सोमवार, 21 जनवरी 2019

पालनाघर

" नहीं... मुझे नहीं खाना है कुछ...। " जोर जोर से रोते हुए ध्रुव ने जिद ठान ली ।

" क्यों नहीं खाना ? भूखे सोओगे क्या ? " शिखा ने भी जोर की आवाज में पूछा ।

" आप पहले कहानी बताओ , तभी खाऊंगा । " गुस्से से पैर पटकते हुए ध्रुव बोला ।

शिखा ने आव देखा ना ताव , एक चांटा उसके गाल पर जड़ दिया । नन्हा सा बच्चा एक क्षण के लिए सहम गया , फिर जोर जोर से रो-रोकर घर सिर पर उठा लिया ।

दूसरे कमरे से तपन तेजी से बाहर आया और ध्रुव को गोद में उठा लिया ।
" क्या हुआ बेटा , मत रोओ । मैं आज तुम्हें कम्प्यूटर पर नया गेम सिखाता हूं । चलो , हम खेलेंगे । " कहते हुए तपन ध्रुव को लेकर अपने स्टडी रूम में चला गया ।

थोड़ी देर बाद ध्रुव के रोने की आवाज बंद हो गई ।

     इंदौर का यह एक छोटा सा परिवार है ‌। तपन और शिखा  , दोनों काम पर जाते हैं ।
ध्रुव को इस साल किंडरगार्टन में डाला है । सुबह नौ बजे तपन उसको स्कूल छोड़कर आफिस चला जाता है ।
दोपहर को स्कूल बस उसे पालनाघर छोड़ देती है । दिनभर ध्रुव वहां रहता है । शाम को शिखा उसे लेती हुई घर आती है ।

यह दिनचर्या करीब तीन महीने से है और ध्रुव इस बीच बहुत जिद्दी , चिड़चिड़ा और कमजोर हो गया है ।
" कितना मुश्किल है छोटे बच्चों को संभालते हुए नौकरी करना ।  घर -गृहस्थी के साथ नौकरी की जिम्मेदारी कठिन है बहुत । "  मन ही मन शिखा ने सोचा ।

" ध्रुव तो छोटा बच्चा है , आजकल मुझे कितना गुस्सा आता है कि उस पर हाथ उठा देती हूं । बच्चा ज़िद करेगा तो क्या मैं ऐसे ही मारूंगी ? " माँ का मन मोम की तरह पिघल कर आँखों से बहने लगा ।

शिखा ने तुरंत उठकर दूध गर्म किया । बहुत सारा बोर्नविटा मिलाकर , चम्मच से घोलती हुई  ध्रुव के पास गई तो देखा ध्रुव कुर्सी पर सो गया है । तपन लेपटॉप पर अपने काम में मशगूल हैं ।

दूध का गिलास रखकर ध्रुव को गोद में उठा कर अपने कमरे में आ गई । ध्रुव के काले-घुंघराले बालों में अंगुलियां  फेरने लगी ‌।
कोमल , सफेद गाल पर उसकी अंगुलियों के निशान उभर आए थे। आंखों से बरसता आंसू अब उनपर मरहम का काम कर रहा है।
" कितनी मुश्किलों का है यह जीवन ? " अपनी तकलीफ शिखा को एवरेस्ट की तरह दुस्साध्य लग रही थी ।

शिखा के मायके में भी कोई नहीं है कि कुछ मदद ले सके । मम्मी तो सालों पहले चल बसी थी और दो साल पहले पापा भी नहीं रहे ।

भैया भाभी का अपना परिवार है , वैसे भी कोई कितने दिन रह सकता है ।
तभी तपन बाजू में आकर बैठ गया । वह एकटक शिखा की तरफ देखने लगा ।
" अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है शिखा । अम्मां से माफी मांग लो , ले आते हैं उन्हें। ध्रुव की देखभाल बहुत अच्छी तरह करेंगी वो । तुम उनको लाना क्यों नहीं चाहती ? "  तपन ने सुझाव दिया ।

डबडबाई आंखों से शिखा ने तपन की ओर देखा _ " मैं नहीं लाना चाहती हूं या वो आना नहीं चाहती हैं । उन्हें यहां रहना पसन्द ही नहीं है । मेरा कोई भी काम उन्हें अच्छा नहीं लगता । " उसने कहा ।

