नौ साल की रानी ने महिला चौपाल की बातों से अंदाजा लगा लिया कि आने वाले कुछ दिनों काफी चहल-पहल के रहेंगे । मिश्रा चाचा के चौबारे पर जो मर्दाना बैठक होती है , वहां से बात निकलकर महिला मंडल तक आ पहुंची है ।
मिश्रा जी के बेटे की शादी पक्की हुई है और इस सप्ताह तिलक समारोह है ।
" पक्के इलाहाबदिया हैं , तिलक तो जमके चढ़ेगा ।" शुक्लाइन बड़ी माँ ने अपनी बात रखी ।
" अब कोई दोई - चार बेटवा तो हैं नहीं , एक ही एक बेटा है , तो बटोरेंगे दोनों हाथन से ।" ठहाका मारकर ठकुराइन मामी बोली ।
"अपनी बिटिया के लगुन को का ले गए रहे , केहि को भनक ना लगी ।" ददुआइन ने भौंह टेढ़ी करके कहा ।
" का लिए , का दिए कौन जाने । गौने के दूसरे बरस से इहैं डेरा डाले हुए है । सब अपने कर्मन का फल भुगत रही है बेचारी ।" ठकुराइन मामी ने हमदर्दी जताई ।
" अब वो का भुगत रही है , मां-बाप के छाती पर सिल बनी पड़ी है । " अब शुक्लाइन बड़ी माँ की बारी थी ।
रानी को अपने पास से उठाते हुए अम्माँ ने धौल जमाते हुए कहा _ " भाग यहां से , सब बातें सुनकर अजिया - ददिया बन रही है ।"
रानी के भागने के साथ ही महिला मंडल भी समाप्त हो गया ।
रानी की अम्मांँ , तीन बेटियों की मांँ है । उन्हें कभी किसी के घर की बात करना ,सुनना पसंद नहीं है पर क्या करे इस मोहल्ले में एक दिन भी महिला सभा के बिना नहीं बीतता है ।
छोटे से इस मोहल्ले में ब्राह्मण- ठाकुरों के पंद्रह-बीस घर हैं । बाकी सारे लोग वहीं के स्थानीय राऊत , गोंड समाज के हैं । "परदेसी " कहलाए जाने वाले ये पंद्रह बीस घर व्यवसाय और छोटे धंधे में लगे थे । सिर्फ दो परिवार नौकरीपेशा हैं , जिसमें रानी का परिवार एक है ।
मिश्रा जी राजनीति में भी दखल रखते थे ।" परदेसी समाज " के अध्यक्ष थे और बड़ी सरकारी जमीन पर भैंसों का तबेला खोल रखा है ।
हर शाम उनके घर के सामने चौपाल लगती थी और किसी भी विषय पर बहस हुआ करती थी । रानी के पिताजी कभी नहीं जाते थे वे काम से आकर अपने परिवार और बच्चों की पढ़ाई लिखाई में व्यस्त रहते थे ।
अम्माँ कभी कभी जरा व्यवहारिक हो जाती _ " अरे ! रोज ना सही कभी कभी तो चले जाया करो , मिश्रा भैया की चौपाल में । लोगों से संबंध तो बनाए रखना होगा ।"
" सारे संबंध , व्यवहार तू ही निभाया कर , मुझे ये लोग पसंद ही नहीं हैं । " और पिताजी अखबार सामने रख लेते ।
एक-दो दिन बाद तिलक की तैयारी होने लगी । नियत दिन , नियत समय पर लड़की वालों ने आकर तिलक किया । खूब ढोलक बजी , मंगलगीत हुए । रानी की अम्माँ की ढोलक और गीत " परदेसियों " में प्रसिद्ध है ।
लड्डू , बताशे बटें , और रानी को तो बहुत मज़ा आ गया क्योंकि मिश्रा चाचा के घर जाने का मौका मिला ।
सवा लाख नकद , चाँदी की थालियाँ , चाँदी के नारियल सुपारी और लड़के को मोटरसाइकिल दिया गया । सब जगह तिलक की वाहवाही हो रही थी ।
शाम को रानी की अम्माँ ने घर में आकर बताया तो बड़ी दीदी बोल पड़ी _ " वो नालायक लड़का , ना पढ़ा ना लिखा , मैट्रिक भी पास नहीं कर पाया । उसकी शादी में इतना पैसा लिया उन लोगों ने ? बाप की कमाई पर मौज मस्ती करता है , पता नहीं कौन इससे अपनी लड़की ब्याह रहा है ? "
रानी को कुछ बात समझ ना आई । अम्माँ ने तल्ख लहजे में कहा _ " तू अपना मुंह बंद कर । क्या करना है ? कौन रोज उनके घर जाना है ? मैं तो समाज के नाते जाती हूँ वरना लड़के के लच्छन तो मुझे भी पसंद नहीं है।"
अम्माँ ने बात पूरी करते हुए कहा _" गौने के बाद लड़की भी वापस आ गई । ना पढ़ाया ना लिखाया और इंजीनियर के साथ ब्याह दिया । कौन निभाएगा ऐसी अनपढ़ लड़की से , सब पैसे का खेल है संस्कार तो कौड़ी का नहीं है ।"
बड़ी दीदी की नौकरी लग गई और वो दूसरे शहर चलीं गईं । अम्माँ भी कुछ दिन उनके साथ रहकर , व्यवस्था करके वापस आ गई ।
इधर मिश्रा जी के घर की शादी धूमधाम से हो गई और बहू आ गई । मुँह देखी का बुलावा आया तो रानी भी अम्माँ के साथ गई ।
बहू क्या थी , कपड़ों की ढेर के समान ढंकी बैठी थी । हाथ भर का घूंघट लिए बैठी थी । अम्माँ ने पायल दी और बहू का मुँह देखा । रानी को तो कुछ दिखा ही नहीं ।
गर्मियों की छुट्टियांँ शुरू हो गई और बच्चों की मस्ती भी । सारे दिन छुप्पन छुपाई , गोटा , साँप सीढ़ी , गेंद से मारने के कई खेल खेलते रहते । मिश्रा चाचा के घर की बड़ी सी दीवार के पीछे छुपने की अच्छी जगह थी । आम का बड़ा पेड़ भी था ।
एक खिड़की भी थी जो हमेशा बंद रहती थी । आज जब रानी छुपने की जगह ढूंढ रही थी तब खिड़की का पर्दा सरका और एक बहुत ही सुन्दर , गोरा चेहरा उसी की ओर देख रहा था । वह भी एकदम देखने लगी ।
उसने हाथ के इशारे से रानी को बुलाया । पास जाकर रानी ने देखा कि खिड़की पर पतली सी जाली भी थी ।
बहुत ही प्यारी , मिसरी की तरह मीठी आवाज आई _" तुम रानी हो ? " रानी ने आश्चर्य से सिर " हाँ " में हिलाया ।
" मैं भाभी हूंँ ।" उसने उतने ही प्यार से कहा ।
" अच्छा तो आप ही नई भाभी हो ? आप तो बहुत सुंदर हो । उस दिन तो आपने पूरा मुंह ढांक रखा था । " रानी एक सांस में कह गई।
तभी कुछ आवाज़ आई और उसने कहा _ " रानी कभी बाद में बात करेंगे । " और उसने परदा खींच दिया ।
बड़ी दीदी की सरकारी नौकरी लगते ही उनके लिए रिश्ते की शुरुआत हो गई । योग्य रिश्ता देखकर दीदी की शादी कर दी गई । रानी दस की भी नहीं हुई थी , बस इतना समझ आया कि शादी के बाद दीदी दूसरे के घर चली गई और नई भाभी मिश्रा चाचा के घर आ गई ।
दीदी की शादी में पूरा परदेसी मोहल्ला सक्रिय रहा। तिलक में सिर्फ ग्यारह सौ रुपए लेकर गए थे , पढ़ी-लिखी और कमाऊ लड़की जो थी दीदी ।
मंडप के दिन सब आए तो रानी की नजर "नई भाभी" को ढूंढ रही थी ।
