चाहिए, आप तो इस बात पर कभी विश्वास ही नहीं करते इसलिए हमने उमा को ब्यूटी पार्लर की सलाह दिया।" उमा की जगह उसकी माँ‌ ने प्रतिपक्ष संभालते हुए कहा, "ननकू की बहू भी करती है, रोज का दो-चार सौ कमा लेती है घर बैठे। हम उसी से सामान खरीदवा लाएं हैं।" मखमली जूता मार दिया था सामने खड़ी सास नाम की स्त्री ने।
"अभी तो कह रहीं थीं कि रिक्शा के लिए इस गांँव में पाँच सौ का खुला नहीं मिलता, ऐसे गांँव में मुँह चमकाने के लिए पैसा देगा कोई?" आज अच्छे ने अपने दिमाग का सही तरह से उपयोग किया।
"अब दुनिया तो तुमने देखी नहीं बाबू। आज औरतें खाना एक समय खाकर रह लेतीं हैं परंतु ब्यूटी पार्लर का नशा चढ़ जाए तो महीने में कम से कम एक बार तो आतीं ही आतीं हैं।" चारपाई पर अपने शरीर को किसी तरह रखते हुए उमा की माँ बोली।

"अब हमारे घर में अँगरेजी नियम कानून चलेगा भैय्या, बाहर के लोग बताएंगे कि घर गिरस्थी कैसे चलाई जाए।" अम्माँ ने अपने दिल पर हाथ रख लिया।

" वो जमुनिया घर घर से कपड़े लाती ले जाती है, छुट्टन की लुगाई खेती किसानी करती है, मास्टरनी पढ़ाती हैं और कमातीं हैं, हमारे घर में तो नून राई उतारने के लिए भी किराए का मुँह देखना पड़ता है...ऐसा पाठ हम अब ना सुनेंगे अम्माँ, हम भी चार पैसा कमाएंगे।" अपना फैसला सुना दिया था उमा ने। अब वो अपनी माँ के बैग, सूटकेस से अपने पार्लर के लिए लाए गए क्रीम की डिब्बियांँ, ब्रश, कंघी के अलग-अलग नमूने, पिन और ना जाने क्या-क्या निकाल कर चहकने लगी थी।

शुभ मुहूर्त तो भेदभाव नहीं करता। अम्माँ के पूजा की तिथि और ब्यूटी पार्लर के शुभारंभ का दिन, समान आया। कथा पूजा दोपहर को और शाम को ब्यूटी पार्लर का फीता काटने का कार्यक्रम रखा था।
सामने के कोने में पड़े कबाड़ से कमरे को उमा और उसकी माँ ने आसपास की औरतों के साथ मिलकर चमका दिया। औरतें तो इतनी मुस्तैदी से जुटीं थीं मानो उमा का पार्लर अमावस को पूर्णिमा में बदलने की गारंटी है।

"पंडित,पूजा का दान दक्षिणा तो जमा लिया मां-बेटे ने, हमने ब्यूटी पार्लर का फीता काटने के लिए मीरा बहन जी को बुलाया है। बड़े बड़े लोगों से जान-पहचान है उनकी, वो आएंगी तो हमारी नाक ऊँची हो जाएगी।" जरा इधर-उधर देखकर उमा फुसफुसाई, "हज़ार रुपया में मना लिया है वैसे तो लोगों से दो हज़ार लेतीं हैं बहन जी, परंतु हमने चुनाव में भागदौड़ की थी सो उन्होंने कनसेशन कर दिया है।" 

"फीता काटने के हज़ार रूपए!" अच्छे की पुतलियों के फैलाव ने हज़ार रुपए का बड़प्पन जाहिर कर दिया।
"हम ही काट देते हैं फीता।" अच्छे भड़क गए।
"अभी तक तो अपनी अम्मांँ से नाड़ा बँधवाते हो, हमारे पार्लर का फीता काटने चले, हुँह।" छुरी से पैनी ज़ुबान से अच्छे की बात के पुर्ज़े पुर्ज़े  कर फेंक दिया उमा ने।

"यहाँ भी हमारी अम्माँ को ला ही लिया, शांति पड़ गई।" अच्छे भनभनाए।
"माँ तो हमारी ही काम आ रही हमें, हज़ार रुपए भी वही दे देंगी, दहेज की किस्त समझ कर।" मुँह चढ़ाकर उमा बोली।

"दहेज के नाम पर एक साइकिल ना मिली थी तुम्हारे मायके से, अब दहेज देंगे। घर खर्च के नाम पर जो लेती हो किराए से, उसमें से कितने नोट आलमारी के कागज के नीचे दफना रखी हो, सब मालूम है हमको।" कहता हुआ अच्छे अपने किराएदारों से, अपनी जरूरतों का ब्यौरा देने चल पड़ा।
"किराया वसूलते ही पूजा का  सामान, पंडित जी की दक्षिणा अलग रख देना, नहीं तो इस घर में सब स्वाहा हो जाए।" जाते जाते अम्माँ ने पीछे से नोटिस चिपका ही दिया।

