मंगलवार, 26 मार्च 2024

व्यंग्य - नारी निंदा न करो, नारी रतन की खान

व्यंग्य _"नारी निंदा न करो, नारी रतन की खान"



"सुनते हो, अगले सप्ताह हमारी माँ आ रहीं हैं। ननकू के पास से वापसी के समय, हमने ही रुकने को कह दिया था।"  हाथ में हलुए की कटोरी पकड़ाते हुए, हलुए से भी  मीठे स्वर में उमा बोली।‌

असली घी की खुशबू नथुनों से होती हुई, दिल में समाने लगी।‌ आँखें बंद करके, सूँघकर ही आधी तृप्ति अच्छेलाल ने हासिल कर ली।‌

सहसा, उमा के शब्दों को तौलने लगा।‌
"अभी-अभी कुछ दिनों पहले ही तो आईं थीं तुम्हारी माँ, फिर आ रहीं हैं?"  हलुए में पड़े घी से अच्छेलाल की ज़ुबान चिकनी हो गई थी।

"हे भगवान! कैसे आदमी से पाला पड़ा हमारा।‌  हमारी मांँ दो महीने पहले आईं थीं, ननकू के घर जाने के टाइम।"   उमा के स्वर में आए तीक्ष्ण बदलाव से, अच्छेलाल को आने वाले दिनों में अपना राशिफल साफ दिखने लगा।

"अम्माँ भी तो तीर्थ से कल-परसों आने वालीं हैं।" बेमतलब की बात अक्सर अच्छे के मुँह से फिसल ही जाती है। 
"तो... आएंगी तो हम क्या उनको रोक रहें हैं। आएं, रहें।‌ घर तो उनका ही है।‌  हमारी छाती पर मूँग दलने को तो  तुम्हारा पूरा खानदान है।" एक क्षण में ही अच्छे, बच्चे और अम्माँ सब दूसरे खानदान में आ गए।

माँ, मायके की ताक़त देखकर अच्छेलाल‌, खुद को मैदान के दोनों पालों के बीच लुढ़कती फुटबॉल सा अनुभव करने लगे।
सामने बरामदे में पिताजी की तस्वीर लगी थी।‌ रौबदार चेहरा, मूँछों की सघन‌ संरचना , आँखों से एक्स-रे निकाल लेने की क्षमता, फोटो से महसूस होती थी। ऐसा इंसान ही हमारी अम्माँ के साथ घर गृहस्थी करके, गाँव मोहल्ले के लिए काम करके, इतनी खेती-बाड़ी, घर जायदाद बनाकर दुनिया से गए। अच्छेलाल ने‌ अपने अच्छे, शांतिपूर्ण और आरामदायक जीवन का श्रेय पिताजी को देते हुए, उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

"पिताजी, आप सब कर पाए क्योंकि आपकी सास नहीं थी। दो-दो नाव पर सवार होना आसान नहीं है।" बड़बड़ाते हुए अच्छे कमरे में चले गए।

अगली दोपहरी अम्माँ वापस आ गईं। शाम तक उनसे मिलने, तीर्थयात्रा की जानकारी लेने के लिए लोग आते रहे। बिना दूध की, कम शक्कर की चाय पीकर, वे उमा के हैल्थी चाय को कोसते चले गए।
रात को अम्माँ के पैरों पर अच्छे ने तेल लगाया, पैर दबाया और अम्माँ ने आशीर्वादों की झड़ी लगा दी।‌ अच्छेलाल अपनी अम्माँ में  आए अप्रत्याशित बदलाव से अचंभे में पड़ गए।‌ आशीर्वादों की हर बूँद को समेटते कि उससे पहले अम्माँ बोल पड़ीं।

"तीर्थ कर आए हैं हम।‌ पूजा-पाठ करके गाँव के लोगों के लिए खाना-प्रसाद रखना है। अब किराएदारों ने किराया भी बढ़ा दिया है, अनाज तो हमारे खेतों का ही है।" अम्माँ ने स्थिर, शांत स्वर से कहा।
"हाँ- हाँ अम्माँ, जरुर करेंगे।" पिताजी की तस्वीर की ओर देखते हुए अच्छे ने फिर हाथ जोड़ लिए।

कमरे की देहरी में, नरसिंह अवतार सी खड़ी उमा को पार करने की कोशिश भी नहीं की अच्छे ने। 
भेदी दृष्टि से उमा ने उसे खंगाला, "कोई शादी-ब्याह कर रहे हो क्या? गाँव भर का खाना, मुँह उठाकर बोल दिए, दाल आटे का भाव मालूम है यहाँ किसी को?" अम्माँ की ओर अस्सी प्रतिशत इशारा था।

"हाँ हाँ, अपनी माँ को खिलाने के लिए असली घी का डिब्बा ले आई, तीर्थ प्रसाद के लिए तुम्हारी नानी मर रही है।" उमा का तीर सही निशाने पर लगा।
दालान‌ में बैठी अम्माँ को, रसोईघर में रखे असली घी के डिब्बे की भनक कैसे लगी, उमा इस विचार में डूबी और अच्छेलाल देहरी पार करके बिस्तर में घुस गए। 

कालचक्र की गति उस समय थम गई, जब उमा की माँ समय से पहले ,अपने सुपुत्र ननकू को ले पधार गईं।‌ 
"राम राम समधन, अब क्या करूँ मेरा मन आपकी तरह कठोर नहीं कि बाल-बच्चों को छोड़कर तीर्थ यात्रा कर लूँ। मुझे तो अपनी बेटी, नाती-नातिन से मिलने की जल्दी थी, सो ननकू को कहा कि पहुँचा दे।" एक क्षण समधन के चेहरे के भावों को ताड़ा और पैर छूने का अधूरा प्रयास करते हुए कहा, "जोग-संन्यास  की ना उम्र है हमारी ना ही कोई इच्छा।"

"सोलह साल सा श्रृंगार पटार बनाए घूमती हो, उसी में रमी रहो, भावभक्ति तुम्हारे बस की बात नहीं।" इतना उत्तर तो अपेक्षित था।

आज दो ध्रुव चलकर, अच्छेलाल के आँगन की विषुवत रेखा पर मिल रहे थे। विहंगम दृश्य, अलौकिक समय का अनुभव करने के लिए सारी प्रकृति दम साध कर खड़ी थी।
"आओ माँ! ननकू कहाँ रह गया?" अपने भाई को साथ ना देखकर उमा ऐसे घबरा गई जैसे ननकू पाँच साल का हो।

"रिक्शा के लिए चिल्लर करवा रहा है बाहर। पाँच सौ के नोट का खुला मिलना भी कठिन है इस गाँव में।" मुँह बनाकर अपने दामाद की ओर देखा उमा की माँ ने।
"मैं दे देता हूँ चिंता ना कीजिए।" अपने गाँव की लघुता को अपने अच्छे स्वभाव से छुपा लेने को मजबूर थे अच्छेलाल।
अच्छे ने जेब टटोली, सिक्कों के ढ़ेर में एक कड़कते नोट  के स्पर्श ने उनमें हिम्मत जगा दिया। 
बाहर रिक्शावाला व्याकुल हो रहा था, सामान रिक्शे से उतार ननकू कोने के पान ठेले पर छल्ले उड़ाते नज़र आए।
"कितना देना है भाई?" अच्छे ने पूछा।
"अच्छे बाबू, आपके घर के मेहमान थे सो ले आया। धूप दोपहरी में ऐसी सवारी कौन ढ़ोता है?" अपने नाम से परिचित किसी को देखकर अच्छे की नन्ही मूँछें फड़कने लगीं।‌ ननकू और अपनी सास की विस्तृत, सुगठित काया का ध्यान आते ही अच्छे ने पचास का कड़कता नोट रिक्शे वाले को दे दिया।
"ये लोग एक समय कम भी खाएं तो कुछ ना बिगड़ेगा अच्छे बाबू‌। यही हाल रहा तो यमदूत भी खींच ना सकेंगे।  एक पूरा बड़ा पैकेट समोसा कचौड़ी मिनटों में चट कर गए, नाक को सूँघने का भी समय ना दिया।" पसीना पोंछते हुए वह रिक्शा लेकर निकल गया।

दरवाजे पर पड़े सूटकेस, बैग का आकार, आने वालों की काया के अनुरूप था अतः अच्छे करीब घसीटते हुए ले जाने लगे।  
"प्रणाम जीजा।"  घुटनों को टच करने की रस्म अदा करके ननकू आँधी की तरह दरवाजे के अंदर समा गया। 
"मेहरारू की माँ का सामान ढो रहे हो बेटवा, ढोओ खूब ढोओ।"  अम्माँ शतरंज की बिसात पर एक चाल हार चुकीं थीं।
"अब का करें अम्माँ, ननकू सारा सामान बाहर छोड़ कर अपनी दीदी से मिलने भाग आए। क्या करते सामान बाहर छोड़ आते?" 

