"लोफर"
स्टेशन चौक की भीड़ का एक जाना पहचाना चेहरा था वह। वेशभूषा ऐसी की असली नाम क्या था, वह शायद खुद भी भूल गया है, "लोफर" की ध्वनि ही उसका प्रतिनिधित्व करती थी।
बड़े-बड़े नमूने की शर्ट, ऊपर की दो-तीन खुली बटन उसकी पसलियों की गिनती के लिए हमेशा खुली रहतीं। पैसों की बचत या हिप्पियों के जीवन-दर्शन का प्रभाव था कि लंबे बालों को एक रबर बैंड से बाँधें रखता। शरीर के अधोभाग में बेलबाॅटम और पैर की चप्पल हमेशा कोल्हापुरी। अंगुलियों में एक सिगरेट फंसी होती, न..न.. सिगरेट जलती नहीं थी सिर्फ हाथ की शोभा बढ़ाने के लिए कई कई दिनों एक ही सिगरेट अंगुलियों बीच सजी रहती।
अजीब सा था, ज्यादातर चुप रहता और जब कभी बोलता तो सीधी सपाट, जलीकटी बातें। स्टेशन के माल धक्के में ठेला गाड़ी से सामान ढ़ोता था, दिन में एक दो बार फेरी की और अपनी गाड़ी किसी और के सुपुर्द कर निकल जाता। चौक पर खाने-पीने का इंतजाम करता और फिर यूँ ही रात तक सड़कों पर भटक कर, फिल्मी गानों पर सीटी बजाते थक जाता तो कहीं किनारे सो लेता। अपने साथ साथ, सड़क पर गुज़र बसर करने वाले कुछ बुजुर्गों के पेट भरने का भी ठेका उठा रखा था उसने। एक पतली शाल, हमेशा गले से झूलती रहती, जो हर मौसम ओढ़ने के काम की थी।
स्टेशन चौक से चार-पाँच किलोमीटर तक वह अपनी लोफराई के लिए जाना जाता। किसी भी दूकान या खाने की सड़क छाप होटल तो मानो उसे दहेज में मिली थी। जो खाना हो, बिना बोले निकाल लेता और जितना मन हो पैसे रखकर निकल जाता। मुफ्त का नहीं, अपनी मर्जी के पैसे देता जरुर था।
कभी किसी से पंगा लेता नहीं था परंतु किसी का अन्याय सहना भी पसंद नहीं था उसे। सड़कछाप हीरो ही था वो।
पानठेले पर की भीड़ से थोड़ा हटकर बैठा, आते जाते लोगों को घूरा करता। महिलाओं और लड़कियों के लिए अपशब्द, किसी भी प्रकार की छींटाकशी उससे बर्दाश्त नहीं होती थी इसलिए औरतें उसज्ञपर विश्वास और प्रेम करतीं थीं।
सड़क किनारे सोने वालों के बीच भी रिश्ते बन जाते हैं, पर उसने कोई रिश्ता पाला नहीं या पालने से बचता था। आज किसी किनारे तो कल किसी और जगह सो जाता। रिश्तों के नए धागे जोड़ने की उसकी लेशमात्र भी इच्छा नहीं थी शायद।
बहुत से साथी रात को अपनी बिछावन पर लेटकर दुनिया भर की बातें, अपने अतीत को याद किया करते और लोफर अपनी सेज उनसे दूर कर सीटी बजाता गाने गाते हुए सो जाता।
सड़क किनारे के इस परिवार में, कुछ दिनों पहले एक औरत ने अपनी आठ-नौ साल की बेटी के साथ प्रवेश लिया। उसने कुछ रातें सड़क के किनारे सोकर गुजारने का निर्णय यूँ ही नहीं लिया होगा परंतु किसी के घावों को कुरेदने की प्रथा, सड़कों पर भी कम नहीं है।
"ऐ.. नाम क्या है तेरा?" साठ साल की झमिया बुड्ढी ने उसे घूरते हुए कहा।
"बस..! कुछ दिनों यहाँ सोने की जगह मिल जाए तो मैं मेहनत मजदूरी करके, सिर छिपाने का प्रबंध कर लूंगी।" उस औरत ने नाम बताने की जगह एक प्रार्थना कर दी।
"अरे..! नाम तो बता नहीं रही, साथ ये छोरी कौन है?" शंकर दादा ने औरत से पूछा।
"मेरी बेटी है।" उस औरत का छोटा सा उत्तर।
"कुछ तेरा पता ठिकाना मालूम नहीं, कैसे अपनी सड़क पर तेरे कू जगह देंगे ?" शंकर दादा ने ऐसे कहा जैसे सड़क उसके पूर्वजों की धरोहर हो।
"हम सब भाड़ा देते हैं यहाँ सोने का! तेरे पास है भाड़ा के लिए नोट?" झमिया बुड्ढी की जुबान झमक रही थी।
"मैं काम करुंगी, कोई भी काम। स्टेशन पर सामान उठाने, साफ-सफाई करने, हॉटल में बरतन उठाकर साफ करने का, कोई भी काम करुंगी। बस .. मुझे मेरी बेटी के साथ यहाँ थोड़ी जगह दे दो।" उस औरत ने रुआंसी होकर कहा।
सड़क के दूसरे किनारे पर वड़ा-पाव खाता हुआ लोफर रुक गया। हाथ का बचा हुआ वड़ा-पाव पैर के पास बैठे कुत्ते ( जिसको वो साहब बुलाता था) के सामने डाल दिया और सड़क के इस पार आ गया।
लोफर के आने की सुगबुगाहट हुई और लोफर ने शंकर दादा सारी हेकड़ी, अपनी धारदार जुबान से निकाल दी।
अब उस औरत, जिसका नाम बासंती था, अपनी बेटी पायल के साथ एक ओर बैठकर, अपने इकलौते बैग से सामान निकालने लगी। बच्ची ने भी अपने पीठ पर लदे बैग को खोलकर, पानी की बोतल से पानी पीने लगी।
सड़क किनारे रहने वालों के लिए इतनी सुंदर, जवान औरत का उनके बीच रहना, सपना ही था। बासंती का पहनावा, रहने का सलीका और बातचीत का अंदाज औरों जैसा नहीं था। सूती के सादे कपड़ों से पूर्णतया शरीर को ढांकें रखती, मध्यम स्वर में और नपा तुला बोलती थी। पायल को हर वक्त साथ रखती।
स्टेशन के साफ सफाई करने वालों में से एक जगह खाली थी जहाँ बासंती को काम मिल गया। पायल भी पूरे दिन उसके पीछे-पीछे रहती और कचरा उठाने में मदद करती।
"अपने साथ इस बच्ची को काम में क्यों लगाती है? थोड़ी बहुत पढ़ी लिखी तो लगती है फिर बच्ची को स्कूल क्यों नहीं भेजती?" कभी ठीक से बात नहीं करने वाले लोफर ने एक दिन बासंती से पूछा।
"मैं स्कूल जाती थी अंकल, मेरे पास अभी भी स्कूल के पानी की बोतल है।" प्रश्न का उत्तर मां की जगह बेटी ने दिया।
"जब मैं थोड़ा संभल जाऊंगी, इसे फिर से पढ़ाऊंगी। एक साल तो लगता है ना किसी को संभलने में!" बासंती ने लोफर की ओर देखकर कहा और पायल का हाथ थामे चली गई।
गर्मियों की उमस बढ़ गई थी और मेघ मंडराने लगे थे। तेज आंँधियाँ जैसे घाघरा घुमाती पूरी धरती पर नृत्य करने लगीं। आकुल धरा की तपन को शांत करने के लिए मेघ भी लालायित हो रहे थे।
सड़क किनारे बसेरा लगाए लोगों के लिए, यह समय सिर पर छत ढूँढने का होता है। होटलों के बाहर का शैड, बस-स्टाॅप की बैंचें, रेल्वे स्टेशन के बाहर आटो स्टैंड पर की जगह और जहां कहीं इस पानी की मार से बचा जा सके, ऐसी सभी जगह को पहले हथियाने का प्रयास जारी रहता है।
सड़क किनारे के सभी अपना चौमासा बिताने के इंतजाम में लग गए थे परन्तु बासंती को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह अब कहाँ जाए? उसे बात समझ आती तब तक तो औरों ने अपनी गृहस्थी सुरक्षित जगहों पर बसा ली।
"मौसी, मेरा भी इंतज़ाम कर लो अपने साथ, इस बच्ची को लेकर बारिश में कहाँ रहूँगी।" बासंती ने झमिया मौसी से चिरौरी की।
"अरे, मुझे ही एक बिस्तर की जगह मिल पाई है, औरतों के आश्रम के बरामदे में। वहाँ तो अब बिल्कुल जगह नहीं बची।" कहते हुए झमिया मौसी भी सड़क किनारे की जगह छोड़ गई।
"इसी जगह के लिए कितने झगड़े होते थे और अब चार महीनों के लिए यह मुक्त रहेगी।" मन ही मन बासंती को लोगों के बदलते रंग पर हँसी आ गई।
"रहने का इंतजाम नहीं हुआ इसलिए हँस रही है क्या?" लोफर की आवाज़ से बासंती संयत हो गई।
"नहीं।" छोटा सा उत्तर था बासंती का।
"सोच रहीं हूँ कि बरसात में कैसे और कहाँ रहूँ? मैं तो तकलीफ़ झेल भी लूँगी, पायल तो बहुत छोटी है कैसे रह पाएगी?" माँ का मातृत्व आँखों से बहने लगा।
आसपास के सभी अपने ठिकानों पर चले गए थे और वो सड़क पर खड़ी अपना ठिकाना ढूंढ रही थी। अचानक तेज हवा चलने लगी और काले बादलों ने बूंदाबांदी शुरू कर दी।
"मेरे साथ चलेगी, एक जगह है।" लोफर के मुँह से प्रस्ताव सुनकर बासंती सोच में पड़ गई।
"यहाँ सड़क में भीगकर, ठिठुर कर मरने से अच्छा है कि मेरे साथ चल। तेरे और तेरी बेटी की सुरक्षा की गारंटी है मेरी।" मरती क्या ना करती, बासंती के पास उस पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
सामान उठाकर, पायल का हाथ पकड़े लोफर के पीछे चल पड़ी।
"बस स्टैंड पर क्यों आए हैं?" बसों को देख बासंती ने पूछा।
"दूसरे शहर जाना है।" कहता हुआ लोफर जेब के पैसों से टिकट लेने लगा।
"मेरे पास पैसे हैं।" बासंती ने पैसे निकालने चाहे।
"रहने दे, काम आएंगे तुम दोनों को।" वही अलमस्त अंदाज था उसका।
पूरे रास्ते वह अनमना रहा, खिड़की से बाहर देखता रहा एक जगह बस रुकने पर खाने का सामान ले आया। पाँच -छह घंटों के सफर के बाद, गंतव्य पर पहुंचकर वे सब बस से उतर गए।
"मैं अभी आता हूँ, यहीं रुकना।" कहकर वह भीड़ में गुम हो गया।
नई जगह, शाम की बढ़ता साया, बारिश की शुरुआत और ऐसे जगह पर बेटी को लेकर खड़ी बासंती का दिल घबराने लगा।
"एक सड़क पर रहने वाले लोफर पर क्यों विश्वास कर लिया मैंने। ना जाने इसके मन में क्या है, नहीं मुझे इसके साथ नहीं जाना चाहिए।" बासंती ने चारों ओर नज़रें घुमाईं और पायल का हाथ पकड़े, वापसी बस टिकट के लिए बढ़ने लगी।
"टूट गया भरोसा, टूटना भी चाहिए। दुनिया ने कितनी ठोकर दी होगी समझ सकता हूँ। एक बार आजमा लो, नहीं तो वापस चली जाना। पैसे तो हैं ही तुम्हारे पास।" कहते हुए लोफर ने पायल का हाथ थाम लिया।
रिक्शेवाले को एक पता बताया और कुछ ही देर बाद वे एक बड़े बंगले के सामने थे। रिक्शेवाले को रोककर लोफर बासंती से कहने लगा, "यहाँ तुम और पायल सुरक्षित रहोगी। चाहो तो काम भी मिल जाएगा, क्लीनिक में साफ-सफाई या और कुछ भी।" एक लंबी साँस लेकर बोला, "इस घर में बहुत से डॉक्टर हैं, कोई ना कोई इंतज़ाम हो जाएगा। मेरे बारे में किसी को भी जानकारी देने की जरूरत नहीं।" कहते हुए अपने जेब से एक फोटो निकाल कर बासंती को पकड़ा दिया।
"यह किसकी फोटो है मुझे क्यों दे रहे हो?" बासंती का प्रश्न था।
"एक अधूरे डॉक्टर की फोटो है, बस यही तुम्हारा काम बना सकती है। मेरी बात हो गई थी।" कहते हुए वह रिक्शे में बैठ गया।
"उन लोगों से मुझे मिलवा तो दो, ऐसे कैसे चले जाओगे छोड़कर, यदि उन्होंने मुझे जगह नहीं दी तो?" भविष्य के ढे़र सारे प्रश्न तैर रहते थे बासंती के सामने।
