मंगलवार, 16 मार्च 2021

अप्रकाशित लघुकथा "संरक्षक"

"संरक्षक"

आज मंडल बाबू के घर के सामने, पंडाल तना था, कुर्सियां बिछी थीं। मंडल बाबू का बेटा रंजन, अमेरिका से आया है। 
"सुना है कोई बड़ा काम किया रंजन ने।" मंडल बाबू के मित्र सुदेश जी ने पूछा।
" हाँ हाँ, पक्षियों की विलुप्त होती प्रजातियों पर शोध कर रहा था।" उसके शोध पर प्रकाशित पुस्तक हाथ में पकड़े मंडल बाबू बोले।
"ये भी कोई काम है।" चेहरे पर बुरे से भाव थे।
"नहीं यार! उसके शोध को बहुत सराहा गया, पुस्तक का रूप दिया गया है। उसके शोध से पक्षी प्रेमियों को बहुत सहायता मिलेगी।" अपने बेटे की मेहनत का, इतना उदासीन स्वागत मंडल बाबू को पसंद नहीं आया।
"किसी को सुनने, जानने की इच्छा ही नहीं है, सिर्फ बधाई दी और जलपान करके गए।" अपनी पुस्तकों की ओर देखकर रंजन दुखी हो गया।
मंडल बाबू ने, रंजन को साथ चलने कहा।
बाजार में रद्दी वाले की दुकान के बाजू में चादर बिछाए, कुर्ता पायजामा पहने, पुस्तक पढ़ने में तल्लीन, अधेड़ उम्र के व्यक्ति को पहचानने में रंजन को अधिक समय नहीं लगा।
"अरे! लेखक काका आप, यहां! " आश्चर्य से रंजन ने पूछा।
"अरे! रंजन बेटा! बधाई हो, बहुत बढ़िया काम किया तूने। तेरे शोध की पुस्तक मुझे भी देना पढ़ने।" खुशी से रंजन को गले लगा लिया।
"आप तो लिखते थे काका। कोई पुस्तक आई आपकी?" रंजन ने बचपन से समाचार पत्रों में प्रकाशित उनकी कविताएं, कहानियां पढ़ीं थीं।
"नहीं रे! अब मैंने लिखना बंद कर दिया है।" लंबी सांस भरकर उन्होंने कहा, "पढ़ने वालों की विलुप्त होती प्रजाति को बचाने के लिए, मैं विशुद्ध पाठक बन गया।" मुस्कुराते हुए बोले, "नहीं तो आगे दस बीस साल बाद, तेरे को पाठकों की विलुप्त प्रजातियों पर शोध करके पुस्तक लिखना पड़ता।" कहकर रंजन के 'लेखक काका' वेदना भरी हँसी, हंसने लगे।
रंजन ने अपनी पुस्तक, एक प्रबुद्ध पाठक के हाथों सौंप दी।

मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान

अप्रकाशित लघुकथा

"संरक्षक"

आज मंडल बाबू के घर के सामने, पंडाल तना, कुर्सियां बिछी थीं। मंडल बाबू का बेटा रंजन, अमेरिका से आया है। 
"सुना है कोई बड़ा काम किया रंजन ने।" मंडल बाबू के मित्र सुदेश जी ने पूछा।
" हाँ हाँ, पक्षियों की विलुप्त होती प्रजातियों पर शोध कर रहा था।" उसके शोध पर आधारित पुस्तक हाथ में पकड़े मंडल बाबू बोले।
"ये भी कोई काम है।" चेहरे पर बुरे से भाव थे।
"नहीं यार! उसके शोध को बहुत सराहा गया, पुस्तक का रूप दिया गया है।" अपने बेटे की मेहनत का, इतना उदासीन स्वागत मंडल बाबू को पसंद नहीं आया।
"किसी को सुनने, जानने की इच्छा ही नहीं है, सिर्फ मिलकर जलपान करके गए।" अपनी हिंदी में अनूदित पुस्तकों की ओर देखकर रंजन दुखी हो गया।
मंडल बाबू ने, रंजन को साथ चलने कहा।
बाजार में रद्दी वाले की दुकान के बाजू में चादर बिछाए, कुर्ता पायजामा पहने, पुस्तक पढ़ने में तल्लीन, अधेड़ व्यक्ति को पहचानने में रंजन को अधिक समय नहीं लगा।
"अरे! लेखक काका आप, यहां! " आश्चर्य से रंजन ने पूछा।
"अरे! रंजन बेटा! बधाई हो, बहुत बढ़िया काम किया तूने। तेरे शोध की पुस्तक मुझे भी देना पढ़ने।" खुशी से रंजन को गले लगा लिया।
"आप तो लिखते थे काका। कोई  पुस्तक आई आपकी?" रंजन ने बचपन से समाचार पत्रों में प्रकाशित उनकी कविताएं, कहानियां पढ़ीं थीं।
"नहीं रे! अब मैंने लिखना बंद कर दिया है।" लंबी सांस भरकर उन्होंने कहा, "पढ़ने वालों की विलुप्त होती प्रजाति को बचाने के लिए, मैं पाठक बन गया हूँ।" मुस्कुराते हुए बोले, "नहीं तो आगे दस बीस साल बाद, तेरे को पाठकों की खोज पर पुस्तक लिखना पड़ेगा।" 
रंजन ने अपनी पुस्तक, एक प्रबुद्ध पाठक के हाथों सौंप दी।

मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान

शर्मिला चौहान ठाणे (महाराष्ट्र)१) संज्ञान वार्षिक पत्रिका-२०१९संपादक- के.पी.सक्सेनालघुकथा- उम्र का ढ़लता पड़ाव२) चिकीर्षा ई-पत्रिकासंपादक- दुर्गेश साध२०२०- गर्म कोट२०२१- पोटलीसाझा संकलन१) जिंदगी जिंदाबाद-२०२१संपादिका- रीमा दीवान चड्ढालघुकथा- जीवन सुर२) समसामयिक लघुकथाओं का साझा संकलन-२०२१संपादिका- शगुफ्ता यास्मीन क़ाज़ीलघुकथा- अपना आसमान३) महिला दिवस, एक अभिव्यक्ति-२०२१संपादिका- खुदेजा खानलघुकथा- चिंगारीवर्ष २०१९-२०२० में विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित लघुकथाएंनवभारत साहित्यनामा- माँ यहीं है, गरीब का दुख, रिश्ते।दैनिक भास्कर मधुरिमा- बिदाई, सेल्फी, मिजा़ज, जवाब, आनलाइन।इंदौर समाचार- अपना अपना हिस्सा, आकाशदीप, हस्ताक्षर।निकट भविष्य में प्रकाशित होने वाले साझा संकलन (२०२१)१) विभाजन त्रासदी की लघुकथाएंसंपादक- डाॅ. रामकुमार घोटड़ लघुकथा- अपना अपना सच२) क्षितिज - संवादात्मक लघुकथाएँ३) भूख पर आधारित लघुकथाओं का साझा संकलनलघुकथा- बोध, गिरगिट।४) पड़ाव और पड़ताल खण्ड 32संपादक- मधुदीप गुप्ता जीलघुकथा- मन की बात५) लघुकथा आयोजन २०२० में प्रथम आई लघुकथा "सौंधी महक" भी संकलन में आने वाली है। वनिका प्रकाशन( जानकारी के अनुसार)६) समकालीन लघुकथा कारों का दस्तावेज (साझा संकलन)लघुकथा- सारथी, गर्म रजाई।अभी तक की जानकारी अनुसार आपको बताया है सर।🙏

अखिल भारतीय हिंदी लघुकथा प्रतियोगिता १३ सामयिक परिवेश हेतु ३ लघुकथाएं

[14/03, 16:50] Sharmila Chouhan: "मरहम"

सुबह से ना जाने कितनी बार उन्हीं पंक्तियों को दोहराते हुए मोहिनी का मन मस्तिष्क थक गया था। मेकअप की परत के नीचे से, मुक्ति की आकांक्षा लिए, त्वचा की आत्मा चीख रही थी। 

एक बार फिर सैट तैयार हो गया, पूरी शक्ति से बड़े बड़े बल्ब, ढलती शाम को टक्कर देने के इरादे से चमकने लगे। मोहिनी के चेहरे पर फिर से साज सज्जा पोती गई और काम चालू हुआ।

किसी कंपनी के सौंदर्य प्रसाधनों की स्तुति करती मोहिनी, अपने ही अंदाज में मन मोह रही थी। अपनी खूबसूरती का राज, वह सभी को बताने पर आमादा थी।
विज्ञापन बनाने वाले, उसकी एक एक अदा को कैमरे में बखूबी कैद कर रहे थे। आने वाले दिनों में, उसकी अदाएं हर जवान लड़की में नजर आने वाली थी।‌ 
रात को घर वापस आने तक, मोहिनी चूर हो गई थी। हाथ मुंह धोते हुए,अपने चेहरे को गौर से देखने लगी।
"चीजें नहीं, सपने और कुछ उम्मीद बेचता है यह चेहरा।" अपने द्वारा बोली पंक्तियों को याद करके, उसका चेहरा मलीन पड़ गया।

अपने मुर्झाए चेहरे को प्यार से सहलाते हुए, अंदर कमरे में झाँकी। माँ और छोटी बहन, उसका इंतजार करते हुए, सो गए थे। उनके ऊपर चादर डालकर, खाना खाने के लिए रसोई की ओर जाने लगी।