"दामाद जी, सुबह से चाय पीकर चले थे, दोपहरी हो गई, ननकू भूखा गया था। हम तो सह भी लिए उससे भूखा नहीं रहा जाता।" अपने सामान दामाद को ढोते देख, थोड़ी आत्मसंतुष्टि के साथ उमा की माँ बोली। 
"आओ आओ माँ, हम अभी गरम पूड़ियाँ तल देते हैं। आलू की सब्जी बनाए थे, आपको पसंद है ना।" उमा अपनी माँ का हाथ पकड़े घर के अंदर घुस गई।

अम्माँ तो पहले ही मोर्चा छोड़ अपने कमरे में चलीं गईं थीं। अच्छेलाल अपनी सास के भूखे रहने की सच्चाई की गहराई को, उस रिक्शे वाले  के आँखों देखी से  मापने लगे।

मैदान खाली देख अच्छेलाल ने भी मैदान छोड़ बाहर का रास्ता पकड़ लिया।‌
छुट्टन और हरिया से भी बात करने का मन नहीं था अच्छे का इसीलिए दोनों से बचते, गाँव के किनारे पर पीपल की चौपाल पर बैठ गए। 
पीपल की सरसराहट कानों में रस घोल रही थी। मंद बयार एक एक रोमछिद्र से घुसकर आत्मा तक को शीतल कर रही थी। पलकों को मींचे अच्छे, अपने घर के वर्तमान और भविष्य के बीच गोते लगाने लगे। 
"अच्छे भैया, हमने सुना है कि भौजी ब्यूटी पार्लर खोल रहीं हैं।" कुछ अंटर-पंटर जो छुटाए नहीं छोड़ते, हरिया उनमें से ही था।
कंधे पर गिरे बैताल की तरह उसके हाथ, अच्छे के हटाने से भी टस से मस ना हुए।
"का बक रहे हो बे, हमरी मेहरारू हमसे ना बताएगी, तुमसे कहेगी का?" बेवक्त, बेकार की बात सुनने के मूड में नहीं थे अच्छे आज।
गमछा को दूसरे कंधे में डाल, जरा पास चिपककर बैठते हुए हरिया ने कहा, "कल जमुनिया कह रही थी कि उमा भौजी, सजने संवरने का कोर्स करतीं हैं। वो जो गाँव की अँग्रेजी सकूल की मास्टरनी है ना, वही सिखाती है कहे।" हरिया और उसकी पत्नी ने कब उसके और उमा के बीच सेंध लगा ली, पता ही नहीं चला।
"बिना होली भांग खा लिए हो का हरिया, उल्टा-सीधा बके जा रहे हो।"  हरिया को डपट कर, बिना चाय पिलाए अच्छे कच्चे मन से, उस घर कहलाने वाली जगह पर वापस आ गए।

घर की दहलीज़ लांघी ही थी अच्छे ने की बस, "हाय राम! कैसी बेसरम दुनिया हो गई भगवान। पता होता ये दिन देखना है तो कभी ना आते तीर्थ से वापस, वहीं गंगा में प्राण त्याग देते।" अम्माँ के विलापी स्वरों से अच्छे की आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा।

"अम्माँ, ऐसा मत बोलो, ये घर द्वार सब तुम्हारा है, खेती - जमीन तुम्हारी, तुम काहे मरोगी जाकर। जो हमारी अम्माँ को दुःख दिया है वही जाएगा।" ब्यूटी पार्लर की बात को दिमाग से नहीं हटा पाए थे अच्छे।
अम्माँ ने एक लंबी सांँस ली, सास का सामान उठाने वाला बेटा, अब उनके लिए  सब कुछ करने को तैयार था। विजेता होने का गर्व छिपाती हुई अम्माँ ने बात पूरी की।

"बेटा, तुम्हारी मेहरारू कोई दूकान बना रही घर में, कहे कि लुगाइयों को सुंदर बनाएगी‌ लो भला, भगवान ने बनाया है अब ई का मुँह चमकाएगी।" अम्माँ का स्वर थर्मामीटर के पारे की तरह चढ़ा हुआ था।
"इनका नहीं बेटवा, इनकी माँ की सीख है सब। वही आग लगाय रहीं हैं। आखिर फसल तो वही होगी जो जमीन उगलेगी।" अम्माँ ने दनादन गोले दाग दिए।

"काहे उमा, तुमने सारे मोहल्ले को बताया कि तुम ब्यूटी पार्लर खोल रही हो, हमसे बताना ठीक नहीं समझा तुमने।  हम पति हैं तुम्हारे, क्यों छुपाया हमसे, कहो?" पिताजी की लटकती तस्वीर का कड़कपन आवाज़ में भरकर अच्छे ने उमा से पूछा। मूँछ तो बंजर में उगी विरल घास थी, सो अपने तेल लगे बालों पर बाल फेर लिया था अच्छे ने।

"अब देखो बाबू, आखिर कार बाप-दादा की जायदाद पर कब तक चलेगा। चार पैसों की आवक चाहिए, आप तो इस बात पर कभी विश्वास ही नहीं करते इसलिए हमने उमा को ब्यूटी पार्लर की सलाह दिया।" उमा की जगह उसकी माँ‌ ने प्रतिपक्ष संभालते हुए कहा, "ननकू की बहू भी करती है, रोज का दो-चार सौ कमा लेती है घर बैठे। हम उसी से सामान खरीदवा लाएं हैं।" मखमली जूता मार दिया था सामने खड़ी सास नाम की स्त्री ने।
"अभी तो कह रहीं थीं कि रिक्शा के लिए इस गांँव में पाँच सौ का खुला नहीं मिलता, ऐसे गांँव में मुँह चमकाने के लिए पैसा देगा कोई?" आज अच्छे ने अपने दिमाग का सही तरह से उपयोग किया।
"अब दुनिया तो तुमने देखी नहीं बाबू। आज औरतें खाना एक समय खाकर रह लेतीं हैं परंतु ब्यूटी पार्लर का नशा चढ़ जाए तो महीने में कम से कम एक बार तो आतीं ही आतीं हैं।" चारपाई पर अपने शरीर को किसी तरह रखते हुए उमा की माँ बोली।

"अब हमारे घर में अँगरेजी नियम कानून चलेगा भैय्या, बाहर के लोग बताएंगे कि घर गिरस्थी कैसे चलाई जाए।" अम्माँ ने अपने दिल पर हाथ रख लिया।

" वो जमुनिया घर घर से कपड़े लाती ले जाती है, छुट्टन की लुगाई खेती किसानी करती है, मास्टरनी पढ़ाती हैं और कमातीं हैं, हमारे घर में तो नून राई उतारने के लिए भी किराए का मुँह देखना पड़ता है...ऐसा पाठ हम अब ना सुनेंगे अम्माँ, हम भी चार पैसा कमाएंगे।" अपना फैसला सुना दिया था उमा ने। अब वो अपनी माँ के बैग, सूटकेस से अपने पार्लर के लिए लाए गए क्रीम की डिब्बियांँ, ब्रश, कंघी के अलग-अलग नमूने, पिन और ना जाने क्या-क्या निकाल कर चहकने लगी थी।

शुभ मुहूर्त तो भेदभाव नहीं करता। अम्माँ के पूजा की तिथि और ब्यूटी पार्लर के शुभारंभ का दिन, समान आया। कथा पूजा दोपहर को और शाम को ब्यूटी पार्लर का फीता काटने का कार्यक्रम रखा था।
सामने के कोने में पड़े कबाड़ से कमरे को उमा और उसकी माँ ने आसपास की औरतों के साथ मिलकर चमका दिया। औरतें तो इतनी मुस्तैदी से जुटीं थीं मानो उमा का पार्लर अमावस को पूर्णिमा में बदलने की गारंटी है।

"पंडित,पूजा का दान दक्षिणा तो जमा लिया मां-बेटे ने, हमने ब्यूटी पार्लर का फीता काटने के लिए मीरा बहन जी को बुलाया है। बड़े बड़े लोगों से जान-पहचान है उनकी, वो आएंगी तो हमारी नाक ऊँची हो जाएगी।" जरा इधर-उधर देखकर उमा फुसफुसाई, "हज़ार रुपया में मना लिया है वैसे तो लोगों से दो हज़ार लेतीं हैं बहन जी, परंतु हमने चुनाव में भागदौड़ की थी सो उन्होंने कनसेशन कर दिया है।" 

"फीता काटने के हज़ार रूपए!" अच्छे की पुतलियों के फैलाव ने हज़ार रुपए का बड़प्पन जाहिर कर दिया।
"हम ही काट देते हैं फीता।" अच्छे भड़क गए।
"अभी तक तो अपनी अम्मांँ से नाड़ा बँधवाते हो, हमारे पार्लर का फीता काटने चले, हुँह।" छुरी से पैनी ज़ुबान से अच्छे की बात के पुर्ज़े पुर्ज़े  कर फेंक दिया उमा ने।

"यहाँ भी हमारी अम्माँ को ला ही लिया, शांति पड़ गई।" अच्छे भनभनाए।
"माँ तो हमारी ही काम आ रही हमें, हज़ार रुपए भी वही दे देंगी, दहेज की किस्त समझ कर।" मुँह चढ़ाकर उमा बोली।

