कहानी - छरफुक्कन
इंदू आंगन से दौड़ती हुई भीतर आई और उसका पैर दूध के बर्तन से टकरा गया। दूध गिराकर वह तेजी से अंदर के कमरे में घुस गई।
"अब क्या गिराई-पडा़ई रे छरफुक्कन छोकरी। दिन भर दौड़ भाग करती है, छन-छन में नुकसान करती है नासपीटी।" बरामदे में माला जपती दादी गुस्से से चिल्लाई।
"हैरान करके रखा है इसने। बिना किसी नुकसान के, तोड़फोड़ के इसका दिन ही नहीं जाता।" नीचे गिरे दूध को कपड़े से पोंछती हुए इंदू की माँ बड़बड़ाई।
"आपको ही शौक था अम्माँजी कि तीसरा तो बेटा ही होगा। बेटा-वेटा तो ना हुआ यह निगोड़ी आ गई करम फोड़ने।" मांँ की आवाज से आठ साल की इंदू सोच में पड़ गई।
"माँ, अगर मेरी जगह भाई होता तो आज यह दूध न गिरता ना?" बस, माँ ने उसकी बांँह पकड़ी और पीठ पर दो धमाके जड़ दिए। रोती-बिसूरती इंदू किनारे पड़े दीवान पर पसर गई और थोड़ी ही देर में गहरी नींद में सो गई थी।
साधारण नौकरी वाला, सामान्य परिवार तीन लड़कियों की जिम्मेदारी कैसे संभाल सकता था? तीन लड़कियों की पैदाइश ही मानो इस घर में असाधारण बात थी फिर अंतिम फूल के प्रति मन कैक्टस सा कांटेदार हो तो ऐसी घटनाएं रोजमर्रा का अंग बन जाती हैं।
घर मालिक विश्वनाथ, सरकारी दफ्तर में छोटे बाबू थे। उनकी अम्माँ उन्हें बड़ा अफसर बताया करती थीं परंतु पत्नी सुभद्रा को सच्चाई से कभी परहेज नहीं रहा।
"अम्माँजी क्लर्की के काम को अफसरी बताने पर क्या घर में तनख्वाह ज्यादा आ जाती है या बोनस भत्ता दुगुना मिल जाता है?" सुभद्रा की यह बात अम्मांँजी अनसुना कर देती थीं। विश्वनाथ जी की दोनों बड़ी कन्याएं क्रमशः सोलह साल की निधि और बारह साल की नीमा थीं। दोनों शांत, सुशील, आज्ञाकारी दादी का हाथ पैर दबाने वाली, माँ का काम दौड़कर करने वाली और बाबूजी के आगे पीछे थैला पकड़ने वाली सुघड़ कन्याएं थीं।
इंदू , ऐसी संतान जिसके गर्भ में आने पर दादी की जपमाला दुगुनी हो गई थी।
" हे प्रभु आखिरी दांव है, बेटा दे दे। विश्वनाथ का वंश आगे चलता रहेगा।" उनकी दुगुनी जपमाला से सुभद्रा को भी अपने पेट में अभिमन्यु का एहसास होने लगा था। जिस दिन बच्ची ने जन्म लिया, उसी रात अस्पताल में आग लग गई। वैसे उस दिन अस्पताल में चार और बच्चे पैदा हुए थे पर ठीकरा तो इस बच्ची के परिवार ने इसी के सिर फोड़ा। अब बिजली विभाग ने अपना काम सही ढंग से नहीं किया और दोष नवजात इंदू पर आ गया। सवा महीने में नामकरण की शुभ बेला थी उसी दिन विश्वनाथ जी की फाइलों की अचानक जांच हुई और हिसाब किताब की सही गणना ना मिल पाने पर उन्हें छह महीनों के लिए नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। नामकरण तो हुआ "इंदू" परंतु जपमाला की उलटबांसी जानकर दादी ने उसे "छरफुक्कन" नाम दे दिया।
