अस्सी वर्ष के भोला काका की मृत्यु पर पूरा मोहल्ला दुःखी था । उनकी इच्छानुसार , उनकी अस्थियां गंगा में विसर्जित करने के लिए बेटा मदन और उसका मित्र विमल , हरिद्वार गए । परसों तेरहवीं काम होने वाला है।
हरिद्वार से जबसे विमल वापस आए हैं बहुत गुमसुम बैठे हैं घर से बाहर भी नहीं निकले।
शकुन जब भोला काका के घर पहुँची तब पता चला कि हरिद्वार में विमल और मदन भैया की मुलाकात ' गप्पू दीदी ' से हुई थी । काका के क्रियाकर्म के समय भी दीदी साथ रहीं ।
बात की सच्चाई जानने के लिए शकुन ने मदन भैया से बात की ।
तेरहवीं का दिन है , अभी ब्राह्मण भोजन होने वाला है इस कारण मदन भैया व्यस्त थे । शकुन को परेशान देखकर उन्होंने समय निकाल कर बात की ।
मदन भैया ने बताया कि _ " भाभी , हरिद्वार में हमें गप्पू दीदी मिली थीं। साध्वी का वेश , गले में रूद्राक्ष की माला थी । काका की अस्थि पूजा के समय थी साथ में । वहां ही एक आश्रम में रहतीं हैं । "
कुछ घंटे के बाद , भोजन करके शकुन घर आ गई । शकुन समझ गई कि इतने वर्षों के बाद अपनी छोटी बहन से अचानक मिलकर विमल बहुत विचलित हो गए हैं ।
हरिद्वार से लौटने के बाद से अपने कमरे में कैद हो गए हैं ।
बरामदे में लगे लकड़ी के तख्ते वाले झूले पर बैठकर शकुन वर्षों पहले , अपनी शादी की बात में खो गई ।
बीस की उम्र में वो इस घर में दुल्हन बनकर आई थी तब उसकी ननद , जिन्हें सब ' गप्पू' कहते थे , सत्तरह साल की थी । अब तो शादी को पैंतीस साल हो गए पर कल की ही बात लगती है । यादें कभी बूढ़ी नहीं होती हमेशा कल की झलक चुपके से दिखा जाती हैं ।
इस परिवार में विमल , उनसे पाँच साल छोटी बहन गीतिका और पिताजी थे । माँ के ना रहने पर गीतिका की देखभाल , उसे खिलाना , चोटी बांधना सब विमल की जिम्मेदारी थी ।
पिताजी काम में जाने के पहले बच्चों के लिए खाना बनाकर रख दिया करते थे और विमल बड़े प्यार-दुलार से छोटी बहन को खिलाते फिर स्कूल छोड़ने जाते थे । पिताजी , कचहरी के किसी वकील के मुंशी थे ।
गीतू की हर बात मानी जाती थी और वो बहुत मस्ती करती थी। गोल-मटोल , गोरी , चंचल और वाकपटु गीतिका पूरे दिन मोहल्ले में घूमती रहती थी ।
विमल ने बी.ए. कर लिया और सरकारी चुंगी नाके में काम पर लग गए ।
गीतू का मन पढ़ाई लिखाई में बिल्कुल नहीं लगता था , बड़े मुश्किल से उसने आठवीं कक्षा पास की । बाबूजी को उम्र से पहले जिम्मेदारियों ने ही बूढ़ा और बीमार बना दिया ।
एक शाम चौपाल पर विमल के विवाह की बात चली तो भोला काका ने शकुन का रिश्ता सुझाया ।
" लड़की मैट्रिक पास है । घर-गृहस्थी का काम जानती है । अच्छे परिवार- संस्कार वाली है । बहू बनकर आएगी तो घर संभाल लेगी भैया ।" शकुन की तारीफ करते हुए काका ने बाबूजी से कहा ।
बाबूजी के पूछने पर विमल ने भी सहमति दे दी । रोज-रोज के चौके- चूल्हे से वह भी तंग आ गया था । गीतिका भी बड़ी हो गयी थी और वह कभी बच्चों की टोली में, कभी औरतों की पंचायत में, कभी आदमियों की चौपाल में भटकती फिरती ।
