गुरुवार, 4 जनवरी 2024

ग़ज़ल 212 212 212 212

नमस्कार दोस्तों 🙏
आज महीनों बाद ग़ज़ल कहने का प्रयास किया है। आप सभी के सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।

फ़िलबदीह क्रमांक- 9
मिसरा-ए-तरह _ 
संग उसके ये कितनी सरल सी लगे
क़ाफिया - अल
रदीफ़-  सी लगे

212  212  212  212

दूर से ज़िंदगी, बस तरल सी लगे
पास से जब चखो, वो गरल सी लगे।।1।।

चाँदनी में नहा, सेंकती धूप को
भोर की नवकिरण, तब धवल सी लगे।।2।।

फूल तितली नदी, बाग वन वाटिका
मुस्कुराती धरा, नित नवल सी लगे।।3।।

प्रेम भर चंग जब, डोर बाँधे उड़ी
चूमकर फिर गगन, वह चपल सी लगे।।4।।

कुछ लजाती खड़ी, ओढ़ चूनर बढ़ी
साँझ प्रिय से मिलन, को विकल सी लगे।।5।।

गिरह का शेर

ज़िंदगी गम कई राह मुश्किल बड़ी
संग‌ उसके ये कितनी सरल सी लगे ।।


शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

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