"दो पाटन के बीच में"
किराएदारों से बढ़ा किराया आने लगा और अच्छेलाल के अच्छे दिन आ गए। जेब की गर्म हवा ने रिश्तों को पिघलाना शुरू कर दिया। उमा अपनी पायल छनकाती, घर के आँगन में ठुमकती चलती। अम्माँ को रेशमी साड़ी तो नहीं परंतु माधोपुर के लोगों के साथ तीर्थयात्रा पर भेजकर अच्छे ने सपूत होने की गारंटी दे दी थी। बच्चों को अँग्रेजी स्कूल में भर्ती करके, आजकल अब अपने करने के लिए कुछ बढ़िया सा सोच रहे थे अच्छे।
वैसे शहर की स्वच्छंद हवा, अच्छे के नाज़ुक फेफड़ों को रास आ गई थी, अब कभी-कभार वकील साहब की फटफटी की पिछली सीट उनके लिए रिजर्व रहती। पेट्रोल का आधा पैसा मिलने पर वकील साहब जब कहो तब सवारी लेकर दरवाजे पर हाज़िर।
बसंत की फगुनाहट लिए, मत्त चुनावी हवा सारे देश में सरसराने लगी। बरसाती मेंढ़कों की तरह मुहल्ला छाप नेताओं और उनके चमचों के टरटराने का स्वर माधोपुर में भी गूँजने लगा।
पिताजी के खून में बहने वाली सेवा भावना, देशप्रेम अच्छे के हृदय में हिलोरें लेने लगीं।
"अरे सुन बे मुन्ना, कौन पार्टी बढ़िया है हमारे लिए?" टपरी पर चाय सुड़कते हुए अच्छे ने जानकर मुन्ना से पूछा।
"अच्छे भैया, समोसा पार्टी, कचौड़ी पार्टी, पकौड़ा चाय पार्टी यही तो आपके फेवरेट हैं। क्या काकटेल पार्टी का सोच रहें हैं आजकल?" कुछ अँग्रेजी बोलने वाले ग्राहकों से मिली जानकारी मुन्ना ने अच्छे को दी। शहर की हवा अच्छे भैया को सुहाने लगी है, मन ही मन मुन्ना सोचने लगा।
"चाय बेचने वाले देश चलाने लगे पर तुम तो मुन्ना टपरी पर बैठ ज़िंदगी भर पकौड़े छानते रहो। अरे, हम तो देशसेवा के लिए चुनावी पार्टी का पूछ रहे हैं।" चाय के गरम कप से अपनी हथेलियाँ सेंकते हुए अच्छे, खुद को सफेद कुर्ता पायजामा, हॉफ जैकेट और हाथों में झंड़ा लिए अनुभूत करने लगे।
"अरे भैया, ये चुनाव-वुनाव हम आपके समान लोगों के लिए नहीं है। बड़े लोगों का काम है।" मुन्ना का 'अपने समान' कहना अच्छे को कुछ भाया नहीं।
"अच्छे भैया, आपको जाना है तो जाओ। पाठशाला के पीछे बड़े हॉल में एक पार्टी का आफिस खुला है कल मंगल काका कह रहे थे।" मुन्ना ने बात खत्म भी नहीं की थी कि अच्छेलाल निकल पड़े।
हॉल के बाहर से ही चुनावी गर्मी की आँच अच्छे की ऊर्जा बढ़ाने लगी।
"कौन है रे, खड़ा खड़ा का देख रहा है। सारे बैनर, पोस्टर उठाकर अंदर ले आ।" ऊँचे कद-काठी का, गंजा, पहलवान नुमा, श्यामल रंग का आदमी, जिसके गले में मोटी सी सोने की चैन झूल रही थी, गुर्राया।
"हम कोई नौकर नहीं हैं, हम तो पार्टी के सदस्य बनने आए हैं।" अपने तेल चुपड़े बालों पर अंगुलियांँ फिराते हुए अच्छे ने उत्तर दिया।
"पार्टी का सदस्य बनकर, बिना काम किए रोज पचास रूपया और समोसा कचौड़ी का भोग लगाने आए हो।" पहलवान की छोटी आँखें पिचकते गुब्बारे की तरह और छोटी हो गई।
"हम देशसेवा करने आएं हैं पचास रुपए और समोसा खाने नहीं। हम तो खुद ही अपने दोस्तों को पाँच-पचास का चाय-पानी कराते हैं रोज।" अच्छे के चेहरे पर वीर योद्धा की तमक थी।
"अबे ये कौन से चिड़ियाघर से आया है रे, साथ देशसेवा भी उठा लाया है।" पहलवान के हँसने से उसके कमीज़ में फंसी तोंद उछलने लगी।
"चल आजा, हम तुम मिलकर देशसेवा करते हैं। अपना नाम बता और देश की सेवा में लग जा।" अपना नाम लिखाकर अच्छेलाल हॉल के अंदर पहुँच गए ।
