बुधवार, 22 सितंबर 2021

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एक प्रयास सादर

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हृदय में साथ रहकर मुस्कुराती बात बचपन की
कभी जब याद आ जाती मुझे बरसात बचपन की।1।

चमकती दामिनी के संग बादल का गरज जाना
छिपे माँ की रजाई में निराली रात बचपन की।2।

बरसने से भरी गलियाँ भरे वो खेत चौबारे
चलाना नाव कागज की बड़ी सौगात बचपन की।3।

चने के चार दाने भी बखूबी बाँटकर खाना
नहीं था भेद आपस में न कोई जात बचपन की। 4।

लगाकर शर्त बारिश में गली तक दौड़कर जाना
अभी तक याद है मुझको मिली वो मात बचपन की।5।

शर्मिला चौहान

2122 1122 1122 22

गृहकार्य समीक्षार्थ 🙏 सुझाव के अनुसार संशोधन के बाद।

2122 1122 1122 22

स्वार्थ के बीज हमेशा जो बशर बोता है
देख औरों की खुशी खूब वही रोता है।।1।

हौसला सीख विहग से रे मनुज तू जग में
क्यों सुबह देर तलक ओढ़ के तू सोता है।।2।।

प्रेम की राह कठिन यह तो पता है सब को
जब मिलें हाथ तभी साथ सफल होता है।।3।।


चोट दुनिया ने बहुत बार दिए जो तुझको
घाव सीने पे लिए आज तलक ढोता है।।4।।

खूब खुशियों से भरा आज है दामन तेरा
चंद बातों में उलझ क्यों तू खुशी खोता है।।5।।

शर्मिला चौहान

221 2122 221 2122 की बहर

गृहकार्य प्रथम प्रयास 🙏

221  2122  221  2122

रदीफ़- ले
क़ाफ़िया- आ


सारे भरम हृदय के अपने ज़रा मिटा ले
जो राह सामने है  उस पर कदम बढ़ा ले।1।

नवपुष्प खिल उठें जब तब शाख मुस्कुराए
गम भूलकर जहाँ के जी भर के खिलखिला ले।।2।

तू छोड़ आ गया था वो गाँव याद करता
अब लौट चल वहीं फिर अपना उसे बना ले।।3।।

संसार रूप सागर जो दे रहा चुनौती
कश्ती चला के अपनी  हिम्मत को आज़मा ले।।4।।

वो नाच जो नचाता, सब नाचते उसी पर
तू ताल पे उसी की अपने कदम मिला ले।।5।।

शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

2122. 1122. 1122 22

गृहकार्य समीक्षार्थ 🙏 सुझाव के अनुसार संशोधन के बाद।

2122   1122  1122  22

स्वार्थ के बीज हमेशा जो बशर बोता है
देख औरों की खुशी खूब वही रोता है।।1।

हौसला सीख विहग से रे मनुज तू जग में
क्यों सुबह देर तलक ओढ़ के तू सोता है।।2।।

प्रेम की राह कठिन यह तो पता है सब को
जब मिलें हाथ तभी साथ सफल होता है।।3।।


चोट दुनिया ने बहुत बार दिए जो तुझको
घाव सीने पे लिए आज तलक ढोता है।।4।।

खूब खुशियों से भरा आज है दामन तेरा
चंद बातों में उलझ क्यों तू खुशी खोता है।।5।।

शर्मिला चौहान

बुधवार, 8 सितंबर 2021

कहानी " नया नामकरण"

कहानी- "नया नामकरण"
(पलाश, उमाकांत भारती जी को भेजी, जुलाई दिसम्बर २०२३ अंक में प्रकाशित)

दस खरे सिक्कों के बीच एक खोटा तो चल जाता है, बस इसी बात को मानकर कुसुम, जी रही है। तीन बच्चियों की माँ है पर ताने उलहाने इतने झेलती कि दस बच्चे जनी हो। जिसके कारण गाँव भर से झगड़ा मोल लेना पड़ता है वो उसकी तीसरे नंबर की संतान, "कचरा"!

अब बताओ, कचरा भी कोई नाम हुआ ..पर क्या करे कुसुम दो बेटियों के बाद भी जब तीसरी बेटी पैदा हुई तो दाई ने फुसफुसा कर कहा, "मुई.. कित्ती छोरी पैदा करेगी। अरी! दूसरी छोरी के बखत कही थी मैंने, पर तू ना मानी। अब ले, पोस एक और बेटी।"  बच्ची के रोने की आवाज भी ना सुन सकी कुसुम ठीक से।
"क्या करूँ मौसी, मेरी किस्मत में बेटियाँ ही लिखीं हैं तो बेटा कैसे होगा?" नवप्रसूता की थकी, कमज़ोर आवाज थी।

"तुझे टोटका तो बताया था पर तूने सुनी ही नहीं। अब भी वक्त है, इस छोरी का नाम ऐसा रख दे कि कोई अपने बच्चे का ना रखे। जब जब इसको पुकारेगी तब तब तेरी किस्मत में फेर होगा।" दाई की बात कुसुम के दिमाग में घूमने लगी।

सवा महीने तक तो सभी उस बच्ची को गुड़िया, मुनिया कहकर पुकारते पर सवा महीने के बाद, जब आसपास के दो-चार लोगों के बीच पंडित जी के सामने, बच्ची का नाम रखवाया तो औरतें फुसफुसाने लगीं।

"ये क्या कोई नाम हुआ, "कचरा"!  कैसी माँ है ! अपनी सुंदर सी बेटी का नाम कचरा रख दी।" ढोलक पर दो-तीन सोहर गाकर, महिला मंडल नामकरण पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगा।
"क्या करे कुसुम भी, भगवान ने दो के बाद तीसरी भी छोरी भेज दी। अब कचरा ही तो बोलेंगे ना उसे ..हुँह.!" दो बेटों की माँ सगुना ने आँखें मटकाकर कहा।

खैर, कुछ महीनों के बाद सब कुछ सामान्य हो गया और कचरा अपनी बड़ी बहनों के साथ खूब मस्ती करते बढ़ने लगी। दो साल की होते कचरा, खूबसूरत, प्यारी बच्ची लगने लगी। गोल मटोल, गोरी चिट्टी, बड़ी आँखों वाली कचरा, दुकान में सजी गुड़िया लगती थी। सबसे बड़ी खासियत थी कचरा की जु़बान! सीधे, साफ शब्दों का उच्चारण, कहीं कोई तुतलाहट नहीं थी। पूरे वाक्य, कभी संयुक्त वाक्य भी, स्पष्ट तेज बोलती थी। समय के साथ बच्ची, स्वस्थ, तेज और मनमौजी हो गई।

"छोरी की ज़ुबान बड़ी तेज है, चार साल की है पर बोलने में तूफान।  कल मेरे को बोली की तेज ना चल, गिर जाएगी बुआ। बस.. आगे थोड़ी दूर जाकर सचमुच मैं गिर पड़ी। छोरी का नाम वैसी जुबान है।" कमला बुआ, जिसे सारा गाँव "बुआ" ही पुकारता था, ने अपनी दुखती कमर पर हाथ लगाकर कहा।

"बैठो बुआ, चाय पीकर जाना।" कुसुम ने उन्हें मनाने के लिए रोक लिया। बुआ तो फिर बुआ ठहरीं, चाय भी पी लीं और साथ पकौड़े भी बनवा लिए।

"इस लड़की ने खूब परेशानी में डाल रखा है। क्यों बोलती है ऊटपटांग बातें? लोगों ने तुझे 'काली जुबान वाली' का नाम दे रखा है। करम मेरे ही फूटे थे जो छाती पर मूंँग दलने ऐसी छोरी भेज दी भगवान ने।" कुसुम ने गुस्से से दो-चार हाथ जमा दिए कचरा पर।
"अरी.! ज्यादा गुस्सा मत किया कर, इससे पूछ जरा कि अबकी बार बेटा होगा या बेटी?" चौथी बार गर्भवती कुसुम से उसके पति मनोहर ने कहा‌
"क्या पूछूँ? कभी कोई जवाब अच्छा देती है‌। बित्ते भर की छोकरी गज भर ज़ुबान, वो भी काली।" गुस्सा कम ना हुआ था कुसुम का।

"अम्माँ, मेरे को भाई चाहिए, छोटा सा भाई।"  कचरा ने दोनों हथेलियों से छोटा आकार बना दिया‌
"आज तो तेरी ज़ुबान सच हो जाए, तो तेरे मुंँह में घी-शक्कर पड़े।" कहते हुए कुसुम कचरा को बेतहाशा चूमने लगी।

तीन-तीन बेटियों को जन्म देते-देते, बेटे की धूमिल होती आशा को जैसे नव रुप मिल गया। पति की इच्छा, समाज का दबाव झेलते हुए कुसुम का शरीर और मन, थक गए थे। छोटी बच्ची की बोली ने, उम्मीदों के दीपक में विश्वास का तेल भर दिया।

दिन, महीने जैसे-जैसे आगे बढ़ते, कुसुम का शरीर भारी होता जान पड़ता। अब आए दिन कचरा की बड़-बड़ उसको उतनी बुरी नहीं लगती। इस बार तो दाई ने भी चार-पांँच चक्कर लगा लिए‌ थे।

"कहती थी ना मैं कि छोरी का बेकार सा नाम रख दे। मेरा टोटका काम कर गया।" दाई जब जब आती, चाय नाश्ता करके ही जाती। 
"अभी बच्चा हुआ तो नहीं ना मौसी, लड़का ही होगा कैसे पक्का बोल सकते हैं?" दाई को कुसुम ने समझाया। 

तीन-तीन बेटियों को संभालना, घर का काम करना और शरीर की कमजोरी ने कुसुम को परेशान कर रखा था। अठारह में ब्याह कर आई थी कुसुम और अब अट्ठाइस में चौथी बार गर्भवती हुई थी।  खेती किसानी ठीक थी इसलिए खाने पीने की कमी तो नहीं थी परंतु बार बार मातृत्व का अनुभव करके, कुसुम का नाज़ुक शरीर इस बार बहुत कमजोर हो गया था।
"तू दूध घी खाया कर, छोरा अच्छा पैदा होगा। हमारे वंश को आगे बढ़ाने वाला वही तो है।" कुसुम को मनोहर समझाया करता।
कैसे कहती कुसुम कि तीन तीन बच्चियाँ हैं, उन्हें पहले खाने-पीने को देगी या खुद खा लेगी। पति की आशाओं से मानसिक दबाव महसूस करने लगी थी कुसुम।

"मेरी माँ को बुला लेती हूँ इस बार, रहेगी तो कम से कम चूल्हा-चौका संभाल‌ लेगी।" कुसुम ने धीमे स्वर में पति से पूछा।
"रहेगी तुम्हारी माँ हमारे घर? उनको तो बेटी का घर रास नहीं आता" मनोहर ने चोट की।
"मना लूँगी मैं, तुम हाँ कहो तो।" कुसुम ने थोड़ी ज़िद की और मनोहर मान गया।

मनोहर की माँ बचपन में ही गुजर गई थी और कुसुम ने ससुर को तो देखा परंतु सास का साथ नहीं मिला। कुसुम की शादी के बाद, ससुर भी धर्म स्थानों की यात्रा पर चले गए तो फिर कभी लौटकर नहीं आए। मनोहर और रिश्तेदारों ने बहुत पता लगाया पर निराशा ही हाथ लगी।

कुसुम की मांँ आ गई और कुसुम ने चैन की सांँस ली। माँ, बच्चियों का ख्याल भी रखती, रोटी पानी भी कर लेती थी। सचमुच, इस उम्र में भी माँ का उत्साह देखकर कुसुम को लगता कि भगवान "माँ" को गढ़ने में कौन सी माटी लगाता होगा जो हर पीढ़ी, हर उम्र की माँ में समान वात्सल्य मिलता है। नानी, कचरा को नहीं भाती थी क्योंकि वो दिन भर हिदायतें देती रहती। समय पर उठो, नहाओ खाओ.! कचरा ऐसे बंधन से ऊब रही थी।

