मंगलवार, 27 फ़रवरी 2024

2212 2212 2212 2212 पर ग़ज़ल

आप सभी के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏(संशोधित रूप)

फ़िलबदीह क्रमांक 12
दूसरा चरण
रदीफ़- हो
क़ाफ़िया - आर

2212  2212  2212  2212 

दुनिया के झूठे मंच पर, कोई असल किरदार हो
सच के लिए जो लड़ सके, वो आदमी  तैयार हो।।1।।

जब औरतों की छुट्टी हो, घर पर  रहें आराम से
हाथों मिले थाली भरी, कोई तो वो इतवार हो।।2।।

अपनों को छाया एक सी, दे प्यार पोषण एक सा
मुखिया वही होता सही, जो पेड़ सा छतनार हो।।3।।

वो रूठकर बैठे रहें, बातों से उनको लूँ मना
यूँ ज़िंदगी  चलती रहे,  कुछ  रसभरी तकरार हो।।4।।

नदियों के जल में लोच हो, पर्वत का साफा हो हरा
आँचल घटा के बूँद हों, फसलों की बस चमकार हो।।5।।

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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

"जैसा ढूँढत मैं फिरा, वैसा मिला ना कोय" (हास्य व्यंग्य)

"जैसा ढूंँढत मैं फिरा, वैसा मिला ना कोय" (हास्य व्यंग्य)



हमारे अच्छेलाल, अपने नाम को सार्थक करने में रत्ती भर कम नहीं पड़ते थे। सूरज-चाँद की तरह उनकी गति, नियमितता और पेड़ों की तरह दूसरों को सुख देने का जज्बा ही उनको अच्छे बनाता।‌ पत्नी और अम्माँ के तानों-उलाहनों के आगे भी, उनकी अच्छाइयों ने घुटने नहीं टेके।

 सभी का मुँह बंद करने की आज अच्छे ने मन में ठान ली थी। गाँव के वकील साहब तो अच्छे को देखकर, प्रेमिका की तरह मुँह फुलाकर निकल जाते।

अब तो उनके पैसों से चाय पकौड़े खाने वाली मित्रमंडली भी, उनके किराएदारों के रवैए पर बरसाती मेंढ़कों की तरह टर्राने लगी थी। शहर से नाता ना रखकर, अपने गाँव में सुखी रहने वाले अच्छे, आज दूल्हे की तरह सज-धजकर  शहर के लिए निकल पड़े।

"आज सुबह-सुबह सवारी कहाँ के लिए निकल पड़ी?" पीछे से शत्रु ने गोली दागी।
"तुम्हारी टोक से ही हमारे काम बिगड़ जाते हैं, जाते समय तो अपना मुंँह बंद रखा करो।"  पत्नी उमा को घूरते हुए अच्छे घर से निकले।

सफेद कुर्ता पायजामा, गले में रेशम किनारी वाला इकलौता गमछा, पैरों में लखनवी चप्पल और होंठों पर खालिस दूध सी शुद्ध मुस्कान लिए अच्छेलाल ने सालों बाद शहर की कचहरी में प्रवेश किया।

मोर के समान चारों ओर गर्दन घुमाते, नपी तुली अदा से पैर उठाते हुए  जेराॅक्स की एक दूकान के सामने खड़े हो गए। 

"ओह बेचारा, बंडल के बंडल खाली पेपरों पर छाप रहा है।  कितना पेपर रंगवाते हैं लोग। "उस बीस-इक्कीस के जवान छोकरे के माथे पर उभरती बूंदों से भीग गए थे अच्छेलाल।

"अरे ओ भाई! आसपास कितनी दुकानें हैं जाकर वहांँ रंगवा लो यार। इस गरीब के पीछे काहे पड़े हो?" अच्छेलाल का अच्छा दिल पिलपिला गया।

"अरे कौन है तू भाई? मेरे पुराने कस्टमर्स को तोड़ रहा है, अजीब पागल आदमी है।" जेराॅक्स करने वाले लड़के की सहनशीलता, क्रिकेट के बाॅल की तरह सीमा पार कर गई थी।
वह नया बंडल खोलने लगा और बढ़ती हुई भीड़ में, अच्छे थाली पर लुढ़कती सरसों की तरह लुढ़क कर बाहर आ गए।

"अजीब लोग हैं, भले की बात पर हमारा ऐसा हाल किया। मज़ाल है कि हमारे गाँव में कभी हमारे साथ ऐसा हुआ हो।" सफेद कुर्ते पर पड़ी शहरी मिट्टी को झड़ाकर, अच्छे उठ खड़े हुए। 

सफ़ेद कमीज़, काले कोट में बड़ी शान से घूमने वाले देवदूतों के पीछे लोग भाग-दौड़ रहे थे। 
"कितना रूतबा है इस काले कोट का। हम तो बैसाख की सुबह दस बजे ही पसीने में भीगे जा रहें हैं पर वाह.. इस मौसम में काले कोट पहनें इन देवदूतों देख कलेजा ठंडा हो गया। सूरज को चुनौती देते उनके काले कोटों को मन ही मन प्रणाम कर लिया अच्छे ने।

"एक गाँव के हमारे  वकील हैं, हजार बार कह चुके कि किराएदारों से घर खाली करवा दो या किराया बढ़वा दो  परंतु उनके कानों में जूंँ नहीं रेंगती। इधर घर में चीन और पाकिस्तान हर समय बम गिराने को तैयार रहतें हैं। आज तो अपना काम खुद ही करवाकर जाएंगे, अब हम भी दिखा देंगे कि हम अच्छेलाल ऐसे ही नहीं हैं।" दृढ़ निश्चय पक्के इरादे के साथ अच्छे सामने वाली कैंटीन में घुस गए जहाँ सभी वकील चाय पी रहे थे।

"वकील साहब, गाँव में हमारा पुराना बड़ा मकान है। बाबू के ज़माने से चार परिवार किराए पर हैं। ना किराया बढ़ाते ना मकान खाली करते।" आँधी तूफान की तेजी थी।

"केस किसके पास है?" सभी वकीलों ने एक साथ प्रश्न किया।
"किसके क्या, हमारे पास है। घर हमारा तो केस किसका, क्या भाई इतना भी नहीं जानते।" अपनी होशियारी पर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे अच्छे।

"घर-द्वार के पेपर, किराए की रसीदें, गवाह सबूत तो रहे तभी आवेदन करते हैं ना।" वकीलों को अपनी कसौटी पर खरे उतरते इस आदमी में, आज के सार्थक दिन की संभावना नज़र आ रही थी।

