बुधवार, 31 जुलाई 2024

"स्वयं मुक्त है" कविता

"स्वयं मुक्त है"

प्रकृति धरा बादल फूल सब प्रेम युक्त हैं,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।

पर्वत श्रृंखलाओं से कल कल नदियों का बहना,
नाज़ुक अठखेलियों संग सागर की बाँह सिमटना।

ऋतुओं का सुंदर आना-जाना,
पत्तों का गिरना, मुरझाना।
नवपर्णों से वृक्षों का दमकना,
फूल देख भ्रमरों का बहकना।

आल्हादित धरती सारी प्रेम लिप्त है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।१।।

पंछी, तितली, मछली, कीड़े,
नियमों से बंधे सारे।

नित कर्मयोग में लगे रहें,
सूरज धरती चंदा तारे।

वायु का मंद प्रवाह सुगम, दे प्राण श्वास भरें चेतन।

धरती अंबर की प्रेमकथा,
बन गई बूंँद जल जीवन।

कर्म की इस नियति से सारी प्रकृति युक्त है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।२।।


बूँदों का सीपियों पर गिरना,
फिर गर्भ में मोती का पलना।

प्यार भरी इन बूँदों से, सृष्टि में जीवन का चलना।

हरि तृणों की नोकों पर,
जब ओस चमक इठलाती है।
मेघों को आँचल से ढंकने,
कभी बदली दौड़ी आती है।

हृदय में भावों का  नवगीत सुप्त है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।३।।

उसांस भरे वसुधा जिस क्षण,
गर्मी की तपन झुलसाती तन।

सूरज जब आँख दिखाता है,
गुलमोहर तब मुस्काता है।

महुआ तेंदु टेसू महके,
बन बाग रहें बहके बहके।

ऋतुओं का रुप सलोना है,
महके जग का हर कोना है।

जड़ चेतन कालचक्र सब अटल नित्य है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।४।।

समरसता की सीख धरा जब देती है,
मानव को भी वो अपना कह देती है।

प्रकृति के संकल्प में लीन हो जाना है,
चर अचर का हाथ थाम बढ़ जाना है।

तू प्रकृति का अंग भूल क्यों जाता है,
अहं लपेटे अपना तू इठलाता है।

प्रस्तर में जो दबा भाव अब बहने दे,
दूसरों के साथ ही जीवन चलने दे।

आसपास की सोच जब कदम बढ़ाता है,
मानव, तब सच्चा मानव कहलाता है।।५।।


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शर्मिला चौहान

शनिवार, 27 जुलाई 2024

212 1222 212 1222 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏( संशोधित रुप)


फ़िलबदीह क्रमांक 22
दूसरा चरण 
क़ाफ़िया -ई की मात्रा 


212 1222  212 1222

सींच दे दिलों को जो, वो नमी कहीं गुम है
गूँज जाये घर जिससे, वो हँसी कहीं गुम है।।1।।

चार दाने चुगकर जो, मीठे गीत गाती थी
दौर में नये देखो, वो चिड़ी कहीं गुम है।।2।।

लिखते थे कभी जिसमें, सब हिसाब खुशियों के
आज के ज़माने में, वो बही कहीं गुम है।।3।।

थामकर जिसे शिक्षक पाठ को पढ़ाते थे, 
आज उनके हाथों की, वो छड़ी कहीं गुम है।।4।।

तेज़ चाल से अपनी, जो मुझे डराती थी
सुस्त सी पड़ी रहकर, वो घड़ी कहीं गुम है।।5।।

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 23 जुलाई 2024

212 1222 212 1222 पर ग़ज़ल

(आदरणीय अनिल सर द्वारा संशोधित 🙏)

फ़िलबदीह 22 
प्रथम प्रयास 
ई -क़ाफिया 
रदीफ़ -नहीं होती

212 1222  212 1222

दिल्लगी की कुछ बातें, आशिक़ी नहीं होती
चार शेर कह लेना, शायरी नहीं होती।।1।।

पोर पोर महका दे, बावरा जो कर दे मन
बहती हर हवा अक्सर, फागुनी नहीं होती।।2।।

मत्त हो महक जिसकी, खुद में गुम जो कर देती 
हर हरिण में कस्तूरी, वो छुपी नहीं होती।।3।।