"अम्माँ, नानी अपने घर क्यों नहीं जाती?" कचरा ने एक रात कुसुम से पूछा।
"हमारे घर ही रहेगी नानी, नानी खाना बनाती है बड़ी अच्छी है ना!" कुसुम ने बिटिया से पूछा।
"मुझे अच्छी नहीं लगती, ज्यादा दिन ना रहेगी नानी, देख लेना।" कहकर चार साल की बच्ची तो सो गई पर कुसुम की नींद उड़ गई।

अब होनी को कौन टाल सकता है, कुसुम का भाई छज्जे में खपरैल डलवा रहा था। पैर फिसलने से जो गिरा की पैरों में प्लास्टर चढ़ा कर पलंग पर आ गया।
कुसुम की माँ , बेटे का समाचार सुनकर व्याकुल हो गई और कुसुम से अपने वापसी का अनुरोध करने लगी। 
"पता नहीं, लल्लन को कितनी चोट लगी है। बहू भी अकेली, घर संभालेगी, बच्चे और अब लल्लन की देखभाल भी।" 

गाँव के एक आदमी के साथ, माँ को विदा करके अब कुसुम बहुत अकेलापन महसूस कर रही थी। माँ के साथ थोड़ा बहुत हाथ बँटाकर, अपने और भाई के बचपन के किस्से, आस-पड़ोस की बातें करते हुए समय बीत जाता था और आराम भी था।

वापस वही काम, बच्चों की चिक-चिक और चिड़चिड़ाहट का दौर शुरू हो गया। भाई को भी डाॅक्टर ने बेड रेस्ट और कुछ एक्सरसाइज बताई थी तो अब माँ के आने की कोई गुंजाइश बची नहीं थी।

सातवें महीने के आते-आते, कुसुम का शरीर पीला पड़ गया। कमजोरी से हाथ-पैरों की नसें दिखने लगीं। साँस फूल जाती थी तब मनोहर उसे डॉक्टर के पास ले गया। सरकारी अस्पताल की इकलौती महिला डॉक्टर ने जाँच करके बताया कि खून की कमी है। अच्छा पौष्टिक भोजन और साथ में कैल्शियम आयरन की गोलियां लिख दीं। इस बार प्रसव इसी अस्पताल में कराने का सोच रखी थी कुसुम ने।

शाम को दाई भी आ पहुँची  जो कुसुम के अस्पताल में जचकी कराने की बात से नाराज़ थी। कुसुम ने उसे बताया कि अस्पताल से घर आने पर जच्चा-बच्चा का नहलाना, मालिश और सिंकाई सब दाई को ही करना है। उसे नई साड़ी ‌देने का वादा किया कुसुम ने। 

अपने अंदाज में दाई ने कहना चालू किया, "क्या हालत बना ली तूने? भगवान ने सबकुछ दिया है तू तंदुरुस्त रहकर ही बेटा पैदा करेगी तो आगे सब ठीक रहेगा‌। ऐसा रहा तो तू मर ही जाएगी।" कुसुम तो सिर झुकाए सुन रही थी परंतु कचरा नहीं सुन पाई।

"क्यों, क्यों मरेगी मेरी अम्माँ? कभी नहीं मरेगी। तुम बहुत बुरी हो। जाओ..भाग जाओ। तुम ही मर जाओ! नहीं मरेगी मेरी अम्माँ, कभी नहीं मरेगी!" कचरा  जोर से चिल्ला रही थी, "तुमने ही मेरा नाम कचरा रखवाया था ना, बहुत गंदी हो तुम! भाग जाओ!"

दाई तो सिर पर पैर रखकर घर की ओर निकल गई। रास्ते भर रोते चिल्लाते जा रही थी कि," हे भगवान! 'काली जुबान वाली' छोरी ने मरने का श्राप दिया है। हे प्रभु! बचा ले!"

 इधर कुसुम से लिपटकर कचरा सुबकने लगी। दोनों बड़ी बेटियांँ भी आकर चिपक गईं।
कुसुम ने उनको सीने से लगा लिया.।अब वो इन बच्चियों के लिए और आने वाले नए शिशु के लिए जीवन जीना चाहती थी। 

सुबह उठकर देखा तो नौ साल की बड़ी बेटी, उसके लिए चाय और डबलरोटी लिए खड़ी थी। स्कूल से आकर दोनों बड़ी बहनों ने कचरा को नहलाया, खिलाया और खुद भी खाना खा लिए। मनोहर ने शाम को जल्दी आकर दूध दुहकर गरम किया। 

पूरे समय सब मिलकर काम करने की कोशिश करते और कचरा तो एक मिनट के लिए भी अपनी अम्माँ को छोड़ती नहीं थी। कभी कुसुम के बालों में तेल लगाकर अपने छोटे हाथों से मालिश करती तो कभी पैर दबाती। अब बोलती बहुत कम थी और जब बोलती सिर्फ अम्माँ के जल्दी अच्छी होने की बात करती।

दो-तीन दिनों तक सब ठीक चलने के बावजूद कुसुम परेशान थी कि सचमुच दाई को कुछ हो तो नहीं जाएगा। तीन दिन बाद, पास के घर से दाई की जोर से बोलने की चिर-परिचित आवाज सुनाई दी और कुसुम ने बाहर निकलकर देखा।
"कैसी हो मौसी?" डरते डरते कुसुम ने पूछा।
"अरी कुसुम बिटिया, बिल्कुल अच्छी हूँ। दो दिनों  से मैं बहुत डर रही थी परंतु कल मुझे रास्ते में दस हजार रुपए, पर्स में पड़े मिले। उसे पुलिस थाने में दे आई तो मुझे इनाम भी मिला और मेरी फोटू भी पेपर में छपी है, देख तू भी देख!" सचमुच दाई मौसी की फोटो छपी थी। 