"आज सुबह से नाश्ता का भी ठिकाना नहीं, यहाँ आओ तो काम ही काम। बिना खाए-पिए आदमी सोचेगा कैसे?" आपस में वो ठहाके लगाने लगे। 
जेब में रखे पैसों से परोपकार, जनसेवा करने की भावना, अच्छे के हृदय में हिलोरें मारने लगीं। 
"अरे भाई, तो करिए ना चाय-नाश्ता, हम तो रोज ही अपने दोस्तों को कराते हैं।‌ अब आप सब भी तो हमारे दोस्त ही हैं।" अच्छे की अच्छाइयों ने सीमा तोड़ किनारों पर बहना शुरू कर दिया।
"दो भाई, जो जो खाएंँ खिलाओ, आपका भी पाला अच्छेलाल से पड़ा है किसी ऐरे गैरे से नहीं।" कैंटीन के छोकरे को देखकर अच्छे ने अपने तेल चुपड़े बालों में कंघी घुमा ली।

थोड़ी देर बाद अच्छे के देवदूत मित्र जीम रहे थे। प्लेटों में इडली-साँभर, पाव-भाजी, चीन से आए खूबसूरत गोले और उनकी लच्छेदार कमर मटकाती सहेली इठला रहे थे। अच्छे की दुनिया तो पकौड़ों पर ही खत्म होती थी, परंतु यहाँ के पकौड़े मुन्ना की टपरी की तरह करारे नहीं लगे अच्छे को।

अपने अपने केसों की बातें करते, खाकर वे सब उठ खड़े हुए। कैंटीन के छोकरे ने हवा में हिलाते हुए, 'बिल' नाम का   कागज का छोटा परंतु शक्तिशाली टुकड़ा उनके सामने धर दिया।

एक बार, दो बार, तीन बार पढ़ा अच्छे ने।  कक्षा दो में दो साल बिताकर ही शाला छोड़ी थी उन्होंने तो इतना पढ़ना आता था कि बिल पर लिखा छह सौ पचास रूपया पढ़ गए।
"पाँच आदमी के नाश्ते का इतना रूपया? क्या लूट मची है? हमको गाँव का सीधा सादा आदमी समझ रखा है क्या? रोज खिलाते हैं अपने दोस्तों को समोसा पकौड़े, कभी इतना पैसा नहीं दिया।"  सुबह उमा द्वारा दिए हजार रुपयों से बचे, जेब में  रखे आठ सौ रुपयों पर उनकी आत्मा व्यथित हो गई। वैसे अच्छे पैसे कौड़ी से मोह करने वाली नस्ल के प्राणी नहीं हैं परंतु अपनी खाली जेब के वो आदी भी नहीं थे।

"आर्डर किया था तब साथ ही रेट लिखा था, वही लगाया है। धंधें का टाइम खोटा मत करो। यहां सभ्य लोग आते हैं। ना जाने कहाँ से आ जाते हैं सुबह-सुबह।" काउंटर पर बैठा मोटे चश्मे वाला, थुलथला आदमी गरजा।

दुनिया का ऐसा रुप देखकर अच्छे का दिल व्यथित हो गया। उसके देवदूत मित्र तो कब के साथ छोड़कर अपने अपने रास्ते निकल गए थे।
मरता क्या न करता, जेब से सात सौ रुपए निकालकर, अच्छे ने एक बार भारी मन से उनको श्रद्धांजलि दी और उस  बिल पर अर्पण कर दिया। कुछ देर बाद बचे पचास का नोट, सौंफ के साथ टेबल पर फड़फड़ा रहा था।  काम करने वाला लड़का उनको घूरता खड़ा था मानो कैंटीन से बाहर पहुँचाकर ही दम लेगा।

"इस कैंटीन में टीप भी देते हैं साहब।" उस लड़के ने अपने मोतियों से झक दाँतों को, बाहर की दुनिया देखने की खुली छूट दे दी।
"टीप..ये कौन सी बला है। टपरी पर कभी नहीं सुनी।" अच्छे हड़बड़ा गए।
"नहीं देना है तो मत दो साहब, नाटक क्यों कर रहे हो? खाने के बाद बीस-पचास तो कोई भी देता है।" वह बड़ी अदा से मुस्कुरा रहा था।
"अच्छा!" अच्छे ने कौतूहल से कहा और लड़के ने हरा सिग्नल देख नोट उठाकर जेब के हवाले कर लिया। अब लड़का ज़ोर ज़ोर से टेबल पर कपड़ा मारने लगा।

कपड़े की फटकार ऐसी थी कि अच्छेलाल के दिमाग की सारी नसें हिल गईं।‌ कहीं ये सालों पुराना, मैला कपड़ा उनपर अपनी छाप न छोड़ दे, झटके के साथ उठकर अच्छे बाहर आ गए।

बाहर की तपती धूप, जेब में अचानक आई ठंडक ने वातावरण को उमस भरा कर दिया। इस शहर ने घंटे दो घंटे में सात सौ रुपए लिए और डकार तक नहीं ली। 

सारे प्रागंण में तथाकथित देवदूत अपना काम करने में लगे थे। 
"ओ वकील साहब, हमारा काम कब होगा?" सामने उस वकील पर अच्छे की नज़र पड़ी, जिसने अभी अभी डबल मक्खन वाली पाव-भाजी को अपने लटके पेट में स्थान दिया था।
"अजीब आदमी हो, न केस फाइल, न कोई जानकारी खामखां पीछे ही पड़ गए । कैंटीन में भी दिमाग खाते रहे।" अपना कोट को झटकता वह उनकी आँखों से ओझल हो गया।
गरमी की तपन से व्याकुल अच्छे ने गमछा सिर पर बाँध लिया। आँखों पर हथेली का छज्जा बनाते हुए उनकी निगाहें, सामने छोटी छोटी मेज़ गादी पर कुछ लिखते लोगों पर पड़ी। 

अर्जी निवेश कह रहे थे लोग उनको, वे ‌लोगों की अर्जियाँ लिख रहे थे।
"अब आए हो अच्छे सही जगह।" अच्छे उनकी ओर लपक लिए।
"भाई, हमें हमारे किराएदारों से मुक्ति दिला दो, मदद करो हमारी।" उस व्यक्ति के सामने आलथी पालथी मार कर अच्छेलाल विराजमान हो गए।

"हम यहाँ मदद करने के लिए ही बैठे हैं भाई। मुक्ति के लिये फीस होती है।" उसने अपने‌ कागज, कलम को सहेजते हुए कहा।
"हाँ हाँ, सौ रुपए हैं ना हमारे पास।" कहते हुए अच्छे ने अपने जेब परिधि में, अँगुलियों को घुमाया। कड़क नोट का कोई स्पर्श नहीं मिला। झटके से उठकर अच्छे ने अपनी जेब पलट दी। कागज के पुराने तुड़े मुड़े पुर्जे, सौंफ सुपारी के सप्ताह पहले के टुकड़े और एक दो सिक्के मुँह बाए नीचे गिर पड़े। 

"अभी तो था जेब में, वही तो इकलौता बचा था।" अपने इकलौते कड़क सहारे के न मिलने से दुखी हो कर अच्छे ने कहा।

"ऐसा तो यहाँ रोज़ होता है तमाशा। बिना पैसों के स्याही के, मेरी कलम एक कदम नहीं चलती भाया। जा, बोहनी खोटी मत कर।" कहते हुए उसने मुँह मोड़ लिया।