"ऐसा हुआ तो बस से वापस उसी जगह चली जाना, पैसे तो हैं तुम्हारे पास। लोफर हूँ, पर इतना नहीं कि तुम्हें बच्ची के साथ गलत ठिकाने पर छोडूँ। मेरे निकल जाने के बाद घंटी बजाना।" उसके इशारे पर रिक्शावाला चल पड़ा।
आशा, भय और चिंता से भरी बासंती ने घंटी बजाई। कुछ देर बाद एक औरत बाहर आई।
"किससे मिलना है?" उसने पूछा।
"जी, घर के मालिक से।" बिना सोचे-समझे बोल गई बासंती।
"श्वेता दीदी से या उनके मम्मी-पापा से।" उस अधेड़ औरत ने फिर पूछा।
"मैं किसी को नहीं जानती, ये फोटो उन्हें दिखाना।" हाथ पर रखी फोटो बासंती ने उस औरत को दे दी।
एकटक उस फोटो को देखती वो अंदर की ओर भागी। कुछ समय बाद उसके साथ एक खूबसूरत जवान लड़की, एक सौम्य अधेड़ औरत और व्हील चेयर पर एक व्यक्ति बाहर आ गए।
"ये फोटो तुम्हें कहाँ से मिली? कौन हो तुम? यहाँ केसे आई?" प्रश्नों के बौछार से घबरा गई बासंती।
"मुझे लोफर यहाँ छोड़ गया। उसने ये फोटो दी और कहा कि अधूरे डॉक्टर की फोटो दिखा देना, तुम्हें कुछ दिनों रहने की सुरक्षित जगह और काम मिल जाएगा।" बासंती बोल रही थी और सामने खड़े सभी की आँखें बरस रहीं थीं।
"भैया, वापस क्यों चले गए। आप लोफर नहीं हो। डॉक्टर ना बन पाना, अपराध नहीं था आपका। हम सब अपराधी हैं आपके भैया।" कहते हुए वो लड़की, जिसका नाम शायद श्वेता था, जोर से रो पड़ी।
अब वे सब अपने लोफर बेटे के द्वारा भेजे गए जरूरतमंद बासंती और पायल को सामान सहित घर में ले गए थे। घर के मुख्य हाल में लगी कई तस्वीरें उस लोफर की थीं या इस घर के अधूरे डॉक्टर की, बासंती समझ नहीं पा रही थी।
कुछ ही दिनों में बासंती ने सब अंदाज़ा लगा लिया। औरतों की छठी इंद्रिय की सक्रियता, उसमें तेजी से आ रही थी। घर के कामकाज, क्लीनिक के कामकाज के लिए तो पहले से ही लोग थे इसलिए घर मालकिन ने उसे रसोई के कामकाज में हाथ बंटाने, कभी साफ सफाई, बगीचे के काम में मदद करने का कार्यभार सौंपा। उन्हें देखकर बासंती ने समझ लिया कि दिल में जगह हो तो कहीं भी जगह बनाई जा सकती है।
"शाम को एक-दो घंटे पायल को पढ़ाया करो।" श्वेता दीदी ने आदेश दिया था।
महीने भर में आत्मीयता की कड़ी से बँध गई थी वह। अहसान करने जैसा भाव कभी नहीं दिखा। बँगले में सामने दो कमरे थे, एक में कामकाजी सती मौसी रहती थी और दूसरा उसके लिए खोल दिया था।
जो घर में बनता वह सब उसे भी मिल जाता, रात को माँ बेटी सिर्फ़ सोने जाते थे कमरे में।
श्वेता दीदी ने पायल को पास के स्कूल में भर्ती करा दिया। एक परिवार बिना उसके अतीत के बारे में जाने दिल से मदद कर रहा था। सती मौसी से घर की कहानी परत दर परत खुलती गई और बासंती का मन उनमें उलझ गया।
"लोफर" इस घर का वारिस, डॉक्टर माता पिता की बड़ी संतान है। श्वेता उससे उम्र में सात-आठ साल छोटी थी।
अपने क्लीनिक के बाद, माता-पिता दोनों ने ही बच्चों को मेडिकल की पढ़ाई के लिए प्रेरित करना शुरू किया। आखिरकार इतने बड़े क्लीनिक को चलाने के लिए कोई तो हो।
अमित, जी हाँ अमित नाम बताया गया लोफर का, बचपन से ही उसे संगीत और गिटार का बहुत शौक था।