चुप्पी की ज़ुबां बेहतर, वार उसके पैने से
ख़ामशी हरिक की तो, बेबसी नहीं होती।।4।।

रंग केसरी गाता, दर्द गान उस माँ का
बेटे की कभी जिसके, वापसी नहीं होती।।5।।


गिरह का शेर-

 फूल कागज़ी खुश्बू को तरसते जीवन‌ भर
बाँस की हरिक टहनी बांसुरी नहीं होती।

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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

लघुकथाएं, मेरी दृष्टि से (अहमदनगर)

"लघुकथाएं: मेरी दृष्टि से"


कहानियों से जब लघुकथा के संसार में पदार्पण किया तो कुछ बंधन, वर्जनाएं सीखने का अवसर मिला।‌ सूक्ष्म निरीक्षण, शब्दों का पैनापन, समाज के प्रति अपना दृष्टिकोण और सही सोच के साथ लघुकथाएं लिखी जातीं हैं।‌ 
नाम के अनुसार,आकार में लघु परंतु अपनी बात पूर्णतया कहने में सक्षम होतीं हैं लघुकथाएं। लघुकथाकार संवेदनाओं की भूमि पर विसंगतियों के बीज बोकर, शब्दों-भावों का सिंचन करके, लघुकथा का पौधा तैयार करता है। इस प्रक्रिया में, तैयार होती लघुकथा आने वाली समस्याओं से जूझकर, अपना अस्तित्व बनाए रखना भी सिखाती है।

परिवार, समाज, देश और अब तो विश्व स्तर के विभिन्न विषयों पर, लघुकथाकार अपनी कलम चला रहें हैं। पाठकों के द्वारा पढ़ी‌ जाने वाली प्रमुख विधाओं में, लघुकथा ने अपना स्थान बनाया है।
वर्तमान की विषमताओं, परिस्थितियों पर नज़र बनाए रखने वाली, सशक्त विधा है लघुकथा।‌
आसपास की भौगोलिक स्थिति, सामाजिक व्यवस्था, औद्योगिक विकास संबंधी लघुकथाएं, जहाँ समस्याओं को जनमानस तक लातीं हैं, वहीं उनके समाधान का कुछ प्रयास भी करतीं हैं।  

लघुकथाकार की सूक्ष्म दृष्टि, उसकी सहृदयता उसे एक सशक्त लघुकथा लिखने को प्रेरित करती है। लघुकथाओं के पात्र इसी समाज से चुने और फिर बुने जाते हैं।‌ विषयों को चुनना बेहद महत्वपूर्ण चुनौती भरा काम है क्योंकि इसी पर लघुकथा का दारोमदार निर्भर करता है।

नदी के सूखकर, प्रवाह का मंद होना, एक पर्यावरण जनित समस्या है जिसके साथ समाज के बँटवारे को जोड़ने के प्रयास में लिखी मेरी एक लघुकथा "बैलेंसिंग" की कुछ पंक्तियां, जो भाषा के प्रवाह से लघुकथा को अंत तक ले जाती है।
"किनारों की ऊँचाई तक लहरों के अंगड़ाइयों के निशान बना करते थे, रामदीन ने महसूस किया की अब नदी की साँसें फूल जातीं हैं। उसकी तलहटी के रंग-बिरंगे, हीरे-जवाहरात से चमकते पत्थर, अब मटमैले धूसर हो गए हैं। वह भी कृशकाय हो गई है बिल्कुल रामदीन की तरह।"

मेरी लघुकथाएं मुख्यतः स्त्री विमर्श, उनके प्रतिरोध, बाल विसंगतियों, पर्यावरण एवं संवेदनाओं से भरपूर समाज से जुड़ी, आशावादी दृष्टिकोण लिए, विभिन्न समस्याओं के समाधान हेतु अग्रसर रहतीं हैं।

 लघुकथा "शक्ति" जिसे पाठकों द्वारा, निर्णायकों द्वारा बहुत सराहा गया, वह झोपड़पट्टी में रहने वाली छोटी बच्ची पर लिखी है। माता-पिता रोजी-मजदूरी के लिए जाते हैं और बच्चे थोड़ा बहुत पढ़कर, उसी काम में लग जाते हैं। एक मूर्तिकार का, छोटी बच्ची को पुस्तक-स्लेट देकर, देवी की मूर्ति के श्रृंगार को पूर्ण करना, बालिकाओं की शिक्षा पर बल देता है।

इसी प्रकार "चिंगारी" "गौरैया-बाज" "न्याय" "स्वयं सिद्धा" जैसी लघुकथाएं, स्त्रियों को अपने ऊपर होने वाले अत्याचार के प्रति आवाज़ उठाने पर आधारित हैं। प्रतिरोध, रोष दिखाएं बिना ग़लत करने वालों को मुँहतोड़ जवाब संभव नहीं है।