"बच्ची के बोलने से क्या अच्छा और क्या बुरा हो सकता है। हमने क्यों ऐसा सोच लिया कि वह जो बुरा बोलती है वही होता है। उस दिन तो दाई ने मुझे मरने का श्राप दिया तो क्या उसकी जुबान काली नहीं हुई।" कुसुम ने बाजू में खड़ी कचरा को प्यार से चूम लिया।

"तू जब अस्पताल से आ जाएगी, तो जच्चा-बच्चा की देखभाल मैं ही करुँगी, तेरी मुँहबोली मौसी जो हूँ।" कहते हुए कुसुम को हाथ से टाटा करते दाई चली गई।

"तीसरी बेटी होने के कारण, कभी इसे प्यार-दुलार नहीं किया।  छोटी बच्ची मन में कितनी दुखी होती होगी तभी कुछ भी बोल‌ देती है।" अम्माँ के स्पर्श से बालमन की कली खिल गई। अम्माँ से लिपटकर बोली, "अम्माँ, मैं कचरा नहीं हूँ ना।"

कुसुम ने उसे छाती से चिपकाकर कहा, "नहीं बिटिया, तू तो खरा सोना है।  बिल्कुल खरा। मेरे घर तो तीन-तीन रत्न हैं , अब मैं जीवन में कभी हार नहीं मानूँगी।" कुसुम ने आगे बात पूरी की, "अब एक साथ दो बच्चों का नामकरण होगा, नए बच्चे का और  सोना का।"

बाहर खड़े मनोहर ने शांति की साँस ली, अब चौथा बच्चा जो भी हो इस परिवार का अंतिम सदस्य रहेगा। वंश बढ़ाने के लिए अब तक कुसुम ने अपने शरीर पर कितने ज्यादती सही है, उसका अंदाजा लगाते हुए मनोहर की आँखें नम हो गईं।

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स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।


शर्मिला चौहान
C-1401, निहारिका, कनकिया स्पेसेस
लोकपुरम मंदिर के सामने
ठाणे (पश्चिम)400610
महाराष्ट्र

मो.नं._9967674585
ई-मेल sharmilachouhan.27@gmail.com

शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

खूबसूरती ( कहानी- मे आइ कम इन)

"खूबसूरती"

मुंबई के सबसे शानदार, महंगे एरिया में, कंपनी के ऑफिस का होना गर्व के साथ थोड़ी कठिनाई की बात भी थी माला के लिए। पहले ही पढ़ाई करते समय, लोकल ट्रेनों के साथ जिंदगी की बड़ी दौड़ कर चुकी थी वो।
"एक-दो साल जाॅब कर लूँ, फिर बैंक से लोन लेकर कार खरीद ही लूँगी।" हमेशा से ही जल्दी आगे बढ़ने की उच्चाकांक्षा रखने वाली जवान लड़की को ठहराव पसंद ही नहीं था।
"अरे ..! बाप रे !! आज फिर लेट हो गई हूँ। लोकल ट्रेन, बस का चक्कर है ही बेकार। देखो किस्मत वाले लोग, शान से अपनी कार में आते हैं।" अपने बाजू से कार में जाती लड़की को देख, मन ही मन चिढ़कर माला ने बस स्टॉप से जल्दी कदम बढ़ा लिए।

परिवार की आर्थिक स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। पिताजी कपड़े की मिल में काम करते थे। तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी माला, पढ़ने में बचपन से अच्छी थी। मिल के कामगारों के बच्चों के साथ खेलना, उनके साथ घुलना-मिलना पसंद नहीं था उसे।
चाॅल में रहने के कारण, सबके साथ गाना-नाचना, बातचीत करने और पूजा-पाठ का सबसे बड़ा उत्सव, गणेशोत्सव होता था। मिल में और चाॅल में गणपति उत्सव के समय दस दिन, अलग अलग कार्यक्रम होते थे। विसर्जन के दिन पूरा परिवार पंडाल में ही रहता। 
"माँ, मेरे लिए घर में खाना बना दे, मैं वहां नहीं जाऊंगी खाना खाने।" हर साल माला की एक ही जिद रहती।
"क्यों नहीं जाएगी तू? सब परिवार आते हैं दर्शन और खाने को, तू कोई स्पेशल है क्या? जरा जमीन पर पैर रखना सीख। अपने बाप की कमाई पर शर्म आती है ना तेरे को, जरा खुद कमाना तब दिखाना इतने नखरे।" माला की माँ, अपनी छोटी बेटी के व्यवहार, स्वभाव से परेशान हो जाती थी।

भगवान ने बुद्धि के साथ सुंदरता भी खूब दी थी माला को। रंग गेहुंआ, बढ़िया कद-काठी के साथ तीखे नैन-नक्श। बाल तो इतने लंबे, काले, मुलायम की किसी शैंपू का विज्ञापन हो। अब इससे ज्यादा क्या चाहिए किसी को, अपने आपको श्रेष्ठ समझने के लिए।

समय के साथ, माला की दीदी का विवाह हो गया, भाई भी काम करने लगा। माला ने अपनी पढ़ाई पूरी की, उस स्थिति में भी उसने मुंबई के कॉलेज से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।

माला की ऊँची महात्वाकांक्षा का साथ किस्मत ने भी दिया। मुंबई के कॉलेज की ही एक रईस लड़की रुबी से, माला का दोस्ताना इतना बढ़ा कि रुबी के पापा की कंपनी में इंटरव्यू के लिए माला को बुलाया गया।

"पापा को बोल दिया है मैंने, तुम्हारी घर की स्थिति भी बता दी है। अच्छा इंटरव्यू देना, तुमको जाॅब मिल जाएगी।" रुबी ने समझा दिया।