दफ्तर के काम की गड़बड़ी दो साल पुराने हिसाब किताब की थी परंतु अपराधी साबित हुई यह नवजात कन्या, जिसका दो साल पहले कहीं कोई अता-पता नहीं था। अमावस्या को पैदा हुई थी तो दिन दूनी रात चौगुनी चंद्रमा की तरह बढ़ने लगी। बड़ी बहनों के आगे पीछे घूमती, उनकी पुस्तक कॉपी पर पेंसिल चलाती और खुश होती बच्ची इंदू की व्यथा उस समय और बढ़ गई जब उसका पहला जन्मदिन आया।
इंदू के पहले जन्मदिन पर उसकी सबसे बड़ी दीदी निधि, जो उसे वक्त नौ साल की थी सड़क पर गिर पड़ी और उसके सामने के दो दांँत टूट गए।
"कैसी कुलच्छन जन्मी है इस घर में, जिसके जन्म से लेकर आज पहले जन्मदिन तक अशांति ही अशांति है।" मां निधि के बहते खून को पोंछती जाती और खुद रो-रो कर छोटी बेटी पर दोष मढ़ती जाती।
भगवान की मर्जी थी कि सबका कोपभाजन बनी बच्ची स्वस्थ, सुगठित, खुशमिजाज और हर बात में तेजतर्रार थी। विश्वनाथ को छोटी बच्ची की मासूमियत और उसके निर्दोष होने पर कभी-कभी बड़ा पछतावा होता परंतु वह मध्यम वर्ग का ऐसा पिता था जो अभी भी अपने आप को एक आदर्श बेटे के फंदे से छुड़ा पानी में असमर्थ था।
अब तो परिवार ने तीसरी लड़की के जन्म को, अपने घर के सर्वनाश का कारण साबित करने के लिए कमर कस लिया था। इस घर में जो कुछ भी लीक से हटकर होता, उसका सारा दोषारोपण भगवान की दी हुई इस अतिरिक्त बेटी के सिर मढ़ दिया जाता।
दूसरे नंबर की बेटी नीमा के जन्मदिन पर विश्वनाथ एक बछिया खरीद लाए थे।
"तीन-तीन छोरियां हैं घर पर, दूध दही की खरीदी तो कर नहीं सकते आये-गये के चाय पानी के लिए भी मुंँह देखना पड़ता है। एक बछिया ले आता तो दो-तीन साल में बिया जाती। कम से कम दूध दही का भरोसा हो जाता।" अपनी अम्माँजी की इस बात को शिरोधार्य करके विश्वनाथ ने, इस महीने नीमा के जन्मदिन पर बछिया ला दी थी।
"माँ, यह लड़की है या लड़का?" उसके चारों ओर घूम-घूम कर उसे प्यार से स्पर्श करती इंदू ने पूछा।
"लड़की है, बछिया है ना।" आज माँ बिना तुनके बोल रही थी। इंदू सोच में पड़ गई कि वह भी तो लड़की है उसे कितनी गालियांँ पड़ती है। बछिया को तो जानबूझकर, पैसे देकर खरीद कर लाए हैं। उसे इस घर का हिसाब-किताब समझ ना आता। प्यार मनुहार से बछिया बिल्लो बढ़ने लगी और क्षण-क्षण गाली खाकर छरफुक्कन इंदू।
इंदू जैसे-जैसे बड़ी हो रही थी वैसे-वैसे घरवालों को उससे चिड़ होती जा रही थी। वह गुल्लक में पैसे जमा करती तो कभी भी पटक कर फोड़ देती, पैसे निकालकर बर्फ, अमरूद और चने खरीद लाती।
"राम राम! कैसी छोरी है जो मिला खा-पी के खत्म कर देती है, ना आगे सोच ना पीछे देखना। झाड़ू मार के निकल जाती है। जिस घर जाएगी सारे घर में झाड़ू फिरा के सब कुछ सत्यानाश कर देगी छरफुक्कन।" दादी उसे आसपास भी देख लेती तो बड़बड़ाना शुरू कर देती थीं।
बड़ी बेटी निधि के शादी की तैयारी हो रही थी। लड़के वालों के सामने इंदू को आने ही नहीं दिया गया पता था कुछ ना कुछ गड़बड़ कर देगी। निधि के दूध के टूटे दांत तो दोबारा उग आए थे परंतु शादी में गड़बड़ हो गई तो क्या करते?
