मंगलवार, 24 नवंबर 2015

चिड़िया

उठ भिनसारे मेरे घर पर
चुग्गा चुगने आ जाती है ,
ना छत की मुंडेर है
ना खपरैलों की ढलान ,
बस छोटी खिड़की के बाहर
अपना डेरा लगा जाती है ।

ना धानों की बालियाँ सुनहली
ना सूप फटकते हैं यहाँ ।
फिर भी आकर रोज सबेरे
अपना प्यार जता जाती है ,
दस दाने चावल के रूचि से
चुग कर तृप्ति पा जाती है ।

सिर घुमाती ,पंख झडाती
फुदक -फुदक कर नाच दिखाती ।
छोटी ,नन्ही,भोली भाली ,
भूरे पंखों वाली चिड़िया
अमृत गीत सुना जाती है ।

शुष्क हृदय में गाकर जैसे
मीठा सोत जगा जाती है ।
मेरे घर से अपना रिश्ता ,
अटूट कितना बना जाती है ।
कितनी मोहक ,कितनी प्यारी ,
मुझे भी तुमसे बहुत प्यार है ।

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