"भूख"  "धर्म" "बदलता ज़ायका" "विनिमय" "बहती संवेदना" जैसी लघुकथाएं, समाज का आधार प्रेम, अपनापन और दया जैसी संवेदनाओं को बनातीं हैं।

"कठपुतली" "गिरगिट" "काले उजाले" "नई फ्रॉक" लघुकथाएं, बाल विसंगतियों को सामने लातीं हैं जो आज के समाज पर प्रश्न चिन्ह हैं।

नए विषय, नए विचारों से भरपूर "अटैक" "हकीकत"  "किराएदार" "संरक्षक" "कंपनी" जैसी लघुकथाएं, वर्तमान एवं भविष्य में आने वाली बड़ी समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करतीं हैं।
"कंपनी" में घर के वृद्ध को अचंभा होता है कि तीसरी पीढ़ी के बेटे बहू अपने शुक्राणु और अंडाणु अपनी कंपनी के बैंक में सुरक्षित रख दिए हैं ताकि भविष्य में जब समय मिले, अपना परिवार बढ़ाएंगे।

लघुकथाओं का अनंत विस्तार है जिनमें विचरण करते हुए, लघुकथाकार स्वयं को उसी का एक किरदार अनुभूत करने लगता है। यही अनुभूति ही लघुकथा का मूल आधार है।
अहमदनगर (महाराष्ट्र) लघुकथा शोध केंद्र से जुड़ना, मेरा सौभाग्य है। आदरणीया ऋचा शर्मा जी के‌ नेतृत्व में लघुकथाओं के विस्तार, विकास पर मार्गदर्शन मिलता है। मासिक संगोष्ठी, लघुकथाओं के वाचन और उनपर वरिष्ठ लघुकथाकारों के सुझाव जैसे नियमित आयोजनों से, बहुत कुछ सीखने मिलता है। आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र वार्षिक लघुकथा प्रतियोगिता के आयोजन संयोजन से, लघुकथाकारों की गुणवत्ता को परखने का स्वस्थ अवसर मिला है।

अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता 2020 में मेरी लघुकथा "सौंधी महक" का प्रथम स्थान प्राप्त करना, मेरा रूझान लघुकथाओं की ओर बढ़ाने का गौरवपूर्ण कारण था। 
विभिन्न साहित्यिक मंचों, संस्थानों द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिताओं में, मेरी लघुकथाएं पुरस्कृत होतीं रहीं एवं पाठकों द्वारा सराही गईं।

साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं, संकलनों में प्रकाशन के अलावा क्षितिज लघुकथा प्रतियोगिता, सिरसा हरियाणा लघुकथा प्रतियोगिता, आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र लघुकथा प्रतियोगिता, कृष्णा देवी सारस्वत लघुकथा प्रतियोगिताओं में पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त मेरी लघुकथाएं, मेरी संवेदनाओं की कलम  से निकलीं हैं। लघुकथाएं के इस सुंदर संसार को अपनों लेखनी से सुंदरतम बनाने का निरंतर प्रयास करतीं रहूंगी।


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नाम - शर्मिला चौहान 
शिक्षा - एम.एच.एससी., बी.एड.
प्रकाशित कहानी संग्रह - मुट्ठी भर क्षितिज 

लघुकथा संग्रह के प्रकाशन की प्रक्रिया में अग्रसर।

निवास - ठाणे (महाराष्ट्र)

9967674585
ई-मेल- sharmilachouhan.27@gmail.com 

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मंगलवार, 16 जुलाई 2024

एक नई सुबह _कहानी

"एक नई सुबह"