" कितनी सुंदर है वो , उनके जैसा सुंदर यहां और कोई भी नहीं है । " मन ही मन रानी सोच रही थी ।
रिश्तेदारों , मित्रों से घर भरा रहा और शादी के दो महीने बाद ही पिताजी ने रानी को हाॅस्टल में रखकर पढ़ाने का फैसला लिया । अब इस जगह पर उन्हें पढ़ाई का उपयुक्त वातावरण नहीं लगता था।
एक शाम जब खिड़की का पर्दा हटा तब भाभी को देख रानी उछलते हुए उनके पास गई ।
" नई भाभी , आप मेरी दीदी की शादी में आईं नहीं ? " रानी ने अपने मन का सवाल पूछा ।
" नहीं गुड़िया , मैं कहीं भी नहीं जाती हूँ । " उदास स्वर में उन्होंने कहा ।
" मेरी दीदी आप की ही तरह दुल्हन बनी थी , मेंहदी लगाई थी , बहुत सुंदर दिख रही थी । आपको आना चाहिए था उनको देखने ।" नासमझ बचपन ज़िद कर रहा था ।
" मेरी तबियत ठीक नहीं थी रानी मैं खिड़की से झांक कर देखती थी । मैंने दीदी की बिदाई भी देखा । तुम तो बहुत रो रही थी । मेरी बिदाई के समय मेरी छोटी बहन भी बहुत रोई थी , तुम्हारी तरह । " भाभी ने झिलमिलाती आँखों से कहा ।
" सामने के दरवाजे से आ जाओ ।" भाभी ने कहा ।
" नहीं नहीं , अम्माँ ने बिना काम किसी के घर जाने को मना किया है । " रानी ने डरते हुए कहा ।
" अरी बिन्नो , आओ तो सही । सामने चौकीदार से कहना कि भाभी से काम है । आज घर में कोई नहीं है । " भाभी ने आग्रह किया ।
रानी उछलती कूदती बड़े दरवाजे के बाहर बैठे चौकीदार से रौब से बोली _ " मुझे भाभी से काम है , अंदर जाना है ।"
चौकीदार ने मुस्कुराते हुए कहा _" ठाकुर साहब की बिटिया हो । बड़ी जोर की आवाज है तुम्हारी । जाओ-जाओ , भाभी से बात कर आओ ।"
अंदर आकर रानी ने देखा कि आज भाभी ने सिर पर पल्लू नहीं रखा है । लंबी , दूध-सी गोरी , मक्खन -सी चिकनी , काले लम्बे कमर तक बाल । रानी को देखते ही दौड़कर छाती से लगा लिया ।
बोलने लगी _" तुम कभी अंदर नहीं आती और मैं कभी बाहर नहीं जाती । कबसे मिलने का मन था तुमसे । " अपने कमरे की ओर ले चली ।
उनके कमरे में अंधेरा था सिर्फ खिड़की का पर्दा सरकाने पर थोड़ी रोशनी हुई । अच्छा ..! रोशनी के लिए ही भाभी खिड़की पर आ जाती है , बच्चे के मन ने अपनी पड़ताल का निष्कर्ष निकाला ।
भाभी के हाथों में एक सुंदर सा स्कार्फ था । बारीक काम करके , महीन धागों से फूलों की कढ़ाई की थी । किनारे पर" रानी " भी लिखा था । उसके सिर पर बाँधते हुए कहा _" दो बनाई थी , एक अपनी छोटी बहन के लिए और यह तुम्हारे लिए । छिपाकर ले जाना , किसी को बताना मत । मैंने बड़ी दीदी के विवाह के लिए कुछ लिखा है , मेरी ओर से उनको दे देना । " कहते हुए भाभी ने एक खुबसूरत सा लिफाफा हाथ में पकड़ा दिया ।
मुझे बहुत प्यार किया और कहा _" रानी अपना बहुत ध्यान रखना बेटा । खूब मन लगाकर पढाई करना , अपनी दीदी की तरह । वहां तो हॉस्टल में रहोगी , सबसे मिलकर रहना । जब भी आओगी , मुझसे मिलने जरूर आना । मैं इंतजार करूँगी । अब तुम घर जाओ ।" किसी के आने से पहले रानी को वापस भेजना भी उन्हें याद था ।
