गुरुवार, 18 जनवरी 2024

ग़ज़ल 2122 2122 2122 212

आदरणीय अनिल सर के मार्गदर्शन के अनुसार संशोधित ग़ज़ल -

आप सभी के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास_

फ़िलबदीह क्रमांक-10
मिसरा-ए-तरह  
और फिर इक दिन इसी मिट्टी में मिट्टी मिल गई

शाइर/ शाइरा  - मुनव्वर राणा
क़ाफिया- ई की मात्रा
रदीफ़- मिल गई
वज़्न -2122  2122  2122 212


बचपने को जब घरों से सीख सच्ची मिल गई
देश गढ़ने के लिए मज़बूत मिट्टी मिल गई।।1।।

चल पड़े थे देश हित जो बाँधकर सर पर कफ़न
भारती की राह पर उनको शहीदी मिल गई।।2।।


धूप बारिश झेलकर हैं काम करते रात दिन
शाम को खुशियों मनाते आज रोटी मिल गई।।3।।

ढोल ढम ढम झाँझ झम झम गीत फगुआ गूँजता
राह के उस मोड़ पर मस्तों की टोली मिल गई।।4।।


छल कपट चालाकियों से उम्र भर परहेज था
हर कदम पर क्यों मगर दुनिया फरेबी मिल गई।।5।।

मिसरा-ए-तरह

रार थी तकरार थी था गर्व अपने आप पर
और फिर इक दिन इसी मिट्टी में मिट्टी मिल गई।।

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शर्मिला चौहान

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