मंगलवार, 3 नवंबर 2015

सुनहली धूप (निरंतर )

कितने घने,  कितने लंबे
देवदार और चीड के तने ।
सहज ठिठकी एक पल को ,
लगी सोचने कैसे जाऊँ मिलन को ।

ओह ! छनकर गुजरना होगा ,
पत्तों की ओट से छुपते छुपाते ।
अपनी पलकें मूँद ,आँचल लपेटती ,
सरकती हुई सी फिसल गई ।

कंचन सी काया ,कोमल लचीली
हल्की सी तपिश है गालों में ।
बढ़ चली आगे है मंजिल ,
सोचा ना रूकेगी राहों में ।

कानों में गूँजती कल-कल ध्वनि ,
यह शुभ्र नवयौवना कौन चली ?
मुड़ते ,रूकते , छल -छल बहते ,
इतराती, बल खाती चली ।

स्वच्छ निर्मल उथला पानी ,
गोल, चिकने पत्थरों से टकराकर
उन्हें खूबसूरती से सजाकर ,
निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है ।

देवदार से छनी ,कोमल स्वर्णिम
अल्हड कच्ची धूप जब पड़ती है ।
सारे पत्थर चमककर मानो
नदी को रत्नों से भर देते हैं ।

                          क्रमशः ...

8 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर रचना हैं
    पढ़कर हरी भरी पर्वतों की सुनहरी चमकती सुबह आँखो के सामने आ गई।

    जवाब देंहटाएं
  2. सुंदर रचना हैं
    पढ़कर हरी भरी पर्वतों की सुनहरी चमकती सुबह आँखो के सामने आ गई।

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