सुमन का आखिरी पीरियड चार बजे खत्म होता है पर आज वह पाँच बजे तक कॉलेज में ही थी। स्टाफ रूम में रखी उसकी आलमारी को, आज उसने व्यवस्थित किया था। कल ही द्वितीय वर्ष की एक छात्रा की फाइल नहीं मिल रही थी, तो आज इस शुभ कार्य करने का अवसर मिला था। सारी फाइलें, रजिस्टर, पुस्तकें सुमन ने आलमारी में करीने से लगाया फिर उसे लॉक करके महाविद्यालय के ही अपने क्वार्टर की ओर चल पड़ी।
सुमन पैंतीस वर्षीया प्रौढ़ महिला, ज़िम्मेदार वार्डन एवं बुद्धिमान प्राध्यापिका है। इसके साथ ही वह अच्छी लेखिका और कमाल की वक्ता भी है। साहित्य प्रिय विषय होने के कारण उसने हिंदी साहित्य में एम.ए. किया फिर पी.एच.डी.।‌ आज जब वह कक्षा में हिंदी साहित्य पढ़ाती है तो छात्राएं मंत्रमुग्ध हो कर सुनतीं हैं मानो सारा आत्मसात कर‌ लेंगी।‌
सुमन चौधरी मैडम, छात्राओं के बीच ऐसा नाम जो उन्हें कड़क शासन में रखता है और साथ ही स्नेह भी देता है।

प्रिंसिपल ने हॉस्टल वार्डन के लिए सुमन का नाम स्वयं लिया था क्योंकि लड़कियों के हॉस्टल की इस ज़िम्मेदारी के लिए, सुमन उन्हें अनुकूल लगती थी। 

सुमन भी इस ज़िम्मेदारी में सुकून पाती थी, उसका कॉलेज, हॉस्टल और ये लड़कियांँ, यही तो उसका परिवार, उसकी ज़िंदगी थी। हिंदी के काव्यांश, व्याकरण और साहित्य को इतने प्रेम से, उदाहरणों द्वारा पढ़ाने वाली चौधरी मैडम, छात्राओं की पसंदीदा शिक्षिका थी। हॉस्टल से लगे क्वार्टर में रहने के कारण, लड़कियों के लिए मैडम के घर के द्वार हमेशा खुले रहते थे। लड़कियों के जीवन की बहुत सी बातें मैडम सुनतीं, समाधान का सुंदर रास्ता भी निकालने की कोशिश करतीं।

जब जब लड़कियांँ अपनी इस खूबसूरत, होशियार टीचर को देखतीं, तब तब आपस में बतियातीं कि आखिरकार मैडम अकेली क्यूँ हैं? अन्य शिक्षिकाओं की तरह इनकी शादी, परिवार क्यों नहीं है? कभी कभी हवाओं के बदलते तेवर से, सुमन को उनके इस कौतूहल का अंदाजा होता भी था जिसे वो उन्हीं हवाओं के साथ दूर उड़ा दिया करती थी।

धीरे-धीरे चलती हुई सुमन अपने क्वार्टर के सामने पहुँच गई।  रोज की तरह हॉस्टल की ओर नज़र दौड़ाकर, लड़कियों की आवाजाही का जायज़ा लिया और यंत्रवत गेट का दरवाजा खोलकर बगीचे से निकलकर कब बरामदे तक आ गई, उसे पता ही नहीं चला। बरामदे में रखी  मेज पर पर्स और हाथ की पुस्तकें रखकर वह पास ही पड़ी आराम कुर्सी पर पसर गई। पैर की चप्पल तक उतारने की ताकत नहीं बची थी सुमन में।‌ दिनभर की थकावट से चूर, पलकें बंद किए अधलेटी सी पड़ी रही।‌ ईश्वरी को आवाज़ देकर, चाय बनाने के लिए भी कहने की इच्छा ‌नहीं हुई उसकी। 

सामने लगे पेड़ों पर चंद ही पत्तियांँ लटकीं थीं। आज से चार महीने पहले हरे भरे थे यही पेड़, फरवरी-मार्च से इनकी पत्तियांँ साथ छोड़ने लगतीं हैं और पतझड़ का आगमन हो जाता है। कॉलेज में भी प्रेक्टिकल परीक्षाएं, अतिरिक्त कक्षाओं के चलते एक प्रकार की शांति सी रहती है। परिक्षाओं की तैयारी में लगी छात्राओं के बीच हो-हल्ला, मौज-मस्ती कम होने लगती है और यहाँ की प्रकृति बेजान, मूक,मौन‌ लगने लगती है।

अब थोड़ी विश्रांति के बाद सुमन ने ईश्वरी को आवाज़ देने के लिए आँखें खोली तो सामने ईश्वरी खड़ी थी।

"बहन जी, ई तार आवा रहा, हम तुम का बुलाए खातिर आवत रहे, मुला तुम बिगड़ जाती तो एहि कारन  हम ‌आए नहीं।" कहती हुई टेलीग्राम सुमन के हाथों में पकड़ा दिया।
उसे चाय बनाने को कहकर सुमन टेलीग्राम खोलने लगी। 