"दहेज के नाम पर एक साइकिल ना मिली थी तुम्हारे मायके से, अब दहेज देंगे। घर खर्च के नाम पर जो लेती हो किराए से, उसमें से कितने नोट आलमारी के कागज के नीचे दफना रखी हो, सब मालूम है हमको।" कहता हुआ अच्छे अपने किराएदारों से, अपनी जरूरतों का ब्यौरा देने चल पड़ा।
"किराया वसूलते ही पूजा का  सामान, पंडित जी की दक्षिणा अलग रख देना, नहीं तो इस घर में सब स्वाहा हो जाए।" जाते जाते अम्माँ ने पीछे से नोटिस चिपका ही दिया।

जोर-शोर से तैयारी चालू थी, दोनों मोर्चों के बीच अच्छे कन्हैया सी बाँसुरी बजाते रहते। उमा ने बच्चों और खुद के लिए कपड़े भी बनवा लिए, चेहरा तो वैसे भी माँ और भाई के रहने से चमक ही रहा था उसका।

"मीरा बहन जी के साथ फोटो वाले भी आते हैं। ये जो सिर पर कुचली घास चिपकाए फिरते हो, शैंपू करके खड़ी कर लेना। सारी दुनिया का तेल पिलाते हो इनको, तेल चुपड़ा सिर लिए  हमारे साथ तो फोटो में आना ही मत। ब्यूटी पार्लर का शुभारंभ है तेल की दूकान का नहीं।" अच्छे समझ ही नहीं सका कि दुनिया में तेल कब से इतना बुरा हो गया कि फोटो में नहीं समाता है।

शुभ दिन, शुभ मुहूर्त पर पंडित जी ने पूजा संपन्न कराई। ग्यारह सौ रुपयों में सात पीढ़ियों तक तीर्थ का पुण्य ढोकर पहुँचा आए पंडित जी। खीर पूड़ी का प्रसाद, छककर खाए लोग। 

"पंडितजी, अब लगे हाथों ब्यूटी पार्लर का भी शुद्धिकरण कर दीजिए मंत्रोच्चार से।" ना जाने उमा ने पंडित के कान के पास कौन सा मंत्र पढ़ा कि सौ रूपयों के लिए अटक जाने वाले पंडित जी ने खुशी से उस कमरे की पूजा भी कर दी।

"शाम को भेज दीजिएगा पंडिताइन को, आइ ब्रो फ्री करेंगे उद्घाटन का दिन है।" उमा ने गर्व से कहा।
पूजा में तो गिन गिनाकर सात स्त्रियांं पधारीं थीं शाम को तो तांता ही लग गया। ऐसे जुटीं थीं सब की सब मानो उनका ही पार्लर हो।

"यह समोसा, गुलाब जामुन और चाय, इतना तामझाम।" अच्छे इस बहती गंगा का उद्गम जानना चाहते थे।
"सारा साज-संभाल तुम्हारे दोस्तों की पत्नियों ने ही किया है। मुन्ना भैया वाली भौजी ने नाश्ता भिजवाया, बिहारी की बहू ने हार फूल सजा गई। हमें तो स्पांसर मिल गए, तुमसे तो हज़ार रुपए भी ना निकले।" जो मुन्ना एक कप चाय पिलाने के पहले पैसे और जेब का वजन तौलता है उसकी घरवाली ने इतना सब दे दिया, ना जाने कौन सी छड़ी फेर आई उमा। 

"ज़्यादा भौंहों पर तान ना दो, सबको छह महीने बाल काटने, आइ ब्रो और बाल पर तेल मालिश फ्री रखा है हमने। कोई तुम्हारे नाम से नहीं कर रहीं फोकट में।"  कहते हुए मीरा बहन जी के स्वागत के लिए उमा आगे निकल गई।

बाल में तेल के दो-दो पहलू, कुछ समझ नहीं पा रहा था अच्छे। अपने बालों पर हाथ फेरने लगा तो बिना तेल के रूखे काँटों से हथेली छिलने लगी।

"मीरा बहन जी ज़िंदाबाद, मीरा बहन जी ज़िंदाबाद।" के नारे लगाते, हाथों में फूल माला, गुलदस्ता लिए उमा सखियों संग स्वागत कर रही थी।

अच्छेलाल ने भी अपने कदम आगे बढ़ाए।
" अरे ओ भाई, कहाँ घुसे जा रहे हो। देखते नहीं मीरा बहन जी के साथ सभी महिलाओं की फोटो ले रहें हैं, बीच में मत आओ।" उसे करीब धकेल ही दिया फोटो वाले ने।

फीता काटने के समय उमा, उसकी माँ, सब औरतें मीरा बहन जी से चिपकी पड़ रहीं थीं। 
"अरे, ये क्या?" अच्छेलाल ने आँखों को मसला, पलक झपकाई और देखा, सफेद सुनहरी किनारे की साड़ी पहने अम्माँ, समधन के साथ खड़ी पोज़ दे रहीं थीं। आज उनके बालों की सफेदी गायब देख अच्छे को उमा के व्यवहारिक ज्ञान पर पूरा भरोसा हो गया।

नारियों के विराट स्वरूप को देखकर अच्छेलाल, जीवन के कुरूक्षेत्र में खुद को अकेला और निहत्था पा रहे थे। 

कार्यक्रम के खत्म होते तक, फोटो वाले के किसी भी फ्रेम में वो फिट नहीं हुए।


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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 22 मार्च 2024

कहानी - लोफर

"लोफर"

स्टेशन चौक की भीड़ का एक जाना पहचाना चेहरा था वह। वेशभूषा ऐसी की असली नाम क्या था, वह शायद खुद भी भूल गया है, "लोफर" की ध्वनि ही उसका प्रतिनिधित्व करती थी।

बड़े-बड़े नमूने की शर्ट, ऊपर की दो-तीन खुली बटन उसकी पसलियों की गिनती के लिए हमेशा खुली रहतीं। पैसों की बचत या हिप्पियों के जीवन-दर्शन का प्रभाव था कि लंबे बालों को एक रबर बैंड से बाँधें रखता। शरीर के अधोभाग में बेलबाॅटम और पैर की चप्पल हमेशा कोल्हापुरी। अंगुलियों में एक सिगरेट फंसी होती,  न..न.. सिगरेट जलती नहीं थी सिर्फ हाथ की शोभा बढ़ाने के लिए कई कई दिनों एक ही सिगरेट अंगुलियों बीच सजी रहती।

अजीब सा था, ज्यादातर चुप रहता और जब कभी बोलता तो सीधी सपाट, जलीकटी बातें। स्टेशन के माल धक्के में ठेला गाड़ी से सामान ढ़ोता था, दिन में एक दो बार फेरी की और अपनी गाड़ी किसी और के सुपुर्द कर निकल जाता। चौक पर खाने-पीने का इंतजाम  करता और फिर यूँ ही रात तक सड़कों पर भटक कर, फिल्मी गानों पर सीटी बजाते थक जाता तो कहीं किनारे सो लेता। अपने साथ साथ, सड़क पर गुज़र बसर करने वाले कुछ बुजुर्गों के पेट भरने का भी ठेका उठा रखा था‌ उसने।  एक पतली शाल, हमेशा गले से झूलती रहती, जो हर मौसम ओढ़ने के काम की थी।

स्टेशन चौक से चार-पाँच किलोमीटर तक वह अपनी लोफराई के लिए जाना जाता। किसी भी दूकान या खाने की सड़क छाप होटल तो मानो उसे दहेज में मिली थी। जो खाना हो, बिना बोले निकाल लेता और जितना मन हो पैसे रखकर निकल जाता। मुफ्त का नहीं, अपनी मर्जी के पैसे देता जरुर था।

कभी किसी से पंगा लेता नहीं था परंतु किसी का अन्याय सहना भी पसंद नहीं था उसे। सड़कछाप हीरो ही था वो।

पानठेले पर की भीड़ से थोड़ा हटकर बैठा, आते जाते लोगों को घूरा करता। महिलाओं और लड़कियों के लिए अपशब्द, किसी भी प्रकार की  छींटाकशी उससे बर्दाश्त नहीं होती थी इसलिए औरतें उसज्ञपर विश्वास और प्रेम करतीं थीं।

सड़क किनारे सोने वालों के बीच भी रिश्ते बन जाते हैं, पर उसने कोई रिश्ता पाला नहीं या पालने से बचता था। आज किसी किनारे तो कल किसी और जगह सो जाता। रिश्तों के नए धागे जोड़ने की उसकी लेशमात्र भी इच्छा नहीं थी शायद।

बहुत से साथी रात को अपनी बिछावन पर लेटकर दुनिया भर की बातें, अपने अतीत को याद किया करते और लोफर अपनी सेज उनसे दूर कर सीटी बजाता गाने गाते हुए सो जाता।