माला को इस बात का बुरा लगा कि रुबी ने उस कंपनी में इंटरव्यू के पहले ही उसके घर की स्थिति बता दी। कहीं ना कहीं बात दिल में और चुभती परंतु दो दिन बाद ही नौकरी का आदेश मिल गया और अब माला सब कुछ भूलकर इस नई दुनिया में, अपनी जगह बनाने के लिए तैयार हो रही थी।
अपनी सुंदरता, काम सीखने की ललक और बड़े पदों के लोगों से जल्दी मधुर संबंध बनाने के स्वभाव ने, चार-छह महीनों में माला को कंपनी का जाना पहचाना चेहरा बना दिया।
"तुम कहां रहती हो माला?" लंच टाइम में कंपनी की एक सहकर्मी ने माला से पूछा।
"बस यहीं आसपास ही।" अपने चॉल का पता बताने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी माला की।
अब तो दिमाग में एक ही बात घूमती कि किस तरह एक सिंगल बेड रूम वाला फ्लैट किराए पर लिया जाय। अभी तो पैसे इतने नहीं मिलते थे कि इतना किराया दे सकती।
"बाबा, आपके पास कुछ पैसे हैं तो हम मुंबई में एक फ्लैट लेंगे ना।" एक रात खाना खाते समय माला ने अपने पिताजी से कहा।
"मेरे पास इतने पैसे कहां से आएंगे बेटा! तेरी दीदी की शादी, तेरी पढ़ाई कितनी मुश्किल से हुई है। भूल गई क्या तू, कितने बार हमने एक समय ही खाना खाया।" अपनी इस बेटी की अक्ल पर बाप हतप्रभ रह गया।
"तेरा भाई काम कर रहा है तो अब दो समय खाना मिल रहा है। यह घर, यह चॉल हमारी पहचान है, इसे ना हम छोड़ सकते हैं ना इससे ज्यादा हमारी औकात है।" इस बुढ़ापे में, बेटी की बेतुकी बातें, माँ को परेशान कर रहीं थीं।

"अब तेरी भी शादी कर देने का टाइम है। बिरादरी से अच्छे रिश्ते आ रहें हैं।" माँ की बात पर नाक मुंह सिकोड़ कर माला ने उत्तर दिया।

"नहीं, मैं अभी शादी नहीं करुंगी। अपना फ्लैट लूंगी, कार लूंगी और फिर सोचूंगी।" खाने की थाली सरका कर उठ गई थी माला।

पिछले कुछ दिनों से कंपनी का काम संभालने की जिम्मेदारी रुबी के भाई धवल ने संभाल ली थी। रुबी के पापा की तबियत ठीक नहीं थी और इतनी बड़ी कंपनी की जिम्मेदारी धवल ने संभाल ली।

ऑफिस के स्टाफ से धवल को परिचित कराने के लिए एक छोटी सी वेलकम पार्टी रखी गई थी। पहली बार माला ने धवल को देखा तो देखती रह गई। रुबी से विपरीत, गोरा चिट्टा, हैंडसम लड़का धवल। पार्टी के बाद उसी दिन से अपने केबिन को अपने अनुसार बनवाने का काम धवल ने आर्किटेक्ट को दे दिया।

दो पीढ़ियों के बीच काम करने का अंदाज अलग सा था। धवल एकदम आधुनिक ढंग से काम करना पसंद करता था। सभी कामवालों के मनोरंजन के लिए एक रिक्रिएशन रुम भी बनाने का काम दिया। उसे खुद के लिए "सर" का संबोधन बिल्कुल पसंद नहीं था वह खुद सभी सीनियर लोगों को नाम से बुलाता था।

माला ने उसे सिर्फ दो-तीन, बार देखा था। 
"माला, इस काम को और भी कम स्पेस में, कम खर्च में किया जा सकता है। मुंबई में जगह बेशकीमती है। थोड़ा समय लो, परंतु काम परफेक्ट करके लाना।" केबिन में चार लोगों के सामने कहा था धवल ने।
"सर, आपको मेरा नाम याद है।" आश्चर्य से पूछ लिया था माला ने।
"माला, पहले तो मेरा नाम सर नहीं धवल है। दूसरी बात, मुझे नाम कभी भूलते नहीं।" इस अंदाज से कहा धवल‌ ने की, माला सारी रात सो नहीं सकी।

"क्या लड़का है, अब तो कंपनी का मालिक भी है।" उसका मन ऊँचे ख्वाब देखने लगा। कमा कमाकर कितना भी कर लेगी वो परंतु इन अमीरों की बात निराली होती है। रुबी की तरह धवल की भी अलग अलग कारें, एक से एक ब्रांडेड कंपनी के कपड़े देखकर, माला को उनकी और उनके जैसे अमीरों की ज़िंदगी से ईर्ष्या होने लगी थी।
 
घर में माँ-बाबा और भाई से आने-जाने की तकलीफ़ो का बखान करके, आखिरकार माला ने ऐसे एरिया में वन रुम किचन किराए पर ले लिया जो उसके घर और आफिस के बीच था। किराया इतना था कि अपनी तनख्वाह में खींचतान कर दे सके। घर में पैसे देने का उसने सोचा ही नहीं, भाई है ना मांँ-बाबा का ध्यान रखेगा। कटी शाख की तरह उसने, अपने पेड़ से अलग होने में संकोच नहीं किया।

"आजकल तुम टिफिन नहीं लाती?" उसको आफिस में एक दोस्त ने पूछा।
"हाँ, आजकल मैंने दोपहर का खाना बंद किया है। मोटी होती जा रही हूँ और दिनभर बैठकर काम करना होता है।" कह तो दिया माला ने परंतु भूख तो लगती थी। खुद सुबह खाना बनाकर टिफिन लाने की फुर्ती नहीं थी। रोज बाहर से कुछ लेकर खाने की पर्स अनुमति नहीं देता था। अक्सर चाय-ब्रेड या चाय के साथ पराठा खा आती थी। रात को घर जाकर कुकर में दाल चावल बनाकर खाती। रोज खाते समय मांँ की याद बहुत आती थी परंतु अपने बड़े सुनहरे भविष्य की चाहत में, वह सब भूल जाती थी।

