गुरुवार, 19 नवंबर 2015

रचना

सोच में डूबी थी एक दिन ,
गंभीर-सी शांत भाव में लीन ।
सहसा लगा मुझे किसी ने दस्तक दी ,
कौन है जिसकी दस्तक इतनी प्रबल है ?

क्यों समझ ना पाई मैं अनभिज्ञ थी ,
अपने ही ह्रदय की आवाज से ।
उत्सुकता हुई क्या चाहता है मन ?
क्यों जगा रहा है मुझे ?

बोला , "मेरे अंदर भाव पल रहे हैं ।
कई विचार, कई ख्याल उबल रहे हैं ।
उनको शब्दों का जामा पहना दो
पिरोकर माला में अपनी रचना बना लो " ।

क्यों जटिल है अंतर्मन का सुनना ?
साहस करके कहा मैंने -
"क्या न्याय कर पाऊँगी मैं ?
तुम्हारे भावों को सही मायने दे पाऊँगी मैं ?

तुम्हारी जननी बनने से पहले
तुम्हारा भविष्य जानना चाहती हूँ ।
शब्दों के कई अर्थ लगाए जाते हैं ,
अग्निपरीक्षा से नवजात भी नहीं बच पाते हैं "।

खिलखिलाकर हँस पड़ा बेबाक मन ,
बोला -"तू ही मेरी माँ हो सकती है ।
मुझे चिंता नहीं लोगों की ,
सिर्फ तू ही मुझे समझ सकती है ।

अपना शिशु जानकर जब तू
शब्दों को कागज पर सजाएगी ।
अपने आप वात्सल्य भर जाएगा ,
तेरी रचना अप्रतिम बन जाएगी ।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. शब्दों को बहुत सुंदरता से कागज पर उतारा है।
    मन ही विचारों की जननी है,
    सही ढंग से अपने विचाराें को दूसरे को समझना भी कला है।

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  2. शब्दों को बहुत सुंदरता से कागज पर उतारा है।
    मन ही विचारों की जननी है,
    सही ढंग से अपने विचाराें को दूसरे को समझना भी कला है।

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  3. भावों एवं विचारों को प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।।

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