आधा माधोपुर जैसे उस हॉल में ठूंँसा पड़ा था। सबके सब चाय सुड़क रहे थे।
"अरे अच्छे भैया, आप यहाँ?" हरिया चिल्लाया।
"ऐ..लो. हरिया, छुट्टन, मंगल काका सब यहाँ हैं भाई। हमने तो सोचा हमें ही देशसेवा का रोग लगा है, यहाँ तो सारा गाँव बीमार है।" अपने साथियों को देखकर सूरज की नवल किरणों से, खिलते कमल की तरह अच्छे का मुखमंडल खिल उठा।
"तुम भी अच्छे भैया, देशसेवा का पंछी सिर्फ चुनाव तक पेड़ पर बैठता है, चुनाव खत्म और पंछी फुर्ररर। हम तो पचास रुपए, दो टाइम चाय-नाश्ता के लिए यहाँ आए हैं।" हरिया का सीधा सरल, सच्चा जवाब अच्छेलाल को अच्छा ना लगा।
"नहीं-नहीं, भाई हम तो पचास रुपए ना लेंगे। दिल लगाकर देशसेवा करेंगे आखिर हमारे पिताजी ने अपने प्रयासों से गाँव में सरकारी स्कूल खुलवाया था।" सामने दिखती पाठशाला की ओर इंगित करते अच्छे की छाती छप्पन इंच की हो गई।
सामने पड़े बैनर पर कुर्ता पायजामा, हॉफ जैकेट, सिर पर पगड़ी पहने, घनी लंबी मूँछों वाले चौधरी जी हाथ जोड़े नज़र आए। बाजू में एक भैंस की तस्वीर थी।
"यही तो उम्मीदवार हैं अच्छे भैया, चौधरी जी। पहले बड़ी पार्टी में रहे, इस बार अकेले ही चुनाव लड़ रहे हैं। किसानों के देवता हैं सो चुनाव चिन्ह भैंसिया रख लिए।" छुट्टन ने राजनीति की पूड़ियाँ कुछ ज़्यादा ही छानी थी।
"अपने गाँव में तो कभी आए नहीं चौधरी जी।" अच्छे ने अपने दिमाग की घंटी बजाने की पुरजोर कोशिश की।
"अरे भाई! बड़े नेता हैं काफी बड़ा क्षेत्र होता है अब सब गाँव थोड़े जा पातें हैं।" मंगल काका ने अपनी बुद्धि का तड़का मारा।
"आज कितने लोग हैं रे?" पहलवान दहाड़ा।
"आज तो पचास हो गए बाबू!" छुट्टन की गिनती हो गई थी।
"बाबू काहे कहा बे! हम का दो-चार हजार के लिए ज़िन्दगी भर कलम घिसने वाले दिखतें है तुमको ? हम नेताजी के दाएं हाथ हैं, हमारे बिना उनका कोई काम नहीं होता।" अपने कुछ हल्की, बड़ी मुश्किल से ऊंँचक कर दुनिया को झांकने का प्रयास करती, मूँछों पर अँगुलियां फेरता पहलवान बोला।
दो-चार दिनों में अच्छेलाल को, अलग-अलग गाँव, शहरों से आए मेंढ़कों की टरटराहट सुनने का अवसर मिला। सब एक स्वर में राग अलापते।
देशसेवा का सैलाब अच्छे के घर आ गया था।
"ये क्या कचरा पट्टी घर पर ले आ रहे हो?" अच्छे को रिक्शे से बैनर, पोस्टर घर के सामने उतारते देख उमा भड़क गई।
"चार तक पढ़ी हो परंतु रही जाहिल की जाहिल। देखती नहीं बैनर और पोस्टर हैं हम चौधरी जी के प्रचार में व्यस्त हैं। किसानों के नेता हैं, गाँव के लिए अच्छा करेंगे।" बैनर और पोस्टर बरामदे में पहुँचे।
वहाँ तो पहले ही बैनरों और पोस्टरों की भारी भीड़ जमा थी। अच्छे ने देखा, एक लड़की किताब पढ़ रही है और बाजू में एक महिला लाल किनारी की सफेद साड़ी पहने, आँखों में काली फ्रेम का चश्मा लगाए, हाथों को छाती पर बाँधे खड़ी है।
"हम और सारी महिलाएंँ, महिला मुक्ति, अधिकार के लिए लड़ने वाली सोना दीदी के साथ हैं। देखते नहीं, किताब पढ़ती लड़की का चिंह है उनका।" अच्छेलाल की प्रश्न सूचक दृष्टि को उत्तर मिल गया था।
घर का बरामदा युद्धक्षेत्र बन गया, दो शत्रु आमने-सामने अपने अपने अस्त्र शस्त्रों से लैस खड़े हो गए।
