शनिवार, 7 नवंबर 2015

सुनहली धूप (अंतिम )

नदी के किनारों की चमक ,
वातावरण में प्रतिबिंबित होने लगी ।
पहाड़ी नवयौवनाएँ भी रूककर ,
सुनहली धूप का स्वागत करने लगीं ।

गोरी देह , कसी काया
चेहरों पर उम्र का गुलाबीपन ।
हँसती ,खिलखिलाती बेफिक्र चाल ,
बाँस की टोकरियों में मानो सपने समेटें ।

मृदुल धूप ने अपनी चूनर सरकाई ,
सारी ऊर्जा भरकर उसमें
हाथों से युवतियों को पहनाई
गुलाबी रंग का सुनहरे से मिलन हुआ ।

नाक की लौंग का लश्कारा ,
काँच के कंगन हीरे-से चमकने लगे ।
सारी हरी,सुप्त वादी में ,
सुनहरे रंग बिखर कर खिलने लगे ।।

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