सड़क किनारे के इस परिवार में, कुछ दिनों पहले एक औरत ने अपनी आठ-नौ साल की बेटी के साथ प्रवेश लिया। उसने कुछ रातें सड़क के किनारे सोकर गुजारने का निर्णय यूँ ही नहीं लिया होगा परंतु किसी के घावों को कुरेदने की प्रथा, सड़कों पर भी कम नहीं है।
"ऐ.. नाम क्या है तेरा?" साठ साल की झमिया बुड्ढी ने उसे घूरते हुए कहा।
"बस..! कुछ दिनों यहाँ सोने की जगह मिल जाए तो मैं मेहनत मजदूरी करके, सिर छिपाने का प्रबंध कर लूंगी।" उस औरत ने नाम बताने की जगह एक प्रार्थना कर दी।

"अरे..! नाम तो बता नहीं रही, साथ ये छोरी कौन है?" शंकर दादा ने औरत से पूछा।
"मेरी बेटी है।" उस औरत का छोटा सा उत्तर।

"कुछ तेरा पता ठिकाना मालूम नहीं, कैसे अपनी सड़क पर तेरे कू जगह देंगे ?" शंकर दादा ने ऐसे कहा जैसे सड़क उसके पूर्वजों की धरोहर हो।

"हम सब भाड़ा देते हैं यहाँ सोने का! तेरे पास है भाड़ा के लिए नोट?" झमिया बुड्ढी की जुबान झमक रही थी।
"मैं काम करुंगी, कोई भी काम। स्टेशन पर सामान उठाने, साफ-सफाई करने, हॉटल में बरतन उठाकर साफ करने का, कोई भी काम करुंगी। बस .. मुझे मेरी बेटी के साथ यहाँ थोड़ी जगह दे दो।" उस औरत ने रुआंसी होकर कहा।

सड़क के दूसरे किनारे पर वड़ा-पाव खाता हुआ लोफर रुक गया। हाथ का बचा हुआ वड़ा-पाव पैर के पास बैठे कुत्ते ( जिसको वो साहब बुलाता था) के सामने डाल दिया और सड़क के इस पार आ गया।

लोफर के आने की सुगबुगाहट हुई और लोफर ने शंकर दादा सारी हेकड़ी, अपनी धारदार जुबान से निकाल दी।
अब उस औरत, जिसका नाम बासंती था, अपनी बेटी पायल के साथ एक ओर बैठकर, अपने  इकलौते बैग से सामान निकालने लगी। बच्ची ने भी अपने पीठ पर लदे बैग को खोलकर, पानी की बोतल से पानी पीने लगी।

सड़क किनारे रहने वालों के लिए इतनी सुंदर, जवान औरत का उनके बीच रहना, सपना ही था‌। बासंती का पहनावा, रहने का सलीका और बातचीत का अंदाज औरों जैसा नहीं था। सूती के सादे कपड़ों से पूर्णतया शरीर को ढांकें रखती, मध्यम स्वर में और नपा तुला बोलती थी। पायल को हर वक्त साथ रखती।

स्टेशन के साफ सफाई करने वालों में से एक जगह खाली थी जहाँ बासंती को काम मिल गया। पायल भी पूरे दिन उसके पीछे-पीछे  रहती और कचरा उठाने में मदद करती।

"अपने साथ इस बच्ची को काम में क्यों लगाती है? थोड़ी बहुत पढ़ी लिखी तो लगती है फिर बच्ची को स्कूल क्यों नहीं भेजती?" कभी ठीक से बात नहीं करने वाले लोफर ने एक दिन बासंती से पूछा।
"मैं स्कूल जाती थी अंकल, मेरे पास अभी भी स्कूल के पानी की बोतल है।" प्रश्न का उत्तर मां की जगह बेटी ने दिया।
"जब मैं थोड़ा संभल जाऊंगी, इसे फिर से पढ़ाऊंगी। एक साल तो लगता है ना किसी को संभलने में!" बासंती ने लोफर की ओर देखकर कहा और पायल का हाथ थामे चली गई।

गर्मियों की उमस बढ़ गई थी और मेघ मंडराने लगे थे। तेज आंँधियाँ  जैसे घाघरा घुमाती पूरी धरती पर नृत्य करने लगीं। आकुल धरा की तपन को शांत करने के लिए मेघ भी लालायित हो रहे थे। 

सड़क किनारे बसेरा लगाए लोगों के लिए, यह समय सिर पर छत ढूँढने का होता है। होटलों के बाहर का शैड, बस-स्टाॅप की बैंचें, रेल्वे स्टेशन के बाहर आटो स्टैंड पर की जगह और जहां कहीं इस पानी की मार से बचा जा सके, ऐसी सभी जगह को पहले हथियाने का प्रयास जारी रहता है।

सड़क किनारे के सभी अपना चौमासा बिताने के इंतजाम में लग गए थे परन्तु बासंती को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह अब कहाँ जाए? उसे बात समझ आती तब तक तो औरों ने अपनी गृहस्थी सुरक्षित जगहों पर बसा ली।
"मौसी, मेरा भी इंतज़ाम कर लो अपने साथ, इस बच्ची को लेकर बारिश में कहाँ रहूँगी।" बासंती ने झमिया मौसी से चिरौरी की।
"अरे, मुझे ही एक बिस्तर की जगह मिल पाई है, औरतों के आश्रम के बरामदे में। वहाँ तो अब बिल्कुल जगह नहीं बची।" कहते हुए झमिया मौसी भी सड़क किनारे की जगह छोड़ गई।
"इसी जगह के लिए कितने झगड़े होते थे और अब चार महीनों के लिए यह मुक्त रहेगी।" मन ही मन बासंती को लोगों के बदलते रंग पर हँसी आ गई।

"रहने का इंतजाम नहीं हुआ इसलिए हँस रही है क्या?" लोफर की आवाज़ से बासंती संयत हो गई।
"नहीं।" छोटा सा उत्तर था बासंती का।
"सोच रहीं हूँ कि बरसात में कैसे और कहाँ रहूँ? मैं तो तकलीफ़ झेल भी लूँगी, पायल तो बहुत छोटी है कैसे रह पाएगी?" माँ का मातृत्व आँखों से बहने लगा।

आसपास के सभी अपने ठिकानों पर चले गए थे और वो सड़क पर खड़ी अपना ठिकाना ढूंढ रही थी। अचानक तेज हवा चलने लगी और काले बादलों ने बूंदाबांदी शुरू कर दी। 

"मेरे साथ चलेगी, एक जगह है।" लोफर के मुँह से प्रस्ताव सुनकर बासंती सोच में पड़ गई।
"यहाँ सड़क में भीगकर, ठिठुर कर मरने से अच्छा है कि मेरे साथ चल। तेरे और तेरी बेटी की सुरक्षा की गारंटी है मेरी‌।" मरती क्या ना करती, बासंती के पास उस पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा नहीं था।

सामान उठाकर, पायल का हाथ पकड़े लोफर के पीछे चल पड़ी। 
"बस स्टैंड पर क्यों आए हैं?" बसों को देख बासंती ने पूछा।
"दूसरे शहर जाना है।" कहता हुआ लोफर जेब के पैसों से टिकट लेने लगा।
"मेरे पास पैसे हैं।" बासंती ने पैसे निकालने चाहे।
"रहने दे, काम आएंगे तुम दोनों को।" वही अलमस्त अंदाज था उसका।
 पूरे रास्ते वह अनमना रहा, खिड़की से बाहर देखता रहा‌ एक जगह बस रुकने पर खाने का सामान ले आया। पाँच -छह घंटों के सफर के बाद, गंतव्य पर पहुंचकर वे सब बस से उतर गए।

"मैं अभी आता हूँ, यहीं रुकना।" कहकर वह भीड़ में गुम हो गया।
नई जगह, शाम की बढ़ता साया, बारिश की शुरुआत और ऐसे जगह पर बेटी को लेकर खड़ी बासंती का दिल घबराने लगा।
"एक सड़क पर रहने वाले लोफर पर क्यों विश्वास कर लिया मैंने। ना जाने इसके मन में क्या है, नहीं मुझे इसके साथ नहीं जाना चाहिए।" बासंती ने चारों ओर नज़रें घुमाईं और पायल का हाथ पकड़े, वापसी बस टिकट के लिए बढ़ने लगी।

"टूट गया भरोसा, टूटना भी चाहिए। दुनिया ने कितनी ठोकर दी होगी समझ सकता हूँ। एक बार आजमा लो, नहीं तो वापस चली जाना। पैसे तो हैं ही तुम्हारे पास।" कहते हुए लोफर ने पायल का हाथ थाम लिया।

