[14/03, 16:50] Sharmila Chouhan: "मरहम"
सुबह से ना जाने कितनी बार उन्हीं पंक्तियों को दोहराते हुए मोहिनी का मन मस्तिष्क थक गया था। मेकअप की परत के नीचे से, मुक्ति की आकांक्षा लिए, त्वचा की आत्मा चीख रही थी।
एक बार फिर सैट तैयार हो गया, पूरी शक्ति से बड़े बड़े बल्ब, ढलती शाम को टक्कर देने के इरादे से चमकने लगे। मोहिनी के चेहरे पर फिर से साज सज्जा पोती गई और काम चालू हुआ।
किसी कंपनी के सौंदर्य प्रसाधनों की स्तुति करती मोहिनी, अपने ही अंदाज में मन मोह रही थी। अपनी खूबसूरती का राज, वह सभी को बताने पर आमादा थी।
विज्ञापन बनाने वाले, उसकी एक एक अदा को कैमरे में बखूबी कैद कर रहे थे। आने वाले दिनों में, उसकी अदाएं हर जवान लड़की में नजर आने वाली थी।
रात को घर वापस आने तक, मोहिनी चूर हो गई थी। हाथ मुंह धोते हुए,अपने चेहरे को गौर से देखने लगी।
"चीजें नहीं, सपने और कुछ उम्मीद बेचता है यह चेहरा।" अपने द्वारा बोली पंक्तियों को याद करके, उसका चेहरा मलीन पड़ गया।
अपने मुर्झाए चेहरे को प्यार से सहलाते हुए, अंदर कमरे में झाँकी। माँ और छोटी बहन, उसका इंतजार करते हुए, सो गए थे। उनके ऊपर चादर डालकर, खाना खाने के लिए रसोई की ओर जाने लगी।
वाश-बेसिन के ऊपर लगे दर्पण ने उसके पैर बाँध लिए। उम्र का असर आँखों के नीचे झलकने लगा है। चेहरे पर हाथ फेरते हुए मोहिनी को अपनेपन का अहसास हुआ।
"यही उसका असली रूप है।" कुछ वर्षों के बाद, यह चेहरा किसी विज्ञापन के लिए नहीं लिया जाएगा, भविष्य की वेदना से आँखें छलक गईं।
मोहिनी ने कुछ महंगे, सौंदर्य प्रसाधनों का मरहम चेहरे पर लगा लिया। अब भूख भी मिट गई थी।
यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com
[14/03, 17:30] Sharmila Chouhan: "स्वाद"
सूरज अपने दीदे फाड़े, सबको डरा रहा था। दल-बदलने में माहिर हवा, आज सूरज से दोस्ती गांठे, गर्म हो रही थी। एक दुकान के सामने वातानुकूलित कार रूकी और मालिक उतर कर सामान लेने गए।
चिलचिलाती धूप में, ठंडे वातावरण में बैठा गोल्डी, अपनी किस्मत पर इतरा रहा था। भूरे-सुनहरे बालों वाला, मध्यम कद काठी का, प्यारा-सा कुत्ता गोल्डी। न..न..न! कुत्ता नहीं, बेटा गोल्डी।
"भौं! भौं! भौं!भौं!" गोल्डी ने कार से बाहर जाने की इच्छा जताई।
"नहीं गोल्डी बेटा, बाहर तेज धूप है। पापा आइसक्रीम ला रहें हैं।" मालकिन ने प्यार से गोल्डी के बालों को सहलाया।
कुछ मिनटों में, अपने पसंद के वनीला आइसक्रीम का स्वाद लेता गोल्डी, खुले शीशे से बाहर झांकने लगा। अचानक, तीन-चार सड़क छाप कुत्ते कार के पास खड़े होकर भौंकने लगे। अपनी जाति-बिरादरी के प्राणी को, आदमी के साथ कार में बैठे देखना उन्हें नागवार गुजरा।
अपने जैसे दिखने वाले, अपनी बोली बोलने वालों को देखकर, गोल्डी खुशी से पूँछ हिलाने लगा।
"अंदर सिर करो गोल्डी, ये आवारा कुत्ते हैं।" कहते हुए मालिक ने कार के शीशे चढ़ा दिए।