तपन ने समझाते हुए कहा _ " ऐसी बात नहीं है शिखा । अम्मां शुरू से ही तेज स्वभाव की हैं । दिल से तो वो सबको बहुत प्यार करती है । "

तमककर शिखा बोली _ " कितना प्यार है , मुझे मत समझाओ । भूल गए कि दीवाली के त्यौहार पर , क्या बखेड़ा कर दिया था  ? "  तपन भी उसी घटना के बारे में सोच रहा था जब अम्मां को गांव से लाए थे , साथ दीवाली मनाने के लिए ।

नमकीन , मठरी और गुझिया अम्मां के साथ मिलकर शिखा ने बनाया , पर जब अम्मां ने कहा _ " बहू , बेसन की बर्फी बना लेना , उसी का भोग लगाएंगे । "

शिखा ने कहा _ " मांजी , मुझे बर्फी बनाना नहीं आता । जरूरी हो तो होटल से लाकर भोग लगा देंगे । "

बस्स... इतना सुनना था और अम्मां बरस पड़ी _" क्या आता है तुम्हें ? कोई चीज बनाती हो खुद से । बाहर से मंगवा लोगी , बड़ा घमंड है अपनी नौकरी और पैसों का । "

बीच बचाव करते हुए तपन ने कहा _ " अम्मां , उसको नहीं आता तो तुम ही सिखा दो । उसकी मां बचपन में चल बसी , कौन सिखाता उसको ? बोलो तो बाहर से ले आऊंगा । "  त्यौहार के माहौल को देखते हुए तपन ने कहा ।

" एक तो इसे किसी भी काम का शऊर नहीं है और ऊपर से तू इसका पक्ष ले रहा है ।" गुस्से से तमककर अम्मां ने कहा ।

दूर खड़ी शिखा ने भी तल्खी से उत्तर दिया _ " बर्फी बना  नहीं सकती , परंतु आपको जिंदगी भर खिला सकती हूँ । कमाती हूँ वो भी तपन से ज्यादा ।"

अभी दीपावली के लिए दो दिन बाकी थे परंतु इस घर के हर कोने में फटाके फूटने लगे । दिमागों में फुलझडियाँ उड़ने लगी ।

जब लोगों के घरों में लट्टूओं की रंगीन जगमगाहट थी , तब हमारा घर आंसुओं के सैलाब में डूबा था।

आनन फानन में अम्मां ने सामान बांध लिया और घर से निकल पड़ी । तपन ने बहुत कोशिश की पर वो नहीं मानी ।
स्टेशन में चार घंटे के इंतजार के बाद रेलगाड़ी आई और बिना आरक्षण के बहुत तकलीफ से वो गए । तपन की वह दीवाली , आने जाने में ही निकल गई ।

सहसा..ध्रुव के कराहने से तपन और शिखा की तंद्रा टूट गई ।
"  ध्रुव बेटा .. उठो । बोर्नविटा वाला दूध है , पी लो । बहुत सारा बोर्नविटा डाला है मम्मी ने । उठो ..। " कहते हुए शिखा ने ध्रुव के शरीर पर से हाथ फेरा तो वह करवट बदल कर फिर से सो गया।

दीर्घ श्वास लेकर शिखा ध्रुव को बगल में चिपटा कर सो गई । सोच रही थी कि शायद पालनाघर बच्चे को पसन्द नहीं आ रहा है ।

शिखा की एक सहेली की बेटी भी पालनाघर में ही रहती है और वो हमेशा उस पालनाघर की बहुत तारीफ करती है । कल ही उससे पता करने का विचार करते हुए शिखा को नींद आ गई ।

दूसरे दिन सहेली ने बताया _ " मेरी बेटी चार साल से पालनाघर में रहती है ।  "नानी - दादी पालनाघर " में बहुत खुश रहती है । अब तो वह आठ साल की हो गई ।"

" नानी - दादी पालनाघर"  का नाम सुना था कि बच्चों, की घर के समान देखभाल होती है ।

दूसरे दिन शिखा ने छुट्टी का आवेदन दे दिया और शाम को ध्रुव को लेकर घर आ गई ।
ध्रुव को गोद में बैठाकर बोली _ " बेटा , कल तुमको एक अच्छी जगह घुमाने ले जाऊंगी । तुम्हें वहां अच्छा लगेगा तो फिर स्कूल से वापस आकर तुम वहीं रहा करना। ‌" मासूम बच्चे को बात ज्यादा समझ में आई नहीं ।

दूसरे दिन दोपहर को आटो रिक्शा से शिखा पालनाघर पहुंची । गेट पर चौकीदार ने पूछताछ की और रजिस्टर में नाम दर्ज किया ।

अंदर का नजारा एकदम अलग सा था । एक अलग दुनिया , जो शहर के शोर-गुल से दूर गांव जैसा वातावरण देती है ।

बड़े-बडे़ नीम और आम के पेड़ , फूस की झोपड़ी नुमा पक्के घर थे । पेड़ों पर रस्सी के झूले बंधे थे और कुछ बच्चे झूल रहे थे । एक दो बुजुर्ग महिलाऐं उनका ध्यान रख रहीं थीं ।

एक बड़े से बाड़ में कुछ रंग-बिरंगी चिड़िया रखीं थीं । कुछ बच्चे मिट्टी के बर्तन बना रहे थे तो कुछ सूखे बर्तन में रंग कर रहे थे ।

सब बच्चे किसी ना किसी काम में लगे हुए थे । कुछ खाटें बिछी हुई थी और एक पर ऊंची कद-काठी की , गोरी महिला बैठी थी । पांच-सात बच्चे उसको घेरे हुए थे ।

पास ही एक महिला पौधों में पानी डाल रही थी । शिखा ने उनसे पूछा_ " मुझे पालनाघर की मालकिन से मिलना है ।"
" चलती जाओ ,जो बच्चों से घिरी बैठी है , कहानी सुना रही है , वही मालकिन हैं ।" महिला ने अंगुली उस दिशा में दिखाकर कहा ।

साठ-सत्तर के आसपास की बहुत महिलाऐं दिखाई दे रही थी जिन्हें बच्चे नानी या दादी पुकार रहे थे ।
चारपाई पर बैठी महिला भी पैंसठ सत्तर की होगी । वो बच्चों को राक्षस और परी की कहानी बता रही थी और बच्चे तल्लीनता से सुन रहे थे ।

एक बच्चा गोद में बैठा था और बाकी चारपाई तथा जमीन पर ।
महिला के कहानी सुनाने का ढंग लाजवाब था और शिखा को अपना बचपन याद आ गया ।

बचपन में जब मम्मी के साथ , गर्मियों की छुट्टी में नानी के घर जाती थी तब रात को नानी ऐसे ही चारपाई पर बैठ कर कहानी सुनाती थी ।
मौसी और मामा के बच्चों के साथ बडा मजा आता था । आज के बच्चे तो उस सुख से भी वंचित रह जाते हैं ।ध्रुव के सिर पर हाथ फेरने लगी तो वह कबका हाथ छुड़ा कर चारपाई के पास खड़े होकर कहानी का मजा ले रहा था।

एक नए बच्चे को देखकर , कहानी वाली महिला ने नजर घुमाकर देखा ।

दबंग व्यक्तित्व , अनुभवी पैनी आंखें , गोल-मटोल काया , सुनहरे किनारे वाली सफेद सूती साड़ी , बड़ी लाल बिंदी और हाथों में सोने की एक-एक चूड़ी ।

शिखा ने हाथ जोड़कर अभिवादन किया ।

" आओ आओ , खड़ी क्यों हो ? बेटा तो आकर बैठ भी गया । " मुस्कुराते हुए शिखा का स्वागत किया ।
" आपका नाम क्या है? " ना जाने क्यों शिखा ने पूछ लिया ।

" क्यों , " कहानी वाली नानी " पसंद नहीं आया क्या ? " ठहाका मारकर उन्होंने कहा । शिखा झेंप गई ।

" ये मेरा बेटा ध्रुव है , चार साल का है । मैं और मेरे पति दोनों काम पर जाते हैं । स्कूल के बाद इसे दिनभर पालनाघर में रखते हैं। ‌" शिखा ने लंबी सांस भरकर आगे बताया _" तीन महीने हो गए परंतु ये बहुत रोता है , जिद करता है और कमजोर भी होता जा रहा है । समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें । आपके पालनाघर की बड़ी तारीफ सुनी थी मैंने इसलिए आज इसे लेकर आई हूं ।" शिखा ने सब कुछ साफ शब्दों में कह दिया ।