सामने गन्ना रसवाला ताज़ा, ठंडा गन्ना रस गिलास भर भरकर लोगों को बेच रहा था। अच्छे ने अपनी जीभ की लार को गटक कर, गला गीला कर लिया। बस स्टैंड पर खड़े अच्छेलाल को जो चाहिए था वो‌ नहीं मिला, ऊपर से धोखा और अपमान मिला। 

अब दुनिया के सारे रंग सही नज़र आ रहे थे।

वाह रे वाह! साठ-पैंसठ की अम्माँ, मार पावडर लाली कर के सोलह की बनीं हुई हैं।
छोटे-छोटे बच्चों के पीठ पर भारी बैग लटका कर माँ बाप निश्चिंत छोड़ रहे।

कितना भीड़, कोई किसी से बोलता बतियाता भी नहीं। आदमी हैं या मशीन।
एक बस आते दिखी और लोगों के धक्के से अच्छे भूमि पर चारों खाने चित्त पड़ गए।
भागते दौड़ते लोगों को, एक गिरा हुआ आदमी नज़र नहीं आया और अच्छेलाल खुद ब खुद अपने पैरों पर खड़े हो गए। शहरी मिट्टी को अपने कुर्ते से झटक झटक कर निकाल ही रहे थे कि सामने से स्कूटर पर एक जाना पहचाना व्यक्ति आते दिखा।

"अरे अच्छे, तुम यहाँ, इस जगह। कैसे भाई आज तुम्हें मित्रमंडली से फुर्सत मिल गई।" गांँव के वकील साहब को सामने देख, एक बार काले कोट में फिर अच्छे को देवदूत के दर्शन होने लगे।

"चलो, घर ही जा रहे हो ना। आओ हमारी स्कूटर पर बैठो, अरे बस का किराया हमें ही दे देना। हाँ अपनी वो दूर पड़ी चप्पल जरूर पहन चलना वरना चौक से उतरकर बिना चप्पल ही घर पहुँचोगे।" वकील साहब जोर जोर से हँसने लगे।

"हे देवदूत, तुम्हें प्रणाम करता हूँ।" हाथ जोड़कर अच्छेलाल ने वकील साहब को प्रणाम किया और लपककर पीछे की सीट पर जम गए।

"देवदूत!" आश्चर्य से अच्छे की ओर देखते हुए वकील साहब ने स्कूटर आगे बढ़ा दी।


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शर्मिला चौहान

बुधवार, 21 फ़रवरी 2024

ढाई आखर प्रेम का (व्यंग्य)

"ढाई आखर प्रेम का" (व्यंग्य)


सरकारी सूचना के अनुसार, कार्यालय में हिंदी सप्ताह का आयोजन करना तय हुआ। मधुर के अनुभवहीन कंधों पर, इस आयोजन की जिम्मेदारी डाल, कार्यालय प्रबंधन ने खुद राहत की सांँस ले ली।
बैताल सी कठोर ज़िम्मेदारी कंधों पर लाद, मधुर अपनी लक्ष्य प्राप्ति के इंतजा़म के लिए निकल पड़ा। अँग्रेजी माध्यम में पढ़ा-लिखा मधुर, अब अपनी राजभाषा को हृदय से आत्मसात करने को लालायित था।

सड़क के किनारे बैठे रद्दी वाले के पास, खूबसूरत आवरण से सजी हिंदी की पुस्तकें पानी के दाम बिक रहीं थीं।
"सारे ज़माने का कचरा घर पर उठा लाए, दिमाग में कोई नया फितूर चल रहा है क्या?" मधुर की पत्नी कोकिला की जासूसी नज़र से धूल भरी पुस्तकें बच ना सकीं। 
"यही तो खराबी है, अपनी भाषा की पुस्तकें तुम्हें कचरा दिखाई दे रहीं हैं।" पहले से ही विभिन्न भाषाओं की मोटी पुस्तकों से भरी आलमारी को देख मधुर का सिर घूम गया।
 
"घूरकर उन बेचारियों को भस्म नहीं कर सकते तुम। पुस्तक मेले, प्रदर्शनियों और बुक स्टॉल से उन्हें तुम ही घर ले आए थे।" नाम के विपरीत कर्कश स्वर में कोकिला को सुन, मधुर को हैरत नहीं हुई।

"ठीक है, अँग्रेजी की पुस्तकें बैठक की अलमारियों में रखना, हाई सोसायटी में स्टेटस सिंबल हैता है।" सिटपिटाता हुआ मधुर अपनी लाई पुस्तकों को साफ कर, करीने से रखने लगा।
"इस वीकेंड दो-तीन तो पढ़ ही लूँगा।" मन ही मन दृढ़ संकल्प करता हुआ मधुर नहाने चला गया।

नाश्ता करके उसने एक पुस्तक पढ़ने उठा ली। पुस्तक कौन सी पढ़ी जाए, निर्णय करने आसान था। जिस पुस्तक का मुख्य आवरण कला और सुंदरता से लबरेज था, वह नंबर वन बनकर उसकी हथेलियों में इठला रही थी।
हाथ में पकड़ी पुस्तक दर्शनीय थी। एक कमनीय स्त्री अपने लंबे खुले बालों को मोगरे की लड़ियों से समेटे, दूर अस्तगामी सूर्य को निहार रही थी। 
"ऐसी सुंदर स्त्री सचमुच होती है क्या?" उस स्त्री के लावण्यमयी सादगी पर एक क्षण के लिए मधुर मुग्ध हो गया। उसे अपने पर रह रहकर क्रोध आ रहा था कि उसने पहले ऐसे सुंदर उपन्यास, कहानियों की पुस्तकें क्यों नहीं पढ़ीं। मशहूर उपन्यासकार का प्रेम पर आधारित यह उपन्यास, आज उसके दिल में अपनी जगह बना लेने को तैयार था।

अपनी साहित्य साधना शुरू करता कि मौसम ने रंग बदला। बादलों ने सूर्य को अपनी गिरफ्त में ले लिया और प्रेम रुप बूँदों की छनकार गूँजने लगी।
मधुर ने पुस्तक छाती पर रखकर अपनी आँखें मूँद लीं। सावन का कोई फिल्मी गीत गुनगुनाते हुए वह आनंद लेने लगा।
"इस बिन मौसम बरसात की तरह तुम्हें भी कभी कोई शौक चर्रा जाता है। जरा शटर बंद कर‌ देते तो कौन सी साहित्य साधना अधूरी रह जाती।" कहती हुई कोकिला ने पूरे जोर से शटर बंद कर दिया।
कोकिला के हाथों और जुबान की कार्यकुशलता देख कर मधुर चकित रह गया।

अब अपना समय इस स्त्री पर व्यर्थ करना मधुर को बिल्कुल गंवारा नहीं था, अतः उसने पुस्तक के मुख्य पृष्ठ की उस कोमलांगी पर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया।