वाश-बेसिन के ऊपर लगे दर्पण ने उसके पैर बाँध लिए। उम्र का असर आँखों के नीचे झलकने लगा है। चेहरे पर हाथ फेरते हुए मोहिनी को अपनेपन का अहसास हुआ।
"यही उसका असली रूप है।" कुछ वर्षों के बाद, यह चेहरा किसी विज्ञापन के लिए नहीं लिया जाएगा, भविष्य की वेदना से आँखें छलक गईं।

मोहिनी ने कुछ महंगे, सौंदर्य प्रसाधनों का मरहम चेहरे पर लगा लिया। अब भूख भी मिट गई थी।

यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com
[14/03, 17:30] Sharmila Chouhan: "स्वाद"

सूरज अपने दीदे फाड़े, सबको डरा रहा था। दल-बदलने में माहिर हवा, आज सूरज से दोस्ती गांठे, गर्म हो रही थी। एक दुकान के सामने वातानुकूलित कार रूकी और मालिक उतर कर सामान लेने गए।

चिलचिलाती धूप में, ठंडे वातावरण में बैठा गोल्डी, अपनी किस्मत पर इतरा रहा था। भूरे-सुनहरे बालों वाला, मध्यम कद काठी का, प्यारा-सा कुत्ता गोल्डी। न..न..न! कुत्ता नहीं, बेटा गोल्डी।

"भौं! भौं! भौं!भौं!" गोल्डी ने कार से बाहर जाने की इच्छा जताई।
"नहीं गोल्डी बेटा, बाहर तेज धूप है। पापा आइसक्रीम ला रहें हैं।" मालकिन ने प्यार से गोल्डी के बालों को सहलाया।
कुछ मिनटों में, अपने पसंद के वनीला आइसक्रीम का स्वाद लेता गोल्डी, खुले शीशे से बाहर झांकने लगा। अचानक, तीन-चार सड़क छाप कुत्ते कार के पास खड़े होकर भौंकने लगे। अपनी जाति-बिरादरी के प्राणी को, आदमी के साथ कार में बैठे देखना उन्हें नागवार गुजरा।
अपने जैसे दिखने वाले, अपनी बोली बोलने वालों को देखकर, गोल्डी खुशी से पूँछ हिलाने लगा।
"अंदर सिर करो गोल्डी, ये आवारा कुत्ते हैं।" कहते हुए मालिक ने कार के शीशे चढ़ा दिए।
सड़क पार, उन कुत्तों को डबलरोटी का खुला पड़ा पैकेट दिख गया। उछलते कूदते हुए ‌वे मुँह में पैकेट दबाए, पेड़ के नीचे की मिट्टी में लोट पोटकर टुकड़े खाने लगे।

कार के अंदर बैठे गोल्डी को, ना जाने क्यों वनीला आइसक्रीम बेस्वाद लगने लगी।


यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com
[16/03, 13:09] Sharmila Chouhan: "बैल"