"यह लो, अब एक एक ओर अपना अपना सामान रखो।" दस साल के दीपू ने चॉक से बरामदे के बीचोंबीच लकीर खींच दी।
"अम्माँ, आज दोपहर बाद से कुछ खाया नहीं है भूख लगी है।" छोटी गोपी ने उमा का आँचल पकड़ लिया।
"बिटिया, कुछ दिनों की बात है धीरज रखो। ये जीत जाएंगी तो तुम खूब पढ़ोगी, नौकरी करोगी। हमारे जैसे चूल्हे में ना पड़ी रहोगी।" बेचारी बच्ची को यही समझ में आया कि आज अम्माँ ने हड़ताल कर दी है।
"अब दिनभर पार्टी का काम करें और शाम को तुम्हारा भाषण पचाएँ का?" अच्छे ने चौधरी जी के पोस्टर को किनारे रखते हुए उनकी घनी मूँछों को स्पर्श कर लिया था।
"अपनी पार्टी से कहो कि रात का भी खाना बाँध दे।" अपनी साथी महिलाओं की सूची बनाते हुए उमा बोली।
दोनों बच्चे दादी के कमरे में जाकर सो गए थे। आज रात आराम के खुर्राटों की जगह, चार खाली पेटों के कुलबुलाहट घर की दीवारें सुन रहीं थीं।
भूखे भजन ना होय गोपाला और बस बच्चों ने माता-पिता से भी जल्दी राजनीति सीख ली। वो कभी मूँछ वाले चौधरी के पोस्टर की तारीफ करते तो कभी किताब पढ़ती लड़की के पोस्टर को सुंदर बताते। गिरगिट की तरह रंग बदलकर, दोनों खेमों से जलेबी समोसे और चाकलेट के पैसे वसूलने लगे।
उमा की ज़ुबान पर सरस्वती के निवास होने की गारंटी थी और घर घर जाकर सोना दीदी के निशान पर मुहर लगाने के लिए महिलाओं को राजी करने के काम का प्रतिनिधित्व उसे मिला। अच्छेलाल भी दिलोजान से चौधरी जी की विरदावली गाते थे।
औरतें तो खुली हवा में साँस लेते हुए, चुनावी खेमे से मिले सौ-पचास रुपयों से मेकअप का सामान और घर की जरूरतें पूरी करतीं परंतु आदमियों की शाम देसी ठेके पर बीतने लगी। मुन्ना तो सेठ मुन्ना बन गया, दो अस्सिटेंट रख लिए थे उसने। माधोपुर के घर घर में चुनावी पार्टियांँ, मुन्ना के बने समोसे कचौड़ी की पार्टियांँ देती थीं। चुनाव का असली लुत्फ़ मुन्ना उठा रहा था।
"अम्माँ, टीचर ने प्रोजेक्ट के लिए चार्ट बनाने कहा है।" दीपू और गोपी, उमा के सामने पुस्तक लेकर खड़े थे।
"तुम्हारी टीचर अपना काम हमारे पर ढकेल देती है। जो बनाना है खुद बनाकर ले जाओ ना। लो दस रूपए और पीछा छोड़ो हमारा।" अपने पल्ले में बँधा दस का नोट बच्चों को देकर उमा ने अपना पल्ला झाड़ लिया।
दूकान में चार्ट पेपर तो मिला नहीं, हाँ चाकलेट जरूर मिल गई और दस के नोट को ठिकाना।
"चौधरी जी का पोस्टर तो घर की छत पर लगेगा।" दीवार पर सोना दीदी का पोस्टर देख अच्छे ने मूँछ ऐंठते चौधरी जी का पोस्टर छत पर लगा दिया।
घर की दीवारें और छत तो बैनर पोस्टरों से रंग गईं, परंतु घर के लोगों का दिल बेरंग हो गए।
आए दिन अच्छे के घर का आँगन गुलज़ार होता। कार्ड्स, झंड़े, बैनर बनाने का काम इस बड़े खुले आंगन में खूब आराम से होता और दिनभर चाय-पानी की महफ़िल जमती।
"हमारे घर के आंगन में कितने चुनावी कुकुरमुत्ते उग आएं हैं। " उमा ने शाम को घर में घुसते हुए कहा।
"हमारे देशभक्त, सेवा करने वाले चुनावी मित्र तुम्हें कुकुरमुत्ते लगते हैं। दिनभर मक्खियों की तरह भिनभिनाती तुम्हारी सहेलियों को देखा, घर घर घुसती हो।" अच्छे को अपने ही घर में अपने मित्रों की बेइज्जती हज़म नहीं हुई।
बच्चों की परीक्षाएं सिर पर थी और देश में चुनाव। अच्छे और उमा ने देशभक्ति का परिचय दिया और चुनाव पर केंद्रित हो गए।