घर के कामकाज में बिल्कुल मन नहीं लगता था उसका । बातों में तो इतनी उस्ताद हो गई थी कि कब गीतिका से ' गप्पू ' हो गई पता ही नहीं चला ।
अब शाम हो चली थी तो शकुन ने झूले से उठकर बरामदे की बत्ती जला दी । विमल को आवाज देकर कहा_ " आज तेरहवीं है काका की । जाओगे नहीं क्या ? मदन भैया भी रास्ता देख रहे होंगे ।"
अंदर से ही विमल ने कहा _" जाऊँगा रात तक । बता दिया था मदन को । "
शकुन वापस झूले पर आ बैठी । अभी दीया बाती का वक्त नहीं हुआ है ।
गीतिका के बारे में सोचते हुए शकुन को हंसी आ गई । छोटी सी बात को बढ़ा चढ़ाकर कहने में महारत हासिल कर ली थी उसने । पूरे मोहल्ले में गप चलाती फिरती थी वो ।
" मेरे भैया चुंगी नाका में रहते हैं , उनको सलामी दिए बगैर कोई आ जा नहीं सकता यदि वो चाहे तो जेल भेज सकते हैं ।" बच्चों की टोली में धौंस जमाते रहती ।
" हजारों रिश्ते आ रहें हैं मेरे भैया के लिए , पर पिताजी ने काका के बताए रिश्ते को हामी भर दी , आखिर संबंधों का ध्यान तो रखना ही पड़ता है । " औरतों की पंचायत में भी पीछे नहीं रहती ।
" हाँ हाँ री , हजारों क्या लाखों आते होंगे । जब तेरी बारी आएगी , तब पता चलेगा । एक भी आगे ना आएगा , ऐसी ऊंची ऊंची गप्पें हांकती है कि बस्स्स ..। " तेज तर्रार गौरी भाभी ने गोली दाग दी ।
शकुन उस दिन को कैसे भूल सकती है जिस दिन वह इस घर में बहू बनकर आई थी । सास तो थी नहीं इसलिए इकलौती ननद गप्पू ने , आसपास की औरतों के साथ मिलकर उसका स्वागत किया था ।
इधर उधर से आती तो कभी बालूशाही , कभी लड्डू पकड़ा जाती और कान में फुसफुसाती _ " चुपचाप खा लो । यहां खाने पीने का कोई टाइम नहीं मिलेगा ।" घूँघट में से छुपाकर शकुन ने सब खा भी लिया ।
' मुँहदेखी ' की रस्म में जब आंगन में मजमा लगा था तब गप्पू दीदी ने ऐलान किया _" भाभी ने कठिन व्रत किया है । मंडप के दिन से सिर्फ फलाहार पर है । ये रस्में जल्दी जल्दी निपटाओ , वरना उनको चक्कर आ जाएगा ।"
शकुन सुनकर चौंक पड़ी । ' खुद ही कभी बालूशाही कभी नमकीन खिला रही थी और अब व्रत की बात कर रही है । हे भगवान ! ये लड़की अपने गप के चक्कर में मेरी आफत तो नहीं करा देगी ।' मन ही मन शकुन ने सोचा ।
" विमल के तो भाग ही खुल गए जो इतनी संस्कारी लड़की मिली है । वरना आजकल की लड़कियां तो व्रत उपवास के नाम से भी भागतीं हैं । ये गपोड़ी को देखो , सावन का एक सोमवार भी कर नहीं सकी । " झुंड़ में बैठी एक औरत ने कहा तो शकुन अंदर तक कांप गई और नज़र के सामने बालूशाही नाचने लगी ।
दूसरी औरत बोली _ " बहू , जरा अपना हीरों का हार तो दिखाना । सुना है जयपुर से बनवाया है तुम्हारे पिताजी ने । अच्छा नमूनेदार होगा । देखें तो सही , आज तक मैंने तो कभी देखा ही नहीं असली हीरों का हार ।"
" कीमती भी बहुत होगा जिज्जी ।" तीसरी ने भी समर्थन किया ।
" कीमती तो है ही , ऐसे गले में डाल कर थोड़ी घूमेंगी भाभी । सुरक्षित रखवा दिया है , जब भीड़-भाड़ कम हो जाएगी , ले आएंगी । " गप्पू दीदी ने तपाक से जवाब दिया ।
शकुन समझ गई कि यह गप्पू दीदी की कोई नई खोज है । अपने गले में पड़ी सोने की चैन और नाज़ुक से हार को सकपका कर और भी ढांक लिया ।
उस रात शकुन ने विमल को सब बता दिया और पूछा कि "गप्पू दीदी ने ऐसा क्यों किया ? "
विमल ने सोचते हुए उत्तर दिया कि_ " माँ नहीं थी तो गीतू की जिम्मेदारी पिताजी और मैं उठाते थे । जब जब उसे लगता कि उस पर कम ध्यान दिया जा रहा है वह कोई ना कोई नई बात बना लिया करती थी । धीरे धीरे यह उसके स्वभाव में शामिल होता चला गया । " विमल ने शकुन का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा _ " अब तुम आ गई हो तो वह सुधर जाएगी । घर पर रहा करेगी और कुछ काम काज भी सीख जाएगी। "
शकुन अपने आप को खुश किस्मत समझ रही थी कि उसको इतना प्यार और विश्वास करनेवाला पति मिला है।
अंधेरा बढ़ता देख शकुन ने उठकर भगवान के पास दीपक जला दिया । तुलसी के पास भी दीया जलाया ।
विमल ने भी कमरे की बत्ती जलाई और दरवाजा खोला ।
शकुन ने देखा , कमरे की मेज़ पर पुरानी तस्वीरें बिखरी हुई हैं । मेले में ली दोनों भाई बहन की , बाबूजी एवं अम्माँ के साथ दोनों बच्चों की तस्वीरें यादों की तरह बिखरी पड़ी थी ।
शादी के कुछ समय बाद ही बाबूजी ने विमल और शकुन को बुलाकर कहा था _ " बहू , गीतू को मुझसे ज्यादा विमल ने ही संभाला है । माँ नहीं थी इसलिए घर-परिवार समझती नहीं । अब तुम उसे संभाल लेना । उसका रिश्ता भी पक्का हो जाता तो मैं चैन की सांस ले पाता ।"
शकुन ने बाबूजी को आश्वस्त किया कि वो ननद का ध्यान रखेगी ।
शकुन ने कह तो दिया पर इस गपबाज ननद ने तो नाक में दम कर दिया था । कभी किसी को कह आती कि भाभी ने स्वादिष्ट दही बड़े और कचौड़ियां बनाईं हैं । रिश्ते में जेठानी लगने वाली एक महिला आकर कहने लगी _ " अरी छोटी ! सुना कचौरी बड़ी अच्छी बनी है । जरा चखाओगी नहीं ।" बेचारी ' छोटी ' आनन फानन में कुछ बातें करते हुए नमकीन बनाकर खिलाती ।
कभी ढिंढोरा पीट आती कि भैया ने नाके से बोरा भर कैरियां लाए हैं। बहुत ही ताज़ी हैं तो भाभी मुरब्बा और अचार बना रहीं हैं ।
" बहू , तुम्हारे काम से ज्यादा हों तो दो-चार दे देना । तुम्हारे काका को मुरब्बा बहुत पसंद है , बना दूंगी । " भोला काका की पत्नी ' काकी ' ने घर में घुसते ही कहा।
शकुन को कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या कहे ? बाबूजी सामने बैठे थे , उन्होंने बात संभालते हुए कहा _" छोटी , तुम्हें अपनी गप्पू की आदत तो पता ही है ना । अब एक -दो किलो आम थे बता आई एक बोरी । अब बड़े दिनों बाद तुम आई हो तो बहू के हाथ की अदरक वाली चाय पीकर ही जाना । "
काकी ने बुरा सा मुंह बनाकर कहा _ " जेठजी , चाय तो मैं पीकर ही जाऊंगी पर इस लड़की का क्या करोगे ? ऐसे ही बोलती रही तो कहां निबाह होगा ? " किसी प्रकार शकुन ने उनको शांत किया और चाय के साथ पकौड़े भी तल दिए ।
अब पिताजी के साथ विमल भी परेशान रहते थे कि ये लड़की समझती क्यों नहीं है ?
एक दिन शकुन ने उसको अपने पास बैठाकर , प्यार से समझाते हुए कहा कि _ " आपको मेरी जो साड़ी पसंद है पहन लो । मैं बाल बना दूंगी और फोटो लेंगे । "
बड़ी खुशी से गीतू तैयार हो गई । जब फोटो और कुंडली को रिश्ते की बात के लिए भेजने का पता चला तो उसने रो-रोकर घर सिर पर उठा लिया ।
बाबूजी और विमल की सलाह से शकुन ने कुछ जगहों पर रिश्ते की बात चलाई । शकुन की मौसी के रिश्ते में एक अच्छा परिवार था । वहां भी रिश्ते की बात की गई ।
गीतू की फोटो उनको पसंद आ गई । सुंदर , गोरी , थोड़ी गोल-मटोल गीतू उनको भा गई । साधारण घर परिवार के अच्छे लोग थे । शकुन के संबंधी होते थे तो शकुन मन ही मन डर रही थी कि ये लड़की कैसे टिकेगी ?
शकुन ने देखा कि विमल कुर्ता पायजामा पहने बाहर आ रहे हैं । रात के आठ बज रहे हैं और अब जायेंगे काका के घर ।
शकुन के कुछ बोलने से पहले ही विमल बोला _ " मदन से मिलकर आता हूं अब लोगों का आना-जाना भी कम हो गया होगा । " सिर नीचे किए विमल बाहर निकल गए ।
शकुन ने उठकर गेट बंद किया और वापस झूले पर बैठ गई । खाना तो काका के घर से खा आई थी और अब विमल को भी मदन भैया खिलाकर ही भेजेंगे । बड़ा दोस्ताना है दोनों में । बाबूजी और भोला काका के रिश्ते को आगे बढ़ाया है दोनों ने ।
विमल और शकुन की दोनों बेटियों की शादी में मदन भैया ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था । शीनू और मीनू को अपने बच्चे जैसे ही प्यार करते हैं भैया । पिछले साल ही मीनू की शादी हुई।
शीनू के दो बेटे हैं , बेटियां आती हैं तो घर भर जाता है । विमल भी दोनों नातियों के साथ बड़े खुश रहते हैं ।
शकुन ने सोचा " शादी तो गप्पू दीदी की भी धूमधाम से की थी । कोई कसर नहीं छोड़ी थी । "
तब तो शकुन गर्भवती भी थी परंतु हर रस्म में बढ चढकर हिस्सा लिया था , गप्पू दीदी इकलौती ननद हैं उसकी ।
जब बारात दरवाजे पर आई तब औरतों में कानाफूसी होने लगी _ " कहती फिरती थी कि ससुराल में मोटर कार है , पर दूल्हा तो घोड़ी पर आया है । कार होती तो कार में ना आता ।" शकुन ने बातों से ध्यान हटाकर बारातियों के स्वागत में लगाया ।
विदाई के समय गप्पू दीदी शकुन से लिपट कर खूब रोई और शकुन ने ससुराल में सबसे प्रेम से रहने का मंत्र दिया ।
गीतू अब अपने जीवन का नया अध्याय शुरू कर रही थी । चार दिनों के बाद विमल और मदन भैया गीतू एवं दामादजी को लेकर आए ।
गप्पू दीदी तो मोहल्ले भर घूम घूमकर अपने ससुराल की वैभव गाथा गा रही थी और दामादजी अनमने से घर पर बैठे रहे ।