गर्मियों की उमसभरी शाम, दिन ढल गया परंतु अभी भी कुछ रोशनी रास्ते पर पड़ रही है। लंबे लंबे डग भरता, गोविंद अपनी झोपड़ी के सामने पहुँचा। दिनभर के पसीने से, कुर्ता और गमछा दोनों ही निचोड़ने लायक हो गए थे।
"कुएं का ठंडा पानी भर रखा है नहा धो लो।" कहते हुए पत्नी झुनिया धोती लाने गई।
सिर से ठंडे पानी की धार छोड़ते गोविंद ने, लंबी सांस ली। दिनभर की जी-तोड़ मेहनत, आग बरसाने वाली गर्मी से मन और शरीर, दोनों त्रस्त हो जाते हैं।
"मालिक से एक दो दिन की छुट्टी क्यों नहीं मांगते? मोगी बुआ कह रही थी कि घर परिवार अच्छा है। लड़का भी सरकारी स्कूल में चपरासी है।" अपनी अठारह साल की बेटी के विवाह की चिंता, झुनिया के शब्दों से झलक रही थी।
"अब गर्मी में कहां छुट्टी देंगे मालिक! पूरे बगीचे को दो-दो बार पानी देना, गैया- बैलों को पानी पिलाना। मुझे तो छुट्टी मांगने में डर लगता है झुनिया‌।" अपनी दोनों लड़कियों को चूल्हे के पास देखकर, गोविंद ने हौले से कहा।
"कैसा काम है, भिनसारे के गए तो संझा भी घर नहीं पहुंचते। दो रोटी बांध देती हूँ तो दोपहरी खाते हो, नहीं तो भूखे ही काम करते रहो।" पूरी जिंदगी मेहनत करके, मुश्किल से दो जून खाना जुटाने वाले की पत्नी का संयम टूट गया था।
"बरसात के समय बुवाई, फिर निराई -गुडाई, कटाई! अरे..! खेत का काम कभी बंद होता है। जो अभी छुट्टी ना मिली तो आषाढ़ में मिलेगी क्या?"
पानी का गिलास थमाकर, झुनिया अंदर खाना लाने चली गई। 
"आज गुड़ भी खत्म हो गया, इसलिए बिना गुड़ के पानी पकड़ा गई।" पानी गटकते हुए गोविंद ने मन ही मन सोचा।
झोपड़ी में लगे इकलौते बल्ब की पीली रोशनी, सब ओर प्रकाश देने की पुरजोर कोशिश कर रही थी।
गोविंद उस रोशनी में, अपने पूरे परिवार को देखने की कोशिश कर रहा था।
"मालिक, कर्जा तो चुकता करना ही है आपका! आप तो माई-बाप हैं। मैं मर गया तो ये गोविंद, मेरा बेटा आपके खेतों में काम करेगा।" कहते हुए गोविंद के बाबू ने आठ साल के गोविंद को आगे कर दिया था।
आज इसी इकलौते बल्ब की धीमी रोशनी में, उसका दस साल का बेटा माधव पढ़ रहा है।
"बैल बहुत उपयोगी पशु है। वह मेहनती और ईमानदार होता है। दिन रात काम करता है, अपने मालिक का वफादार...।"आगे के शब्द गोविंद को सुनाई ही नहीं पड़े।
"बंद कर ये पाठ! नहीं बनना तुझे बैल।" अचानक तेजी से उठकर गोविंद ने बेटे की पुस्तक बंद कर दी।
चारपाई पर बैठे, हांफते गोविंद के सामने थाली में भात सब्जी रखी थी।

यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

बुधवार, 10 मार्च 2021

शिव वंदना ( महाशिवरात्रि)१०/३/२०२१

"शिव वंदना"

हे नीलकंठ, हे शिव शंकर, मम हृदय करो बसेरा।
हे उमापति, हे महादेव, कैलाश बने मन मेरा।।

मन कर्म वचन का बिल्वपत्र, नित्य करूँ शिव अर्पण,
नंदी जैसा मौन साथ, रहे मन में पूर्ण समर्पण।
जटाजूट का वेश धराए, तप करते महायोगी,
तामस छोड़ सत्व को पाऊँ, जनम जनम की भोगी।

हे शिव शंभू, हे मृत्युंजय, दूर करो तम मेरा।
हे उमापति, हे महादेव, कैलाश बने मन मेरा।।

☘️☘️🌼🌼☘️☘️🌼🌼

घट घट वासी, शिव अविनाशी, भूत भविष्य के ज्ञाता,
ज्ञान चक्षु खुल जाएं भोले, हूँ मूढ़ मति अज्ञाता।
सत रज तम से ऊपर हैं, निर्गुण त्रिशूल धारी,
भूत भविष्य के ज्ञाता हैं शिव, रूप छबि निराली।

हे त्रिलोकी, हे गंगाधर, अज्ञान हरो प्रभु मेरा।
हे उमापति, हे महादेव, कैलाश बने मन मेरा।।

☘️☘️🌼🌼☘️☘️🌼🌼

नाग ततैया बिच्छू विषधर, सबको गले लगाए,
हलाहल धारे सृष्टि हित, नीलकंठ कहलाए।
बाघंबर मृगछाला पहनें, करते नंदी सवारी,
पशुपति हो नाथ सदा ही, अद्भुत लीला तिहारी।

हे शंकर, हे भूतपति, करुँ सदा जप तेरा।
हे उमापति, हे महादेव, कैलाश बने मन मेरा।।

☘️☘️🌼🌼☘️☘️🌼

हे सोमनाथ, हे महाकाल, कल्याण कारी विश्वेश्वर,
हे शिव शंकर, हे मृत्युंजय, केदारनाथ  रामेश्वर।
हे वामदेव, अंबिकानाथ, हे त्रिलोकेश जटाधर,
हे त्र्यंबकं, हे बैद्यनाथ, कैलाशपति परमेश्वर।
त्रिदल त्रिशूल त्रिपुंड धारी, हो त्रिलोक के स्वामी,
भक्ति शक्ति मुक्ति के दाता, भोले अंतर्यामी।

हे आदिदेव, हे शिव शंभू, रक्षण करना मेरा।
हे उमापति, हे महादेव, कैलाश बने मन मेरा।।
☘️☘️🌼🌼🌼☘️☘️

  🙏ऊँ नमः शिवाय 🙏

शर्मिला चौहान

मंगलवार, 9 मार्च 2021

लघुकथा-चिंगारी( महिला दिवस,एक अभिव्यक्ति पुस्तक) प्रकाशित, लघुकथा- स्वयंसिद्धा अप्रकाशित(कथादेश में भेजी)





-"चिंगारी"


दुलारी ने आँगन में बीड़ी फूंँकते लखना को देखा तो बस बिगड़ गई।
"अरे! भिनसारे कोई बीड़ी फूँकता है क्या? निकल पड़ो तो कोई काम भी मिले।" एक सप्ताह से बिना काम के, घर में बैठे पति से त्रस्त हो गई थी दुलारी। 
"काम मिलता ही नहीं तो क्या चोरी करूँ?"तल्ख स्वर में लखना ने जवाब दिया।
"उमर हो रही है तुम्हारे साथ, सब जानती हूँ। एक-दो घर पूछा और फिर चार दोस्तों में दिन बिता के खाने के टैम हाजिर।" आज दुलारी के तेवर भी तेज थे।
"चार घर पोंछा बर्तन क्या कर लेती है, अपने आप को मालकिन समझ रही है।" गुर्राते हुए लखना ने अधजली बीड़ी को पैर से मसल दिया।
लखना के पैरों तले रौंदी बीड़ी ने दुलारी को अपने पुराने दिनों की याद दिला दी। 
गाँव की सबसे सुंदर लड़की थी दुलारी। पाँच कक्षा पढ़ी भी थी। सोलह में ब्याह दी गई लखना से और बीस तक तो दो बच्चों की माँ बन गई थी। 
लखना, लकड़ी का काम करता था। फर्नीचर, दरवाजे सब बनाता था परंतु स्वभाव का तेज और शरीर से आलसी। किसी ठेकेदार के नीचे टिककर काम ना करता। घर की जरुरतों को पूरा करने के लिए दुलारी आसपास की बिल्डींग में काम करने लगी।
लखना के खाँसने से दुलारी की तंद्रा टूटी। हाथ में पानी का गिलास भरकर लखना के पास गई।
"कहती हूँ बीड़ी मत फूँको। फेफड़ा खराब हो रहा है। सब जगह लिखा रहता है कि बीड़ी पीना बुरी बात है।" कहते हुए पानी का गिलास उसके हाथ में पकड़ा दिया।
बेकार बैठकर, दोनों जून  खाना खाने का आनंद लेने वाला मर्द जाग गया। 
गिलास की झनझनाहट हुई और दुलारी का माथा छिल गया। माथे से छलकती रक्त बूँदों ने दुलारी को, उसका अस्तित्व बता दिया। उसने ऐसी मर्दानगी अपने बापू और अपने ससुर में भी देखी थी।  किसी भी कीमत पर वह इस परंपरा को आगे  बढ़ने नहीं  देना चाहती थी।
कुछ सड़ी-गली परंपराओं को तोड़ना ही भला होगा, इसी सोच के साथ दुलारी ने कमर कस लिया।
अगले कुछ क्षणों में, अपनी मर्दानगी भूलकर, हाथ पैर बचाता लखना सचमुच काम की खोज में निकल गया था। कुचली बीड़ी में से एक चिंगारी चमक रही थी।

स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com



"स्वयंसिद्धा"

शादी की गहमा-गहमी खत्म हुई तो आज पूरा परिवार घर के बगीचे में आराम कर रहा है। वैसे व्यवसाय करने वाले परिवारों में ऐसा दृश्य कम ही होता है कि सब एक साथ घर पर बैठें। कुछ एक्का - दुक्का करीबी रिश्तेदार ही घर पर हैं।

"नितिन की शादी बड़ी यादगार रहेगी, कम मेहमान और जो थे वो सब भी मास्क में।" हँसते हुए नितिन के बड़े भाई राजीव ने कहा।
"सही बात कही भैया ने, फोटोग्राफर के सामने ही सब चेहरा दिखा रहे थे।" नितिन से छोटे पुनीत ने कहा।
इन सबकी बातों को सुनते हुए, नई बहू दिव्या और कहीं खो रही थी।
इस घर में सब कुछ अच्छा है, पर उसको ना जाने क्यों कुछ अजीब सा लगता है। अपने कमरे में भी लगता है कि कोई और भी है। कल बाथरूम से बाहर‌ निकली तो लगा कोई दरवाजे से तुरंत हट गया।
"क्यों, तुम मेरे नहाने के समय बाथरूम के बाहर पहरा दे रहे थे!" दिव्या ने नितिन से मुस्कुरा कर पूछा था।
"मैं तो बाहर समाचार पत्र पढ़ रहा था, तुम भी ना! क्यों करुँगा पहरेदारी?" नितिन ने बताया।
कल से दिव्या और परेशान हो गई। 
शाम को सास और जिज्जी ने चाय बनाकर कमरे में लाने को कहा। जिज्जी ने रसोई का सारा समझा दिया था कि चीजें कहाँ कहाँ हैं।
चाय उबल रही थी और गुनगुनाते हुए दिव्या दूध का पतीला लेने पलटी, अनायास ही डर गई। उसने रसोई के दरवाजे से किसी को तेजी से हटते देखा।
"कौन है ये? कोई क्यों छिपकर देखता है?" एक मर्दाने परफ्यूम की खुशबू ने उसका दिमाग खराब कर दिया।
सास- जेठानी के साथ चाय पीने में बिल्कुल मन नहीं लगा उसका।
"हमारी नई बहू आती जाती है तो पता चलता है। बहू की पायल बजती है।" बाबूजी ने कुर्सी पर बैठी दिव्या को देखकर कहा।
बाजू में बैठे, जिज्जी के भाई की परफ्यूम की महक से विचलित दिव्या ने, सबकी ओर एक दृष्टि डाली और अपने पैर से पायल निकाल लिया।
"मुझसे ज्यादा जरुरत इस पायल की इनको है।" जिज्जी के भाई के हाथों, अपनी पायल पकड़ाते हुए दिव्या के दिल का बोझ हल्का हो गया।