ध्रुव को देखा तो बच्चों के साथ रेत में किला बना रहा था । एक महिला उनको किले की जानकारी दे रही थी , राजाओं के नाम बता रही थी ।

कहानी वाली नानी ने कहा _ " हमारा तो काम ही है बच्चों की देखभाल करना , उनको घर का सा वातावरण देना और अच्छी बातें सिखाना । कुछ बच्चे स्कूल जाकर दोपहर को यहां आते हैं और कुछ सुबह आकर यहीं से दोपहर स्कूल जाते हैं । "

उन्होंने चारों तरफ दृष्टि दौड़ाई फिर कहने लगी _"  तीन से दस साल तक के बच्चे रहते हैं यहां । सबकी देखभाल के लिए नानियां - दादियां रहतीं हैं ‌यहां । ये सारी महिलाएं अपने घरों से किसी ना किसी रुप में बाहर निकाली हुई है। यहां सब मिलकर परिवार का सुख लेती हैं और बच्चों को प्रेम से रखतीं हैं । " शांत स्वर में उन्होंने कहा ।

शिखा ने देखा , दोपहर के खाने के लिए उन सबने बच्चों को प्यार से , कुछ को जबरन ले जा रही है।

पहले उनका हाथ पैर साफ किया , कपड़े बदले और खाना खिलाने लगीं ।
ध्रुव भी उनके साथ खाना खाने चला गया । शिखा जब रोकने लगी तब " कहानी वाली नानी " ने कहा_" अरे... क्यों रोकती हो ? बच्चा है , बच्चों के साथ ही खाएगा ना । जाने दो उसे ।"

एक महिला ने उसे भी शरबत लाकर दिया ।

" हमारे यहां की महिलाएं अपने अपने काम में कुशल हैं । कोई खाना अच्छा बनाती हैं , कोई बाग-बगीचे की शौकीन हैं , कोई बच्चों को पढ़ाती हैं और उनके गृहकार्य में मदद करतीं हैं । कुछ अच्छी शिक्षिका हैं जो बच्चों को कम्प्यूटर पर सिखाती हैं ।"

शिखा के कान में फुसफुसा कर बोली _ " मुझे तो कुछ आता नहीं  इसलिए बच्चों को कहानियां सुनाकर उनका मन बहलाती हूँ।" और वह खुद ही हंस पड़ी ।

" क्या तुम्हारी मां या सास नहीं हैं ? " इस अप्रत्याशित प्रश्न से शिखा चौंक गई ।

" माँ तो बचपन में ही गुजर गयी थी , सास हैं । गांव में रहतीं हैं । ध्रुव को एक ही बार देखा है उन्होंने जब वह छह महीने का था। पूजा करने के लिए गांव गए थे  ।"  शिखा ने बताया ।

" अपनी सास को ले आओ ना , वो बहुत अच्छी तरह बच्चे की देखभाल करेंगी ।" उन्होंने सलाह दी ।

" कैसे ले आऊं , वो आना ही नहीं चाहतीं हैं । एक बार दीपावली मनाने लाए थे , दो-दो बात हो गई और वो फिर कभी आई नहीं ।" शिखा ने आगे बताया कि _" उनको यहां अच्छा नहीं लगता । गांव और गांव का मकान ही पसंद है उन्हें । " और शिखा ने दीपावली की घटना का उल्लेख भी कर दिया ।

अपनी बात खत्म करके जब शिखा ने सिर उठाया तो देखा कि सामने बैठी दबंग महिला  आंखों में नमी थी ।

यह कैसा व्यक्तित्व है ? इतना बड़ा पालनाघर चलाने वाली ये दबंग महिला , एक छोटी सी बात पर रो पड़ी ।

शिखा के पीठ पर हाथ रखकर बोलने लगी _ " आज कितने ही बच्चों को कहानी सुनाने वाली नानी ' लीला '  अपने ही पोते-पोतियों को कभी कहानी नहीं सुना पाई । एक ही बेटा है मेरा , पति की मृत्यु के बाद मेहनत मजदूरी करके पाला था उसको । " बताते हुए वो मानो अपने पुराने दिनों में खो गई ।

" बड़ी नौकरी मिली उसको । बहू भी नौकरी करती थी । अनपढ़ सास का , साथ उसे पसंद नहीं था । उम्र के पैंतालीसवें साल में मुझे महिला आश्रम में रख दिया ।" गहरी सोच में डूबी हुई वो कह रही थी ।

" मैंने भी काम करने का निश्चय किया , उस आश्रम से निकल कर इस नए शहर में आ गई । मेहनत मजदूरी की , लोगों के घर काम किया , खाना बनाने का काम, बच्चों को संभालने का काम किया । " वो अपनी मेहनत के दिनों को याद कर रही थी ।

" अपने दो कमरों के किराए के घर में मैंने बच्चों को रखना शुरू किया ‌। दिनभर बच्चों को संभालती और सुबह शाम घरों के बर्तन साफ कर आती ।" उन्होंने बताया ।

" फिर इतना बड़ा पालनाघर कैसे बनाया आपने ? " शिखा ने आश्चर्य से पूछा ।

"  पहले चार बच्चे थे और मैं अकेली संभालने वाली । मेरा प्यार , रखरखाव बच्चों के माता-पिता को पसंद आने लगा । उसी पैसों से मैंने थोड़ा बड़ा मकान किराए पर ले लिया । मेरी ही तरह बेसहारा औरतें , अतृप्त नानियां- दादियां जुड़ती गई । आज अस्सी के करीब बच्चे हैं और तीस महिलाऐं हैं । " उन्होंने बड़े गर्व के साथ बताया ।

" बेटी , अपनी सास को मना लाओ । एक छोटी सी जिद का परिणाम पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है । इस छोटे से बच्चे का क्या कसूर है ? क्यों यह अपनी दादी के प्रेम से वंचित रहे ? " लीला ने शिखा को समझाया ।

"  तुम्हारे पति को अपनी माँ की कितनी याद आती होगी । तुम्हारी एक जिद से  सब अधूरा है ।" उन्होंने सीधी बात कह दी ।

" मैं अपने इस पालनाघर में उन्हीं बच्चों को रखती हूँ जिनकी नानी - दादी कोई नहीं है ।" उन्होंने समझाया _ " जरा सोचो , छोटा मासूम बचपन अपने बुजुर्ग के प्यार , स्पर्श के लिए तरस रहा है । आगे निर्णय तुम्हारा है ।" कहते हुए वो अंदर चली गई ।

शिखा को आज अहसास हुआ कि उसने अपनी जिद को कितना लंबा खींच लिया । एक अकेली बूढ़ी औरत , अपने परिवार से दूर रह रही है । एक बार उसने खुद जाकर उन्हें मना लिया होता तो क्या बिगड़ जाता ?

ध्रुव को वहां खेलता देखकर वह विचार में डूब गई । उसको कोई अधिकार नहीं कि वह एक बेटे को माँ से और पोते को दादी  से दूर रखे ।

एक ठोस निर्णय लेकर वह उठी और ध्रुव का हाथ पकड़ कर बाहर आ गई । रिक्शा किया और सीधे रेल्वे स्टेशन चली गई ।
शनिवार की टिकट लिया और  रिक्शा में ही घर वापस चली गई ।

रास्ते में शिखा ध्रुव को समझा रही थी _ " शनिवार को हम सब दादी के पास गांव जाएंगे । अभी जैसा देखा था ना वैसा ही रहता है गांव। हम दादी को ले आएंगे साथ ही । तुम अब स्कूल से वापस आओगे तो अपने घर में दादी के साथ रहोगे । " शिखा ने खुशी से समझाया ।

" मम्मी , क्या दादी कहानी सुनाएगी ? " भोलेपन से ध्रुव ने पूछा ।

" हाँ मेरे बच्चे , सब कुछ करेंगी वो तुम्हारे लिए ।" शिखा ने ध्रुव को अपने पास चिपकाते हुए कहा ।

रिक्शा तेजी से सड़क पर फिसलता जा रहा था और शिखा का मन माँजी के गांव की गलियों में डूबता जा रहा था ।

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