जोर-शोर से तैयारी चालू थी, दोनों मोर्चों के बीच अच्छे कन्हैया सी बाँसुरी बजाते रहते। उमा ने बच्चों और खुद के लिए कपड़े भी बनवा लिए, चेहरा तो वैसे भी माँ और भाई के रहने से चमक ही रहा था उसका।

"मीरा बहन जी के साथ फोटो वाले भी आते हैं। ये जो सिर पर कुचली घास चिपकाए फिरते हो, शैंपू करके खड़ी कर लेना। सारी दुनिया का तेल पिलाते हो इनको, तेल चुपड़ा सिर लिए  हमारे साथ तो फोटो में आना ही मत। ब्यूटी पार्लर का शुभारंभ है तेल की दूकान का नहीं।" अच्छे समझ ही नहीं सका कि दुनिया में तेल कब से इतना बुरा हो गया कि फोटो में नहीं समाता है।

शुभ दिन, शुभ मुहूर्त पर पंडित जी ने पूजा संपन्न कराई। ग्यारह सौ रुपयों में सात पीढ़ियों तक तीर्थ का पुण्य ढोकर पहुँचा आए पंडित जी। खीर पूड़ी का प्रसाद, छककर खाए लोग। 

"पंडितजी, अब लगे हाथों ब्यूटी पार्लर का भी शुद्धिकरण कर दीजिए मंत्रोच्चार से।" ना जाने उमा ने पंडित के कान के पास कौन सा मंत्र पढ़ा कि सौ रूपयों के लिए अटक जाने वाले पंडित जी ने खुशी से उस कमरे की पूजा भी कर दी।

"शाम को भेज दीजिएगा पंडिताइन को, आइ ब्रो फ्री करेंगे उद्घाटन का दिन है।" उमा ने गर्व से कहा।
पूजा में तो गिन गिनाकर सात स्त्रियांं पधारीं थीं शाम को तो तांता ही लग गया। ऐसे जुटीं थीं सब की सब मानो उनका ही पार्लर हो।

"यह समोसा, गुलाब जामुन और चाय, इतना तामझाम।" अच्छे इस बहती गंगा का उद्गम जानना चाहते थे।
"सारा साज-संभाल तुम्हारे दोस्तों की पत्नियों ने ही किया है। मुन्ना भैया वाली भौजी ने नाश्ता भिजवाया, बिहारी की बहू ने हार फूल सजा गई। हमें तो स्पांसर मिल गए, तुमसे तो हज़ार रुपए भी ना निकले।" जो मुन्ना एक कप चाय पिलाने के पहले पैसे और जेब का वजन तौलता है उसकी घरवाली ने इतना सब दे दिया, ना जाने कौन सी छड़ी फेर आई उमा। 

"ज़्यादा भौंहों पर तान ना दो, सबको छह महीने बाल काटने, आइ ब्रो और बाल पर तेल मालिश फ्री रखा है हमने। कोई तुम्हारे नाम से नहीं कर रहीं फोकट में।"  कहते हुए मीरा बहन जी के स्वागत के लिए उमा आगे निकल गई।

बाल में तेल के दो-दो पहलू, कुछ समझ नहीं पा रहा था अच्छे। अपने बालों पर हाथ फेरने लगा तो बिना तेल के रूखे काँटों से हथेली छिलने लगी।

"मीरा बहन जी ज़िंदाबाद, मीरा बहन जी ज़िंदाबाद।" के नारे लगाते, हाथों में फूल माला, गुलदस्ता लिए उमा सखियों संग स्वागत कर रही थी।

अच्छेलाल ने भी अपने कदम आगे बढ़ाए।
" अरे ओ भाई, कहाँ घुसे जा रहे हो। देखते नहीं मीरा बहन जी के साथ सभी महिलाओं की फोटो ले रहें हैं, बीच में मत आओ।" उसे करीब धकेल ही दिया फोटो वाले ने।

फीता काटने के समय उमा, उसकी माँ, सब औरतें मीरा बहन जी से चिपकी पड़ रहीं थीं। 
"अरे, ये क्या?" अच्छेलाल ने आँखों को मसला, पलक झपकाई और देखा, सफेद सुनहरी किनारे की साड़ी पहने अम्माँ, समधन के साथ खड़ी पोज़ दे रहीं थीं। आज उनके बालों की सफेदी गायब देख अच्छे को उमा के व्यवहारिक ज्ञान पर पूरा भरोसा हो गया।

नारियों के विराट स्वरूप को देखकर अच्छेलाल, जीवन के कुरूक्षेत्र में खुद को अकेला और निहत्था पा रहे थे। 

कार्यक्रम के खत्म होते तक, फोटो वाले के किसी भी फ्रेम में वो फिट नहीं हुए।


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शर्मिला चौहान

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