स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।

शर्मिला चौहान
सी-१४०१, निहारिका कनकिया स्पेसेस
ठाणे (पश्चिम) ४००६१०
महाराष्ट्र
फो.नं._ 9967674585
ई-मेल- sharmilachouhan.27@gmail.com


महिला दिवस, खुदेजा खान जी को नागपुर।

लघुकथा-यात्रा, खुशी

[18/02, 15:31] Sharmila Chouhan: 

"यात्रा"

चौक पर खड़ा, सीमेंट का पुराना खंभा परसों रात गिर गया। अस्सी वर्षीय गोविंद सिंह जी, आज सुबह उस क्षत विक्षत, धराशाही खंभे के पास चुपचाप खड़े थे।
एक समय था जब गोविंद सिंह जी की सभाएँ, समारोह इसी खंभे के नीचे हुआ करते थे। वक्त बदला, पार्टियाँ बदली, लोग और हालात भी। अब तो चौक के चाय की टपरी वाला, अस्सी साल के बूढ़े नेता को टोहता है कि एक कप चाय पीने के बाद कब जाएँगे।

 कितनी ही सभाओं, समारोहों का साक्षी था खंभा। नेताओं की तस्वीर, बड़े बड़े बैनर, चुनाव के पोस्टर थामकर, खंभे की कमर दुख गई थी और परसों तो टूट ही गई।
आज अचानक जिले के पालक मंत्री के आगमन की सूचना मिली और पार्टी के कार्यकर्ताओं में हलचल होने लगी।
"शाम को मंत्री जी यहाँ संबोधित करेंगे और इस खंभे को अभी गिरना था‌।" नए खंभे के लिए गड्ढा खुदवाते हुए एक कार्यकर्ता झल्लाया।
"हाँ यार, अब जल्दबाजी में नया खंभा लगाना ही पड़ेगा। चौक का मजा खराब हो गया।" दूसरे कार्यकर्ता ने गिरे खंभे को घूरते हुए कहा।

खंभे की आत्मा तिलमिला गई।
 दोपहर को बड़े से ट्रक में, मान सम्मान के साथ नए खंभे को लाया गया। लंबी आयु की कामना करते हुए, कुछ लोगों के करकमलों से उसे खड़ा किया। खुदे गड्ढे में पैर जमाए, खंभा आसमान को झाँकने लगा। पालक मंत्री की तस्वीर उसके शरीर पर चिपका दी गई।

जमीन पर पड़ा, पुराना खंभा दो दिनों से लोगों की ठोकरें और कुत्तों की जगविदित प्रिय क्रिया को झेलता कराह रहा था।
"ट्रक में इस सीमेंट के टूटे खंभे को भरकर शहर के बाहर डाल दो। कचरा साफ करो।" एक नवजवान कार्यकर्ता चिल्लाया।

टुकडों में बंटे, उस बूढ़े पुराने खंभे को ट्रक में ठूँसा जा रहा था। खंभे का एक छोटा टुकड़ा, अपने हाथों से उठाकर, गोविंद सिंह जी ने ट्रक पर रख दिया।

आगे बढ़ते ट्रक की दिशा में, थके बूढ़े कदम, कुछ दूर साथ चलने लगे।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
१८/०२/२०२१
[19/02, 17:31] Sharmila Chouhan: 

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"खुशी"