"ईश्वरी भी अजीब है जब तब छोटी सी बात पर बुलाने आ जाती है कॉलेज, अब टेलीग्राम आने पर भी नहीं आई।" मन ही मन बड़बड़ाते हुए टेलीग्राम खोल लिया।

टेलीग्राम दिल्ली से था। कौन होगा, दिल्ली में तो कोई जान-पहचान का नहीं है सोचते हुए टेलीग्राम के शब्दों को पढ़ने लगी।
"सुमी, तुम फौरन दिल्ली चली आओ। मुझे तुम्हारी बहुत ज़रूरत है।
तुम्हारा तो नहीं कह सकता, सिर्फ़ शेखर।"

एक क्षण के लिए सुमन को लगा कि पैरों के नीचे से जमीन सरक गई है। समय रूक गया और साथ ही सामने पेड़ों से गिरती पत्तियांँ भी मानो जहाँ की वहाँ थम गईं।
आज दस साल बाद क्यों याद किया शेखर ने, सुमी कहने वाला कौन है वह? आज वह अपने कॉलेज में सुमन चौधरी है, सुमी का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

हवा से मेज़ पर रखी पुस्तक के पन्ने फड़फड़ाए और उनको देखती हुई सुमन अपने अतीत में गुम हो गई।

ग्यारह-बारह साल पहले की बात सुमन को कल की बात लग रही थी। सुमन मध्यम आय वाले परिवार की, सुंदर, बुद्धिमान और मेहनती लड़की थी।‌ अपने पैरों पर खड़ी होकर, अपने परिवार को आर्थिक संबल प्रदान करने की अभिलाषा मन में लिए उसने हिन्दी साहित्य में एम.ए. कर लिया। साथ ही साथ पी.एच.डी. की तैयारियां भी शुरू कर दी थी। शेखर उससे सीनियर था और वह भी साहित्य पर शोध कर रहा था। एक ही निकाय के होने के कारण वे एक-दूसरे से कुछ परिचित थे। किसी भी प्रकार की कठिनाई आने पर, सुमन बेहिचक शेखर से पूछ लेती थी। 
जिस प्राध्यापक के निर्देशन में शेखर शोधपत्र तैयार कर रहा था, उसी प्राध्यापक के पास सुमन भी अपनी थीसिस के लिए गई थी। एक ही निर्देशक के पास रहने के कारण, दोनों शोधकर्ताओं में अच्छी जान-पहचान हो गई। एक समान रुचि, योग्यता और समान आर्थिक स्थिति के होने से दोनों करीब आने लगे।

शेखर के परिवार में उसके अलावा, एक और भाई‌ और बहन थे। पिता लेखापाल थे और सेवानिवृत्ति के करीब भी थे। शेखर के पिता की इच्छा थी कि उनकी सेवानिवृत्ति के बाद शेखर उनकी जगह के लिए प्रार्थना करे।

सुमन ने भी शेखर को अपने परिवार का परिचय दिया ‌था। सुमन के घर में उसकी माँ के अलावा एक छोटा भाई था। पिताजी की मृत्यु के बाद माँ को नौकरी मिली थी और उन्होंने घर-परिवार, बच्चों को अकेले संभाल कर बड़ा किया था। सुमन का भाई रवि उससे पाँच साल छोटा , माँ और सुमन, दोनों का ही लाड़ला था।‌ सुमन को जल्दी से पी.एच.डी.करके, उपाधि लेकर कॉलेज में प्राध्यापिका बनना था। माँ को आराम देना और छोटे भाई को उच्च शिक्षा दिलवाना, सुमन के जीवन का उद्देश्य था।

शेखर और उसने जात-पात की दीवारों को तोड़ने का साहस कर लिया था क्योंकि शेखर का मानना था कि एक अभिरुचि के साथ नौकरी करके वे दोनों परिवारों को सुखी कर सकेंगे।
शेखर की पी.एच.डी. हो गई और उसी कॉलेज में तदर्थ व्याख्याता के रूप में उसके काम की शुरुआत हुई। अब एक ही कॉलेज में रहकर भी वे कम मिलते थे। एक प्राध्यापक की ज़िम्मेदारी और फिर हमेशा किसी छात्रा से मिलना, दोनों को उचित नहीं लगता था। एक-दूसरे को जीवनसाथी बनाने का संकल्प तो दिल से पक्का कर ही लिया था दोनों ने।