खैर, अब बढ़ता खर्च, लड़के वालों की फरमाइशें, शादी की तैयारियों का जोर दादी का कुछ पुराना बूढ़ा दिल झेल नहीं पाया और एक महीना पहले वो स्वर्ग सिधार गईं।
"सच कहती थीं अम्माँजी, इस छरफुक्कन के पैदा होने के बाद कोई काम सही नहीं हुआ। अब सिर पर ब्याह है और अम्माँजी संसार छोड़ गईं । हे राम! कैसे होगा आगे?" माँ रोती जाती और हमेशा की तरह ठीकरा बस एक पर फूट रहा था।
"माँ, दीदी के ससुराल वालों को मैंने देखा भी नहीं परंतु दादी को आज सोलह साल से देख रही थी। उनका दिल चलते-चलते रुक गया, तो उसमें मैं क्या करूंँ?" जवान होती इंदू ने जवाब देना शुरू कर दिया था।
समय की मार और वाक् तीरों को झेलती इंदू ने, अपने पैरों को जमीन पर जमाते हुए आसमान की ओर देखना शुरू कर दिया था। उसने ग्रेजुएशन कर लिया था। दोनों बहनें अपने घरों में सुखी थी परंतु इंदू से ज्यादा मेलजोल रखने से कतराती थीं।
"नीमा का सातवां महीना, गोद भराई का बुलावा आया है उसकी ससुराल से। इस काम में सब मायके से ही जाता है नीमा के बाबूजी। साड़ी, मेवा, फल, मिठाई, सास-ससुर और दामाद के कपड़े।" माँ ने सामान की सूची बाबूजी को पकड़ा दिया था। बाबूजी ने लिस्ट पढ़ी, दस-बारह हजार का खर्च देखकर उनका दिल बैठ गया।
"सबके लिए कपड़े अभी थोड़ी लिए जाते हैं। निधि के समय तो सिर्फ उसी के कपड़े गए थे।" बाबूजी ने याद दिलाया।
"चार-पांच साल में दुनिया बदल जाती है। इसके घर का स्टैंडर्ड कुछ अलग है सो नीमा ने खुद कहा है।" माता-पिता की बातें सुनकर इंदू ने सोचा इस घर की दुनिया तो पिछले बीस-इक्कीस सालों में अपनी सोच, अपनी मानसिकता में जी रही है। क्या बदल गया, कुछ भी तो नहीं। बदल तो उसकी दोनों बहनें गई हैं जो ससुराल में यह चाहिए, वह चाहिए, अमुक त्यौहार फल-मिठाई भेज देना, शगुन का नकद लिफाफा भेजना, हिदायतें देती रहती हैं जबकि पिताजी के सेवानिवृत्ति की जानकारी उन दोनों को है।
नीमा का मन तो नहीं था पर दुनिया दिखावे के लिए मायके से सबको बुलाना जरूरी था।
"उसे समझा देना अम्माँ, चुपचाप एक जगह बैठी रहे। यहांँ कोई नए झंडे गाड़ने की जरूरत नहीं है।" दीदी की फोन पर आवाज इंदू के मन को चुभ गई।
इंदू का मन हुआ कह दे उसे जाना भी नहीं है परंतु यह दुनिया है पूरी तरह से दिखावे की दुनिया। इसका एहसास तो उसे हर दिन, हर समय होता ही रहता है।
परसों ही कॉलेज से अपनी अंक सूची लेकर आते हुए, उसे पड़ोस की मधु चाची मिल गई।
"कहांँ घूम रही हो इंदू?" चाची ने ही आवाज दी।
"कॉलेज आई थी चाची, माँ ने कुछ सामान मंगवाया है सो सामान लेकर जा रही हूंँ।" साइकिल पर सामान का बैग रखते हुए इंदू ने कहा।