"प्रेम बंधन" की इस कोमलांगी से बस ज़रा सी कम थी 'वो'। कॉलेज के द्वितीय वर्ष की परीक्षा के समय, पतझड़ के पत्तों सी 'वो' सामने आ गई थी।
"खुद देख कर नहीं चलती और मुझे गालियांँ दे रही हो।" साइकिल के सामने आ टकराई उस अनिंद्य सुन्दरी के सौंदर्य से मधुर का मन आज भी बेचैन हो गया।

अपने हिंदी ज्ञान की गहराइयों से, एक दोहा समेट कर गुनगुनाने लगा, "ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"
दिमाग पर बल डालकर प्रथम पंक्ति याद करने की पुरजोर कोशिश की मधुर ने, असफल होने पर सिर झटक लिया।

सामने देखा तो हाथ में झाड़ू लिए, साफ-सफाई करने वाली अधेड़ उम्र की शांता मौसी उसे घूर रही थी।
उनकी अनुभवी दृष्टि और कुटिल मुस्कान से मधुर को लगा मानो किसी ने उसे चोरी करते रंगे हाथों पकड़ लिया है।
उसने उपन्यास के मुख्य पृष्ठ की कोमलांगी को, अपनी हथेलियों से ढंक दिया। आई हुई आपदा ने अपने विशेष अंदाज में, झाड़ू पटक पटक कर कमरा साफ किया और उसे तिरछी निगाहों से देखती हुई बाहर चली गई।

"सबको पढ़ा लिखाकर सरकार ने कुछ खास अच्छा नहीं किया।" मन ही मन सोचता हुआ मधुर अपने मन को पुनः प्रेमबंधन में बाँधने का प्रयास करने लगा।

"घंटे भर से सिर्फ़ इसका मुखड़ा निहारते बैठे हो, अच्छा है कि पुस्तक में छपी है  जीती जागती सामने होती तो तो ना जाने क्या करते?" कोकिला के कर्णभेदी स्वरों से मधुर भीतर तक घायल हो गया।
"तुम्हें साहित्य की कोई समझ होती तो ऐसा कभी नहीं कहतीं, खैर मुझे अभी तुमसे हवाई किले नहीं बनवाना है।" कहते हुए उसने अपनी दृष्टि फेर ली। 

"हा हा हा.. उपन्यास पढ़ने से पहले सादे मुहावरे तो सीख लेते। मुँह ना लगना, माथापच्ची नहीं करना, जुबान नहीं लड़ाना, इतने मुहावरे छोड़कर बोल रहे हवाई किले नहीं बनाना।" कोकिला की विद्रूप हँसी, कानों में गूंँज रही थी।
कोकिला के हिंदी ज्ञान पर मधुर के पसीने छूट गए।
"हिंदी मीडियम में पढ़ी हो तो इतना तो आएगा ही, अँग्रेजी में बताकर दिखाओ तो जानूँ।" कहकर सामने देखा तो उत्तर की प्रतीक्षा के लिए कोकिला के पास समय नहीं था और आँगन में एक नवयुवती को प्रतीक्षारत पाया।

"कोकिला, जरा देखना।" ना जाने क्यों बड़े ही धीमे लहजे में कहा उसने।
हाथ में बैग, कंधे पर पर्स, पतली छरहरी काया, हल्के आसमानी रंग का सलवार कुर्ता और हाँ काले घने लंबे खुले बाल।‌ पुस्तक की उस लावण्यमयी सुंदरी के साथ, सामने खड़ी इस युवती का अस्तित्व एकाकार हो गया।‌
कैसा संयोग, प्रेम की इस पुस्तक के आरंभ से पहले ही, प्रेम के कई इंद्रधनुषी रंग आसपास बिखरते जान पड़ रहे थे।

पुस्तक टेबल पर रख कर मधुर सामने निकल गया। दिल चाह रहा था पूछ ले, "मोगरे की लड़ियांँ क्यों नहीं सजाई बालों में।" 
"आइए, कैसे आना हुआ?" गुड़ की खालिस मिठास थी उसकी आवाज़ में।

"भैया, मैडम ने बुलाया था। कुछ चीजों का आर्डर था लेकर आई हूँ। उन्हें भेज दीजिए।" अपने बैग को आँगन में रखती वह बोली।

छन छन छनाक.."भैया" का हथौड़ा मधुर का नाज़ुक दिल झेल नहीं पाया। 

"कोकिला, जाओ बाहर। जब कोई घंटी बजाता है तो खुद क्यों नहीं जाती। इस घर में सब तुम्हारे ही लोग आते हैं।" मधुर की आवाज़ में अप्रत्याशित कर्कशता से दोनों स्त्रियाँ चौंक गईं।

"काहे का प्रेम और काहे का बंधन। इस निष्ठुर दुनिया को इसका एक अक्षर भी नहीं मालूम तो ढाई क्या सीखेंगे।" आवेश में मधुर बड़बड़ रहा था।
मानसिक थकावट, हिंदी सप्ताह के आयोजन के बैताल ने आँखों पर अपनी सत्ता जमा ली। कमरे में एलेक्सा गा रही थी, "एक डाल पर तोता बोले, एक डाल पर मैना।" 

कॉलेज के रंगीले दिन, खूबसूरत शामों में मधुर का अवचेतन भटकने लगा। टपरी पर खड़े रहना, आती-जाती लड़कियों को छेड़ना और उनकी वो मीठी झिड़कियांँ। वाह! पूरे साल ही वसंत छाया रहता था। प्रेम का पंछी कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल पर डेरा जमा लिया करता। 

"सो गए क्या? हो गई तुमसे इस मोटी पुस्तक की पढ़ाई। चाय पी लो। मुझे शाम को पड़ोस में कार्यक्रम में जाना है। " चाय का कप पकड़ाया नहीं, हाथ में ढकेल ही दिया कोकिला ने।
"अरे! अड़ोस-पड़ोस की बात है, प्रेम संबंध बनाए रखना चाहिए। आज मेरी छुट्टी है मैं भी चलता हूँ।" मधुर के मन में प्रेम के ढाई आखर की लहरें फिर मचल उठीं थीं।

"गुप्ता जी की बहू की गोद भराई है। महिलाओं का कार्यक्रम है। " विचित्र नज़रों से घूरती हुई कोकिला तैयार होने चली गई।

"प्रेम तो जगत व्याप्त है। खुद कान्हा ने प्रेम संदेश दिया। नासमझ लोग इसकी अवहेलना कर रहें हैं।" सोचते हुए मधुर पास पड़ी उस "प्रेमबंधन" को देखने लगा।

मुख्य पृष्ठ पर की उस युवती में अब वो कशिश नहीं थी जो उसे बाँध सके। मधुर का दिल पंचर हुए टायर की तरह पिचक गया था। बिना खुले ही पुस्तक ने उसे प्रेम का यथार्थ रूप दिखा दिया था।

एलेक्सा की आवाज़ भरभरा रही थी, "तोता मैना की कहानी हाय कितनी पुरानी हो गई।" 