सुमन ने अपनी माँ को शेखर के बारे में सब बता दिया था। एक अच्छे परिवार का, सुंदर, सुशील, योग्य लड़का दामाद बने, इससे अच्छा और क्या होता। दोनों एक ही शहर में रहेंगे, दोनों परिवारों के बीच रहेंगे तो सबके लिए अच्छा ही होगा। माँ की सम्मति मिल‌ जाने से, सुमन ने शेखर को घर भी बुलाया। शेखर‌ ने माँ‌ और रवि का दिल जीत लिया था।‌ एक अच्छे रिश्ते के लिए सब खुश थे।

"बहन जी, चाय साथ बिस्किट रख रहें हैं, खा लो।‌ रात को का बनाए खाना, सब्जी भिंडी की बना लें, सुबह की दाल धरी है उसे छौंक लगा देंगे।" ईश्वरी की आवाज़ कुछ सुनाई आई, कुछ समझ।‌ 
"ठीक है, बना लो।" अनमनी सी सुमन‌ ने मानो उसे टाल दिया।
"सब ठीक है ना बहन जी, तार आवा तब से कुछ चुप हो आप।"  ईश्वरी पढ़ी लिखी कम थी परंतु अनुभवी बहुत थी।

सुमन ने उसकी ओर देखकर, "ठीक है सब।"  कहकर फिर अपने आप में डूब गई।

स्वप्नों का घरौंदा भरभरा कर गिर गया, सारी ख्वाहिशें कल्पनाओं के पंँख लगा कर दूर निकल गईं। 
एक दिन कॉलेज में शेखर ने उसे बुलाकर बताया कि, "सुमी, मेरे घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी है।‌ बड़ा धनी परिवार है, सोने-चाँदी के शोरूम हैं उनके।" एक क्षण भी नहीं झिझका था शेखर। 

"तुमने अपने घर में, हम दोनों के बारे में आज तक कुछ नहीं बताया था शायद। हमेशा कहते रहे कि बताने ही वाला हूँ।" सपाट स्वर था सुमन का।

"लड़की के पिता, कई  शिक्षा संस्थानों के मैनेजमेंट से संबंध रखते हैं। मेरे भाई-बहन को भी उच्च शिक्षा के लिए मदद करने वाले हैं..।" वह अपनी गौरव-गाथा का पाठ कर रहा था और सुमन शून्य होकर अपने रास्ते निकल गई थी।

घर आकर माँ से लिपट कर कितनी देर रोती रही थी वह, अंदर की टूटन उसके जीवन पर निर्लिप्तता बन कर छा गई थी। दो स्त्रियों के बीच, संवेदनाओं की  उफनती नदी थी, कौन‌ किसको कैसे संभाल रहा था, किसी को पता नहीं।

उसके बाद सुमन, शेखर से कभी नहीं मिली। कॉलेज में ही सब पता चलता रहा कि अगले ही महीने उसकी शादी है और दो महीने बाद वह अपनी पत्नी के साथ विदेश जा रहा है।

"किस्मत वाला है शेखर, ससुर पैसैवाला, रूतबे वाला मिला भाई।‌ ज़िंदगी सैट हो गई लड़के की।"  प्राध्यापक दीक्षित जी ने कहा था।
"सुना है कि विदेश में हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए, विश्वविद्यालय से उसे विदेश भेजा जा रहा है। अब रईस बाप की इकलौती बेटी का पति है हमारा शेखर, वो नहीं जाएगा तो क्या हम तुम जाएंगे।" उनकी हँसी सुमन के कानों में गर्म सीसे सी उतरती। अपनी पी.एच.डी. के लिए वह इस जगह पर आती थी, वरना अब उसे ज़िंदगी की हर बात व्यर्थ लगती। 
अगले तीन माह उसने अपने दिन रात, अपने शोध-पत्र में झोंक दिए और साथ ही साथ कई महाविद्यालयों में आवेदन भी कर दिया था। कुछ जगहों के साक्षात्कार हो गए थे और वह अपने उपाधि की प्रतीक्षा कर रही थी।

विश्वविद्यालय से उपाधि मिली और एक कार्यक्रम में सुमन को महाविद्यालय ने  उपाधि प्रदान किया। उस दिन अपने मार्गदर्शक प्राध्यापक के सामने सुमन रो पड़ी थी। अब वह डॉ सुमन हो गई थी।
एक दूसरे शहर में उसकी नियुक्ति का आदेश आया और वह जाने की तैयारियांँ करने लगी। माँ की घबराहट, छोटे भाई का चुप रहना सुमन के पैर की जंजीर नहीं बन सका। उसे पता था कि परिवार को उससे ज़्यादा अभी उसकी नौकरी की जरूरत है।‌

