पर्वतों के उत्तुंग शिखर से ,
झाँकती ,अकुलाती सुनहली धूप ।
पारकर इन ऊँचाइयों को ,
वादियों में बिखर जाने को तैयार ।
उफ्फ ! कितना इंतजार करे कोई ,
मौन-मूक खड़ी हैं ये श्रृँखला ।
धानी वादियाँ बाँहें पसार ,
प्रेमालिंगन कर लेने को तैयार ।
सहसा नुपूर की आवाजें गहराई ,
छम-छम ,छम-छम ,छम-छम ।
वादियों में सुनहरा रंग भरने ,
कच्ची अधखिली धूप घूँघट सरकाते आई ।।
सुंदर रचना हैं।
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंसुंदर रचना हैं।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद ।
जवाब देंहटाएंअति उत्तम ।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद ।
जवाब देंहटाएंbeautiful lines... beautiful depiction
जवाब देंहटाएंbeautiful lines... beautiful depiction
जवाब देंहटाएंधन्यवाद संगीता ।।
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया
जवाब देंहटाएंधन्यवाद ।
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