"अमित बाबा, दस साल के थे तब उनको गिटार बजाने में बड़ा पुरस्कार मिला था।" सती मौसी ने बताया।
बासंती ने तो कुछ दिनों पहले ही अमित का संगीत शौक, सीटी से पूरा पूरा गाना गाने की कला देख चुकी थी।
दसवीं के बाद मेडिकल प्रवेश परीक्षा के लिए उसकी सारी शौकिया कक्षाएं, प्रेक्टिस बंद करवा दीं गईं।
गिटार और संगीत के और भी वाद्य यंत्रों को कमरे में बंद कर दिया गया।
"ये सब फालतू शौक की जगह अपनी कोचिंग में समय दो, ध्यान दो। मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिलने के लिए जितना जी जान लगा सकते हो लगा दो, आगे इस क्लीनिक को तुम्हें ही संभालना है।" पापा के शब्द किशोर मन पर हथौड़े की तरह चलते। वह बहुत कोशिश करता परंतु मेडिकल की पढ़ाई उससे होती ही नहीं थी।
नई धुन, शब्दों के साथ बिठाने में हमेशा गिटार के साथ नया प्रयोग करने वाला अमित चुप चुप स रहने लगा था।
पहली साल की परीक्षा में असफल होने के बाद पापा-मम्मी उसकी पढ़ाई, सुविधाओं, कक्षाओं के प्रति बहुत जागरूक हो गए थे।
"उसको देखकर श्वेता बेबी, बहुत कम उम्र से ही, डाक्टर बनने की रट लगाए रहतीं।" सती उस परिवार की सबसे विश्वसनीय और पुरानी सहायिका थी जो मालकिन के साथ ही इस परिवार में शामिल हुई थी।
बासंती ने इस घर में एक खालीपन महसूस किया जो हर के दिल में अंदर तक अपनी जगह बना चुका था।
बहुत दिनों बाद एक दिन मालकिन ने बासंती से उसके बारे में पूछा।
लड़की पैदा करने की जितनी सजा उसको ससुराल से मिली थी सुनकर उनकी आँखें भीग गईं। बिना माँ बाप की बासंती ने, अपनी और पायल की जान बचाने के लिए ही उन क्रूर माँ बेटे के घर से निकल आई थी। अपनी गोरी पीठ पर सलाखों के निशान दिखाते हुए, वह फफक-फफक कर रो पड़ी थी।
"अब तुम भी क्लीनिक के काम में मदद करना, बारहवीं पास हो घर के काम सती मौसी और बाई संभाल लेंगी।" श्वेता दीदी के कहने पर, क्लीनिक की नर्सों ने उसे कुछ बेसिक जरूरी कामों की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया।
बासंती को उस लोफर का चेहरा भूलता नहीं था, उसकी संवेदनशील दृष्टि ने ही बासंती को सड़क से उठाकर इस सुरक्षित घर में जगह दिलाई थी।
"सती मौसी, अमित बाबा के बारे में मुझे सब जानना है।" बासंती ने रात को अपने कमरे में बैठी मौसी से पूछा।
"क्या बताऊँ, तुमने तो उसे देखा है जाना है। इस घर से तो वह इक्कीस की उम्र में चला गया था। अब चौदह-पंद्रह साल हो गए।" सती ने गहरी सांस ली।
"क्यों चले गए, इतना बढ़िया परिवार, घर? किस बात की कमी थी यहाँ?" बासंती ना चाहते हुए पूछ बैठी।
"कमी तो कुछ भी नहीं थी, बाबा के दिल की बात समझने में कमी रह गई।" सती ने बताया, "दूसरी बार में भी मेडिकल परीक्षा पास ना कर पाने पर बाबा ने अपने आपको कमरे में मानो बंद कर लिया। दो-दो तीन-तीन दिन नहाते नहीं थे, खाने का भी होश नहीं था। मालिक का ग़ुस्सा बढ़ता गया और बाबा की चुप्पी।"
उसकी ओर एकटक देखती हुई सती मौसी ने अपनी बात पूरी की।
"एक सुबह जब बहुत ठोकने पर भी बाबा ने आवाज़ नहीं दी, ना ही दरवाजा खोला तब माली, ड्राईवर की मदद से दरवाजा तोड़ दिया था।" अतीत मानो समय को लांघकर, मौसी की आँखों में समा जाना चाहता था।