सड़क पार, उन कुत्तों को डबलरोटी का खुला पड़ा पैकेट दिख गया। उछलते कूदते हुए वे मुँह में पैकेट दबाए, पेड़ के नीचे की मिट्टी में लोट पोटकर टुकड़े खाने लगे।
कार के अंदर बैठे गोल्डी को, ना जाने क्यों वनीला आइसक्रीम बेस्वाद लगने लगी।
यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com
[16/03, 13:09] Sharmila Chouhan: "बैल"
गर्मियों की उमसभरी शाम, दिन ढल गया परंतु अभी भी कुछ रोशनी रास्ते पर पड़ रही है। लंबे लंबे डग भरता, गोविंद अपनी झोपड़ी के सामने पहुँचा। दिनभर के पसीने से, कुर्ता और गमछा दोनों ही निचोड़ने लायक हो गए थे।
"कुएं का ठंडा पानी भर रखा है नहा धो लो।" कहते हुए पत्नी झुनिया धोती लाने गई।
सिर से ठंडे पानी की धार छोड़ते गोविंद ने, लंबी सांस ली। दिनभर की जी-तोड़ मेहनत, आग बरसाने वाली गर्मी से मन और शरीर, दोनों त्रस्त हो जाते हैं।
"मालिक से एक दो दिन की छुट्टी क्यों नहीं मांगते? मोगी बुआ कह रही थी कि घर परिवार अच्छा है। लड़का भी सरकारी स्कूल में चपरासी है।" अपनी अठारह साल की बेटी के विवाह की चिंता, झुनिया के शब्दों से झलक रही थी।
"अब गर्मी में कहां छुट्टी देंगे मालिक! पूरे बगीचे को दो-दो बार पानी देना, गैया- बैलों को पानी पिलाना। मुझे तो छुट्टी मांगने में डर लगता है झुनिया।" अपनी दोनों लड़कियों को चूल्हे के पास देखकर, गोविंद ने हौले से कहा।
"कैसा काम है, भिनसारे के गए तो संझा भी घर नहीं पहुंचते। दो रोटी बांध देती हूँ तो दोपहरी खाते हो, नहीं तो भूखे ही काम करते रहो।" पूरी जिंदगी मेहनत करके, मुश्किल से दो जून खाना जुटाने वाले की पत्नी का संयम टूट गया था।
"बरसात के समय बुवाई, फिर निराई -गुडाई, कटाई! अरे..! खेत का काम कभी बंद होता है। जो अभी छुट्टी ना मिली तो आषाढ़ में मिलेगी क्या?"
पानी का गिलास थमाकर, झुनिया अंदर खाना लाने चली गई।
"आज गुड़ भी खत्म हो गया, इसलिए बिना गुड़ के पानी पकड़ा गई।" पानी गटकते हुए गोविंद ने मन ही मन सोचा।
झोपड़ी में लगे इकलौते बल्ब की पीली रोशनी, सब ओर प्रकाश देने की पुरजोर कोशिश कर रही थी।
गोविंद उस रोशनी में, अपने पूरे परिवार को देखने की कोशिश कर रहा था।
"मालिक, कर्जा तो चुकता करना ही है आपका! आप तो माई-बाप हैं। मैं मर गया तो ये गोविंद, मेरा बेटा आपके खेतों में काम करेगा।" कहते हुए गोविंद के बाबू ने आठ साल के गोविंद को आगे कर दिया था।
आज इसी इकलौते बल्ब की धीमी रोशनी में, उसका दस साल का बेटा माधव पढ़ रहा है।
"बैल बहुत उपयोगी पशु है। वह मेहनती और ईमानदार होता है। दिन रात काम करता है, अपने मालिक का वफादार...।"आगे के शब्द गोविंद को सुनाई ही नहीं पड़े।
"बंद कर ये पाठ! नहीं बनना तुझे बैल।" अचानक तेजी से उठकर गोविंद ने बेटे की पुस्तक बंद कर दी।
चारपाई पर बैठे, हांफते गोविंद के सामने थाली में भात सब्जी रखी थी।
यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)