तैयार होकर मधुर हिंदी आयोजन के बैताल को, कंधों से उतार फेंकने के लिए बरगद की तलाश में निकल गया।

शर्मिला चौहान

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

2212 2212 2212 2212 पर ग़ज़ल

आप सभी विज्ञजनों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏(संशोधित ग़ज़ल)

फ़िलबदीह क्रमांक -12
मिसरा-ए-तरह
आँखों से कीं बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं
क़ाफ़िया - ई की मात्रा
रदीफ़- नहीं

2212  2212  2212  2212


दुनिया की जिसने दौड़ में, इक जी-हजूरी की नहीं
उसको मिली मंज़िल मगर, राहें रहीं सीधी नहीं।।१।।

चलने का जज़्बा है अगर, दिन रात की फिर सोच क्या
 डर कर अँधेरे से कभी, देखो ज़मीं रूकती नहीं।।२।।

सीने पे खाकर गोलियां, जय भारती कहते रहे
अंतिम समय तक जोश था, आवाज़ थी धीमी नहीं।।३।।

ये प्रेम कितना है कठिन, बाती से जाकर पूछ लो
दीपक में भरने रौशनी, दम रहने तक बुझती नहीं।।४।।

छाने लगा उन्माद अब, ऋतुराज का है आगमन
बनठन खिली सरसों कहे, दुल्हन कहीं मुझ सी नहीं।।५।।

गिरह का शेर-

पिछली गली के मोड़ पर, यूँ मिल गए वो सामने
आँखों से कीं बातें बहुत, मुँह से कहा कुछ भी नहीं।।

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शर्मिला चौहान

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

1212 1122 1212 112 पर ग़ज़ल



फ़िलबदीह क्रमांक 11
प्रथम चरण 
1/2/24
मिसरा-ए-तरह -
कई दिनों से मुझे भी तेरा ख़याल नहीं


1212  1122  1212  112

ऐ ज़िंदगी कभी तुझसे किया सवाल नहीं
जो भी मिला वो सही है, मुझे मलाल नहीं।।1।।


दिखाता चाँद कलाएंँ बदलता रूप वो नित
धरा की चाल है ये चाँद का कमाल नहीं।।2।।

सभी सिमट से गये खुद के दायरों में ही बस
पराये दुख का किसी को यहांँ ख़याल नहीं।।3।।

निकलता चंद दिनों में जो कच्चा रंग हो गर
जहाँ में प्यार से पक्का मिले गुलाल नहीं।।4।।

लदी हो खूब फलों से रहा करें चिडियांँ
मेरी नज़र में तो ऐसी कहीं भी डाल नहीं।।5।।

गिरह का शेर-

झटक के हाथ मेरा साथ जो छुड़ाया तूने
कई दिनों से मुझे भी तेरा ख़याल नहीं।।



शर्मिला चौहान

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

ग़ज़ल 1212 1122 1212 22

आप सभी विज्ञजनों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏

फ़िलबदीह क्रमांक 11
दूसरा चरण
रदीफ़- रहने दे
क़ाफिया- आन

1212  1122 1212  22

ज़रा कभी तो मुहब्बत की शान रहने दे
ये दिल तुझे ही दिया था गुमान रहने दे।।1।।

कभी बनाया था जो आशियाना ख़्वाबों का
तो मेरे दिल में वो खाली मकान रहने दे।।2।।

किए थे वादे कई और कसमें खाईं थीं
वो झूठे किस्से ही अब दरमियान रहने दे।।3।।

लिखे थे नाम तेरे सैकड़ों महकते ख़त
 दिलों की आशिकी का वो बयान रहने दे।।4।।

किनारे पर चले थे साथ साथ जब हम तुम
पड़े थे रेत में जो वो निशान रहने दे।।5।।

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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

कहानी _ वो लाल बत्ती

कहानी _ "वो लाल बत्ती"

जीत ने ड्राइविंग सीट को जरा पीछे किया और दोनों भुजाओं को ऊपर करके शरीर को तानने की कोशिश की। ऑफिस से घर के रास्ते में ऐसे तीन बड़े सिग्नल हैं जिनको पार करने में रोज बहुत समय लग जाता है। जीत का पेशेंस रोज ही यहाँ चैक होता है। समाचार,खेल समाचार से बोर होकर उसने दुसरे बटन दबाए और गाना बजने लगा, "सज रही गली मेरी अम्माँ चूनर गोटे में।" गाने में तालियों की थाप का शोर तेज़ हो गया। जीत ने रेडियो बंद कर दिया। सिग्नल हरा हुआ और कछुए की गति से कार बढ़ने लगी। हार्न के शोर से परेशान होकर जीत खिड़की के शीशे चढ़ाने लगा। 
"सैलाब है इस शहर में लोगों का। हर लहर के साथ आदमियों को जलजला फेंकता है शायद समंदर।" बत्ती फिर लाल हो गई थी। पूरा चौक पार करने में दो-तीन बार तो लाल बत्ती का सामना करना पड़ता है। जीत ने गहरी श्वास भरी और फिर रेडियो चालू किया, "मुझे क्या हुआ था मैं पापी दिल से हारा।" गाना अपने अंतिम पड़ाव पर था। जीत की नज़र सड़क के दूसरी ओर पड़ी। गाड़ियों के शीशों के पास तालियां बजा बजाकर किन्नरों का समूह पैसे मांग रहा था। चार तो इधर-उधर घूम कर माँग रहे थे। एक चुपचाप सब देख रहा था।

जीत ने स्त्री वेशभूषा में खड़े उस किन्नर को गौर से देखा। सड़क किनारे की और गाड़ियों की लाइट में उसका चेहरा जाना पहचाना सा लगा। शीशा नीचे कर जीत उसको पहचानने की कोशिश करने लगा। 
उमसभरी कुछ बदबूदार हवा ने कार के अंदर की खुशबू पर अधिकार जमा लिया। 
"दे दे सेठ, तेरा कारोबार बढ़ेगा, नौकरी में प्रमोशन होगा, बाल बच्चे आबाद रहेंगे।" ताली ठोकता एक किन्नर उसकी ओर आने लगा और जीत ने शीशा चढ़ा लिया। 
जीत की निगाह उस छोर पर खड़े, कुछ पहचाने से व्यक्तिव पर अटकी थी। कुछ टैलीपैथी हुई और वह भी कार की ओर देखने लगा। एक क्षण को नज़र मिली, पहचान होती तब तक सिग्नल हरा हो गया। गाड़ी का एक्सीलेटर हौले से दबाकर जीत आखिरी सिरे तक उसको देखता रहा। तभी एक नाम मस्तिष्क में हथौड़ा चलाने लगा। 
"नहीं-नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है?" खुद से जूझते हुए जीत ने सर्कल पार कर लिया।

