गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

चोका

चोका

खुला वितान
हौसला पंख लगे
आशा संजोए
अग्रसर उड़ान
संबल बनें
धैर्य सोच सकार
नकार तजें
मन खड़ा दोराहा
चयन करें
साकार स्वप्न होंगे
मनन करें
टकरा कर लौटें
सुदृढ़ रहें
निज पर विश्वास
हमेशा करें
होगा लक्ष्य हासिल
दूर नहीं मंजिल

शर्मिला चौहान


शर्मिला चौहान

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

चोका

[21/12, 11:46] Sharmila Chouhan: चोका

खुला वितान
हौसला पंख लगे
आशा संजोए
अग्रसर उड़ान
संबल बनें
धैर्य सोच सकार
तजें नकार
मन खड़ा दोराहा
चयन करें
साकार स्वप्न होंगे
आती मुश्किलें
टकरा कर लौटें
लौह इरादे
निज पर विश्वास
पूरी हो हर आस

शर्मिला चौहान
[22/12, 15:45] Sharmila Chouhan: चोका

चंद बूंदों से
बन जाता जीवन
वात्सल्य पूर्ति
करे माँ और माटी
आँचल ढँके
पोषण नवजात
जग देखते
अंकुर और शिशु
प्रकृति जन्य
पौधा झेले आपदा
होता सुदृढ़
नाजुक बने बाल
सुविधा तले
पुष्ट बने जीवन
हो संगोपन
हरा वृक्ष मुस्काय
करे सहाय
परहित जो करे
मानव कहलाय

शर्मिला चौहान

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

हाइकु २)

"हाइकु"

१) 
उदित हुआ
खोली ज्यों गठरिया
फैली रश्मियाँ

२) 
लालिमा प्राची
सिंदूर सजी धरा
मुदित नाची

३) 
रवि बटोही
चला ठिठक कर
कोहरा ओढ़े

४)
भोर नवेली
चंचल चितवन
झाँके दुल्हन

५) 
तिमिरांचल
चंचलता घटती
वृद्धावस्था सी

६)
चाँद झिगोला
सितारे टंके मोती
यामिनी सोती

७) 
धरा के अंक
खेलें रवि रश्मियाँ
प्यारी कन्याएँ

८) 
बरसे पानी
नवांकुर फूटते
चूनर धानी

९)
मेघ बरसे
भीगी धरा गमके
प्रेम महके

१०)
कछुआ चाल
प्रयास निरंतर
धरे संयम

११)
आकाशदीप
करें मार्ग प्रशस्त
जलते स्वयं

१२)
दुनिया सारी
मृगतृष्णा सी ढूंँढे
राह निराली

१३)
बुजुर्ग साथ
वटवृक्ष की छाँव
नेह का गाँव

१४)
नन्हें परों से
दस्तक देते पंछी
नभ किवाड़

१५)
गौरैया नीड़
तिनकों से बुनती
स्वप्न बेजोड़

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
sharmilachouhan.27@gmail.com
9967674585

हाइकु १)

१)
वत्सल बूँदें
तुष्ट प्रसवी धरा
जीवन‌ जना

२)
नन्हें परों से
दस्तक देते पंछी
नभ किवाड़

३)
उदित हुआ
खोली ज्यों गठरिया
फैली रश्मियाँ

४)
रवि बटोही
चला ठिठक कर
कोहरा ओढ़े

५)
आकाशदीप
करे मार्ग प्रशस्त
जलता स्वयं

६) 
चाँद झिगोला
सितारे टंके मोती
यामिनी सोती

७)
गौरैया बुने
नीड़ तिनके जोड़
स्वप्न बेजोड़

८)
दुनिया सारी
मृगतृष्णा सी ढूंँढे
राह निराली

९)
भाग्य लिखते
वर्ण वाक्य बुनते
कलम चॉक 

१०)
शब्द सायक
करें घाव गहरे
सदैव  हरे

११)
संध्या झटके
जूही हरसिंगार
घने केशों से

१२)
गोधूली बेला
काजल आँजे निशा
मिलने आई

१३)
गायें रंभाई
माँ का भीगा अंचल
याद सताई

१४)
दर्पण बोले
दाग लगे चेहरे
आत्मा बेदाग

१५)
कृषक स्वेद
मरकत का डिब्बा
मोती से भरा

१६)
बादल चित्र
नैन तूलिका संग
कल्पना रंग

१७)
मासूम बच्चा
आकांक्षाओं का बस्ता
सहज ढ़ोता

१८)
आभासी जग
लेपटॉप जीवन
प्रस्तर मन

१९) 
जीवन यात्रा
अनुभव झटके
दुर्गम रास्ते

२०)
धरा जनती
तरू खनिज नीर
छाती को चीर

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

गुरुवार, 26 नवंबर 2020

कुंडलियां

[23/11, 19:14] Sharmila Chouhan: कुंडलियां

पानी रहता सरल मन, घुले मिले सब संग।
साथ मिलता जब जिसके, ले लेता वह रंग।।
ले लेता वह रंग, गुण यही बड़ा निराला।
सब कुछ करता दान, बने बादल मतवाला।।
कीमत है अनमोल, बात जिसने यह जानी।
बचत करें सब लोग, धरा का धन है पानी ।।
[23/11, 22:18] Sharmila Chouhan: कुंडलियां

थाना सुंदर है नगर, बड़े ताल हैं शान।
चली रेलगाड़ी प्रथम, यह इसकी पहचान।।
यह इसकी पहचान, बहुत से समुद्री बंदर।
घोड़ों का व्यापार, दूर देशों के अंदर।।
वीर मराठा शान, इस नगरी में आना।
चटपटी मिसल पाव, सदा याद रहे थाना।।

शर्मिला चौहान
[25/11, 16:25] Sharmila Chouhan: कुंडलियां

लगाना पौधा तुलसी, जगविदित यही नाम।
रोगों से रक्षा करना, सुंदर इसका काम।।
सुंदर इसका काम, हरिप्रिया यह कहलाती।
विष्णु को दिया शाप, घरों में पूजी जाती।।
पवित्र कार्तिक मास, मंगल ब्याह रचाना।
अपने घर के द्वार, बिरवा तुलसी लगाना।।

शर्मिला चौहान

कुंडलियां

बेटा बेटी एक सम, कभी करें ना भेद।
अंतर इनमें जो करें, रहे हृदय में खेद।।
रहे हृदय में खेद, बेटियां बड़ी अनूठी।
मन में इनके प्यार, दिखें ऊपर से  रूठी।।
भरें नेह भंडार, बनें खुशियों की पेटी।
सुखी वही परिवार, जहाँ सम बेटा बेटी।।

शर्मिला चौहान

बुधवार, 18 नवंबर 2020

"जिंदगी" भाग १

‌      "जिंदगी"  

जिंदगी पहेली है तो उसे सुलझाना क्यों है।
गलतियां हो गईं जो तो अब दोहराना क्यों है।

जो सोए ही नहीं थे उन्हें जगाना क्यों है।
दिल में जो बसे हैं उन्हें फिर भुलाना क्यों है।

बुझ चुकें हैं जो चिराग उन्हें फिर  जलाना क्यों है।
दिल में लगे हुए जख्म  लोगों को दिखाना क्यों है।

बदले हालातों में कुछ रिश्ते निभाना क्यों है।
जो कभी साथ ना दे सका उसे आजमाना क्यों है।

गर हौसला ना हो तो गहराइयों में जाना क्यों है ‌।
जब डूब ही चुके हैं तो पार आना क्यों है।

जो राग सध ना सके वो गीत गाना क्यों है।
बिखरे सुरों से महफिल  को सजाना क्यों है।

हर शख्स को बातों का मतलब समझाना क्यों है।
दिल जिसे ना चाहे उस बात को अपनाना क्यों है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

रविवार, 1 नवंबर 2020

"शरद-चंद्र"

🌝 शरद -चंद्र 🌝

बीता पावस, अवनि मुस्काई
 फूले कास,  शुभ्रता छाई।
अंबर निहारे प्रतिपल प्रिये
 शरद की सुंदर बेला आई।।

सोलह कलाओं सहित मुस्काता
शशि, नक्षत्रों के संग आता।
धवल ज्योत्सना पाश लपेटे
धरा को सिंचित कर जाता।

नवश्रृंगार किए धरा इठलाई।
 शरद की सुंदर बेला आई।।


शशि का सौंदर्य निराला है
वह वसुधा पर मतवाला है।
प्रेम सुधा बरसाता है
कण कण माधुर्य समाता है।

चंद्र ने नेहदृष्टि घुमाई ।
शरद की सुंदर बेला आई।।

हरित वसन, कुसुमित आँचल
सुरभित पवन बहे मंदरांचल।
हल्की सी धुंध, भरती उसांस
तितलियों को सुमनों की आस।

नवांकुरों को अंक भर लाई।
शरद की सुंदर बेला आई।।

प्रेम सुधा टप टप टपके
लजाई धरा मह मह महके।
बाँकी चितवन रह रह बहके
पिया संग गोरी पल पल लहके।

अमिय पान करे जग भाई।
शरद की सुंदर बेला आई।।

शर्मिला चौहान

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

कविता-"कविता का नशा"

"कविता का नशा"

नशा तो नशा होता है, चाहे कैसा भी हो।
कवि भी इंसान होता है, चाहे जैसा भी हो।।

कुछ तुकबंदी मन में हमारे, इस तरह समाई।
कवि बनने की सुप्त इच्छा, अंकुरित हो बाहर आई।।

अब दाल सब्जी की जगह, पंत निराला आ रहे थे।
कल्पना की उड़ान भरने में हम, बेबाकी दिखला रहे थे।।

मोहल्ले के कार्यक्रम में, नवोदित कवि कहकर बुलाए।
उसी दिन आनन-फानन हमने, पाँच किलो पेड़े बंटवाए।।

बतौर कवि, हम तैयार होकर जा रहे थे।
रिन, व्हील के इश्तेहार, फीके नजर आ रहे थे।।

मंच पर दृष्टिपात किया, सिर बेचारा चकराने लगा।
वहांँ बैठा  हर शख्स, प्रसाद बच्चन नज़र आने लगा।।

बारी आने पर, हाथ पैर कंपकंपाने लगे।
होंठ बेवजह ऊल-जलूल, पंक्तियां बड़बड़ाने लगे।।

चंद क्षणों के बाद, श्रोताओं का धैर्य छूट गया।
चप्पलों की बौछार से, हमारा मन टूट गया।।

किसी तरह मुँह छिपाते, हम अपने घर लौट आए।
कवि ना बनने की सौगंध लेकर, सौ उठक-बैठक लगाए।।

शर्मिला चौहान
ठाणे ( महाराष्ट्र )