सुबह से काम की तलाश में भटकते गनपत को, भूख लग गई थी। बड़ी इमारत के सामने एक बार कोशिश करना चाहा।
"क्या है, कौन हो? गेट के अंदर कैसे आ गए?" चौकीदार ने घुड़की दी।
"काम चाहिए साहब। बाग की साफ-सफाई, छोटी-मोटी मरम्मत का काम, कोई भी काम दिलवा दो।" चौकीदार को 'साहब' संबोधित करते, गनपत बिल्कुल नहीं हिचकिचाया।
"अभी बाहर के लोगों को कोई काम नहीं देता, कोरोना का डर है ना। जा भाई।" स्वयं के लिए 'साहब'का संबोधन चौकीदार को तृप्त कर गया था और आवाज में नरमी आ गई।
सड़क के किनारे ही बड़े पेड़ के नीचे गनपत डिब्बा खोलकर खाना खाने लगा। 
खाते हुए उसकी आंखें नम हो रहीं थीं। पाँच साल की बेटी मनु का अगले सप्ताह जन्मदिन आ रहा है और उसने कहा है कि," बाबा, मुझे लंबे बालों वाली, सुंदर गुड़िया देना ना। मुझे खेलना है उससे।" 
आधा खाना खाकर गनपत ने डिब्बा बंद कर दिया, "काम ही नहीं मिल रहा तो कहाँ से गुड़िया लूँगा ?" सामने की बड़ी इमारतों को देखकर ना जाने क्यों उसे चिड़ हो रही थी। आँखों के सामने बेटी का प्यारा सा चेहरा घूम रहा था।
सामने की एक इमारत का बड़ा गेट खुला और कामवाली बाहर आई। उसने बड़ी भरी थैली को कचरे के डिब्बे में डाल दिया और निकल गई।
उत्सुकता से गनपत उस कचरे के डिब्बे को झाँकनें लगा। रंग-बिरंगे कागजों की कतरनें, पुरानी टूटी चीजों के बीच, नीली आँखों वाली, पलक बंद करने वाली और लंबे बालों वाली सुंदर सी गुड़िया पड़ी थी।
गनपत की तो जैसे लाॅटरी निकल पड़ी। कचरे में से गुड़िया निकाल कर, उसे अपने पास के पानी से पोंछने लगा।
"ऐ..! क्या कर रहा है? बता ?" चौकीदार भागकर आया।
"अबे! बोलना, गूँगा तो है नहीं। क्या लिया है?" चौकीदार ने अपने पद की गरिमा निभाई।
"साहब, कचरे से बेटी की खुशी लिया है।" गनपत के हाथों में, नीली आँखों वाली, लंबे बालों वाली गुड़िया मुस्कुरा रही थी।

शर्मिला चौहान

रविवार, 7 मार्च 2021

स्त्री हूँ मैं

"स्त्री हूँ मैं"

ना अबला कहो, ना सबला कहो
ना श्रद्धा,ना देवी का दर्जा धरो  ।
ना पूजनीय, ना वंदनीय हूँ मैं,
हाड़-मांस से बनी, एक स्त्री हूँ मैं।।

चाहत नहीं कि लोगों बीच पूजी जाऊँ,
यह भी नहीं कि इश्तहारों में नज़र आऊँ।
इंसानियत की तलाश में सदियों से भटकती हूँ‌‌ मैं
हाड़-मांस से बनी, एक स्त्री हूँ मैं ।।

भारत भूमि में वर्चस्व था कभी,
शिक्षा, अस्त्र-शस्त्र में पारंगत थीं सभी।
लुटेरों, आततायियों से मैं गोपनीय हो गई,
आज भी कहीं परदों में छुपी रहती हूँ मैं
हाड़-मांस की बनी,  एक स्त्री हूँ मैं ।।

ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति हूँ,
रिश्तों-नातों से स्वयं बंधीं हूँ।
अधिकार नहीं, विश्वास चाहिए,
 मात्र इंसान समझी जाने की प्रतीक्षा में हूँ मैं,
हाड़-मांस से बनी, सिर्फ एक स्त्री हूँ मैं।।

गर संवेदनाओं को नकारा जाएगा,
क्षमताओं को जबरन दबाया जाएगा।
आँसूओं के सैलाब की परीक्षा ली जाएगी,
कोई भी स्त्री अब सहन नहीं कर पाएगी।
 सदियों से बदलाव की राह तकती हूँ मैं,
हाड़-मांस से बनी, सिर्फ एक स्त्री हूँ मैं।।
स्त्री हूँ मैं।।

बरसों से खड़ी बाधाएँ हटने लगीं हैं
अदम्य हौसलों से राहें बनने लगीं हैं।
हौसलों के पंख से दुनिया हिली है,
आकाश की सौगात औरतों को मिली है।
उड़ान भरने को हीअब सुबह जागती हूँ मैं
हाड-मांस से बनी स्त्री हूँ मैं।।

शर्मिला चौहान 

बुधवार, 3 मार्च 2021

मेरी गज़लें..