कार आगे चल रही थी और जीत सालों पीछे अपने बचपन में।
पापा का ट्रांसफर उस पहाड़ी जगह में हुआ था। कुछ दिनों तो पापा अकेले ही क्वार्टर में रहते थे परिक्षाओं के बाद हम सभी को साथ लेकर जाने का प्लान था।
"पापा, हमारे सारे दोस्त यहाँ हैं हमें नहीं रहना पूरे साल वहाँ।" मुझसे चार साल बड़ी राखी दीदी ने कहा था।
"मैं भी नहीं जाऊंगा।" मैंने हमेशा की तरह दीदी के समान ही बोला।
"हाँ-हाँ, कक्षा चार में तुम्हारे भी जिगरी दोस्त बन गए हैं क्या?" पापा ने हँसते हुए कहा था।
मम्मी बड़े उत्साह से तैयारियां कर रहीं थीं। सुंदर पहाड़ी शहर में  रहने का सुख उनके चेहरे पर नज़र आता था।
घर क्या था मानो हरी भरी पहाड़ियों के उतार-चढ़ाव और भटकते बादलों से हँसी-ठिठोली करता सपनों का महल था। बड़े बड़े कमरे, सामने झूला और बगीचे वाला आँगन। मम्मी का बहुत सारा समय, चटकीले रंग के तरह-तरह के फूलों के पौधों के साथ ही बीतता।

"नई जगह, नया स्कूल है जरा बच्चों की पढ़ाई भी देख लिया करो।" पापा ने कहा बस फिर हम दोनों भाई-बहन की आफ़त ही आ गई।
दीदी ने तो अपनी नोटबुक पूरी कर ली थी परंतु मेरी अधूरी कापियों पर लाल लाल निशानों ने मम्मी का पारा चढ़ा दिया।

"बता नहीं सकते थे कि स्कूल में इतना आगे हो गया और तुमने किसी की कापी ही नहीं ली।" अब मम्मी को क्या बताता कि मुझे किसी से कापी मांगना पसंद नहीं था।

जाँच- पड़ताल के बाद मम्मी ने कुछ ही दूरी पर रहने वाले एक सहपाठी का पता खोज लिया और मुझे लेकर उनके घर चली गईं। अपने स्वभाव के अनुसार मम्मी ने नीला आंटी से दोस्ती कर ली और उनके बेटे गगन की कापी भी ले आईं। नीला आंटी-अंकल, गगन की दादी उस घर में रहते थे। 
मम्मी ने व्हील चेयर पर बैठी दादी को भी प्रणाम कर लिया था। 

अब मुझको और मम्मी, दोनों को दोस्त मिल गए थे। कुछ शांत, कम बोलने वाला था गगन। वो बाहर निकलकर खेलता ही नहीं था। उसके बड़े से कमरे में ही दुनिया भर के खिलौने थे। उन खिलौनों में भी ज़्यादा रूचि नहीं थी उसकी। 
"चलो बाहर गेंद खेलते हैं गगन, आज मौसम भी अच्छा है।" पहाड़ियों पर मौसम के बदलते रंग से परेशान था मैं।
"नहीं, मैं बाहर नहीं खेलूंगा, चलो हम गाने लगाकर डांस करतें हैं।" उसने अपने कमरे का टेलीविजन चालू कर दिया। 
चूड़ियों और चूनर का किसी गाने पर मटक मटक कर नाचने लगा। मुझे तो बाहर खेलना था इसलिए मैं मुँह फुलाए उसका बेकार सा डांस देखता रहा।
गाने की आवाज सुनकर, व्हील चेयर पर बैठी गगन की दादी कमरे में आ गई। एक ही मिनट में उन्होंने टेलीविजन बंद कर दिया।
"ये क्या कर रहे हो?" उनकी आँखों में गुस्सा देख मैं तो अपने घर वापस आ गया।
गगन की दादी को गुस्से में पहली बार देखा था मैंने। बाद में धीरे-धीरे मैंने उसके घर जाना बंद कर दिया। वो भी हमारे घर कभी नहीं आता था।
करीब एक महीने बाद घर के सामने कार रूकी। नीला आंटी के साथ गगन आया था। कार से उतरकर वह मेरे सामने खड़ा हो गया।

"अब खड़े ही रहोगे क्या, हाथ मिलाओ और खेलो साथ में।" नीला आंटी ने उसका हाथ मेरे हाथों में दे दिया। उसकी आँखों की तरह सूखे, कड़क से हाथ थे। 
"पता नहीं दोनों का किसी बात पर झगड़ा हो गया था शायद। जीत आया ही नहीं घर इसलिए आज मैं गगन को ले आई।" नीला आंटी मम्मी से बता रहीं थीं। वो दोनों बाहर रखी चेयर पर बैठकर, मम्मी की बागवानी का लुत्फ़ उठा रहे थे। 

हमेशा की तरह गगन को कमरे में ही खेलना था। मेरा और दीदी का कमरा एक ही था। पलंग पर दीदी के कपड़े बिखरे पड़े थे। वो स्कूल गई थी तो घर में पहने हुए कपड़े पलंग पर फेंक जाती थी। मम्मी रोज उठाकर रखती। आज मम्मी शायद इस कमरे में आई ही नहीं थीं।

मेरे खिलौनों में रेसिंग कार, बाइक, हीमैन और बहुत कुछ था। गगन को कुछ भी पसंद नहीं आ रहा था।  मैं अपनी कार दौड़ा रहा था और उसने पलंग से उठाकर दीदी की फ्रॉक पहन ली। आलमारी में लगे आइने को देखकर, खुशी से गोल गोल घूमकर नाचने लगा।
उसके मुँह से हँसी की आवाज़ें सुनकर मैंने उसकी ओर देखा। मुझे कुछ समझ नहीं आया।

"गगन, ये क्यों पहना? ये मेरी दीदी की फ्रॉक है पागल, लड़के फ्रॉक नहीं पहनते।" मैंने अपनी बुद्धि का पूरा प्रयोग किया।‌

वह झटके से रूक गया। मुझे एकटक देखता रहा और फिर फ्रॉक उतार कर, उसे अच्छी तरह तह करके पलंग पर रख दिया। उसकी ओर देखता हुआ वो बाहर चला गया।

पांँच मिनट बाद गगन अपनी मम्मी के साथ कार से वापस जा रहा था।
मैंने वह बात किसी को नहीं बताई‌। छिमाही परीक्षा पास आ गई थी और हम दोनों भाई-बहन उसकी तैयारी में जुट गए थे। 


जीत की कार के सामने अचानक एक कुत्ता आ गया और जीत ने ब्रेक लगा दिया। विचारों की वह श्रृंखला भी टूट गई। अब उसने धीमी गति से कार को आगे बढ़ाया।‌ कम रफ़्तार कभी कभी सुकून देती है। दिल, दिमाग, रक्त वाहिनियां, नाड़ी तंत्र सब आराम का अनुभव करतें हैं।  आसपास की सब चीजें बहुत साफ दिखने लगतीं हैं। कोई धुंध नहीं, कोई भ्रम नहीं, कोई स्पर्धा नहीं।
जीत ने समय देखा, अभी करीब पंद्रह मिनट और लगने वाले थे। ऑफिस के टाइम और ट्रैफिक के बीच बढ़िया जुगलबंदी रहती है। 
कार की धीमी गति ने जीत को फिर से पहाड़ों पर बिताए उन तीन सालों की ओर ढकेल दिया।

