व्यंग्य- "अनसेफ किनारा"
कुछ फार्मल मीटिंग्स के बाद सर्वेक्षण टीम तैयार हो गई। अलग-अलग विभागों के आठ लोगों को, समुद्री जीवों की विलुप्त होती प्रजातियों के अध्ययन एवं कार्यशालाओं के आयोजन का कार्य सौंपा गया।
चार ऑफिसर्स और साथ चार उनके सहयोगियों को समुद्री किनार पट्टी पर समय बिताने का सुअवसर प्राप्त हुआ था।
प्रमोद, आनंद, जयंत और शरत ने तटीय क्षेत्रों की सबसे आरामदायक और सुंदर रेलगाड़ी में अपनी टीम का आरक्षण करवा लिया।
"शादी के बाद आई-बाबा पहली बार आएं हैं, उन्हें तो साथ ले जा सकते हो। आखिरकार जंवाई के पद का कुछ तो फायदा होगा।" प्रमोद की नवब्याहता ने ठुनकते हुए कहा।
"अरे! सरकारी दौरा है। ऐसा नहीं चलता।" प्रमोद ने असफल विरोध किया।
"कोई मुश्किल नहीं तुम्हारे लिए, बाबा को लकवे के बाद से हवा-पानी बदलना था, समुद्र किनारे की हवा, केकड़े का सूप उनको स्वस्थ बना देगा।" नवब्याहता की मनुहार और सामने खड़े ससुर को देखा, जिन्होंने अपनी चाल को और अधिक टेढ़ी मेढ़ी करने की कोशिश चालू कर दी थी।
"साहेब, थांबा थांबा। ही महत्वाची फाइल तुम्ही विसरला होतात ऑफिस मध्ये।" स्टेशन पर ट्रेन छूटने के पहले चपरासी ने नियम, सूचनाओं की फाइल टीम को सौंपी।
आठ सरकारी और दो गैर सरकारी जीवों ने, आगामी सप्ताह के अपने खूबसूरत समय का अनुमान लगा लिया।
स्टेशन पर लोकल सरकारी लोग, कुछ पर्यावरण संरक्षण वाली संस्था के लोग, टीम के स्वागत के लिए तैयार थे।
"आठ माला लाए थे, ये दस लोग कैसे हो गए?" टीम का एक्स्ट्रा एक्सटेंशन, स्टेशन पर खड़े लोगों को हाइपरटेंशन दे गया।
"अब रहने खाने का भी तो दो एक्स्ट्रा इंतजाम करना होगा।" अधेड़, अनुभवी स्वागत कर्ता बुदबुदाया। उसको अपने समुद्र किनारे के रिसोर्ट का एक और कमरा, बलि चढ़ता दिखाई देने लगा।
फोटोग्राफर की व्यवस्था भी थी ताकि कल के समाचार में, शासन द्वारा इस जगह के संरक्षण और संवर्धन की सजगता का उल्लेख किया जा सके।
स्टेशन पर ट्रेन से उतरे यात्रियों को, समाचार पत्र में छपने का चारा फेंका गया और इस सर्वेक्षण टीम के चारों ओर भीड़ का सुंदर कवरेज फोटोग्राफर को मिला।
अपने बालों का संरक्षण ना कर पाने के दुख और शर्मिंदगी को अधिकारी जयंत ने, टोपी पहन कर छुपा लिया था।
समुद्र किनारे पर बने इस रिसोर्ट को, ऐसे ही सरकारी-गैर सरकारी जीवों के लिए अनाधिकृत रूप से खड़ा किया गया था।
नाश्ते में पोहा, उपमा और चना देख, टीम का आवेश पूर्णिमा की समुद्री लहरों सा उफान पर आ गया।
"हम क्या यहाँ घासफूस खाने आएं हैं? समुद्र के किनारे रहकर फिश, क्रेब और सी फूड खाएंगे या ये सब?" चारों की अनुमानित प्रतिक्रिया के दस मिनट बाद ही टेबल पर विभिन्न आकार प्रकार के केकड़े, मछलियों के क्रिस्प सज गए।