आफिस का रंग-रूप बदल गया था, धवल ने एकदम आधुनिक ढंग से बनवाया था। सभी की सुविधाओं का ध्यान रखा गया था। कई बार माला ने महसूस किया कि उसके लंबे बाल, उसकी आधुनिकता पर धब्बा थे। आफिस में आने जाने वाली, काम करने वाली सभी लड़कियों के बाल‌ एकदम खूबसूरत ढ़ंग से कटे रहते थे। 
"ये पैसा भी कमाल करता है, पैसे खर्च करके लोग अपने चेहरे को कितना बदल लेते हैं।" अक्सर कुछ लड़कियों को देखकर सोचती थी माला। उसका बड़ा मन होता था कि किसी अच्छे बड़े ब्यूटी पार्लर में जाकर, अपने शरीर के रखरखाव पर खर्च करे, परंतु जितना कमाती थी उतना तो घर किराया, आना-जाना और खाने में खत्म हो जाता था।

खैर, धवल के उन्मुक्त और सहयोगी स्वभाव का जादू माला पर इस कदर छा गया कि अब वो सिर्फ धवल की पसंद नापसंद के अनुसार कपड़े पहनती, तैयार होती। बालों की चोटी बनाना बंद करके, ऊपर कसकर बाँध आती।

आज तो माला बहुत खुश हो रही थी क्योंकि कल एक ऑफर कूपन में उसे एक बड़े ब्यूटी पार्लर में हेयर स्टाइलिस्ट से बाल कटवाने का मौका मिला। एक समय अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारे  लगने वाले बालों को, अपनी उन्नति के रास्ते में रोड़ा समझ कर  माला ने मोह त्याग दिया। आज उसे ऑफिस पहुँचने में थोड़ी देर भी हो गई। खूब सज-संवर कर वो आज धवल को एकदम आधुनिक ढंग की दिखना चाहती थी। पैंट और हलके रंग की शर्ट, खुले सुंदर, स्टाइल से कटे खुले बाल, हल्का सा मेकअप। अपनी खूबसूरती पर खुद रीझे जा रही थी माला।

ऑफिस के मेनगेट के अंदर कदम रखा तो आश्चर्यचकित रह गई। बहुत सुंदर सजावट, सारे खुले मैदान में शामियाना लगा हुआ था। 
"शनिवार रविवार की छुट्टी थी और इतनी सजावट हो गई!!ऐसा क्या हो गया?" मन ही मन सोचती ऑफिस के अंदर आ गई। 
आज रुबी को देखकर दूसरी बार आश्चर्य हुआ माला को। रुबी को पापा‌ और भाई की कंपनी, बिजनेस में बिल्कुल रुचि नहीं है।
"हैलो रुबी! आज तुम ऑफिस में कैसे?" माला ने रुबी को देखकर पूछ बैठी। पारंपरिक परिधान में रुबी बड़ी प्यारी लग रही थी।
"डियर माला, ऑफिस तो मेरा ही है इसलिए मेरा आना कोई आश्चर्य की बात नहीं। वैसे तुमने कब इतने छोटे बाल कटवा लिए, मेरे लिए तो यही आश्चर्य की बात है!" रुबी ने अपनी पुरानी दोस्त को तल्ख़ स्वर में उत्तर दिया।
अब माला को अहसास हुआ कि सचमुच रुबी इस कंपनी के मालिक की बेटी है। नौकरी में लगने के दो माह बाद से ही माला ने उसे फोन करना बंद कर दिया था, शायद रुबी की नाराज़गी की यही वजह थी। माला अपने भविष्य को संवारने की प्लानिंग में इतनी डूब गई थी कि पढ़ाई के बाद तुरंत जॉब दिलाने वाली रुबी को भी याद करने का समय नहीं निकाला।

"अरे! तुम तो गुस्सा हो गई। मैंने तो यूँ ही पूछ लिया।" आदतन मीठी आवाज बनाकर माला बोली।
"मैं और नाराज़, कभी नहीं! वो भी आज के दिन.?" रुबी ने हँसकर कहा।
"आज क्या विशेष है? तेरा जन्मदिन भी नहीं.! आज क्या है बता तो सही।" माला ने मनुहार की।

"आज मेरे भाई धवल की सगाई हो रही है। मेरे लिए बहुत खुशी का दिन है। भाई ने ऐसी लड़की को पसंद किया जिसका कोई नहीं है, अनाथ आश्रम में पली बढ़ी परंतु स्वभाव, व्यवहार में बहुत प्यारी, दिल से प्रेम करने वाली।" आगे माला के कानों ने सुनने से इंकार कर दिया।

सामने से धवल और उसकी होने वाली जीवनसाथी आ रहे थे। दोनों हाथों में हाथ लिए, जीवन की नयी राह पर चलने के पूर्व सबसे आशीर्वाद ले रहे थे। उस लड़की के लंबे बालों की गूंथी चोटी, उसके कमर से नीचे लटक रही थी। माला के कदम थम गए, वह अनजाने में ही अपने कटे बालों को सहलाने लगी।

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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

कहानी_ नीलोफर

प्रकाशित गृहशोभा जनवरी प्रथम अंक २०२२ में

कहानी_"नीलोफर"

खिड़की के सामने अशोक की झाँकती टहनी पर, छोटा सा आशियाना बना रखा था उसने। जितनी छोटी वो खुद थी, उसके अनुपात से बित्ते भर का उसका घर। मालती जब जब शुद्ध हवा के लिए खिड़की पर आती, उसको देखे बिना वापस ना जाती। वो थी ही बला की खूबसूरत! चिकनी चमकती सुडौल काया, पीठ जहांँ खत्म होती वहीं से पूँछ शुरू हो जाती। भूरे छोटे परों पर दो चार नीले परों का आवरण चढ़ा था, यही नीला आवरण उसे दूसरी चिड़ियों से अलग करता था। उस छोटी सी मादा को भी, अपनी सबसे खूबसूरत चीज पर अभिमान तो जरूर ही था। 

 खाली समय में, चोंच से नीले परों को साफ करती, अपनी हलकी पीलापन लिए भूरी आँखों से चारों ओर का जायज़ा लेती कि उसके सुंदर रुप को कोई निहार भी रहा है या नहीं।

उस नन्हीं चिड़िया के खूबसूरत पँखों के कारण ही, मालती ने उसका नाम "नीलोफर" रख दिया था।