परीक्षा खत्म हुई और ठंड की छुट्टी घोषित हो गई थी। पहाड़ी ठंड का पहला साल, सभी पर भारी पड़ रहा था। घर से बाहर निकलना कम ही होता था। घर पर भी अलाव जलाकर रात में मम्मी रूम गरम रखतीं थीं। 

मुझे बहुत बुरा लग रहा था। ऐसी कैसी ठंडी की छुट्टियों का कोई मतलब नहीं। मम्मी को मनाकर मैंने गगन के घर जाने की अनुमति ले ली। कपड़ों पर कपड़ों की पर्त चढ़ाए, मैं अपने दोस्त से मिलने पहुँचा।

घर के बरामदे में ही कुछ अजीब सी पोशाक, रंग-रूप वाले लोग बैठे थे। वो सब इतनी ठंड में नीचे ही बैठे थे।  उन्होंने साड़ी, सलवार कुर्ते पहन रखे थे परंतु आवाज़ एकदम मोटी, भरभरी सी थी। गगन की दादी और पापा कुर्सियों पर बैठे थे। 

अचानक मुझे देखकर दादी के चेहरे का रंग उड़ गया। उस दिन मुझे गृह-प्रवेश नहीं करने दिया। 
"अभी जाओ, बाद में फिर कभी आना।" गगन के पापा ने कुछ कठोरता से कहा और मैं उल्टे पांव वापस आ गया। करीब भागते हुए आया, ठंड, रास्तों की ऊँच नीच से मैं खूब हांफ रहा था।

"क्या हुआ? तुरंत वापस आ गया? वो लोग घर पर नहीं हैं क्या? इतना हांफ क्यों रहा है?" मम्मी ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।

दो मिनट साँस लेकर मैंने गगन के घर की सारी बातें मम्मी को बता दीं। मम्मी की आँखों में बहुत से प्रश्नों को  तैरता छोड़ मैं अपने कमरे में वीडियो गेम खेलने चला गया।

पहाड़ों पर हर मौसम का रंग बिल्कुल अलग सा जान पड़ता था। ठंड की विदाई से पहले वसंत के आने के चर्चे आम हो रहे थे। छुट-पुट जमी बर्फ ने पहाड़ियों का साथ छोड़ दिया और सूरज की नर्म किरणों में समाने लगीं थी। 

मौसम के खुशगवार होने पर एक दिन मम्मी गगन के घर गईं। घर में सिर्फ दादी थी इसलिए पाँच मिनट की औपचारिक बात के बाद शायद उन्होंने मम्मी को रोका नहीं और वे घर आ गईं।

अगले साल तो गगन का परिवार चला ही गया। मुझे उसकी बहुत याद आया करती थी। उसकी वो सुस्त, रूकी हुई सी आँखें भी मेरे सामने घूमतीं। 
तीन साल के बाद हमारा परिवार भी दूसरी जगह आ गया। पापा की नौकरी, तबादलों के कारण मम्मी ने इसी जगह पर रहने का पक्का कर लिया। दीदी और मेरी पढ़ाई के लिए, मम्मी हमेशा हमारे पास रहतीं, पापा छुट्टियों में आया जाया करते।

समय का पहिया घूमता रहा और पापा सेवानिवृत्त हो गए। दीदी की शादी हो गई और वो अपने पति बच्चों के साथ विदेश में रहने लगीं। पापा-मम्मी और पत्नी रीना के साथ मैं इस शहर में रहता हूँ। 

"आज बहुत देर हो गई, क्या ट्रैफिक ज़्यादा थी? आज तो रीना भी शाम ५ बजे से आ गई है।" कार पार्क करते ही मम्मी ने बताया।
"ओहो! मम्मी..आपने जीत को दरवाजे से ही बता दिया। मैं तो सरप्राइज देने जल्दी आई थी परंतु आज वही लेट हो गया।" रीना ने तुनकते हुए कहा।

खाना खाते समय मैंने मम्मी पापा को बताया कि आज मुझे गगन दिखा था।‌ दोनों के चेहरे पर सोचने के भाव देखकर मैंने याद दिलाया।
"हम तीन साल मसूरी में थे, तब हमारे पड़ोसी थे ना। गगन, उसके पापा मम्मी और दादी।" 

"अरे वो! इसी शहर में रहते हैं क्या  वो लोग? क्या करता है गगन? सब ठीक तो है ना?" आदतन मम्मी ने कई धाराप्रवाह सवाल कर दिए।
"मम्मी, मेरी उससे बात तो नहीं हुई सिर्फ देखा था उसको।" मैं भी अभी तक  कुछ असमंजस में ही था।

मैंने गगन को जिस रूप में देखा था, अपने घर में उसके ज़िक्र करने में हिचकिचाहट महसूस कर रहा था। उसकी बचपन वाली सुस्त शांत आँखों में एक आग सी दिखी थी मुझे। कुछ दूरी से देखने के बावजूद, उस आग की ताप मुझे जान पड़ी थी। 

अब मैं रोज़ उसी रोड़ से आता-जाता और उन सिग्नलों पर मेरी नज़र उसे ढूँढने लगती। उस दिन के बाद फिर मुझे वो दोबारा कभी नहीं दिखा। 
ज़िंदगी की दौड़ में लगे रहते रहते कब बालों में सफेदी आ गई, पता नहीं चला। इस बीच मम्मी हम सबको छोड़कर चलीं गईं। पापा के साथ हम दूसरे घर में शिफ्ट हो गए। ये शहर से थोड़ा बाहर, बड़ा घर था। दोनों बेटों, पापा,  रीना और मेरे लिए  अलग-अलग बेडरूम थे। बाहर लॉन, झूला भी था। दीदी भी सपरिवार एक महीने के लिए आती तो उस फ्लैट में जगह कम हो जाती। दीदी के आने से, चारों बच्चों को साथ मिलते देखकर, मैं और दीदी अपने बचपन का आनंद ले लेते थे।
मेरा बड़ा बेटा इंजीनियरिंग के दूसरे साल में है और छोटा बारहवीं में।
आज ही सुबह सुबह बड़े बेटे ने पुस्तकों की लिस्ट हाथ में थमाते हुए कहा, "पापा, ऑफिस से आते हुए रास्ते में, लाइन से पुरानी पुस्तकों की दूकानें हैं। आप प्लीज़ इनमें से जो मिलें ले आना।" बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए वो नहाने चला गया।
फूलों की क्यारी के पास कुछ झुककर पापा, पुरानी, सूखी पत्तियांँ तोड़ रहे थे। कई  बार मैंने उन्हें नम आँखों से फूलों को स्पर्श करते देखा था।