"साहेब, हमको लगा कि आप सब सरकारी सर्वेक्षण टीम वाले, जल जीवों के संरक्षण के लिए आए हैं तो हम तो कैसे आपको वही जीव खिलाते।" हाथ जोड़े रिसोर्ट मालिक सामने था।
"सर्वे ही करने आएं हैं ना, कोई भूख हड़ताल तो नहीं। आज तक तुम लोगों ने सैकड़ों किलो मछली, केकड़े खाए-पचाए, अभी बड़े नियम कानून वाले बन गए।" जयंत अपने टकले को पंखे की हवा खिलाते हुए गरजा।
"मला दोन्हीं टाइम खेकड्याच्या सूप द्या, डाक्टर ने सांगितले आहे मला।" सरकारी अधिकारी के गैर सरकारी ससुर आदेश था।
टेबल पर कुछ जिंदा केकड़े प्रदर्शन के लिए लाए गए, उन केकड़ों ने उस घिसटकर चलते हुए प्राणी को देखा और अपनी ही प्रजाति का बड़ा जीव समझकर अपनी ख़ैर मनाते हुए आँखें बंद कर लीं।
नाश्ता डकार कर, लंच के लिए कुछ स्वादिष्ट, कीमती समुद्री स्पेशल डिशेस तय करके, टीम अपने कुछ विशेष सहायकों के साथ आसपास का दौरा करने चली गई।
पुराने समय के बने छोटे-छोटे घर, अपनी अपनी आजीविका की नौका द्वार पर रखे, वर्षों से टकटकी बाँधे, सामने गरजते मित्र की गतिविधियों का सूक्ष्म अध्ययन कर रहे थे।
"क्यों रे, नया घर बाँधा है अभी?" कुछ चमकती दीवारों से घिरे घर के आँगन में लगे काजूओं के ढेर को देख टीम रुक गई थी।
"नाही जी, जुनीच है, फक्त कलर किया। आजोबा के हाथ का घर है साहेब।" घर का मालिक सहमते हुए बोला।
"निकाल रे गाड़ी से मोजणी टेप, एक इंच भी इधर-उधर हुआ तो तोड़ना पड़ेगा।" टकले आफिसर ने सिर खुजलाते हुए, जुगाड़ के बादल जमा किए।
"साहेब, मोठे वादळ आया था, घर गिर गया था तभीच नवा किया साहेब, थोड़ा इधर-उधर हो गया होगा।" घर मालिक ने अपनी घरवाली को कुछ इशारा किया।
"साहेब, रोज फ्रेश सुरमई, खेकडे देगी ये आपके रिसोर्ट में। मेरे बाग के काजू सबसे बड़े हैं साहेब, आपके लिए भेजता हूँ फ्रेश।" कोकम शरबत का गिलास घरवाली से लेकर टीम के सभी लोगों को देने लगा वह।
मौसम, समुद्र और लहरों के मिजाज को समझने वाले इस परिवार ने, सरकारी लोगों की नब्ज पकड़ ली थी।
"शाम को सब आसपास के लोगों को जमा करो, साहेब लोग कुछ जानकारी देने वाले हैं। समुद्री जीव जंतु के संरक्षण, संवर्धन पर कुछ नवीन बातें बताएंगे तुम सबको।" कहते हुए टीम ने कड़कती धूप में, रिसोर्ट पर आराम करने पर सहमति बनाई।
लंच पर भरवें केकड़े, शिंपले की खासियत सुनते हुए सर्वे टीम ने, डेढ़ दर्जन केकड़ों को भवसागर से पार करा दिया।
"प्रमोद राव, तुम्हारे ससुर को फ्रेश केकड़ा सूप आठ-दस दिन मिलेगा तो ठन-ठन चलने लगेंगे।" सासू का लाड़ जंवाई पर बरस रहा था।
"अभी तो काम शुरू किया है, आगे थोड़ा एक्सटेंशन भी ले लेंगे।" प्रमोद सरकारी आफिसर से ज्यादा,अपने आपको श्रेष्ठ जंवाई साबित कर रहा था।
