रविवार, 1 नवंबर 2020

"शरद-चंद्र"

🌝 शरद -चंद्र 🌝

बीता पावस, अवनि मुस्काई
 फूले कास,  शुभ्रता छाई।
अंबर निहारे प्रतिपल प्रिये
 शरद की सुंदर बेला आई।।

सोलह कलाओं सहित मुस्काता
शशि, नक्षत्रों के संग आता।
धवल ज्योत्सना पाश लपेटे
धरा को सिंचित कर जाता।

नवश्रृंगार किए धरा इठलाई।
 शरद की सुंदर बेला आई।।


शशि का सौंदर्य निराला है
वह वसुधा पर मतवाला है।
प्रेम सुधा बरसाता है
कण कण माधुर्य समाता है।

चंद्र ने नेहदृष्टि घुमाई ।
शरद की सुंदर बेला आई।।

हरित वसन, कुसुमित आँचल
सुरभित पवन बहे मंदरांचल।
हल्की सी धुंध, भरती उसांस
तितलियों को सुमनों की आस।

नवांकुरों को अंक भर लाई।
शरद की सुंदर बेला आई।।

प्रेम सुधा टप टप टपके
लजाई धरा मह मह महके।
बाँकी चितवन रह रह बहके
पिया संग गोरी पल पल लहके।

अमिय पान करे जग भाई।
शरद की सुंदर बेला आई।।

शर्मिला चौहान

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें