मंगलवार, 29 जनवरी 2019

अम्मांँजान

रेल्वे स्टेशन का चौक , शहर का भीड़ भरा इलाका , चौक के चारों तरफ हर प्रकार की दुकानें । मिठाई की , फल की , दवाईयों की , बिजली के सामान की , लाटरी टिकट की और सबसे ज्यादा चलने वाली बनारसी भैया की पान की दुकान ।

बनारसी भैया पान बेचते कम थे लोगों को मुफ्त गिलौरियां बांटने का शौक है उनको । चौक कभी शांत नहीं रहता । गाड़ी के यात्री , आने जाने वाले लोग , काम करने वाले लोग , कुली , सायकल और स्कूटर स्टैंड पर हमेशा ही भीड़भाड़ रहती है ।

शहर का सबसे महंगा क्षेत्र है । यहां एक दुकान होना भी बड़ी बात होती है । ऐसी जगह पर शांता बुआ की सात-आठ दुकानें और रहने के लिए घर भी है ।

चार-पांच दुकानें , एक बड़ी डिस्पेंसरी और दो दुकानों की जमीन पर रिहायशी दुमंजिला सादा घर है उनका ।

कान्यकुब्ज ब्राह्मण , शुद्ध शाकाहारी और अपने नाम के अनुरूप ही शांत , सीधी और सरल स्वभाव की है शांता बुआ ।

आज उनके दरवाजे पर , ताबूत में एक जनाजा रखा है । जनाजा उस औरत का ,  जिसने इस ब्राह्मण औरत के साथ , उसके दरवाजे पर रहकर सारी जिंदगी बीता दी ।

इस्लाम के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा है । नज़दीकी मस्जिद कमेटी को इतला कर दिया था ।

उनके शरीर को नहलाकर सफेद कपड़े में लपेटकर सब नमाज़ी प्रार्थना कर रहें हैं । मौलवी साहब के कहे शब्दों को दोहराया जा रहा है ।

आज दौड़ते- भागते रहने वाला स्टेशन चौक , मानो ठिठक गया है। छोटे बड़े दुकान वाले , व्यापारी लोग , बच्चे , बूढ़े सब हाथ में गुलाब का फूल लिए अपनी " अम्माँजान " को रुखसत कर रहे हैं ।

सभी ने आसमान की ओर देखकर मृतात्मा के लिए दुआ मांगी । अपने इतने बड़े परिवार के कांधों पर सवार होकर अम्माँजान ने दुनिया से रुखसत लिया ।

शांता बुआ और उनकी बेटी फफक-फफक कर रो रहे थे । अपनी सगी माँ के मरने पर भी शांता इतना नहीं रोई थी ।

सवा महीने का शोक तो खत्म हो जाएगा पर शांता के जीवन में अम्माँजान की कमी कभी पूरी नहीं होगी ।
अठारह - बीस की रही होगी शांता , तब पिताजी ने उसका ब्याह कर दिया था ।
धनी बाप की इकलौती संतान । दो-तीन शहरों में दुकानें और जमीन थी । गांव में पैतृक घर और खेती थी ।

शांता के पिताजी का नाम जगन्नाथ मिश्र था इसलिए स्टेशन के पास की इस चाॅल का नाम "  जगन्नाथ चाॅल " है ।
जगन्नाथ जी ने अपनी संपत्ति को संभालने के लिए बेटी शांता का हाथ  एक गरीब परंतु होनहार लड़के कन्हैया के हाथ में सौंप दिया ।

शांता , गाँव में रहने वाली लड़की , बड़े घराने की परंतु स्कूल का मुंह तक नहीं देखा था । कन्हैया की तो लाटरी लग गई । सुंदर , सुशील लड़की और पिताजी के पास मनमानी जायदाद संपत्ति ।

कन्हैया पास के ही एक छोटे शहर में शिक्षक था । शादी के बाद शांता  ,इसी जगन्नाथ चाॅल की दो दुकानों को मिला कर , दुमंजिला घर बनवाकर रहने लगी । इससे इस संपत्ति की देखभाल भी हो जाती थी और शहर की सुविधा भी मिल जाती थी ।

कन्हैया छुट्टी पर आता था और कभी कभी कुछ दिन साथ में रहकर जाता था । जगन्नाथ जी गांव के पैतृक घर में रहते थे और बीच-बीच में बेटी दामाद से मिलने आ जाते थे ।

पैसे के अभाव में रहने वाला कन्हैया , अब हजारों का लेन-देन सामने देखता था ।
" आप कहें तो मैं सरकारी नौकरी छोड़ देता हूं , मिलता ही कितना है ? आपकी दुकान और सब हिसाब किताब संभाल लूंगा ।" आखिरकार एक दिन उसने अपने मन की बात कही ।

" ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी । आज नहीं तो कल सब तुम दोनों का ही है ।" जगन्नाथ जी ने उत्तर दिया ।

शांता को बात पसंद नहीं आई कि उसका पति अपनी नौकरी छोड़ कर ससुर की संपत्ति अभी से संभाले ।

समय के साथ-साथ कन्हैया के व्यवहार में आए परिवर्तन को वह नजरअंदाज नहीं कर पा रही थी ।
उसनेे मंहगे कपड़ों और इत्र का शौक पाल लिया था ।
अक्सर दुकान से गायब रहता और मनमाने तरीके से पैसे खर्च करने लगा था ।

शादी के दो साल बीत गए और शांता अपने आप को बहुत अकेला महसूस करने लगी थी ।
पिताजी बीच-बीच में गांव से आकर हालचाल देख जाया करते थे ।
अनुभवी आंखों ने हिसाब-किताब की गड़बड़ी और बेटी के बुझे चेहरे को पढ़ लिया था । अब जगन्नाथ जी उम्र ,  समय की मार और काम के बोझ से थक गए थे।

अपनी बेटी के स्वभाव को वे अच्छे से जानते थे । गांव जाकर उन्होंने इस चाॅल , पैतृक सम्पत्ति की वसीयत बनवाकर वकील के पास रखवा दी ।

जब शादी के तीन साल हो गए और घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी तो जगन्नाथ जी व्याकुल हो उठे ।
अब उनका गांव से बाहर आना जाना कम होता जा रहा था और कन्हैया की मनमानी बढ़ती जा रही थी ।

दुकानदारों , किराएदारों पर रौब जमाता फिरता , घर में तो उसका मन बिल्कुल नहीं लगता था ।

अम्मांजान के मृत शरीर को देखते ही शांता को अपने पिताजी के अंतिम दर्शन की याद आ गई थी । 
पिताजी ने गांव के घर में अंतिम सांस ली थी । खबर मिलते ही शांता एक किरायेदार को साथ लेकर चली गई थी क्योंकि कन्हैया का कुछ पता नहीं था ।

दो दिन बाद कन्हैया आया और वकील के वसीयत पढ़ने पर बहुत हंगामा किया ।
वसीयत में जगन्नाथ जी ने सारी चल-अचल संपत्ति, शांता और उसके होने वाले बच्चों के नाम किया था ।

पिताजी की इच्छानुसार उनकी अस्थियों को इलाहाबाद में प्रवाहित करना था ।
कन्हैया अपने दो दोस्तों को लेकर गया । बाद में पता चला कि उसने अस्थियां पास ही की किसी नदी में बहा दिया और इलाहाबाद का खर्च शांता से ले लिया ।

तेरह दिन गांव में रहकर , पिताजी के सब क्रियाकर्म करने के बाद शांता वापस इस घर में आ गई ।
अब इतनी जायदाद संभालना उसे भारी लगता था । किराएदार बहुत ईमानदार थे और बिना बोले समय पर पैसे दे देते थे ।

अपनी दुकान भी किराए पर दे देनी पड़ी क्योंकि कन्हैया गांव के घर में आराम से रहता था । कभी कभी जब आता तो किराएदारों से अग्रिम किराया वसूल कर चला जाता ।

एक रात बारिश हो रही थी और शांता अकेली थी । स्टेशन से रेलगाड़ी की सीटी सुनाई दी।
शायद पैसेंजर ट्रेन है यही समय है उसका । रेलवे के टाइम टेबल का पक्का अंदाज है उसको ।

इस बात को आधे घंटे बीते होंगे और दरवाजे पर दस्तक हुई । उसने सोचा कि बारिश के जोर से गिरने की वजह से आभास हो रहा है ।

कुछ क्षणों के बाद जोरों से थाप  हुई तब शांता का दिल जोरों से धड़कने लगा । कौन होगा इतनी रात को ?
दरवाजे पर कान लगाकर सुनने की कोशिश की ।
फिर जोर से पूछा _ " कौन है ? इस वक्त दरवाजा क्यों पीट रहे हो ? "

कहीं कन्हैया तो नहीं आया ? वह भी किसी भी समय आता जाता
है ।
कोई ठीक ठिकाना नहीं है उसका।
" मैं हूँ एक अभागन , जरूरतमंद । मदद करो । अल्लाह तुम पर करम करेगा ।" एक औरत की भरभराई हुई सी आवाज आई ।

" नहीं नहीं , इतनी रात गए मैं कोई मदद नहीं कर सकती। । तुम कल सुबह आना । " कहते हुए शांता अंदर के कमरे में आ गई ।

सुबह लोगों की आवाजों से उसकी नींद टूटी। हाॅटल में काम करने वालों की आवाजें , बरतनों की आवाज गाड़ियों की आवाज और सायकल स्टैंड पर भीड़ की आवाज  , ये रोजमर्रा की जिंदगी की सुबह का स्वागत है ।

उसने हाथ मुंह धोकर सामने का दरवाजा खोला तो सामने देखकर उसके पैरों की जमीन खिसक गई ।  सीढ़ियों पर एक औरत बेहोश पड़ी थी और आने जाने वाले लोग उसे रुक रुककर देख रहे थे । इस औरत को कभी आसपास देखा नहीं था ।

चालीस-पैंतालीस के बीच की होगी , सांवला रंग , थोड़ा मर्दाना चेहरा  , कठोर बनावट , कमर तक का ब्लाउज़ , लंबी आस्तीन , घेरदार लहंगा ( जिस पर जगह जगह पैबंद लगे थे ) और नाक में बड़ी सी नमूने दार लौंग थी ।
एक हाथ में काला धागा बांधी थी और कमर में बटुआ खोंस रखी थी । सूती का पुराना दुपट्टा लपेटे हुए थी । पास ही कपड़ों की एक गठरी पड़ी थी ।

एक बार देखने में उसका व्यक्तित्व थोड़ा कठोर और डरावना लगता था । सब सोच रहे थे कि यह कौन है ? कहां से आई है और यहां कैसे पड़ी है ?

" जा रे छोटू , दौड़कर जा । डाक्टर  साहब को बुला ला । वे तो आए नहीं होंगे तो कोई कम्पांडर या नर्स को ही ले आना । " शांता ने हाॅटल में काम करने वाले एक लड़के को बोला ।

" दीदी , इतनी सुबह कोई नहीं आता अस्पताल में , बंद होगा । " अलसाते छोटू ने कहा ।
" अरे.. कोई ना कोई जरुर होगा । तू जा तो सही । अस्पताल बंद नहीं रहता ।" शांता ने जरा डाँटकर कहा ।

थोड़ी ही देर बाद कंपाउंडर हाथ में दवाई की पेटी लिए आ गया ।नब्ज देखी और एक गोली पानी में मिलाकर मुंह में डाल दी ।

दो-तीन  मिनट बाद उसने अपनी आंखें खोली । अपने चारों तरफ लोगों को देखकर घबरा गई । उठकर बैठ गई और सिर पर से दुपट्टा ढांक लिया ।

" कमजोरी , भूख और थकान के कारण बेहोश हो गई थी । थोड़ा कुछ खाने के बाद ये दवा दे देना । " कहते हुए कंपाउंडर ने विष्णु के हाथ में एक पुड़िया पकड़ा दी ।

शांता ने दो रुपए उसके हाथ में धर दिए और उस औरत के खाने के बारे में सोच रही थी कि हाॅटलवाले लड़के ने गरम दूध के साथ डबलरोटी ला दिया ।