"आप भी कुछ लेने आई हो?" सहज व्यावहारिकता भरा प्रश्न था इंदू का।
"हांँ-हांँ, प्रिया को देखने लड़के वाले आ रहे हैं तो जरा कुशन-कवर, पर्दे बदलने की सोच रही हूँ।" मधु चाची ने उत्साह से कह तो दिया परंतु अगले ही क्षण उनका चेहरा उतर गया जैसे कुछ गलत हो गया हो।
बस कल शाम तो मांँ उस पर बरस पड़ीं, "क्या जरूरत थी तुझे पूछने की उनसे? किसी का तो भला होने दिया कर। अपने घर का तो बेड़ा पार करती ही रही है, अब पड़ोसी-पड़ोसियों के घरों का क्यों बंटाधार करती है?" माँ की बात बिल्कुल समझ नहीं आई इंदू को।
"क्या हुआ माँ, अब क्या किया मैंने?" इंदू ने माँ के सामने आकर पूछा।
"कल तुझे मधु मिली थी ना तो उससे बातें क्यों की तूने? उसकी बेटी को लड़के वाले देखने आने वाले थे, तेरे से बात हुई और आज उन्होंने रिश्ते की बात कैंसिल कर दी।" अम्मा ने सिर धुनते हुए कहा।
"बात उन्होंने की थी माँ फिर मैंने पूछा था। मुझे तो मालूम भी नहीं था कि प्रिया की कहीं बातचीत चल रही है, चाची ने खुद बताया। अब उनकी लड़की की कोई बात लड़के वालों को पसंद ना आए तो उसमें मैं क्या करूंँ?" कहती हुई इंदू अपने एम.ए. का फॉर्म भरकर, जमा करने निकल गई।
"तेरे लच्छन, तेज मुँह, खोटा भाग सबको पेर देंगे।" माँ की आवाज उसके कानों से दिल को चुभती चली गई।
दिल बड़ा संवेदनशील होता है, वह धड़कता है तो शरीर जिंदा है। कितने भी परदों, तालों में बंद रखती थी वह अपने दिल को पर पैने नश्तर कहीं ना कहीं से घुस कर भेद ही डालते थे। शाम को बाबूजी-माँ कमरे में कुछ बातचीत कर रहे थे। करीब एक घंटे दोनों में बातें हुई फिर बाबूजी बरामदे में बैठ गए।
"इंदू, एक बात पूछनी है तुमसे।" बाबूजी की आवाज हमेशा की तरह थकी सी थी।
वह चुपचाप खड़ी हो गई बाबूजी ने बैठने का इशारा किया और वह वहीं रखे मोढे पर बैठ गई।
"आज एम.ए. का फॉर्म भरकर आई तू, तेरी माँ ने मुझे बताया।" बाबूजी पूछे।
"हाँ, मुझे अर्थशास्त्र में एम.ए. करना है इसीलिए तीन कॉलेजों के फॉर्म भरी हूँ मैं बाबूजी।" बड़े आत्मविश्वास से बोली थी इंदू क्योंकि वह अपनी पढ़ाई अपनी छात्रवृत्ति से करती थी।
"एक अच्छे लड़के का रिश्ता है बेटा। जीवन बीमा में काम करता है। खुद का छोटा सा घर भी खरीद लिया है। अकेला है, ताऊ-ताई गांँव में हैं। माता-पिता दुर्घटना में कुछ साल पहले चल बसे थे। बाबूजी की आवाज से लगा कि उन्होंने सब पता कर लिया है।
"पर बाबूजी मुझे आगे पढ़ना है।" इंदू बोल पड़ी।