तेरी याद भी अब सताती नहीं है
तेरी बात भी अब रुलाती नहीं है।

न चाहत न कोई शिकायत है तुझसे
तेरी सादगी अब जलाती नहीं है।

तेरी बेबसी का पता है मुझे भी
नई  राह दुनिया बनाती नहीं है।

सुनेगा न कोई भी दुनिया में मेरी
यही बात जीना सिखाती नहीं है।

दबे पाँव आकर चले भी गए जो
मेरी आह तुमको बुलाती नहीं हैं।

इसी चाह में हूँ कभी तो मिलोगे
मेरी चाह आँखें छुपाती नहीं हैं।

कहूँगा मैं तेरी ही महफ़िल में सबसे
कि तू राज़ अपने बताती नहीं है।

बहर-१२२
काफिया-आती
रदीफ़- नहीं है

शर्मिला चौहान
३/३/२०२१

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१२/३/२०२१
बहर १२२
काफिया- आ, छा, भा
रदीफ- रही है


न जाने कहाँ से हवा आ रही है।
उड़ा कर घरौंदा चली जा रही है।

बड़ी तेज़ बहती हवा है यहाँ पर।
कि चूनर सरकती मेरी जा रही है।

न किस्मत मेरी में लिखी थी मुहब्बत।
तेरी चाहतें किस कदर छा रही है।

न शिकवा ना कोई शिकायत करुँगी।
कि दिल से मेरे यह सदा आ रही है।

रखूंगी छिपाकर मैं दिल में हमेशा।
तेरी आशिकी अब मुझे भा रही है।

खुलें हैं कहीं चंद झिलमिल झरोखे
लिये साथ खुश्बू हवा आ रही है।

मेरा नाम आया तुम्हारी जबां पर।
खुली चोट पर अब दवा भा रही है।


शर्मिला चौहान
 ठाणे

मंगलवार, 2 मार्च 2021

गंगा दर्शन


" गंगा दर्शन "

तेजस्विता भाव, शुचिता परिपूर्ण , भव निर्मल करती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे,अंतर मम  बसती हो ।।
भगीरथ अथक प्रयास सफल ,
हुआ धरा पर अवतरण ।
शिव जटा बीच सिमटी ,
था प्रबल वेग मात्र कारण ।
शुभ्र उफनती गौमुख उद्गम,
चपला सी वेग गति ।
संतृप्त हृदय, आत्म अनहद ,
स्थिर करती चंचल मति ।

आवेग, उत्साह , हर्ष , परिपूर्णता , जन-जन में भरती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे , अंतर मम बहती हो ।।

वेद, पुराण , इतिहास , वंदित ,
जप-तप ध्यान योग स्थान ।
निर्मल नीर प्रवाह निरंतर ,
आदिकाल से धरा की शान ।
हरिद्वार की पुण्य भूमि को ,
करती जब स्पर्श ।
तपोभूमि ऋषियों-मुनियों की ,
रम्य मनोहर तीर्थ ।

श्रृद्धा भाव , मन शुचिता , आस्था विश्वास भरती हो ।
माँ गंगे , कल-कल स्वर गूंजे , अंतर मम बहती हो ।।

सुरसरि , देवनदी, माँ गंगा ,
जाह्नवी, अलकनंदा , मंदाकिनी ।
पुण्यदायिनी ,मोक्षप्रदायिनी,
पापनाशिनी , कर्म प्रकाशिनी ।
सिंचन करती निज नीर से , 
समस्त धरा का पोषण करे ।
आलिंगन कर वसुधा का फिर,
जन -जन का कल्याण करे ।

बूंद बूंद निर्मल गंगाजल ,
आध्यात्म भाव भरती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे, अंतर मम बहती हो ।

घंटा, ढोल, नगाड़े बाजें, 
शंखनाद की गूंज रहें ।
बहते दीपक जलधारा में
जीवन सातत्य की सीख धरें ।
आकाश दीप सा जीवन हो
ध्येय उच्चतम सदा रहे ।
आत्मज्ञान की ज्योति से 
हृदय आलोकित रहे ।

जीवन दर्शन की सुंदरता , लहर लहर भरती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे, अंतर मम बहती हो ।।

राम, कृष्ण ने वंदन किया,
तुलसीदास गुणगान करे ।
तट पर स्थित पवित्र भूमि पर ,
शिव साक्षात निवास करे ।
आदि शंकराचार्य , विवेकानंद के
दर्शन का आधार हो तुम ।
सनातन वैदिक संस्कृति का 
एक प्रबल विश्वास हो तुम ।

आदिकाल से अनंत तक , जनमानस में भाव भरती हो  ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे , अंतर मम बहती हो ।
अंतर मम बहती हो ।।