शकुन ने एकांत देखकर उनसे पूछा _ " कुंवर जी , घर में सब ठीक है ना । दीदी इन चार-पांच दिनों में घुल मिल गई होगी सबसे । हमारी दीदी बहुत मिलनसार हैं।
" हां भाभी , मिलनसार तो है । पहली रात ही मुझे बता दिया कि कई रईस घरों से रिश्ते आ रहे थे । भाभी की जान-पहचान थी इसलिए हमारे घर ब्याह दिया , वरना बिना कार वाले घर में तो वो पैर भी नहीं रखती । " दर्द भरी आवाज में बोले थे दामादजी ।
" कैसी लड़की है ये , इतना समझदार पति है फिर भी अपनी आदत से बाज नहीं आई ।" मन ही मन सोचते हुए शकुन ने उनसे परिवार की दूसरी बातें शुरू कर दी ।
वो लोग तो वापस चले गए परंतु शकुन के मन में एक अनजाना सा डर छोड़ गए । दामादजी का उदास चेहरा , भुलाए ना भूलता था ।
अब शकुन के प्रसव का समय पास आ गया और बाबूजी ने शकुन को मायके जाने की सलाह दी । वहां मां और भाभी की देखभाल में जच्चा-बच्चा की अच्छी व्यवस्था हो सकती थी ।
शकुन झूले से उठकर अंदर आ गई ताकि खिड़कियां बंद कर दें । आसपास पेड़-पौधे लगाने से शाम के समय बहुत मच्छर आ जाते हैं ।
विमल के स्टडी-रुम की खिड़की बंद करने आई तो देखा एक फोटो मेज़ के नीचे गिरी है । उसने फोटो को उठाया , देखा तो शीनू के नामकरण की फोटो है ।
सब बहुत सुंदर लग रहे हैं , वैसे भी पुरानी फोटो और पत्रों का मजा ही कुछ और होता है ।
सवा महीने की गोल-मटोल शीनू पालने में और गप्पू दीदी उसके कान के पास मुंह लगाए हुए हैं । चारों तरफ औरतों की भीड़ लगी थी ।
शकुन ने फोटो उठाकर मेज़ पर रख दिया और कमरे का दरवाजा टिका दिया । खुद सामने आकर उस नामकरण के उत्सव के बारे में सोचने लगी ।
शीनू होने के एक महीने बाद ही विमल उसे मायके से वापस ले आए थे । साथ मम्मी भी आई थी सवा महीने की शीनू का नामकरण करना था ।
गप्पू दीदी के ससुराल में भी न्यौता दिया गया था । नामकरण के एक दिन पहले ही गप्पू दीदी एक पड़ोसी के साथ आ गई । पूछने पर बताया कि सब घरवाले कल आएंगे । खूब रौनक थी परंतु शकुन का मन किसी आशंका से ग्रस्त था । दामादजी का चेहरा वह भूल नहीं पा रही थी ।
बहुत जमकर भोज हुआ , ढोल बजी । लोग कहते थे _ " लड़की होने पर इतनी खुशी मना रहे तो अगर लड़का होता तो क्या करते ? "
कार्यक्रम में गप्पू दीदी के ससुराल से कोई नहीं आया । मम्मी भी दूसरे दिन चली गई , बेटी के घर ज्यादा दिनों तक रहना उन्हें मंजूर नहीं था ।
जब गप्पू दीदी से पूछा गया कि उनकी ससुराल से कोई नहीं आया , दामादजी भी नहीं , तब उनका उत्तर सुनकर सबके सिर चकरा गए ।
गप्पू दीदी ने ससुराल में साफ कह दिया था कि नामकरण में आना हो तो मोटरकार में ही आना । भाभी और भतीजी के लिए कपड़े और सोने का जेवर लाना । यदि ऐसा नहीं हुआ तो मत आना।