" ठीक है, अभी इतनी पढ़ाई कर ली हो आगे वही जाकर पढ़ लेना।" माँ के स्वरों की तेजी और रवैया बदला नहीं था। बाबूजी ने इशारे से उन्हें चुप करवाया और बोले, "मेरे साथी ने रिश्ता बताया है। मैंने भी बीमा ऑफिस जाकर लड़के को देखा, उसके बारे में पता किया। पढ़ा-लिखा, समझदार, अच्छा लड़का है। बात तो करते हैं।" बाबूजी अपने ढलते शरीर और जिम्मेदारियां से उकता गए थे जो उनके चेहरे और आवाज से अक्सर झलक जाता था। नेहा ने सिर झुका लिया।
नीमा की गोद भराई के बाद इस लड़के से बातचीत करने का तय हुआ। गोद भराई में दीदी की हिदायत के मुताबिक इंदू एक ही जगह पर बैठी रही मानो किसी ने मूर्ति को रख दिया हो। लेनदेन में माँ ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी, दीदी के बताने से सब कुछ बीस ही रखा था सामान और नकद। आते हुए माँ ने पहले प्रसव के लिए बिटिया को मायके लाने का प्रस्ताव रखा जिसे दामाद ने मंजूर नहीं किया।
"अम्माँ जी, यहाँ भरा-पूरा परिवार है, देखभाल भी अच्छी होगी। आप जब मन हो आया जाया करना।" दामाद जी ने अपनी बात खत्म की। नीमा दीदी के चेहरे से उनकी खुशी दिख रही थी शायद मायके में इस बहन की उपस्थिति उनके मन में डर पैदा करती थी।
नीमा की गोद भराई के पंद्रह दिनों बाद बाबूजी के साथ भोला चाचा ने बात की। उन्होंने लड़के को साथ लेकर आने की बात बताई। माँ के चेहरे पर घबराहट थी जिस लड़की ने जन्मते ही अपना छरफुक्कन कदम दिखाया, उसे ब्याहने वाले का क्या होगा?
इंदू बाहर से आई तो घर का माहौल बदला हुआ था। सिर पर हाथ धरे बाबूजी बैठे थे, माँ देहरी पर बैठी मानो उसी का रास्ता देख रही थी।
"सही कह रही थी नीमा, तुझे ले जाना ही नहीं चाहिए था। आदमी लोक-लाज से डरता है वरना मैं तुझे वहाँ नहीं ले जाती।
"क्या हुआ माँ, दीदी ठीक तो है ना?" इंदू ने पूछा।
"होना क्या था री छरफुक्कन, दामाद जी गिर पड़े मोटरसाइकिल से पैरों में चोट आई है। दो-तीन महीने प्लास्टर चढ़ा रहेगा। हे भगवान! क्या सोचेंगे वो लोग।" माँ बिसूरने लगी।
"फालतू बातें मत करो माँ, मैंने उस दिन किसी भी काम में हिस्सा नहीं लिया था। जीजाजी से बातें भी आपने की, अब वह गिरे तो आप सारा दोष मेरे ऊपर मढ़ दे रही हो। मेरी अपनी ही सगी बहनें भी दिमाग में कैसा वहम पाले हुए हैं कि मुझे भी उनकी सूरत देखने का मन नहीं करता है।" लांछनों से घायल इंदू अपने कमरे में चली गई। क्या हाल पूछती अपनी बहन से, जब बिना कारण सबने उसे दोषी मान ही लिया है। ये उसके अपने लोग हैं दादी, माँ और अब नए ज़माने की पढ़ी-लिखी उसकी बहनें।
दूसरे दिन तैयार होकर इंदू बाबूजी के पास गई और उनसे कुछ देर बातचीत करती रही फिर साइकिल लेकर निकल पड़ी। निश्चित दिन, निश्चित समय पर लड़का सुनील और भोला चाचा घर आए। अपनी और लड़कियों के लिए जो साज-संवार, नाश्ता-पानी का इंतजाम किया जाता था इस बार उसका आधा भी नहीं किया था माँ ने। इंदू, बाबूजी के पेंशन की बात समझती थी परंतु कहीं ना कहीं उसका भी दिल चाहता था कि आलमारी में पड़े अच्छे पर्दे, अच्छी चादरें तो घर में बिछाई जाएं।