"फिर क्या हुआ मौसी?" बासंती टकटकी लगाए, दम साधे बैठी थी।
"बाबा ने बहुत सारी नींद की गोलियांँ खा लीं थीं। माँ बाप दोनों डाक्टर थे, पुलिस केस नहीं बना और अपने ही क्लीनिक में बड़े बड़े डाक्टरों से बाबा का इलाज करवाया।"
"एक सप्ताह के बाद बाबा ने पहला शब्द बोला था "साॅरी"।" मौसी ने अपनी आँखों में उमड़ आए नमकीन पानी को आंँचल से सुखा दिया।
"ओह! फिर अमित बाबा इस घर में क्यों नहीं रहते।" बासंती आज सब जान लेना चाहती है।
"बाबा की दिमागी हालत पर असर हो गया था। वो सिर्फ़ चुपचाप बैठे रहते, अब तो गिटार को हाथ भी नहीं लगाते। किताबों को देखकर चीखते और बेहोश हो जाते थे।" मौसी को हर एक बात कल की घटना सी याद थी।
"उनकी हालत देखकर मालिक मालकिन और बेबी भी मानसिक दुःख से भरे रहते। बाबा को किसी संस्था में भेजा था, वहाँ छह महीने रहकर वो थोड़ा बोलने, घूमने चलने लगे।" सती चुप हो गई।
"परंतु घर क्यों छोड़ा उन्होंने?" कारण जानने के लिए बेचैन थी बासंती।
"जब कुछ अच्छे हो गए तब उन्हें पढ़ाई से डर बैठ गया था। उन्होंने किसी संगीत संस्था के साथ जुड़कर सीखने सिखाने का सोचा परंतु मालिक ने उन्हें मना कर दिया। एक रात चिट्ठी छोड़कर बाबा चले गए। उसके बाद ही मालिक को लकवा मार गया था।" बुरे सपने की तरह बता रही थी सती मौसी।
"ओह! बाद में मालिक-मालकिन ने क्या किया?" बासंती टकटकी लगाए देख रही थी मौसी को।
"क्या करते, चिट्ठी में स्पष्ट लिखा था कि मर्ज़ी से घर छोड़कर जा रहा हूँ, आपके पसंद का काम नहीं कर सका, माफ़ कर देना। मुझे ढूँढना मत, बस माफ़ कर देना। श्वेता आपकी हर इच्छा पूरी करेगी, वो बहुत प्यारी बहन है मेरी।" सती मौसी की आँखों से दुःख के बादल बरसने लगे।
"तब से बाबा कभी आए नहीं, मालिक की हालत खराब ही हो गई थी। उन्हें संभालने, श्वेता दीदी की पढ़ाई में मालकिन का जीवन चला गया।"
"अमित बाबा के घर छोड़ने की तारीख को ही तुम इस घर में आई। आसपास से कुछ बातें पता तो चलतीं थीं कि अमुक ने अमित के जैसे किसी को देखा, परंतु कभी वहाँ कोई मिला नहीं। पुलिस की सहायता लेने से मालिक ने इंकार कर दिया था।" सती उठकर कमरे में घूमने लगी।
"अच्छा, तो लोफर को.. नहीं-नहीं अमित बाबा को पता था कि वो हम दोनों को उसी दिन इस घर में भेज रहें हैं।" बासंती का मन द्रवित था, इस परिवार ने उसे पनाह दी, हिम्मत दी वो भी बिना उसके अतीत पर कोई सवाल किए।
"मौसी, मैं और पायल हमेशा अमित बाबा और इस परिवार का उपकार मानेंगे। मैं कल से घर के सब काम, मालिक मालकिन की देखभाल और क्लीनिक के काम सीखने में कोई कसर नहीं रखूंँगी। मेरी बेटी को एक अच्छे परिवार की छाया मिल गई, बस ईश्वर की इतनी दया बहुत है।" बासंती के चेहरे पर चमकते सत्य को पहचान गई थी अनुभवी आँखें।
सती ने उसका हाथ थाम लिया मानो कह रही हो, मुझे भी जीवन और साथ इसी परिवार ने दिया था। अब अंतिम दिन तक उनके लिए कुछ करतीं रहूँ तभी मुक्ति मिलेगी।
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शर्मिला चौहान
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