शाम की सभा खास थी। मछुआरों के जाल में फंसकर आने वाले, कुछ विलुप्त बेशकीमती समुद्री जीवों को सरकारी कार्यालय या पर्यावरण संरक्षण कर्ताओं की जानकारी में लाकर, वापस समुद्र में छोड़ने पर, घोषित सरकारी ईनाम की जानकारी दी गई।
मछुआरे हैरान थे, बरसों से वो यही बिना ईनाम कर रहे थे।
समुद्र किनारे पर इतनी चहल पहल से, किनारों पर आराम से पड़े रहने वाले जलीय जीव परेशान होकर, इधर-उधर भागने लगे और भीड़ के पैरों तले दबने लगे।
सुबह किनारे पर क्रिकेट खेलती सर्वेक्षण टीम के ब्रांडेड जूतों ने, किनारों पर लघु जीवों के अंडों की बलि ले ली। सुबह-शाम अपने शरीर को धूप में खुला छोड़ देने वाले समुद्री जीवों को अब ये किनारे खतरनाक लगने लगे थे।
नन्हें-नन्हें जलीय प्राणियों को उनकी माताओं ने, किनारों का डर दिखाना शुरू कर दिया था। "जाना नहीं, नहीं तो ये मगरमच्छ तुम्हें खा जाएंगे।" इसी तर्ज पर वे अपने नन्हों को सावधान करने लगीं।
सूर्यास्त के बाद पूर्ण शांति के साथ समुद्र की लय ताल को सुनने वाले किनारे पर, अब हर रात पार्टी होने लगी। लहरों और नारियल के पेड़ों की संगीत की जगह, फिल्मी गानों की तेज़ आवाजें गूँजती। बड़ी बड़ी लाइट्स ने रात को दिन में बदल दिया। रात की पार्टी, हो-हल्ला और सुबह किनारे पर बोतल, पैकेट्स और पालीथीन बैग इधर-उधर पड़े रहते। समुद्री प्राणी टुकुर-टुकुर इन नयी चीज़ों को ताक रहे थे।
समुद्री जीवों ने इस डरावने अनुभव को समुद्री मीडिया में शेयर करना शुरू कर दिया।
प्राकृतिक संसाधनों, सौंदर्य से भरपूर इस जगह पर सर्वेक्षण टीम ने अपना स्टे और बढ़ा दिया।
लोकल निवासियों से मिलकर टीम ने, जलीय जीवन के बारे में अपनी जानकारी बहुत बढ़ा ली थी। प्रकृति के सान्निध्य में, ताजे भोज्य पदार्थों, शुद्ध हवा और आनंदमय वातावरण से सर्वेक्षण टीम के सदस्यों के वजन में इज़ाफ़ा होना जायज़ ही था।
पंद्रह दिनों के इस सर्वेक्षण मुहिम के बाद, महानगर से आई यह टीम आज वापस जा रही थी। बारिश में इस स्थान की खूबसूरती के किस्सों से प्रभावित टीम ने अपनी रिपोर्ट में, हर मौसम में समुद्री किनारों एवं जलीय प्राणियों के संरक्षण संवर्धन की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।
काजू, कटहल, अचार, मसाले, सूखी मछलियांँ, कोकम शरबत और दुनिया में प्रसिद्ध स्वादिष्ट आम के डिब्बों को अपने संरक्षण में लेकर टीम के लोग स्फूर्ति से स्टेशन की ओर, गाड़ियों में बैठ निकल पड़े। उड़ती धूल का गुबार, उनके विलुप्त होने का आनंदमय संकेत दे रहा था।
आज शाम किनारे को पूर्ववत शांत पाकर, शहरी मगरमच्छों से निर्भय सारे जलीय प्राणियों ने किनारों पर रात भर पार्टी की। आज उनकी सारी प्रजाति, अपने आपको शत प्रतिशत सुरक्षित महसूस कर रही थी।
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शर्मिला चौहान
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