गप्पू दीदी ने जब यह बात शान से बताई तो बाबूजी ने मन पर ले लिया और उन्हें दिल का दौरा पड़ गया । छोटी सी बच्ची , बाबूजी की गंभीर हालत और उसपर गप्पू दीदी का बेफ्रिक रवैया ।
शकुन के लिए मानो परीक्षा की घड़ी थी । दस दिन बाद बाबूजी अस्पताल से घर वापस आए और उन्होंने गप्पू दीदी से कभी बात ना करने की कसम खा ली । वे उनका चेहरा भी नहीं देखते थे ।
विमल और मदन भैया ने दीदी के ससुराल वालों से बहुत विनती की परंतु क्या करते अपना ही सोना खोटा निकला । उन्होंने दीदी के कारनामों की सूची बताई तो दोनों का सिर झुक गया ।
दीदी ने उन लोगों को इतनी बड़ी बड़ी बातें बताई थी कि वो अब इतनी रईस बहू को वापस नहीं लाना चाहते थे ।
इधर दीदी को कोई मतलब ही नहीं था कि उनके वैवाहिक जीवन , भविष्य का क्या होगा ? वे पूरे समय शीनू के साथ मस्त रहती या मोहल्ले में इधर-उधर घूमकर बातें करती रहती ।
बाप और भाई उनकी चिंता में घुले जा रहे थे ।
शीनू छः महीने की हुई और बाबूजी चल बसे । गप्पू दीदी वैसे भी उनके सामने नहीं जाती थी , पर शकुन से लिपट कर खूब रोई थी ।
क्या करती शकुन , कैसे समझाती कि अब भी समय है , उनको अपना घर संभाल लेना चाहिए ।
बाबूजी के अंतिम संस्कार में दामादजी आए थे इस लड़की की नासमझी और बड़बोलेपन से परेशान थे वो ।
जाते समय जब विमल और शकुन ने उनसे गप्पू दीदी को भी साथ ले जाने की बात कही तब दीदी ने बीच में ही टोक दिया _ " मुझे उस छोटे से घर में नहीं रहना है । ना आंगन है ना झूला । मैं तो इसी घर में रहूंगी ।"
और विमल सिर पकड़कर बैठ गए थे ।
समय पंख लगाकर उड़ता गया और शकुन ने एक और बेटी को जन्म दिया । गप्पू दीदी तो भूल ही गई की वो ब्याहता भी है , दिनभर या तो घूमती या तो दोनों भतीजियों के साथ खेलती रहतीं।
लोग भी कहने लगे थे कि _" कैसी लड़की है ? अपने घर नहीं जाकर , भाई -भाभी के सिर पर बैठी है ।"
गप्पू दीदी पर इन सब बातों का कोई असर नहीं होता था , कमल के पत्ते पर जैसे पानी नहीं ठहरता है ।
शकुन की मम्मी भी बीमार रहने लगीं थीं उन्हें अपनी बेटी की बहुत चिंता रहने लगी थी । दो-दो बेटियों की जिम्मेदारी और फिर गीतू जैसी ननद , जो अपना घर छोड़ कर चली आई ।
इन सब बातों का असर धीरे-धीरे विमल और शकुन के बीच आने लगा । दोनों लड़कियां भी बड़ी हो रही थी , ये बात उनको व्याकुल कर देती थी ।
रिश्ते-नाते में , समाज में सब गप्पू दीदी के स्वभाव और बड़बोलेपन के किस्से प्रसिद्ध हैं तो इन लड़कियों का भविष्य क्या होगा ?
