आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏(संशोधित रूप)
फ़िलबदीह क्रमांक -16
मिसरा-ए-तरह
धुआं तक नहीं लेकिन अखबार में
क़ाफ़िया - आर
रदीफ़- में
122 122 122 12
छिपा था जो ईश्वर निराकार में
मेरे सामने आया साकार में।।1।।
बढ़ी कीमतें इस कदर चीज़ों की
लगे मन नहीं अब तो सत्कार में।।2।।
तनिक बात का वो बतंगड़ करें
भले कुछ नहीं हो समाचार में।।3।।
बड़ी हड़बड़ी में ये दुनिया चली
सुनेगी नहीं बात विस्तार में।।4।।
भरी जेब से सौदा करने गए
मिली ही नहीं खुशियांँ बाज़ार में।।5।।
तरही मिसरा-
लगी आग दिल में हुआ खाक सब
धुआं तक नहीं लेकिन अखबार में।।
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शर्मिला चौहान
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