पहली बार माँ साथ आई थी, सुमन के कॉलेज और आसपास के वातावरण से खुश होकर वापस गई।
छुट्टियों में सुमन घर आ जाती और कभी-कभी बीच में माँ और रवि उसके पास आ जाते। धीरे-धीरे यह शहर, यहाँ के लोग, कॉलेज के सहकर्मियों में सुमन का मन लग गया। घर पर सुमन नियमित पैसे भेजती थी, अपनी जिम्मेदारी का उसे हमेशा भान रहता था।

तीन साल बाद रवि की नौकरी लग गई और माँ  ने ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ले‌ ली।‌
माँ के हर पत्र से, दबे शब्दों में सुमन को शादी कर‌ लेने की सलाह का अनुभव होता था। सुमन, उसका तो प्रेम, विवाह, अपनापन सब से जैसे विश्वास ही उठ गया था। आखिर कार रवि के पसंद की लड़की मेघा से उसकी शादी करवा कर, माँ को एक भरा परिवार देकर सुमन ऋणमुक्त हो गई। बेटी के एकाकीपन को देखते हुए, एक माँ अपने जीवन संघर्ष से हार गई थी। माँ ने दुनिया छोड़ दी और सुमन का परिवार में आना-जाना कम होने लगा। दीपावली के समय जब कॉलेज बंद रहता और लड़कियांँ अपने अपने घर जातीं तब सुमन भी रवि और मेघा के पास चली जाती। दोनों के खुशनुमा जीवन में कुछ दिन बिताकर,  दीपावली मनाकर फिर अपने कॉलेज लौट आती। राखी के समय रवि और मेघा , उसके पास आ जाते।‌ एक बच्चा होने के बाद अब रवि और मेघा ज्यादा व्यस्त रहने लगे थे। सुमन के हॉस्टल के फोन नंबर पर कभी कभी बात हो जाया करती‌ थी, सुमन‌ को उन दोनों से कोई शिकायत नहीं थी।

"हाय दैया, बहन जी। आप चाय नहीं पीं, राम जाने आज का भया है कि चाय सामने रही और आप बैठी रहीं, हाथ भी ना लगाया।" ईश्वरी की आवाज़ से सुमन हड़बड़ा गई।
"आज मन ही नहीं हुआ, थोड़ी गर्मी शुरू हो गई है ना शायद इसीलिए।" अपनी मनोदशा को छुपाती, तेज वक्ता सुमन थोड़ी घबरा सी गई।
"शरबत ला दें नींबू का।" ईश्वरी ने पूछा।
"नहीं रहने ही दो। सब्जी रोटी बन गई है तो तुम घर जाओ।" कहती हुई सुमन अपने कमरे में जाकर कपड़े बदलने लगी।

"बहन जी, हॉस्टल का चौकीदार घनश्याम आवा है, कहत है कि फोन आवा है।" कमरे के दरवाजे पर खड़ी ईश्वरी को सुमन ने उत्तर दिया, "ठीक है, अभी आती हूँ कहो।"
जल्दी जल्दी सलवार कमीज़ पर दुपट्टा डाल, पैरों में घर की ही चप्पल पहनकर, सुमन‌ हॉस्टल की ओर तेजी से चल पड़ी।
रवि का फोन करता है तो  रात नौ बजे आराम से करता है जिससे दुनिया भर की बात कर सके। क्या मालूम बच्चे की तबियत कैसी है? मन में कई प्रश्न आ-जा रहे थे और वह फोन के पास रखी कुर्सी पर बैठ कर, फोन के पुनः आने का इंतज़ार करने लगी।

फोन घनघनाया और सुमन ने लपक कर उठा लिया।
"हैलो।" सुमन‌ ने कहा।

दूसरी ओर से आने वाली आवाज़ सुनकर चौंक पड़ी सुमन। दस- सालों बाद सुनी थी यह आवाज़ उसने। दबी, बुझी, थकी सी आवाज़ से शेखर था फोन के उस ओर।
"सुमी, मैं शेखर बोल रहा हूँ। तुम्हें टेलीग्राम किया और फिर बड़ी मुश्किल से यह फोन नंबर मिला है मुझे। प्लीज़ फोन कट मत करना।" स्वर में गिड़गिड़ाहट थी। 