रिक्शेवाले को एक पता बताया और कुछ ही देर बाद वे एक बड़े बंगले के सामने थे। रिक्शेवाले को रोककर लोफर  बासंती से कहने लगा, "यहाँ तुम और पायल सुरक्षित रहोगी। चाहो तो काम भी मिल जाएगा, क्लीनिक में साफ-सफाई या और कुछ भी।" एक लंबी साँस लेकर बोला, "इस घर में बहुत से डॉक्टर हैं, कोई ना कोई इंतज़ाम हो जाएगा। मेरे बारे में किसी को भी जानकारी देने की जरूरत नहीं।" कहते हुए अपने जेब से एक फोटो निकाल कर बासंती को पकड़ा दिया।
"यह किसकी फोटो है मुझे क्यों दे रहे हो?" बासंती का प्रश्न था।
"एक अधूरे डॉक्टर की फोटो है, बस यही तुम्हारा काम बना सकती है। मेरी बात हो गई थी।" कहते हुए वह रिक्शे में बैठ गया।
"उन लोगों से मुझे मिलवा तो दो, ऐसे कैसे चले जाओगे छोड़कर, यदि उन्होंने मुझे जगह नहीं दी तो?" भविष्य के ढे़र सारे प्रश्न तैर रहते थे बासंती के सामने।

"ऐसा हुआ तो बस से वापस उसी जगह चली जाना, पैसे तो हैं तुम्हारे पास। लोफर हूँ, पर इतना नहीं कि तुम्हें बच्ची के साथ गलत ठिकाने पर छोडूँ। मेरे निकल जाने के बाद घंटी बजाना।"  उसके इशारे पर रिक्शावाला चल पड़ा।

आशा, भय और चिंता से भरी बासंती ने घंटी बजाई। कुछ देर बाद एक औरत बाहर आई।
"किससे मिलना है?" उसने पूछा।
"जी, घर के मालिक से।" बिना सोचे-समझे बोल गई बासंती।
"श्वेता दीदी से या उनके मम्मी-पापा से।" उस अधेड़ औरत ने फिर पूछा।
"मैं किसी को नहीं जानती, ये फोटो उन्हें दिखाना।" हाथ पर रखी फोटो बासंती ने उस औरत को दे दी।
एकटक उस फोटो को देखती वो अंदर की ओर भागी। कुछ समय बाद उसके साथ एक खूबसूरत जवान लड़की, एक सौम्य अधेड़ औरत और व्हील चेयर पर एक व्यक्ति बाहर आ गए।

"ये फोटो तुम्हें कहाँ से मिली? कौन हो तुम? यहाँ केसे आई?" प्रश्नों के बौछार से घबरा गई बासंती।
"मुझे लोफर यहाँ छोड़ गया। उसने ये फोटो दी और कहा कि अधूरे डॉक्टर की फोटो दिखा देना, तुम्हें कुछ दिनों रहने की सुरक्षित जगह और काम मिल जाएगा।" बासंती बोल रही थी और सामने खड़े सभी की आँखें बरस रहीं थीं।

"भैया, वापस क्यों चले गए। आप लोफर नहीं हो। डॉक्टर ना बन पाना, अपराध नहीं था आपका। हम सब अपराधी हैं आपके भैया।" कहते हुए वो लड़की, जिसका नाम शायद श्वेता था, जोर से रो पड़ी। 

अब वे सब अपने लोफर बेटे के द्वारा भेजे गए जरूरतमंद बासंती और पायल को सामान सहित घर में ले गए थे। घर के मुख्य हाल में लगी कई तस्वीरें उस लोफर की थीं या इस घर के अधूरे डॉक्टर की, बासंती समझ नहीं पा रही थी।

कुछ ही दिनों में बासंती ने सब अंदाज़ा लगा लिया। औरतों की छठी इंद्रिय की सक्रियता, उसमें तेजी से आ रही‌ थी।‌‌ घर के कामकाज, क्लीनिक के कामकाज के लिए तो पहले से ही लोग थे इसलिए घर मालकिन ने उसे रसोई के कामकाज में हाथ बंटाने, कभी साफ सफाई, बगीचे के काम में मदद करने का कार्यभार सौंपा। उन्हें देखकर बासंती ने समझ लिया कि दिल में जगह हो तो कहीं भी जगह बनाई जा सकती है।
"शाम को एक-दो घंटे पायल को पढ़ाया करो।" श्वेता दीदी ने आदेश दिया था। 
महीने भर में आत्मीयता की कड़ी से बँध गई थी वह। अहसान करने जैसा भाव कभी नहीं दिखा। बँगले में सामने दो कमरे थे, एक में कामकाजी सती मौसी रहती थी और दूसरा उसके लिए खोल दिया था।
जो घर में बनता वह सब उसे भी मिल जाता, रात को माँ बेटी सिर्फ़ सोने जाते थे कमरे में।‌

श्वेता दीदी ने पायल को पास के स्कूल में भर्ती करा दिया।‌ एक परिवार बिना उसके अतीत के बारे में जाने दिल से मदद कर रहा था। सती मौसी से घर की कहानी परत दर परत खुलती गई और बासंती का मन उनमें उलझ गया। 

"लोफर" इस घर का वारिस, डॉक्टर माता पिता की बड़ी संतान है। श्वेता उससे उम्र में सात-आठ साल छोटी थी। 
अपने क्लीनिक के बाद, माता-पिता दोनों ने ही बच्चों को मेडिकल की पढ़ाई के लिए प्रेरित करना शुरू किया। आखिरकार इतने बड़े क्लीनिक को चलाने के लिए कोई तो हो।
अमित, जी हाँ अमित नाम बताया गया लोफर का, बचपन से ही उसे संगीत और गिटार का बहुत शौक था। 
"अमित बाबा, दस साल के थे तब उनको गिटार बजाने में बड़ा पुरस्कार मिला था।" सती मौसी ने बताया।
बासंती ने तो कुछ दिनों पहले ही अमित का संगीत शौक, सीटी से पूरा पूरा गाना गाने की कला‌ देख चुकी थी। 
दसवीं के बाद मेडिकल प्रवेश परीक्षा के लिए उसकी सारी शौकिया कक्षाएं, प्रेक्टिस बंद करवा दीं गईं। 
गिटार और संगीत के और भी वाद्य यंत्रों को कमरे में बंद कर दिया गया।
"ये सब फालतू शौक की जगह अपनी कोचिंग में समय दो, ध्यान दो। मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिलने के लिए जितना जी जान लगा सकते हो लगा दो, आगे इस क्लीनिक को तुम्हें ही संभालना है।" पापा के शब्द किशोर मन पर हथौड़े की तरह चलते। वह बहुत कोशिश करता परंतु मेडिकल की पढ़ाई उससे होती ही नहीं थी। 

नई धुन, शब्दों के साथ बिठाने में हमेशा गिटार के साथ नया प्रयोग करने वाला अमित चुप चुप स रहने लगा था।
पहली साल की परीक्षा में असफल होने के बाद पापा-मम्मी उसकी पढ़ाई, सुविधाओं, कक्षाओं के प्रति बहुत जागरूक हो गए थे।

"उसको देखकर श्वेता बेबी, बहुत कम उम्र से ही, डाक्टर बनने की रट लगाए रहतीं।" सती उस परिवार की सबसे विश्वसनीय और पुरानी सहायिका थी जो मालकिन के साथ ही इस परिवार में शामिल हुई थी।

बासंती ने इस घर में एक खालीपन महसूस किया जो हर के दिल में अंदर तक अपनी जगह बना चुका था। 
बहुत दिनों बाद एक दिन मालकिन ने बासंती से उसके बारे में पूछा। 
लड़की पैदा करने की जितनी सजा उसको ससुराल से मिली थी सुनकर उनकी आँखें भीग गईं।‌ बिना माँ बाप की बासंती ने, अपनी और पायल की जान बचाने के लिए ही उन क्रूर माँ बेटे के घर से निकल आई थी। अपनी गोरी पीठ पर सलाखों के निशान दिखाते हुए, वह फफक-फफक कर रो पड़ी थी। 
"अब तुम भी क्लीनिक के काम में मदद करना, बारहवीं पास हो घर के काम सती मौसी और बाई संभाल लेंगी।" श्वेता दीदी के कहने पर, क्लीनिक की नर्सों ने उसे कुछ बेसिक जरूरी कामों की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया।

बासंती को उस लोफर का चेहरा भूलता नहीं था, उसकी संवेदनशील दृष्टि ने ही बासंती को सड़क से उठाकर इस सुरक्षित घर में जगह दिलाई थी।

"सती मौसी, अमित बाबा के बारे में मुझे सब जानना है।" बासंती ने रात को अपने कमरे में बैठी मौसी से पूछा।
"क्या बताऊँ, तुमने तो उसे देखा है जाना है। इस घर से तो वह इक्कीस की उम्र में चला गया था। अब चौदह-पंद्रह साल हो गए।" सती ने गहरी सांस ली।
"क्यों चले गए, इतना बढ़िया परिवार, घर? किस बात की कमी थी यहाँ?" बासंती ना चाहते हुए पूछ बैठी।
"कमी तो कुछ भी नहीं थी, बाबा के दिल की बात समझने में कमी रह गई।" सती ने बताया, "दूसरी बार में भी मेडिकल परीक्षा पास ना कर पाने पर बाबा ने अपने आपको कमरे में मानो बंद कर लिया। दो-दो तीन-तीन दिन नहाते नहीं थे, खाने का भी होश नहीं था। मालिक का ग़ुस्सा बढ़ता गया और बाबा की चुप्पी।"