"मैंने तो आज भूगोल की पढ़ाई की है, परीक्षा में विज्ञान कैसे आ गया?" दीपू ने खड़े होकर टीचर से पूछा।
"तुम्हारा जो मन हो पढ़ आया करो, जिस दिन जो परीक्षा है वही होगी ना।" टीचर ने आँखें तरेरी।
स्कूल में भी चुनावी हवा ने कब्ज़ा कर रखा था। अँग्रेजी और गणित के टीचरों को तो स्कूल आने के पहले ही चुनावी खेमें उड़ा ले जाते। आखिरकार अँग्रेजी में जयकार लगवाने से कोई पार्टी पीछे कैसे हटती? टीचरों की मजदूरी रेट अलग था आखिर वे शिक्षा की मशाल जलाने वाले वर्ग थे। भाषा, सामाजिक अध्ययन के टीचर स्कूल संभाल रहे थे। चपरासी भी नज़रें बचाकर चुनावी पार्टियों की पार्टियों में मुँह मार आते।
उमा, सोना दीदी के द्वारा दी साड़ी पहनकर सारे मुहल्ले उनका यशोगान करती फिरती और अच्छेलाल अपने किराएदारों से एडवांस लेकर सारे देशभक्त चुनावी मित्रों के खान-पान, बीड़ी सिगरेट के लिए फौरन अपनी जेब में हाथ डाल देते।
लाउड स्पीकरों पर बजते देशभक्ति के गीत कब अपना रूप बदलकर, शीला की जवानी और चिकनी चमेली पर फिसलने लगते, पता ही नहीं चलता।
अंतिम सप्ताह में तो उमा और अच्छे ने जी-जान झोंक दिया।
मतदान के दिन सुबह स्नान ध्यान करके पति-पत्नी ने अपने अपने नेता के विजय की कामना की।
"अम्माँ, इस बार हमारी परीक्षा के दिन भी हमको दही शक्कर नहीं खिलाया आपने, ना भगवान जी से हमारे लिए प्रार्थना की।" दीपू और गोपी ने अपने पेपर खराब होने का कारण जान लिया था।
"तुम्हारे लिए तो कितना भी किया, कम ही रहेगा।" तमकती उमा अपनी सहेलियों के साथ बाहर निकल गई।
दिनभर लोगों को रिक्शा, ऑटो रिक्शा में ले जाने वाले दल तैयार खड़े थे। घरों से निकलते लोगों को बाज की तरह झपटकर अपनी गाड़ियों में ठूँस कर ले जाते।
रात अच्छेलाल और उमा के खर्राटों से लगा कि बेटी की विदाई के बाद की थकान निकाल रहें हैं।
चुनाव परिणामों और बच्चों के स्कूल के रिजल्ट का एक ही मुहूर्त हुआ।
सियासी अंडों से निकले दोनों चूजे राजनीति की कुकड़ू-कूँ करने चले। सज धज कर उमा दोनों बच्चों को ले स्कूल चली और अच्छेलाल पार्टी के आफिस में लगे टेलीविजन पर, मित्रों के साथ बैठकर घोषित होते परिणामों को पर थम साध रहे थे।
"दुनिया देश की चिंता के बजाय अपने बच्चों की परीक्षाओं की चिंता कर लेते तो पास हो गए होते। ना किसी प्रोजेक्ट का काम, ना विषयों की मौखिक परीक्षाओं में आए और तो और किसी एक विषय में तो दूसरे विषय के उत्तर लिख गए। ऐसे ही पेरेंट्स स्कूल का नाम खराब करते हैं।" टीचर और हेडमास्टर ने एक उपेक्षा की दृष्टि डाली और पास हुए बच्चों के माता-पिता को बधाई देने लगे।
वासंती हवा की सरसराहट में, बैसाख की गर्माहट महसूस होने लगी थी। मौसम ने मतदाताओं के बदलते तेवर को चख लिया था।
शाम को दोनों चुनावी पार्टी आफिस में ताला पड़ गया था। पचास रुपए रोज वाले मेंढ़क, आज पचीस रुपए में तीसरी विजेता पार्टी के जुलूस में टर्रा रहे थे।
छत पर चौधरी जी मौसम की गर्म हवा से चारों खाने चित्त पड़े थे। दीवारों, आँगन, बरामदे में कटे-फटे बैनर, पेपर के टुकड़े अच्छेलाल के दिल का हाल बयां कर रहे थे।
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शर्मिला चौहान
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