"मैं तुम्हारा अपराधी हूँ सुमी। इस अपराध की सजा भुगत रहा हूँ। तुम्हें धोखा देकर, मेरा भी कुछ अच्छा नहीं हुआ। विदेश से आने के बाद मेरी पत्नी, जो कि माँ बनने वाली थी, एक कार दुर्घटना में चल बसी।" सुमन ने महसूस किया, वो बोलते हुए हांफ रहा था।‌ 
"मैं अपनी ज़िंदगी को ढो रहा हूँ। सभी मुझे ज़िम्मेदार समझते हैं। पिछले पांँच-छह महीनों से बहुत बीमार हूँ, नहीं तो खुद आकर माफी माँगता तुमसे। एकदम अकेला रह गया हूँ। अपना पता बता रहा हूँ प्लीज़ नोट कर‌ लो। एक बार, सिर्फ़ एक बार आ जाओ मुझसे मिलने ताकि चैन से मर सकूंँ।"

सुमीत के हाथ, अनजाने ही टेलीफोन के पास रखें पेपर पर शेखर का पता लिखने लगे। उस कागज को साड़ी के आँचल से छुपाती हुई सुमन अपने क्वार्टर में आ गई।

रात भर अतीत के सागर में गोते लगाती रही वह। दूर दूर तक किनारा नज़र नहीं आता था। इतने सालों से थपेड़ों से जूझती उसकी कश्ती, आज अचानक झंझावात में फंस गई थी। विचारों के ताने-बानों में उलझी, उसकी सोचने की शक्ति मद्धम पड़ती जा रही थी। 
थके शरीर और मन को कब नींद ने अपने आगोश में भर लिया, पता नहीं चला।

सुबह उठी तो एक नई सुबह उसके सामने थी।‌विचारों की बदली को चीरकर निर्णय का सूर्य चमक रहा था। संकल्प ने दुविधाओं को समाप्त कर‌ दिया था।‌

आलमारी से अपने पसंद की, हल्की पीली, सूती की साड़ी निकाली और तैयार होने लगी। कॉलेज के पास पहुँचकर, शेखर के घर का पता लिखा वह कागज़ पर्स से निकाला और उसे फाड़कर डस्टबिन में फेंक दिया।

अब वह अपनी ज़िंदगी की ओर कदम बढ़ा रही थी, जहाँ कई लड़कियों का भविष्य उसकी राह निहार रहा था।


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शनिवार, 13 जुलाई 2024

औरतों पर ग़ज़ल

औरतों पर आज एक ग़ज़ल कही है।🙏


द्रौपदी को खुद अपनी  लाज अब बचानी है
कृष्ण जी के आने की बात तो पुरानी है।।1।।


मूक बैठ कर देखें चीर के हरण को जो
अब दिखे न वो मंज़र याद फिर दिलानी है।।2।।

औरतें रहीं दुश्मन औरतों की सदियों से
लोक लाज के बंधन दर्द की कहानी है।।3।।


धुंध थी दिशाओं में भेद की प्रथाओं में
गाँठ जो पड़ी अंतस अब वही छुड़ानी है।।4।।


सोच तंग दुनिया की वंशबेल बेटों से
कम नहीं ये बेटियांँ भी बात यह बतानी है।।5।।


बाग की सभी कलियांँ हृष्ट पुष्ट हों उन्नत
ज्ञान पुष्प विकसित हों वो फसल उगानी है।।6।।


मुश्किलों को झेलती  विघ्न हर को ठेलती 
छू रही गगन सारा जीत की निशानी है।।7।।


शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

22 22 22 2 पर ग़ज़ल


फ़िलबदीह क्रमांक -21
प्रथम चरण 
मिसरा-ए-तरह
थान अंगूठी से निकले
इतनी कात मुहब्बत को(हस्तीमल जी हस्ती)
वज़्न
 22 22 22 2

अपने दिल की सुनते जो कभी न फिर पछताते वो।1।

मीठे फल की आस बसी
अच्छे बीज अभी से बो।2।

चाँद रहे घटता बढ़ता 
कपड़ा फिट भी कैसे हो।3।

दाग़ दिखाता औरों के
पहले खुद का चेहरा धो।4।

 प्रभु की दुनिया है सुंदर 
सुंदरतम ही रहने दो ।5।

तरही मिसरा-

रेशम सा दिल खिल जाए 
इतनी कात मुहब्बत को।

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शर्मिला चौहान