उसकी ओर एकटक देखती हुई सती मौसी ने अपनी बात पूरी की।
"एक सुबह जब बहुत ठोकने पर भी बाबा ने आवाज़ नहीं दी, ना ही दरवाजा खोला तब माली, ड्राईवर की मदद से दरवाजा तोड़ दिया था।" अतीत मानो समय को लांघकर, मौसी की आँखों में समा जाना चाहता था। 
"फिर क्या हुआ मौसी?" बासंती टकटकी लगाए, दम साधे बैठी थी।
"बाबा ने बहुत सारी नींद की गोलियांँ खा लीं थीं। माँ बाप दोनों डाक्टर थे, पुलिस केस नहीं बना और अपने ही क्लीनिक में बड़े बड़े डाक्टरों से बाबा का इलाज करवाया।" 
"एक सप्ताह के बाद बाबा ने पहला शब्द बोला था "साॅरी"।"  मौसी ने अपनी आँखों में उमड़ आए नमकीन पानी को आंँचल से सुखा दिया।

"ओह! फिर अमित बाबा इस घर में क्यों नहीं रहते।" बासंती आज सब जान लेना चाहती है। 
"बाबा की दिमागी हालत पर असर हो गया था। वो सिर्फ़ चुपचाप बैठे रहते, अब तो गिटार को हाथ भी नहीं लगाते। किताबों को देखकर चीखते और बेहोश हो जाते थे।" मौसी को हर एक बात कल की घटना सी याद थी।

"उनकी हालत देखकर मालिक मालकिन और बेबी भी मानसिक दुःख से भरे रहते। बाबा को किसी संस्था में भेजा था, वहाँ छह महीने रहकर वो थोड़ा बोलने, घूमने चलने लगे।" सती चुप हो गई।

"परंतु घर क्यों छोड़ा उन्होंने?" कारण जानने के लिए बेचैन थी बासंती।

"जब कुछ अच्छे हो गए तब उन्हें पढ़ाई से डर बैठ गया था। उन्होंने किसी संगीत संस्था के साथ जुड़कर सीखने सिखाने का सोचा परंतु मालिक ने उन्हें मना कर दिया। एक रात चिट्ठी छोड़कर बाबा चले गए। उसके बाद ही मालिक को लकवा मार गया था।" बुरे सपने की तरह बता रही थी सती मौसी।

"ओह! बाद में मालिक-मालकिन ने क्या किया?" बासंती टकटकी लगाए देख रही थी मौसी को।

"क्या करते, चिट्ठी में स्पष्ट लिखा था कि मर्ज़ी से घर छोड़कर जा रहा हूँ, आपके पसंद का काम नहीं कर सका, माफ़ कर देना। मुझे ढूँढना मत, बस माफ़ कर देना। श्वेता आपकी हर इच्छा पूरी करेगी, वो बहुत प्यारी बहन है मेरी।" सती मौसी की आँखों से दुःख के बादल बरसने लगे।

"तब से बाबा कभी आए नहीं, मालिक की हालत खराब ही हो गई थी। उन्हें संभालने, श्वेता दीदी की पढ़ाई में मालकिन का जीवन चला गया।" 

"अमित बाबा के घर छोड़ने की तारीख को ही तुम इस घर में आई। आसपास से कुछ बातें पता तो चलतीं थीं कि अमुक ने अमित के जैसे किसी को देखा, परंतु कभी वहाँ कोई मिला नहीं। पुलिस की सहायता लेने से मालिक ने इंकार कर दिया था।" सती उठकर कमरे में घूमने लगी।

"अच्छा, तो लोफर को.. नहीं-नहीं अमित बाबा को पता था कि वो हम दोनों को उसी दिन इस घर में भेज रहें हैं।" बासंती का मन द्रवित था, इस परिवार ने उसे पनाह दी, हिम्मत दी वो भी बिना उसके अतीत पर कोई सवाल किए।‌

"मौसी, मैं और पायल हमेशा अमित बाबा और इस परिवार का उपकार मानेंगे। मैं कल से घर के सब काम, मालिक मालकिन की देखभाल और क्लीनिक के काम सीखने में कोई कसर नहीं रखूंँगी। मेरी बेटी को एक अच्छे परिवार की छाया मिल गई, बस ईश्वर की इतनी दया बहुत है।" बासंती के चेहरे पर चमकते सत्य को पहचान गई थी अनुभवी आँखें। 

सती ने उसका हाथ थाम लिया मानो कह रही हो, मुझे भी जीवन और साथ इसी परिवार ने दिया था। अब अंतिम दिन तक उनके लिए कुछ करतीं रहूँ तभी मुक्ति मिलेगी।‌


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शर्मिला चौहान

गुरुवार, 21 मार्च 2024

2122 1122 22

फ़िलबदीह 14 
क़ाफ़िया -आ की मात्रा 
रदीफ़- हो जैसे

2122  1122  22

इश्क़ करना ही ख़ता हो जैसे
चाँदनी रात सज़ा हो जैसे।। 1।।

पेड़ झूमे हवा से हिल मिलकर
जाम दोनों ने पिया हो जैसे।।2।।

झाँकती यूँ है किरण फुनगी से
बीज धरती से उगा हो जैसे।।3।।

रात भर चाँद भटकता था यूँ
 चैन उसका खो गया हो जैसे।।4।।

डूब दरिया में गई थी कश्ती 
इश्क़ शिद्दत से किया हो जैसे।।5।।

गिरह का शेर-

सामने देख मुझे वह भागा
तार बिजली का छुआ हो जैसे।

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शर्मिला चौहान

बुधवार, 13 मार्च 2024

व्यंग्य _ दो पाटन के बीच में

"दो पाटन के बीच में"


किराएदारों से  बढ़ा किराया आने लगा और अच्छेलाल के अच्छे दिन आ गए। जेब की गर्म हवा ने रिश्तों को पिघलाना शुरू कर दिया। उमा अपनी पायल छनकाती, घर के आँगन में ठुमकती चलती। अम्माँ को रेशमी साड़ी तो नहीं परंतु  माधोपुर के लोगों  के साथ तीर्थयात्रा पर भेजकर अच्छे ने सपूत होने की गारंटी दे दी थी। बच्चों को अँग्रेजी स्कूल में भर्ती करके, आजकल अब अपने करने के लिए कुछ बढ़िया सा सोच रहे थे अच्छे।

वैसे शहर की स्वच्छंद हवा, अच्छे के नाज़ुक फेफड़ों को रास आ गई थी, अब कभी-कभार वकील साहब की फटफटी की पिछली सीट उनके लिए रिजर्व रहती। पेट्रोल का आधा पैसा मिलने पर वकील साहब जब कहो तब सवारी लेकर दरवाजे पर हाज़िर। 

बसंत की फगुनाहट लिए, मत्त  चुनावी हवा सारे देश में सरसराने लगी। बरसाती मेंढ़कों की तरह मुहल्ला छाप नेताओं और उनके चमचों के टरटराने का स्वर माधोपुर में भी गूँजने लगा। 

पिताजी के खून में बहने वाली सेवा भावना, देशप्रेम अच्छे के हृदय में हिलोरें लेने लगीं।

"अरे सुन बे मुन्ना, कौन पार्टी बढ़िया है हमारे लिए?" टपरी पर चाय सुड़कते हुए अच्छे ने जानकर मुन्ना से पूछा।

"अच्छे भैया, समोसा पार्टी, कचौड़ी पार्टी, पकौड़ा चाय पार्टी यही तो आपके फेवरेट हैं। क्या काकटेल पार्टी का सोच रहें हैं आजकल?" कुछ अँग्रेजी बोलने वाले ग्राहकों से मिली जानकारी मुन्ना ने अच्छे को दी। शहर की हवा अच्छे भैया को सुहाने लगी है, मन ही मन मुन्ना सोचने लगा।

"चाय बेचने वाले देश चलाने लगे पर तुम तो मुन्ना टपरी पर बैठ ज़िंदगी भर पकौड़े छानते रहो। अरे, हम तो‌ देशसेवा के लिए चुनावी पार्टी का पूछ रहे हैं।" चाय के गरम कप से अपनी हथेलियाँ सेंकते हुए अच्छे, खुद को सफेद कुर्ता पायजामा, हॉफ जैकेट और हाथों में झंड़ा लिए अनुभूत करने लगे।

"अरे भैया, ये चुनाव-वुनाव हम आपके समान लोगों के लिए नहीं है। बड़े लोगों का काम है‌।" मुन्ना का 'अपने समान' कहना अच्छे को कुछ भाया नहीं।

"अच्छे भैया, आपको जाना है तो जाओ।‌ पाठशाला के पीछे बड़े हॉल में एक पार्टी का आफिस खुला है कल मंगल काका कह रहे थे।" मुन्ना ने बात खत्म भी नहीं की थी कि अच्छेलाल निकल पड़े।