"मम्मी, नीलोफर ने शायद अंडे दिए हैं। वो उस घोंसले से हट ही नहीं रही।" मालती की चौबीस साल की बेटी नीलू ने उसी खिड़की के पास से मालती को आवाज दी।
"मुझे भी ऐसा ही लगता है, इसलिए इतनी मेहनत करके घर बनाया उसने।"  कहती हुई मालती भी खिड़की के बाहर झाँकने लगी।

नीलू को बाहर टकटकी बाँधें देखकर, मालती नीलू के बालों पर अंगुलियों से कंघी करने लगी।
"आपने इस चिड़िया का नाम नीलोफर क्यों रखा मम्मी?" नीलू अभी भी उस छोटी चिड़िया में गुम थी।
"उसके नीले पँख कितने प्यारे हैं, बस इसलिए वो नीलोफर हो गई।" मुस्कुराते हुए मालती ने कहा।
"मेरा नाम नीलू क्यों रखा?" अगला सवाल नीलू ने।
"इसलिए कि तुम्हारी नीली आँखें झील सी पारदर्शी हैं। तुम्हारे हृदय की बात, आंँखें कह देती हैं तो तुम नीलू हो।" मालती ने कहा और फिर नीलू की व्हील चेयर को धकेल कर बैठक की ओर ले गई।

नीलू ने रिमोट से टेलीविजन चालू किया और कुछ पंजाबी डांस वाले गानों का आनंद लेने लगी।  किसी त्यौहार का दृश्य था और रंग-बिरंगी पोशाकें पहने लड़कियाँ, ढ़ोल की थाप पर झूम-झूम के नाच रहीं थीं। मालती ने कनखियों से नीलू को देखा, वह तन्मय होकर गाना गा रही थी और कमर के ऊपर के शरीर को नाचने की मुद्रा में ढालने में लगी थी।

उसे गाने के बोल और नृत्य की मुद्राओं में तल्लीन देखकर, मालती उसके बचपन में खो गई।
"मम्मी, मुझे क्लासिकल डांस नहीं सीखना है, मुझे तो डांस वाले फिल्मी गाने पसंद हैं.  सात साल की नीलू ने जिद करके बालीवुड गानों पर नाचना शुरू किया था।
"क्या है मम्मी, ये दिन भर बंदरिया की तरह उछल-कूद मचाती रहती है। आइने के सामने मटकती रहती है और कोई काम नहीं है क्या इसको?" नीलू से चार साल बड़ा, शुभम झल्लाता रहता।
"आप भी नाचो ना, आपको तो आता ही नहीं।" कहती नीलू उसको और चिढ़ाती।

समय पंँख लगा कर उड़ता गया और नीलू नौ साल की हो गई। 
"कल सुबह बस से शुभम की स्कूल पिकनिक जा रही है। हम उसको स्कूल बस तक छोड़ आएंगे।" मालती ने अपने पति से कहा।
"मैं भी जाऊंगी भैया को छोड़ने।" नीलू ने रात को ही कह दिया था।
सुबह सब कार से शुभम को स्कूल बस तक छोड़ कर वापस आ रहे थे।
"पापा, रुको ना! हम वहां रुककर कुछ खाते हैं। मेरी फ्रेंड्स कहतीं हैं कि सुबह यहांँ वड़ा पाव, इडली डोसा और सैंडविच बहुत अच्छे मिलते हैं।" स्कूल के रास्ते पर, एक छोटे से  रेस्टोरेंट के आगे नीलू ने कहा।

सब उतर ही रहे थे और नीलू दौड़कर सड़क पार करने लगी।
"नीलू, बेटा रुको!" मालती की आवाज़ बाजू से गुजरती कार के ब्रेक मारने में दब गई।
मिनटों में पासा पलट गया था, लहुलुहान नीलू अस्पताल में बेहोश पड़ी थी। ‌तब से आज तक वह कभी खड़ी अपने पैरों नहीं हो पाई है। खेलता-कूदता, दौड़ता-नाचता बचपन कमर के नीचे से शांत हो गया। व्हील चेयर में उसकी दुनिया समा गई थी।

"मम्मी, भैया को आज वीडियो कॉल करेंगे तो मुझे उनसे एक बैग मंगवाना है।" नीलू की आवाज़ से चौंककर मालती वर्तमान में आ गई।
"हाँ, आज करते हैं शुभम को काॅल।"  अमेरिका में जाॅब कर रहे बेटे शुभम के बारे में बात हो रही थी।

दूसरे दिन सुबह-सुबह भाई से बात करके, अपने लिए एक मल्टीपर्पज बैग लाने को कहकर नीलू व्हील चेयर लेकर खिड़की पर आ गई।

पापा और भाई की सलाह से, नीलू ने अपनी पढ़ाई ‌ तो चालू रखी ही, साथ ही हस्तकला की सुंदर चीजें भी बनाती रही। ईश्वर ने उसके पैरों की सारी शक्ति मानो हाथों को दे दी। बारीक धागों, सीपियों, मोती, जूट से खूबसूरत बैग और वाॅल हैंगिंग बनाती थी। उसके काम में मदद करने के लिए मालती तो थी ही, साथ एक और लड़की को रखा था जो सामान उठाने, रखने में मदद करती थी। बड़ी बुटीक से आर्डर आते थे और सब मिलकर उसे समय पर पूरा करते। धीरे-धीरे जिंदगी अपनी गति फिर पकड़ने लगी थी।

"मम्मी, आपको मेरी बहुत चिंता होती रहती है ना?" एक चिर-परिचित से अंदाज में नीलू कहा करती थी।
"नहीं तो, मैं क्यों करुँ तेरी चिंता। तू तो खुद समझदार है, अपने काम कर लेती है। बुटीक के आर्डर भी संभालती है और पढ़ाई भी कर रही है।" मालती हमेशा उसे प्रोत्साहित करती।
"आपके चेहरे पर इतनी झुर्रियाँ आ गईं आँखों के नीचे काले निशान हो गए अब भी कहोगी कि कोई चिंता नहीं।" नीलू की गहरी नीली आँखें मालती को अंदर तक भेद जातीं।