एक दिन विमल ने बहन को कमरे में बुलाया और दरवाजा बंद कर दिया । डेढ़-दो घंटे उनकी क्या बात होती रही , शकुन को कभी पता नहीं चल पाया ।
इस बातचीत के दो दिन बाद गप्पू दीदी घर पर नहीं थी । उन्हें घर , मोहल्ले और गांव भर में ढूंढा गया। रिश्ते-नाते में , संबंधियों में आदमी भेजे गए ।
दीदी की ससुराल में मदन भैया गए । वापस आकर उन्होंने बताया कि दामादजी का आकस्मिक निधन हो गया था और उनके अंतिम संस्कार में विमल गए थे । यह बात और समाचार विमल ने किसी को नहीं बताया था ।
धीरे धीरे गप्पू दीदी की खोज पर विराम लगने लगा और स्वीकार कर लिया गया कि वो अब इस दुनिया में नहीं रहीं ।
दोनों लड़कियों को पढ़ा-लिखाकर , योग्य बनाकर , ब्याह करने की जिम्मेदारियों में शकुन ने अपने आपको पूरी तरह से भुला दिया ।
बड़ी बेटी शीनू रंग रूप , कद-काठी में बिल्कुल अपनी बुआ की तरह है । एक झलक में गीतू दीदी की याद आ जाती है । शकुन ने संस्कार आने नहीं दिया , बचपन से ही पूरा ध्यान रखती थी ।
गेट के खुलने की आवाज से शकुन की सोच को विराम लग गया । देखी , तो सामने विमल और मदन भैया आए हैं ।
" सुबह की पहली गाड़ी से हरिद्वार चलते हैं । अभी बच्चों को कुछ खबर मत करना । " विमल ने कहा ।
दूसरे दिन सुबह की गाड़ी से वे लोग हरिद्वार चल पड़े । सामान के नाम पर सिर्फ एक बैग में कुछ कपड़े लिए थे ।
गप्पू दीदी के निवास स्थान का पता विमल के पास था । एक आश्रम का नाम लिखा था ।
हरिद्वार के गंगा घाट में स्नान करके फिर गप्पू दीदी से मिलने पहुंचें ।
आश्रम में पूछने पर पता चला कि वो तो नहीं हैं ।
एक आश्रमवासी ने बताया_ " गीता बहन जी ने तो कल ही आश्रम छोड़कर चली गई । किसी को बताया भी नहीं कि कहां जा रही हैं । मुझे एक लिफाफा दे गई हैं कि यदि मेरे भाई भाभी आएं तो उनको दे देना । " कहते हुए उन्होंने अंदर से एक बंद लिफाफा लाकर विमल को दे दिया ।
लिफाफा खोलकर विमल ने एक पत्र निकाला जिसमें लिखा था _
" भैया-भाभी ,
प्रणाम ।
आप दोनों से मिलने की हिम्मत नहीं है मुझमें । मैंने बहुत तकलीफ़ दी है आप दोनों को ।
भैया ने बताया कि शीनू - मीनू का विवाह हो गया है और शीनू के दो बेटे भी हैं ।
अपनी भतीजियों के सुखी जीवन की कामना करते हुए आशीर्वाद के रुप में कुछ रखा है । उन दोनों को दे दीजिएगा ।
आपकी गीतिका
पत्र के साथ रूमाल में बंधी सोने की दो चूड़ियां , कानों की बालियां और चैन थी ।
गप्पू दीदी की धरोहर को संभालते हुए , भारी मन और थके कदमों से , विमल और शकुन वापस आ रहे थे । दूर पेड़ की ओट से , दो भरी आंखें हाथ जोड़कर उन्हें अलविदा कह रहीं थीं ।
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