बुधवार, 3 अप्रैल 2024

फ़िलबदीह 15( 2122 1122 1122 22)

(संशोधित रूप)

फ़िलबदीह क्रमांक 15

मिसरा-ए- तरह
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया

2122  1122  1122  22

झूठ के दाँव से अक्सर ही गिरी है दुनिया
थाम सच्चाई को फिर उठ के चली है दुनिया।।1।।

साँस घुटती सी नज़र आये सभी रिश्तों की 
वेंटिलेटर पे लगे आज पड़ी है दुनिया।।2।।

दौर इतना तो ज़माने में दिखावे का है
फोन फिल्टर को लगा  खूब सजी है दुनिया।।3।।


लाख मुश्किल भी मिले राह पे आगे बढ़ती
रोकने से भी भला कब ये  रुकी है दुनिया।।4।।

चक्र जीवन का चले बरसों से जग में यूँ ही
मरते हैं लोग नहीं मरती कभी है दुनिया ‌‌।।5।।


गिरह का शेर-

बन शिखर खूब चमकने की थी  मेरी चाहत
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया।।


***"*********

शर्मिला चौहान

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें