गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

कविता-"कविता का नशा"

"कविता का नशा"

नशा तो नशा होता है, चाहे कैसा भी हो।
कवि भी इंसान होता है, चाहे जैसा भी हो।।

कुछ तुकबंदी मन में हमारे, इस तरह समाई।
कवि बनने की सुप्त इच्छा, अंकुरित हो बाहर आई।।

अब दाल सब्जी की जगह, पंत निराला आ रहे थे।
कल्पना की उड़ान भरने में हम, बेबाकी दिखला रहे थे।।

मोहल्ले के कार्यक्रम में, नवोदित कवि कहकर बुलाए।
उसी दिन आनन-फानन हमने, पाँच किलो पेड़े बंटवाए।।

बतौर कवि, हम तैयार होकर जा रहे थे।
रिन, व्हील के इश्तेहार, फीके नजर आ रहे थे।।

मंच पर दृष्टिपात किया, सिर बेचारा चकराने लगा।
वहांँ बैठा  हर शख्स, प्रसाद बच्चन नज़र आने लगा।।

बारी आने पर, हाथ पैर कंपकंपाने लगे।
होंठ बेवजह ऊल-जलूल, पंक्तियां बड़बड़ाने लगे।।

चंद क्षणों के बाद, श्रोताओं का धैर्य छूट गया।
चप्पलों की बौछार से, हमारा मन टूट गया।।

किसी तरह मुँह छिपाते, हम अपने घर लौट आए।
कवि ना बनने की सौगंध लेकर, सौ उठक-बैठक लगाए।।

शर्मिला चौहान
ठाणे ( महाराष्ट्र )

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