नीलू की कमर से निचले अंगों की स्वच्छता, कपड़े पहनाने का काम मालती खुद करती थी, एक जवान लड़की को, किसी दूसरे के हाथों से ये सब काम करवाने की स्थिति का सामना रोज ही दोनों करते थे।

अचानक, चीं-चीं, चीं-चीं की आवाज के साथ, काँव काँव का शोर होने लगा।
"मम्मी, देखो! नीलोफर के घोंसले में एक साथ तीन चार कौए आ गए। उसको परेशान कर रहें हैं। बचाओ मम्मी, नीलोफर को उसके अंडों को।" नीलू की आवाज़ दर्दनाक थी जैसे कोई उसपर घात कर रहा हो।
एक बेबस, व्हील चेयर पर जीवन बिताने वाली लड़की ने, पेड़ पर रहने वाली अकेली चिड़िया के साथ अपने को शायद दिल की गहराइयों से जोड़ लिया था।

 मालती रसोई से भागकर कमरे की खिड़की पर आ गई। नीलू की ओर देखा, वो पसीने से तर-बतर हो रही थी।
"मम्मी, प्लीज नीलोफर को बचा लो। ये कौए उसे मार डालेंगे। आपने जैसे मुझे बचा लिया, इसको भी बचा लो मम्मा..!" नीलू की आवाज़ कुएं से बाहर आने का प्रयास कर रही थी। एक अंधकार जिसमें वो खुद जी रही थी, एक सन्नाटा जिसको वो झेल रही थी जहाँ मीलों उसकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था। मुट्ठी में आशाओं का क्षितिज था, जो हमेशा मुट्ठी से फिसलने को लालायित रहता।

"बेटा, हर एक को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। कोई दूसरा कुछ मदद तो कर सकता है पर जीवन भर साथ नहीं दे सकता।" मालती ने नीलू का हाथ थाम लिया, "नीलोफर की लड़ाई, उसकी अपनी है। हम सिर्फ ईश्वर से प्रार्थना कर सकतें हैं कि उसको शक्ति दे।" 
"आप तो उन कौओं को भगा सकती हो ना, मैं तो उठकर उन्हें नहीं मार सकती।" नीलू की आवाज कंपकंपा रही थी।
"अपने अंडों की चिंता हमसे ज्यादा नीलोफर को खुद है। तुम देखो, वो कैसे अपनी लड़ाई लड़ेगी।" मालती ने बेटी को दिलासा तो दे दिया परंतु एक नन्ही सी चिड़िया की शक्ति पर उसको विश्वास नहीं था अतः अंदर से एक बड़ी लकड़ी ले आई।

सामने देखकर हतप्रभ रह गई कि चार कौओं से अकेली नीलोफर पूरे विश्वास से जूझ रही थी। अपनी छोटी परंतु नुकीली चोंच से, कौए की आँखों पर वार कर करके, दो कौओं को भगा दिया उसने। एक नज़र अपने अंडों पर डाली, पंख फड़फड़ा कर शक्ति का संचार किया, परंतु यह क्या..? उसके नीले चमकीले पंखों में से दो गिर गए थे। एक भरपूर निगाह गिरे पंखों पर डालकर वो तेजी से चीं-चीं, चीं-चीं करती हुई, बचे दोनों कौओं पर वार करने लगी।

साँस थामकर खिड़की से मालती और नीलू, उस नन्हीं सी चिड़िया का हौसला बढ़ा रहे थे। पक्षी हृदय की बात बहुत जल्दी समझ लेते हैं जो ज़ुबान के रहते मनुष्य नहीं समझ पाता।
 संबल देती चार आँखों ने नीलोफर को बिजली सी गति दे दी। उड़-उड़कर वह अपनी चोंच से लगातार वार करती रही। कौओं की बड़ी, मोटी चोंच से खुद को बचाना छोड़ दिया उसने और आक्रामक हो गई।

आखिर एक माँ के आगे वो दोनों हार गए और भाग खड़े हुए। लंबी श्वास भरकर नीलोफर ने अपने घोंसले में सुरक्षित अंडों को प्रेम से जी भर देखा। उसकी नज़र खिड़की पर रुक गई, जहाँ दो मादाएं ताली बजाकर उसका अभिनंदन कर रहीं थीं।

नीलोफर, अपने क्षतिग्रस्त शरीर का मुआयना करने लगी। जगह जगह, कौओं की चोंच से घाव हो गए थे। उसके चमकीले, नीले पंँख अब शरीर छोड़कर नीचे गिर गए थे। उसकी आँखों में एक बूँद सी चमकने लगी। 

"नीलोफर, तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत चिड़िया हो, तुम्हें नीले पंखों की जरूरत ही नहीं है। आज तुम्हारी खूबसूरती को मैंने महसूस किया है।" नीलू की बात, उस छोटे से पंछी को कितनी समझ आई पता नहीं परंतु  वह खुशी से चिचियाने लगी।

नीलू ने घूमकर मालती की ओर देखा, मम्मी के दमकते चेहरे में आज कोई झुर्रियाँ, आँखों के नीचे कोई कालापन नहीं दिखाई दिया।

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यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।
लिखने की तिथि- 26/8/2021


नाम- शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

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Sharmila chouhan
 C-1401, Niharika kankia Spaces
Opposite Lokpuram Temple
Thane (west) 400610
Maharashtra
M.no.9967674585
email- sharmilachouhan.27@gmail.com

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

212 212 212 212 पर गजल2/9/21

मुसलसल गज़ल

212  212  212  212

रदीफ़- लगे
क़ाफ़िया- आने

हौसलों से भरे गीत गाने लगे
शूर अपनी कहानी सुनाने लगे।1।

शाम  चौपाल पर बैठ कर गांँव की
जिंदगी के तजुर्बे बताने लगे। 2।

याद करके पुरानी सभी जंग को
मूँछ पर हाथ अपने फिराने लगे। 3।

टाँग टूटी रही पर थमे वो नहीं
ले सहारा उठे मुस्कुराने लगे। 4।

जन्म लेकर सदा प्राण अर्पित करें
भारती से यही वो मनाने लगे। 5।

शर्मिला चौहान