हॉल के बाहर से ही चुनावी गर्मी की आँच अच्छे की ऊर्जा बढ़ाने लगी।

"कौन है रे, खड़ा खड़ा का देख रहा है। सारे बैनर, पोस्टर उठाकर अंदर ले आ‌।" ऊँचे कद-काठी का, गंजा, पहलवान नुमा, श्यामल रंग  का आदमी, जिसके गले में मोटी सी सोने की  चैन झूल रही थी, गुर्राया।
"हम कोई नौकर नहीं हैं, हम तो पार्टी के सदस्य बनने आए हैं।" अपने तेल चुपड़े बालों पर अंगुलियांँ फिराते हुए अच्छे ने उत्तर दिया।
"पार्टी का सदस्य बनकर, बिना काम किए रोज पचास रूपया और समोसा कचौड़ी का भोग लगाने आए हो।" पहलवान की छोटी आँखें पिचकते गुब्बारे की तरह और छोटी हो गई।

"हम देशसेवा करने आएं हैं पचास  रुपए और समोसा खाने नहीं। हम तो खुद ही अपने दोस्तों को पाँच-पचास का चाय-पानी कराते हैं रोज।"  अच्छे के चेहरे पर वीर योद्धा की तमक थी।

"अबे ये कौन से चिड़ियाघर से आया है रे, साथ देशसेवा भी उठा लाया है।" पहलवान के हँसने से उसके कमीज़ में फंसी तोंद उछलने लगी।
"चल आजा, हम तुम मिलकर देशसेवा करते हैं। अपना नाम बता और देश की सेवा में लग जा।" अपना नाम लिखाकर अच्छेलाल हॉल के अंदर पहुँच गए ।
आधा माधोपुर  जैसे उस हॉल में ठूंँसा पड़ा था। सबके सब चाय सुड़क रहे थे।
"अरे अच्छे भैया, आप यहाँ?" हरिया चिल्लाया।
"ऐ..लो. हरिया, छुट्टन, मंगल काका सब यहाँ हैं भाई। हमने तो सोचा हमें ही देशसेवा का रोग लगा है, यहाँ तो सारा गाँव बीमार है।" अपने साथियों को देखकर सूरज की नवल किरणों से, खिलते कमल की तरह अच्छे का मुखमंडल खिल उठा।

"तुम भी अच्छे भैया, देशसेवा का पंछी सिर्फ चुनाव तक पेड़ पर बैठता है, चुनाव खत्म और पंछी फुर्ररर। हम तो पचास रुपए, दो टाइम चाय-नाश्ता के लिए यहाँ आए हैं।"  हरिया का सीधा सरल, सच्चा जवाब अच्छेलाल को अच्छा ना लगा।
"नहीं-नहीं, भाई हम तो पचास रुपए ना लेंगे। दिल लगाकर देशसेवा करेंगे आखिर हमारे पिताजी ने अपने प्रयासों से गाँव में सरकारी स्कूल खुलवाया था।" सामने दिखती पाठशाला की ओर इंगित करते अच्छे की छाती छप्पन इंच की हो गई।

सामने पड़े बैनर पर कुर्ता पायजामा, हॉफ जैकेट, सिर पर पगड़ी पहने, घनी लंबी मूँछों वाले चौधरी जी हाथ जोड़े नज़र आए। बाजू में एक भैंस की तस्वीर थी।  

"यही तो उम्मीदवार हैं अच्छे भैया, चौधरी जी। पहले बड़ी पार्टी में रहे, इस बार अकेले ही चुनाव लड़ रहे हैं। किसानों के देवता हैं सो चुनाव चिन्ह भैंसिया रख लिए।" छुट्टन ने राजनीति की पूड़ियाँ कुछ ज़्यादा ही छानी थी।

"अपने गाँव में तो कभी आए नहीं चौधरी जी।" अच्छे ने अपने दिमाग की घंटी बजाने की पुरजोर कोशिश की।

"अरे भाई! बड़े नेता हैं काफी बड़ा क्षेत्र होता है अब सब गाँव थोड़े जा पातें हैं।" मंगल काका ने अपनी बुद्धि का तड़का मारा।

"आज कितने लोग हैं रे?" पहलवान दहाड़ा।

"आज तो पचास हो गए  बाबू!" छुट्टन की गिनती हो गई थी।
"बाबू काहे कहा बे! हम का दो-चार हजार के लिए ज़िन्दगी भर कलम घिसने वाले दिखतें है तुमको ? हम नेताजी के दाएं हाथ हैं, हमारे बिना उनका कोई काम नहीं होता।" अपने कुछ हल्की, बड़ी मुश्किल से ऊंँचक कर दुनिया को झांकने का प्रयास करती, मूँछों पर अँगुलियां फेरता पहलवान बोला।

दो-चार दिनों में अच्छेलाल को, अलग-अलग गाँव, शहरों से आए मेंढ़कों की टरटराहट सुनने का अवसर मिला। सब एक स्वर में राग अलापते।

देशसेवा का सैलाब अच्छे के घर आ गया था।
"ये क्या कचरा पट्टी घर पर ले आ रहे हो?" ‌अच्छे को रिक्शे से बैनर, पोस्टर घर के सामने उतारते देख उमा भड़क गई।

"चार तक पढ़ी हो परंतु रही जाहिल की जाहिल। देखती नहीं बैनर और पोस्टर हैं हम चौधरी जी के प्रचार में व्यस्त हैं। किसानों के नेता हैं, गाँव के लिए अच्छा करेंगे।" बैनर और पोस्टर बरामदे में पहुँचे।

वहाँ तो पहले ही बैनरों और पोस्टरों की भारी भीड़ जमा थी। अच्छे ने देखा, एक लड़की किताब पढ़ रही है और बाजू में एक महिला लाल  किनारी की सफेद साड़ी पहने, आँखों में काली फ्रेम का चश्मा लगाए, हाथों को छाती पर बाँधे खड़ी है।

"हम और  सारी महिलाएंँ, महिला मुक्ति, अधिकार के लिए लड़ने वाली सोना दीदी के साथ हैं। देखते नहीं, किताब पढ़ती लड़की का चिंह है उनका।" अच्छेलाल की प्रश्न सूचक दृष्टि को उत्तर मिल गया था।

घर का बरामदा युद्धक्षेत्र बन गया, दो शत्रु आमने-सामने अपने अपने अस्त्र शस्त्रों से लैस खड़े हो गए। 
"यह लो, अब एक एक ओर अपना अपना सामान रखो।" दस साल के दीपू ने चॉक से बरामदे के बीचोंबीच लकीर खींच दी। 
"अम्माँ, आज  दोपहर बाद से कुछ खाया नहीं है भूख लगी है।" छोटी गोपी ने उमा का आँचल पकड़ लिया।

"बिटिया, कुछ दिनों की बात है धीरज रखो। ये जीत जाएंगी तो तुम खूब पढ़ोगी, नौकरी करोगी। हमारे जैसे चूल्हे में ना पड़ी रहोगी।" बेचारी बच्ची को यही समझ में आया कि आज अम्माँ ने हड़ताल कर दी है।
"अब दिनभर पार्टी का काम करें और शाम को तुम्हारा भाषण पचाएँ का?" अच्छे ने चौधरी जी के पोस्टर को किनारे रखते हुए उनकी घनी मूँछों को स्पर्श कर लिया था।
"अपनी पार्टी से कहो कि रात का भी खाना बाँध दे।" अपनी साथी महिलाओं की सूची बनाते हुए उमा बोली।

दोनों बच्चे दादी के कमरे में जाकर सो गए थे। आज रात आराम के खुर्राटों  की जगह, चार खाली पेटों के कुलबुलाहट घर की दीवारें सुन रहीं थीं।

भूखे भजन ना होय गोपाला और बस बच्चों ने माता-पिता से भी जल्दी राजनीति सीख ली। वो कभी मूँछ वाले चौधरी के पोस्टर की तारीफ करते तो कभी किताब पढ़ती लड़की के पोस्टर को सुंदर बताते। गिरगिट की तरह रंग बदलकर, दोनों खेमों से जलेबी समोसे और चाकलेट के पैसे वसूलने लगे। 

उमा की ज़ुबान पर सरस्वती के निवास होने की गारंटी थी और घर घर जाकर सोना दीदी के निशान पर मुहर लगाने के लिए महिलाओं को राजी करने के काम का प्रतिनिधित्व उसे मिला। अच्छेलाल भी दिलोजान से चौधरी जी की विरदावली गाते थे। 

औरतें तो खुली हवा में साँस लेते हुए, चुनावी खेमे से मिले सौ-पचास  रुपयों से मेकअप का सामान और घर की जरूरतें पूरी करतीं परंतु आदमियों की शाम देसी ठेके पर बीतने लगी। मुन्ना तो सेठ मुन्ना बन गया, दो अस्सिटेंट रख लिए थे उसने।‌ माधोपुर के घर घर में चुनावी पार्टियांँ,  मुन्ना के बने समोसे कचौड़ी की पार्टियांँ देती थीं। चुनाव का असली लुत्फ़ मुन्ना उठा रहा था।

