"जिंदगी"
जिंदगी पहेली है तो उसे सुलझाना क्यों है।
गलतियां हो गईं जो तो अब दोहराना क्यों है।
जो सोए ही नहीं थे उन्हें जगाना क्यों है।
दिल में जो बसे हैं उन्हें फिर भुलाना क्यों है।
बुझ चुकें हैं जो चिराग उन्हें फिर जलाना क्यों है।
दिल में लगे हुए जख्म लोगों को दिखाना क्यों है।
बदले हालातों में कुछ रिश्ते निभाना क्यों है।
जो कभी साथ ना दे सका उसे आजमाना क्यों है।
गर हौसला ना हो तो गहराइयों में जाना क्यों है ।
जब डूब ही चुके हैं तो पार आना क्यों है।
जो राग सध ना सके वो गीत गाना क्यों है।
बिखरे सुरों से महफिल को सजाना क्यों है।
हर शख्स को बातों का मतलब समझाना क्यों है।
दिल जिसे ना चाहे उस बात को अपनाना क्यों है।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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