खैर, सुनील का सादा-सरल स्वभाव, सीधी-सच्ची बातें बाबूजी और इंदू को भा गई और बिना किसी दहेज के कोर्ट मैरिज का प्रस्ताव भी उन्हें जंच गया था। इंदू की शादी में, उसकी बड़ी दीदी निधि और उसके पति ने उपस्थिति दी। नीमा दीदी का नवां महीना था और जीजाजी के पैरों में प्लास्टर चढ़ा था तो इस विवाह में वे नहीं आ पाए। कोर्ट में शादी के बाद सुनील ने अपने कुछ मित्रों, स्टाफ के लोगों को छोटी सी पार्टी दी थी उसी में उसके रिश्तेदार और इंदू के माता-पिता भी शामिल हुए थे। इंदू के पढ़ने की इच्छा देखकर सुनील ने उसे एम.ए. करने के लिए प्रोत्साहित किया और एक कॉलेज में एडमिशन लेकर वह अर्थशास्त्र में एम.ए. करने लगी।
नीमा की बिटिया हुई और फिर बारसे का खर्च उसने माता-पिता पर ठोंक दिया। बाबूजी अपनी सीमित पेंशन में घर का खर्च और दोनों की दवाई पानी कर लेते थे। उन्हें अस्थमा की परेशानी तो थी परंतु फिर भी वह घर का काम खुद ही करते थे। बाजार से सब्जी, दुकान से अनाज लाने से कभी पीछे नहीं हटते थे। एक सुबह सब्जी लेने गए तो पीछे से आती ऑटो ने उन्हें ठोकर मार दी। सात दिनों अस्पताल में रहे परंतु सिर पर लगी चोट ने उन्हें घर वापस आने का मौका नहीं दिया।
इंदू और सुनील अस्पताल में लगातार उनकी सेवा देखभाल करते रहे। माँ दिन भर बैठतीं तो सुबह-शाम इंदू और रात सुनील उनके साथ रहता था। दोनों बहनों ने अपने भरे पूरे परिवार और छोटे बच्चों का बहाना ऐसा तय किया कि दोनों एक ही दिन, एक ही साथ मिलकर बाबूजी को देखने आई थीं। समय निकलता गया और उसे घर में माँ अकेली रह गई। इंदू और सुनील आते-जाते थे परंतु रोज तो यह संभव नहीं था। निधि ने फिर गर्भ धारण किया और नीमा दीदी अपनी साल भर की बिटिया में मगन रहती थीं।
अर्थशास्त्र की शिक्षिका पदों पर होने वाली नियुक्तियों का विज्ञापन आया और अंतिम वर्ष में पढ़ने वाली इंदू ने आवेदन भर दिया। इधर उसका फाइनल हुआ और उधर उच्च श्रेणी शिक्षिका की नियुक्ति हाथ में थी। पास के ही दूसरे शहर में उसका स्कूल था, यह देखकर सुनील ने अपना यह घर किराए पर दे दिया और दोनों उसे नयी जगह में रहने चले गए। सुनील रोज इसी पुराने शहर के अपने ऑफिस आता जाता था।
"माँ, अकेली रहोगी तो मुझे भी चिंता बनी रहेगी। हमारे साथ चलोगी तो सार-संभाल भी होगी अकेलापन भी नहीं रहेगा।" डरते-डरते इंदू ने माँ से पूछा।
चुपचाप देखती रही माँ, क्या करती? दोनों बड़ी बेटियों ने कभी पूछा तक नहीं कि माँ क्या खाती हो, कैसे रहती हो, कैसे जीती हो? अपनी करनी खुद सामने आ गई थी। जिसे कुलच्छन, छरफुक्कन कहकर दिन-रात उलाहने देती रहती थी, वही आज बांहें फैलाए सामने तैयार खड़ी है।
दूसरे शहर में शिफ्ट होने के बाद भी सुनील ऑफिस आते, तो सप्ताह में दो बार माँ से मिल ही जाते थे। एक साल पूरा होते होते माँ ने मन बना लिया और घर को ताला लगाकर वह इंदू के पास आ गई थी। तीन साल वहां रहकर, वापस अपने इस शहर में स्थानांतरण करवा लिया था इंदू ने। अपने घर को सुधारकर सुनील, इंदू और माँ ने एक अच्छी शुरुआत की। माँ के मकान को किराये पर दे दिया था।
माँ के शहर वापसी पर दोनों बहनें अपने परिवार सहित मिलने आई थीं। दोनों की दो-दो प्यारी बेटियों पर अपना प्रेम बरसाया था इंदू ने। माँ तो बेटियों को देखकर, कुछ अनमनी हो गई थीं।
"माँ, अब इंदू के भी बाल-बच्चा होने वाला है। तुम यहीं रहोगी या अपने पुराने घर वापस जाओगी?" दोनों बहनों का मंतव्य पुराने घर को लेकर था।
"जब मुझे जरूरत थी तो इंदू और छोटे दामाद जी ने हर कदम साथ दिया। अब आगे मेरा भी तो कुछ फर्ज है इसके लिए, आज तक तो सिर्फ दोष ही दिया है सबने इसको।" कहती हुई माँ ने आगे अपना पक्ष साफ किया, "पुराने घर का किराया बैंक में जमा होता है और तुम्हारे पिताजी की पेंशन मैं घर में देती हूँ। अभी मुझे अपने घर के बारे में कुछ निर्णय लेना जरूरी नहीं लगता।" बाद का वातावरण उतना प्रेममय नहीं रहा।
कभी-कभार वे दोनों माँ का हालचाल फोन से पूछ लिया करतीं।
"मम्मी, ओ मम्मी! नानी से बोलो ना कि सारे गुब्बारे वह ना फुलाएं। मैं और दीपक आधे-आधे फुला सकते हैं ना।" आठ साल के रोशन ने इंदू को झिंझोडते हुए कहा।
"दीपक नहीं, भैया कहो रोशन।" इंदू ने अपने बेटे को डाँट लगाई।
"सिर्फ चार मिनट बड़ा है वो, भैया क्यों बोलूंँ?" कहता हुआ दीपक बाहर भाग गया।
"शादी की सालगिरह मुबारक हो मैडम इंदू जी।" गुलाब का एक फूल, उसके बालों में लगाते हुए सुनील ने कहा।
"इंदू ...या छरफुक्कन?" शरारत से हँसती हुई इंदू ने कहा।
"वह तो शादी की बात करने तुम्हारे घर आने से पहले ही, तुमने खुद मेरे ऑफिस पहुंँचकर मुझसे बातें की थीं। पहली बार सुना था यह शब्द मैंने तुम्हारे मुंँह से। यदि तुम छरफुक्कन हो, तो ऐसी छरफुक्कन पत्नी भगवान हर जन्म में मुझे दें।" कहते हुए सुनील ने उसका माथा चूम लिया।
तभी बाहर गुब्बारे के फूटने की आवाज आई। दीपक और रोशन तालियाँ बजाते हुए कह रहे थे, "बहुत ज्यादा फुलाया था आपने नानी। बेचारा फुग्गा फूट ही गया।"
इंदू और सुनील देख रहे थे, माँ भी उनकी तालियों के साथ तालियाँ बजाकर हँस रही थीं।
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