"अम्माँ, टीचर ने प्रोजेक्ट के लिए चार्ट बनाने कहा है।" दीपू और गोपी, उमा के सामने पुस्तक लेकर खड़े थे।
"तुम्हारी टीचर अपना काम हमारे पर ढकेल देती है। जो बनाना है खुद बनाकर ले जाओ ना। लो दस रूपए और पीछा छोड़ो हमारा।" अपने पल्ले में बँधा दस का नोट बच्चों को देकर उमा ने अपना पल्ला झाड़ लिया।
दूकान में चार्ट पेपर तो मिला नहीं, हाँ चाकलेट जरूर मिल गई और दस के नोट को ठिकाना। 

"चौधरी जी का पोस्टर तो घर की छत पर लगेगा।" दीवार पर सोना दीदी का पोस्टर देख अच्छे ने मूँछ ऐंठते चौधरी जी का पोस्टर छत पर लगा दिया।
घर की दीवारें और छत तो  बैनर पोस्टरों से रंग गईं, परंतु घर के लोगों का दिल बेरंग हो गए। 

आए दिन अच्छे के घर का आँगन गुलज़ार होता। कार्ड्स, झंड़े, बैनर बनाने का काम इस बड़े खुले आंगन में खूब आराम से होता और दिनभर चाय-पानी की महफ़िल जमती। 
"हमारे घर के आंगन में कितने चुनावी कुकुरमुत्ते उग आएं हैं। " उमा ने शाम को घर में घुसते हुए कहा।
"हमारे देशभक्त, सेवा करने वाले चुनावी मित्र तुम्हें कुकुरमुत्ते लगते हैं। दिनभर मक्खियों की तरह भिनभिनाती तुम्हारी सहेलियों को देखा, घर घर घुसती हो।" अच्छे को अपने ही घर में अपने मित्रों की बेइज्जती हज़म नहीं हुई।

बच्चों की परीक्षाएं सिर पर थी और देश में चुनाव। अच्छे और उमा ने देशभक्ति का परिचय दिया और चुनाव पर केंद्रित हो गए।

"मैंने ‌तो आज भूगोल की पढ़ाई की है, परीक्षा में विज्ञान कैसे आ गया?" दीपू ने खड़े होकर टीचर से पूछा।
"तुम्हारा जो मन हो पढ़ आया करो, जिस दिन जो परीक्षा है वही होगी ना।" टीचर ने आँखें तरेरी।

स्कूल में भी चुनावी हवा ने कब्ज़ा कर रखा था। अँग्रेजी और गणित के टीचरों को तो स्कूल आने के पहले ही चुनावी खेमें उड़ा ले जाते। आखिरकार  अँग्रेजी में जयकार लगवाने से कोई पार्टी पीछे कैसे हटती? टीचरों की मजदूरी  रेट अलग था आखिर वे शिक्षा की मशाल जलाने वाले वर्ग थे। भाषा, सामाजिक अध्ययन के टीचर स्कूल संभाल रहे थे। चपरासी भी नज़रें बचाकर चुनावी पार्टियों की पार्टियों में  मुँह मार आते।

उमा, सोना दीदी के द्वारा दी साड़ी पहनकर सारे मुहल्ले उनका यशोगान करती फिरती और अच्छेलाल अपने किराएदारों से एडवांस लेकर सारे देशभक्त चुनावी मित्रों के खान-पान, बीड़ी सिगरेट के लिए फौरन अपनी जेब में हाथ डाल देते।

लाउड स्पीकरों  पर बजते देशभक्ति के गीत कब अपना रूप बदलकर, शीला की जवानी और चिकनी चमेली पर फिसलने लगते, पता ही नहीं चलता। 
अंतिम सप्ताह में तो उमा और अच्छे ने जी-जान झोंक दिया।

मतदान के दिन  सुबह स्नान ध्यान करके पति-पत्नी ने अपने अपने नेता के विजय की कामना की।  

"अम्माँ, इस बार हमारी परीक्षा के दिन भी हमको दही शक्कर नहीं खिलाया आपने, ना भगवान जी से हमारे लिए प्रार्थना की।"  दीपू और गोपी ने अपने पेपर खराब होने का कारण जान लिया था।
"तुम्हारे लिए तो कितना भी किया, कम ही रहेगा।" तमकती उमा अपनी सहेलियों के साथ बाहर निकल गई।

 दिनभर लोगों को रिक्शा, ऑटो रिक्शा में ले जाने वाले दल तैयार खड़े थे। घरों से निकलते लोगों को बाज की तरह झपटकर अपनी गाड़ियों में ठूँस कर ले जाते। 

रात अच्छेलाल और उमा के खर्राटों से लगा कि बेटी की विदाई के बाद की थकान निकाल रहें हैं।

चुनाव परिणामों और बच्चों के स्कूल के रिजल्ट का एक ही मुहूर्त हुआ।
 
 सियासी अंडों से निकले दोनों चूजे  राजनीति की कुकड़ू-कूँ करने चले।  सज धज कर उमा दोनों बच्चों को ले स्कूल चली और अच्छेलाल पार्टी के आफिस में लगे टेलीविजन पर, मित्रों  के साथ बैठकर घोषित होते परिणामों को पर थम साध रहे थे। 

"दुनिया देश की चिंता के बजाय अपने बच्चों की परीक्षाओं की चिंता कर लेते तो पास हो गए होते। ना किसी प्रोजेक्ट का काम, ना विषयों की मौखिक परीक्षाओं में आए और तो और किसी एक विषय में तो दूसरे विषय के उत्तर लिख गए। ऐसे  ही पेरेंट्स  स्कूल का नाम खराब करते हैं।" टीचर और हेडमास्टर ने एक उपेक्षा की दृष्टि डाली और पास हुए बच्चों के माता-पिता को बधाई देने लगे।

वासंती हवा की सरसराहट में,  बैसाख की गर्माहट महसूस होने लगी थी। मौसम ने मतदाताओं के बदलते तेवर को चख लिया था।‌

शाम को दोनों चुनावी पार्टी आफिस में ताला पड़ गया था। पचास रुपए रोज वाले मेंढ़क, आज पचीस रुपए में तीसरी विजेता पार्टी के जुलूस में टर्रा रहे थे। 

छत पर चौधरी जी मौसम की गर्म हवा से चारों खाने चित्त पड़े थे। दीवारों, आँगन,  बरामदे में कटे-फटे बैनर, पेपर के टुकड़े अच्छेलाल के दिल का हाल बयां कर रहे थे। 

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 12 मार्च 2024

होली में ग़ज़ल 22 22 22 22 22 22 22 2

होली पर विशेष ग़ज़ल 

22 22 22 22 22 22 22 2

आज चढ़ा है रंग नया इन मस्तानों की टोली में
भीग रहें हैं तन मन दोनों इस फागुन की होली में।।१।।

गलियाँ चौक मुहल्लों में ढ़ोल नगाड़े बजते ढम ढम
घर आँगन में फगुआ गूँजे देशज भाषा बोली में।।२।।

अम्माँ के हाथों की गुझियाँ थाली भर भर खत्म हुईं
भांग चढ़ा कर चाचा नाचे साड़ी बाँध ठिठोली में।।३।।

केसर घोल भरी पिचकारी कान्हा  डालें सखियन पर,
प्रेम मगन ताकें सब सखियांँ भीगी लहंगा चोली में ।।४।।

भूल गए सब बैर बुराई लोग मिलें दिल खोल सभी
चुटकी भर रंग लगाकर प्रीत बढ़ाएं हमजोली में।।५।।

वृंदावन की कुंज गलिन में कान्हा रास रचाता है,
सुध बुध बिसरातीं सब सखियांँ उसकी सूरत भोली में।।६।।

सीमा पर तैनात सिपाही होली  खूब मनाता है,
फाग सुनाई देता उसको सन सन चलती गोली में।।७।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

गुरुवार, 7 मार्च 2024

2122 2122 212

फ़िलबदीह क्रमांक _ 13
प्रथम चरण
क़ाफ़िया - ई की मात्रा
रदीफ़- थी मैं न थी 

2122  2122  212 


रात की दीवानगी थी मैं न थी
हर तरफ़ छाई खुशी थी मैं न थी।।१।।

गूँजती थी सब दिशाएं ढ़ोल से
मौज मस्ती हर गली थी मैं न थी।।२।।

प्रेम पाती ले भ्रमर फिरता रहा
प्रेम में डूबी कली थी मैं न थी।।३।।

गिर गए टेसू धरा की गोद में
प्रीत की चादर बिछी थी मैं न थी।।४।।

हट चुके थे बादलों के जाल जब
धूप नन्हीं तब खिली थी मैं न थी।। ५।।


गिरह का शेर-

 आशिकों का कल यहाँ था रतजगा
मयकदा था चाँदनी थी मैं न थी।।६।।


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शर्मिला चौहान