उसने चुपचाप खाना शुरू कर दिया और देखते ही देखते आधा पैकेट खत्म कर दिया । बची को अपनी गठरी में संभालकर रख लिया ।
उदरज्वाला से क्षुब्ध मन को मानो सुकून मिला । भविष्य की चिंता ने बची डबलरोटी को सहेजकर रखने पर विवश कर दिया ।

धीरे धीरे भीड़ छंट गई और लोग अपने कामों में लग गए । शांता भी अंदर आई , स्टोव पर चाय रखा और दूसरे कामों में लग गई ।

चाय की प्याली हाथ में लेकर जब बरामदे में आई तो उस औरत ने कहा _ " थोड़ी चाय मुझे भी दे दे बेटा । दूध से कहीं चाय की तलब जाती है भला ।"

शांता ने पूछा _ " नाम क्या है तुम्हारा ? "

" नाम  उनके होते हैं जिनके सिर पर अम्मी-अब्बा का साया होता है। यतीमों के कभी नाम नहीं हुआ करते ।" गला साफ करके कर्कश , भारी आवाज में आगे बोली _ " वैसे लखनऊ में लोग मुझे 'नज़मा ' बुलाते थे ।"

" मुसलमान हो ?" शांता ने भौंहें चढ़ाकर कहा ।
" मजहब तो इंसान बनाता है बेटा । मैं तो मुसीबत की मारी एक जनानी हूँ । " उसने स्वर को नम्र बनाकर दुःखी होकर कहा ।

सचमुच जब पेट भरा हो तब धर्म , जाति , ऊंच- नीच , अमीर - गरीब की बातें आती हैं । खाली पेट तो सिर्फ रोटी और उसके दाता को अपना भगवान मानता है । दुनिया की सारी दार्शनिकता रोटी के टूकडों में सिमटकर रह जाती है ।

ना जाने क्या सोचकर शांता ने पुराने टूटे से प्याले में उसके सामने चाय धर दी _ " चाय पीकर प्याला फेंक देना । " कहते हुए दरवाजा बंद कर लिया ।

नहा-धोकर खाना बनाया । रोज की तरह भगवान जी की पूजा की और घंटी बजाई । उसके कानों में भजन के स्वर आ रहे थे । ध्यान दिया तो कृष्ण जी का प्रसिद्ध बाल रूप वाला भजन _
  " धूरि भरे अति शोभित स्यामजू ,
तैसेइ बनी सिर सुंदर चोटी ।
खेलत खात फिरै अंगना ,
पग पैंजन बांधत पीरी कछोटी ।"

दरवाजा खोलकर देखा तो वो  भजन गाते हुए अपने बाल सुखा रही थी ।
" तुम गई नहीं अब तक ? " शांता कठोर स्वर में बोली ।

" कहां जाऊंगी बेटा , खुदा ने तेरे दर पर पटक दिया है तो आसरा दे दे । तेरे पर बोझ नहीं बनूंगी । अल्लाह ने तेरे दरवाजे पर जिंदगी लिखी है शायद  । " उसने कातर स्वर में कहा ।

" अरे... मैं कैसे रख सकती हूँ तुमको ?ना जान -ना पहचान , मैं तेरी मेहमान । नहीं नहीं , तुम कोई और ठिकाना देखो । " चिढ़ते हुए शांता बोली ।

" ठौर - ठिकाना तो खुदा बख्शता है , नहीं तो सारा जहां छोड़कर तेरे दरवाजे पर क्यों पटकता ? पक्की मुसलमान हूं , नेकनीयत, खुदा से डरने वाली । तेरा धर्म कभी नहीं बिगाडूंगी । " अपना दुपट्टा फैलाकर उसने भीख मांगते हुए कहा _ " सारी जिंदगी इस चौखट के बाहर गुज़ार लूंगी पर उसको पार करने की जुर्रत कभी ना करुंगी ।"

आसपास के दुकान वाले , होटल वाले भी आकर सुन रहे थे ।
कोई बोला _ " रहने दो दीदी , यहीं  पड़ी रहेगी । आपके किसी काम ही आएगी । रही खाने- पीने की बात वो कोई ना कोई होटल वाला , कुछ ना कुछ दे ही देगा ।"

वह सहसा गुर्राई _ " नहीं ... नहीं।
हराम का नहीं खाऊंगी । काम धंधा करके पेट भरुंगी । " शांता की ओर मुखातिब होकर बोली _ " तेरे घर का भी नहीं खाऊंगी मुफ्त में । कीमत अदा करके ही खाऊंगी । ये देख , मैंने चाय के पैसे रख दिए हैं । " और उसने चौखट पर रखी चवन्नी की ओर इशारा किया ।

इस प्रकार , एक अनजानी , अनचाही , अपरिचित औरत कब स्टेशन चौक की  " अम्मांजान " बन गई  , पता ही नहीं चला ।

सामने की उस थोड़ी सी जगह में  , सीढ़ी और सड़क के बीच की , उसने अपना बसेरा बना लिया ।

बारिश का मौसम था किसी ने बांस दिया , किसी ने तारपोलिन ला दिया शांता ने घर में पड़ी रस्सी दे दी । देखते ही देखते एक छोटी सी झोपड़ी तैयार हो गई ।

झोपड़ी क्या थी , बस्सस..सिर छुपाने के लिए एक छोटी सी जगह थी । एक गठरी , एक-दो बरतन , मटका और ओढ़ने बिछाने की चादर बस यही गृहस्थी थी उसकी ।

होटल वाले ने एक पुराना खस का दरवाजा दे दिया, जब वह सोती तो दरवाजा टिका दिया करती थी ।

पांच वक्त की नमाज़ी थी । स्टेशन पर लोगों का सामान उठाती थी । जो पैसे मिलते उसका थोड़ा सा भाग मिट्टी के गुल्लक में जमा किया करती थी ।

धीरे धीरे सब दुकानदार , काम करने वाले बच्चे , सायकिल स्टैंड पर आने जाने वाले और पान खाने वाले , उसको पहचानने लगे।

जुबान की बहुत मीठी थी , कर्कश आवाज में दिल का अपनापन डाल दिया करती थी । काम करने वाले बच्चों को कभी पिपरमेंट की गोलियां बांटती तो कभी बिस्कुट ।

एक दिन कन्हैया घर आया और सामने झोपड़ी देखकर तमतमा गया ।
" अबे , ये किसने बनाई , किससे पूछ कर बनाई ? हिम्मत बहुत बढ़ गई है क्या? " उसने जोर से पूछा।

" मैंने ही बोला था कि बना लो । एक बेबस औरत , बेसहारा भटक रही थी तो उसके गिड़गिड़ाने पर मुझे दया आ गई ।" शांता ने डरते हुए कहा ।

" अच्छा ! बड़ी दाता - दानी बन गई हो । एक दिन तुमको ही ठिकाने पर लगा कर निकल जाएगी ।" कन्हैया ने मुंह बिचकाकर कहा ।

"सभी तो स्वार्थी हैं इस दुनिया में , ठिकाने तो कोई भी कभी भी लगा सकता है ।" सपाट स्वर में शांता बोली ।
उन दो-तीन दिनों अम्मांजान ने शांता से कुछ बातें नहीं की ना ही चाय के लिए रूकती थी ।
कन्हैया को आते जाते , सिर पर दुपट्टा डाल कर सलाम करती थी।

कन्हैया को बीस हजार रूपए चाहिए थे और शांता को इतने रूपए बैंक से अकारण निकालने का बिल्कुल मन नहीं था । चुनाव आ रहे थे और पार्टियों को खर्चा देना कन्हैया ने अपनी शान मान लिया था । अंततः वह पैसे निकाल कर ले गया ।

कहते हैं कि सूर्य अपने रथ पर सवार होकर विचरण करते हैं । शांता को लगता कि उनकी गति दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है ।
कब सुबह होती और रात के साथ समय का पहिया आगे बढ़ जाता है ।

शांता की बच्चे की चाहत अब मायूसी में बदलती जा रही थी ।
अम्मांजान भली-भांति  उसके दिल का हाल पढ़ लेती थी ।

कभी किसी मजार पर चादर चढाती , तो कभी किसी मौलवी से ताबीज ले आती । कभी किसी मंदिर में प्रसाद चढ़वाती तो कभी किसी पेड़ पर धागा बांध आती ।

जन्माष्टमी का समय पास था । स्टेशन चौक और आसपास को बहुत सजाया गया था । दो किलोमीटर पर प्रसिद्ध "राधाकृष्ण मंदिर " है , जहां  कृष्ण जन्मोत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।

सप्ताह भर कृष्ण लीला होती है और जन्म के अगले दिन दही -हांडी की धूम मची रहती है ।

स्टेशन चौक , रंग बिरंगी कागज की झंडियों , बिजली के लट्टूओं और फूलों से सजाया जाता है ।

जन्माष्टमी के दिन शांता ने व्रत किया । चाय बनाकर अम्मांजान को दी तो वो बोली _ " आज तो रात बारह के बाद ही कुछ खाऊंगी , पियूंगी । आज तो नंदलाला की पैदाइश का दिन है ।"

चाय की तलबी , अम्मांजान का कृष्ण प्रेम , रसखान के अनन्य भाव की झलक दिखाता था ।

संध्या समय अपने घर पर झूला सजाकर , लड्डू गोपाल को बिठाकर वह मंदिर जाने की तैयारी करने लगी ।
मंदिर में भजन कीर्तन में कब बारह बजते हैं पता नहीं चलता ।

उसकी तैयारी देख अम्मांजान बड़बड़ाने लगी _ " अपने घर ही रात भगवान का जन्म कर बेटा । वही मंदिर में है वही तेरे घर पर है। अपने घर जन्म करेगी तो अगले बरस सांवला सरकार तेरी गोद में खेलेगा ।"

ना जाने क्या जादू था उसकी बातों में कि शांता ने घर पर ही कृष्ण जन्म करने का मन बना लिया । जब वो फूलों की माला गूंथ रही थी तब अम्मांजान अपनी कड़क आवाज में कृष्ण भजन गा रही थी ।

मध्यरात्रि जब " कृष्ण कन्हैया लाल की जय " , "हाथी घोड़ा पालकी , जय कन्हैया लाल की" का जयघोष गूंज रहा था तब अम्मांजान गोल-गोल घूमकर  , दुपट्टा लहराकर गा रही थी _

" नटवर नागर नंदा ,भजो रे मन गोविन्दा ।
श्यामसुंदर मुख चंदा , भजो रे मन गोविन्दा ।"
इतना भावविभोर होकर नाच रही थी कि तन की सुध नहीं थी । बाद में प्रसाद खाकर आराम से सो गई।

शांता ने अपने पिता से सुना था कि आस्था का दूसरा नाम ईश्वर हैं और उसपर किसी भी प्रकार का कोई बंधन नहीं होता । आज आंखों के सामने साक्षात हुआ ।

अम्मांजान के विश्वास और शांता के धैर्य की जीत हुई , अगली जन्माष्टमी के पहले ही गोल-मटोल  प्यारा मुन्ना झूला झूलने लगा ।
अब वारिस आ जाने से कन्हैया भी बहुत खुश था क्योंकि उसी के सहारे उसकी नैया पार लगने वाली थी ।

दाई , कामवाली बाई ,  मालिश वाली सब ढूंढ लाई थी अम्मांजान। उनकी नसीहतों का सिलसिला चालू रहने लगा था ।
मुन्ने को वो " माधव " पुकारती थी।
एक दिन गुल्लक तोड़ दिया और जमा पैसों से चांदी की करधनी ले आई । अपने हाथों से माधव को पहनाकर मानो हजयात्रा का सुख प्राप्त करती थी ।

"इतना प्रेम कहां से आया इस कठोर शख्सियत में ? आज के जमाने में भी कोई इतना नि:स्वार्थ प्रेम कर सकता है ? " शांता सोच में पड़ जाती थी ।

  माधव में मानो जान बसती थी उनकी । तेल लगाकर धूप में बैठकर उसको गाने , भजन सुनाती । उन्हीं की गोद में सोता था रोज । जब नींद गहरी हो जाती थी तब उसे झूले पर डलवा कर काम पर जाती थी ।

काम में भी मन नहीं लगता था । दो-तीन घंटे में आ जाती ।

समय बीतता गया और एक बेटी को शांता ने जन्म दिया।
"  माधव की बहन तो सुभद्रा ही रहेगी । " अम्मांजान ने कहा और सचमुच सब बच्ची को सुभद्रा बुलाने  लगे ।

कन्हैया अब कई कई दिन घर आता नहीं था । वह हमेशा माधव को अपने साथ गांव ले जाने के लिए झगड़ा करता था ।
अंत में शांता ने वकील से बच्चे को अपने साथ रखने का अधिकार , न्यायालय से ले लिया।
कन्हैया जमीनों को एक के बाद एक करके बेच रहा था।

जब भी आता जमीन के किसी टुकडे़ के कागजात पर शांता के दस्तखत करवा लेता । शराब और जुए की लत लग चुकी थी ।

शांता ने अम्मांजान की मदद से दोनों बच्चों को बड़ा किया । मैट्रिक की परीक्षा में अच्छे अंक लाने के बाद माधव को दूसरे शहर के महाविद्यालय में भेज दिया। छात्रावास में रहता और डेढ़-दो माह में घर आता था ।

अम्मांजान भी अब सामान ढोने का काम नहीं कर पाती थी । शांता ने उनके लिए एक छोटी सी पानठेलेनुमा दुकान डाल दी थी । चाकलेट , गोली , बिस्कुट , चूरन और छोटे छोटे खिलौने बेचती थी । सुभद्रा को स्कूल से लाने ले जाने का काम वो बड़ी शिद्दत से करती थी ।

अब सुभद्रा कालेज में आ गई और अम्मांजान ने शांता को सलाह दी _ " बिटिया सयानी हो रही है । अपनी बिरादरी में बात चलाओ । शादी की बात में बखत  लग ही जाता है । " शांता भी वही चाहती थी ।

माधव भी उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाने की बात कहता था अत: शांता ने दुकान में से कुछ बेच दी और खेत का बड़ा हिस्सा भी निकाल दिया ताकि माधव अपनी शिक्षा पूरी कर सके ।

माधव के अमेरिका जाने की तैयारियां शुरू हो गई और अम्मांजान ने उसको घरेलू नुस्खे और उपचार लिखवा दिए । जाते समय उसकी बांह पर ताबीज बांध दी और कृष्ण जी की छोटी सी मूर्ति सूटकेस में रखवा दी ।

माधव के जाने के बाद वो बहुत उदास रहने लगीं थीं और बातें भी कम करती थी ।
शांता ने कई बार पूछने की कोशिश की कि क्या कोई सगा संबंधी , रिश्तेदार हैं जिनसे मिलने का मन हो ।

सिर झटककर हंसकर कहती _" मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई ।" फिर गठरी खोल कर माधव की एक फोटो निकाल कर कहती  _" ये ही मेरा गोपाल है । जब इस दुनिया से रुखसत होऊंगी तब मेरी कब्र में इससे तीन दफा मिट्टी डलवा देना , मेरी रूह को सुकून आ जाएगा ।"

बाहर की सरदी , बारिश की हवाओं और गर्मी की तपिश से उनका शरीर थक गया था । दबी जुबान में शांता ने कई  बार बरामदे में आकर सोने को कहा , तो वह सीधे मना कर देती ।

एक खुद्दार औरत , परिस्थितियों को झेलकर भी खुशमिजाज, जिंदगी से भरी , प्रेम से लबालब , शरीफ , नेक,  ईमानदार और जुबान की पक्की ।

धर्म और जाति, मजहब और पंथ से ऊपर की सोच रखने वाली अम्मांजान ने शांता के घर की देहरी कभी नहीं लांघी, परंतु सैकड़ों लोगों के दिलों के दरवाज़े पार कर गई ।

आज स्टेशन चौक के चिरपरिचित चेहरे गमगीन थे मानो उनका कोई सगा मर गया हो ।

अब शांता को इंतजार था माधव का । अम्मांजान की रुह,  कब्र में उसकी हाथों की मिट्टी का इंतजार कर रही है ।

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