कितने घने, कितने लंबे
देवदार और चीड के तने ।
सहज ठिठकी एक पल को ,
लगी सोचने कैसे जाऊँ मिलन को ।
ओह ! छनकर गुजरना होगा ,
पत्तों की ओट से छुपते छुपाते ।
अपनी पलकें मूँद ,आँचल लपेटती ,
सरकती हुई सी फिसल गई ।
कंचन सी काया ,कोमल लचीली
हल्की सी तपिश है गालों में ।
बढ़ चली आगे है मंजिल ,
सोचा ना रूकेगी राहों में ।
कानों में गूँजती कल-कल ध्वनि ,
यह शुभ्र नवयौवना कौन चली ?
मुड़ते ,रूकते , छल -छल बहते ,
इतराती, बल खाती चली ।
स्वच्छ निर्मल उथला पानी ,
गोल, चिकने पत्थरों से टकराकर
उन्हें खूबसूरती से सजाकर ,
निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है ।
देवदार से छनी ,कोमल स्वर्णिम
अल्हड कच्ची धूप जब पड़ती है ।
सारे पत्थर चमककर मानो
नदी को रत्नों से भर देते हैं ।
क्रमशः ...
सुंदर रचना हैं
जवाब देंहटाएंपढ़कर हरी भरी पर्वतों की सुनहरी चमकती सुबह आँखो के सामने आ गई।
सुंदर रचना हैं
जवाब देंहटाएंपढ़कर हरी भरी पर्वतों की सुनहरी चमकती सुबह आँखो के सामने आ गई।
bohot sunder
जवाब देंहटाएंधन्यवाद ।
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी।
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद ।
जवाब देंहटाएंVery nice didi����
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