शाम को ऑफिस से ज़रा जल्दी निकल गया ताकि पुस्तकें खरीद सकूँ। गाड़ी पार्किंग में लगाकर, सड़क के दूसरी ओर पुरानी पुस्तकों की एक  दूकान में गया। पुस्तकें नहीं मिलीं। उस लाइन में कई  दूकानें थी इसलिए जल्दी ही दूसरी दूकान में जा पहुँचा।

बहुत से छात्र-छात्राएं अपने लिए पुस्तकें लेने आए थे। स्कूल -कालेजों की पुस्तकें, रिफ्रेंस बुक्स, विषय विशेषज्ञों की किताबें, डिजाइन, कला विविध विषयों पर  पुस्तकें वहां उपलब्ध थीं। इस दूकान पर एक पुस्तक मिल पाई।

आगे की दूकान पर और मिलने की आशा बढ़ गई।
"भाई,  ये पुस्तकें मिलेंगी क्या?" पुस्तकों की लिस्ट वाला पेपर आगे करते हुए मैंने पूछा।
दुकानदार की पीठ मेरी तरफ थी, वह पुस्तकों पर कपड़ा  झटक रहा था जिससे धूल हट जाए। 
कपड़ा एक ओर उछाल कर वो मेरी ओर मुखातिब हुआ। 
उसने लिस्ट के लिए हाथ बढ़ाया और मैंने उसकी ओर भरपूर निगाह डाली। ढीला ढाला पठानी कुर्ता पायजामा, माथे पर तिलक, सिर पर बाल नहीं के बराबर। आँखों की बात दिल तक पहुंच गई परंतु जुबान ने हड़ताल कर दी। 
दिमाग ने सालों पहले वाली छबि से, आज सामने खड़े व्यक्ति को मिलाना शुरू किया। स्त्री वेशभूषा को पुरूष के रूप में स्वीकार करने में दो मिनट लग गए।

"गगन..!" होंठ बुदबुदाए।
मुझे देखकर उसकी आँखों में चमक आ गई। मेरे हाथ से लिस्ट लेकर, मुझे पास वाली कुर्सी पर बैठने का आग्रह किया। उसने मेरी आँखों के कौतूहल, प्रश्न और स्नेह को पढ़ लिया था।

"हम उस घर को छोड़कर किसी अलग सी जगह में रहने चले गए थे। उस दिन तुम आए थे, मैंने खिड़की से देखा था परन्तु मुझे बाहर आने से रोक दिया गया था।  नई जगह में हमें कोई पहचानता नहीं था। यही तो उद्देश्य था मेरे परिवार का क्योंकि समाज मेरी पहचान, मेरे अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता।"

उसकी आंँखों में पानी तैर गया। 

"कुछ सालों तक दादी का साया रहा, मम्मी तो असमय ही साथ छोड़ कर चलीं गईं थीं। दादी के जाते ही पापा ने मुझे मेरी ही तरह के लोगों के साथ रख दिया। पैसे भेजते रहे हमेशा, खुद कभी न मिलने की शर्त लेकर।‌"
"पापा अपने बिजनेस में, अपनी दुनिया में रमे रहे और मैं नए लोगों के साथ अपनी इस नई दुनिया में।  अपने जैसे कुछ अधूरे से लोगों के साथ रहकर मुझे खुशी होती थी या दुख मुझे कभी पता नहीं चला।" एक गहरी श्वास लेकर उसने मेरे चेहरे पर अपनी नज़र गड़ा दी। शायद मेरी लकीरों को पढ़ने का प्रयास कर रहा था।‌ उसे लगा कि मैं उसके बचपन का वह हिस्सा हूँ जिसने उसका हर रूप देखा है और  उसने अपनी बात फिर शुरू की।

"मैं अच्छे घर का, अच्छी स्कूल में पढ़ने वाला लड़का था जिसके पिताजी पैसे भी भेजते थे, बस सब जल्दी ही मुझे पहचानने लगे।‌ मैं धीरे धीरे उनके साथ, उनके धंधे पर जाने लगा।‌ मेरी सादगी, अँग्रेजी बोलने की कला से उनका धंधा चमक गया, बहुत से पैसे आने लगे और मैं सबकी पसंद बनते गया।" बोलते हुए वो अपनी पुरानी दुनिया में गुम हो गया।

"और फिर, पापा के पैसे बंद हो गए। उस दिन से मैं इस भरी दुनिया में एकदम अकेला था।" एक टीस सी थी आवाज़ में।

"अंकल-आंटी कैसे हैं? दीदी कैसी है? तुम सब कहाँ रहते हो? तुम्हारे कितने बच्चे हैं?" उसने एक ही सांँस में पूछ लिया।
उसको सब जानकारी देते हुए मुझे भी आंतरिक खुशी मिल रही थी।

अचानक, उसने पास के दूकान में बैठकर पढ़ते एक लड़के को आवाज़ दी, "मान, इधर आ बेटा।" 
१७-१८ साल का लड़का, पहली बार देखने पर थोड़ा  अलग सा लगा।

"ये मेरा बेटा है। ये ४ साल का था और हमारे लोगों के बीच आया। मैंने इसे गोद ले लिया था। अब बदलते हुए इस नए ज़माने में इसकी अपनी पहचान है, पढ़ता है। इस साल बारहवीं में है। बहुत होशियार है, आगे प्रतियोगी परीक्षाओं में जाकर समाज के लिए, देश के लिए अच्छा करना चाहता है।" मान की ओर देखते हुए गगन की आँखों में वात्सल्य, स्नेह भर गया।
बच्चे ने हाथ जोड़कर मुझे नमस्कार किया।‌ मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और खूब पढ़ने लिखने का आशीर्वाद दिया।

"इसके लिए ही अपनी बिरादरी का वो काम छोड़कर मैंने पुरानी पुस्तकें खरीदकर, उसे आधी कीमत पर बेचने का काम पकड़ लिया। आज पूरे समय बच्चों से घिरा रहता हूँ और मान भी मेरे इस काम से बहुत खुश रहता है।" मान मेरे लिए पानी का गिलास भरकर खड़ा था।
मैंने पानी पिया और ५००/ उसे पकड़ा दिए। गगन के इशारा करने पर उसने वो नोट रख लिया।

मेरी लिस्ट में से दो पुस्तकें उसके पास थीं। उसने पैक करते हुए, मेरा फोन नंबर लिख लिया। 
"आसपास देखता हूँ, मेरे पास आईं तो तुम्हें फोन करूँगा।" कहते हुए उसने पैक मेरे हाथों में पकड़ा दिया। आज उसके हाथों का स्पर्श आत्मविश्वास से भरा था।

पैक पर मेरे बेटे का नाम और  नीचे लिखा था- 

"सस्नेह भेंट
गगन चाचा।"

 वापस लौटते समय मैं अपने आपको हल्का महसूस कर रहा था। एक हम-उम्र, सहपाठी को अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़कर जीतते जो देख लिया था। 
सिग्नल की हरी बत्ती दूर तक खुला रास्ता दिखा रही थी।


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शर्मिला चौहान