आज इतने वर्षों के बाद भी रानी , उनके स्पर्श के जादू , उनके रुप का सौंदर्य और अपनेपन की सच्चाई को अनुभव करती है ।
इस घटना को चौदह-पंद्रह साल हो गए हैं , अब रानी भी किसी के घर की बहू है । एक नन्हें से बच्चे की मांँ है ।
बच्चे को लेकर रानी पहली बार मायके आई है । अम्माँ अब रहीं नहीं , पिताजी के साथ थोड़ा समय बिताने के लिए आई है । आने के बाद आस-पड़ोस उमड़ पड़ा कि रानी बिटिया आई है ।
आज भी रानी अपनी प्रिय शख्सियत को तलाश रही है । " क्या भाभी इतने सालों के बाद भी कहीं आती जाती नहीं है ।" मन ही मन रानी सोचती रही ।
पिताजी की आवाज से रानी चौंक पड़ी _" रानी बिटिया , इसने फिर मुझे गीला कर दिया । सुबह से तीन चार बार गीला कर दिया है , अब तो मैं नहा ही लेता हूँ ।" पिताजी नाती का मजा लेते हुए बोले ।
" आप भी नहा लीजिए और दाई आएगी ना पक्का , वो ही इसको तेल लगाकर नहलाएँगी । मुझसे नहीं होगा । " रानी ने पूछा ।
" आएगी क्या , आ ही गई हूँ बिटिया । सब बिटियन के बच्चों का तेल और स्नान करवाया है , तो तू कैसे छूटेगी ? ला दे मुन्ना को , देखूँ तेरी सास ने कैसा तेल लगाया है । यहां रहते तक दिन में दो बार तेल लगाने आऊँगी । ठाकुर साहब से नई साड़ी लूँगी ।" आते ही दाई ने अपनी मांगों का पिटारा खोल दिया ।
दाई माँ को देखकर रानी अचरज से भर गई । वही खनकदार आवाज , वैसा ही तेवर और चाल बस थोड़ी-सी कमर झुक गई है ।
" ये लो , संभालो इसको । नहाकर सोए थोड़ी देर तो शांति मिलेगी मुझे । " रानी ने कहते हुए मुन्ने को दाई मां की गोदी में ढकेल ही दिया ।
मुन्ने के गीले कपड़े सुखाने के लिए रानी बाहर आई तो उस जानी-पहचानी खिड़की की ओर आँखें जम गई । शायद आँखों को , हमेशा की तरह पर्दा सरकने का इंतजार था , पर वह खिड़की बंद ही रही ।
रस्सी पर कपड़े डालते हुए रानी ख्यालों में खो गई ।
जब नई भाभी के दिए तोहफे को लेकर खुशी से उछलती हुई वह घर आई थी । स्कार्फ , लिफाफा हाथ में देखकर पहले तो अम्माँ ने फटकार लगाई फिर जब दीदी ने लिफाफा खोलकर पढ़ा तो सब एक क्षण के लिए अवाक रह गए ।
" परिणय मंगलमय हो आपका "
दीपक और बाती की तरह ,
हमेशा साथ रहें साथी की तरह।
आपको हर सुख और खुशी मिल जाएगी,
कल्पनाऐं जब मूर्त रूप में ढल जाएगी ।
दिलों का बंधन है यह रिश्ता ,
विश्वास और प्रेम से ओतप्रोत रहे ।
आशीर्वाद सदा बना रहे ईश्वर का ,
परिणय मंगलमय हो आपका ।।
बहुत ही सुन्दर शब्दों और अक्षरों में एक कविता लिखी थी , जिसमें दीदी और जीजाजी के उज्जवल भविष्य की कामना की थी । एक एक शब्द मानो दिल से निकला हो ।
कभी आमने-सामने ना आकर भी कोई ऐसा कैसे लिख सकता है कि लगे बरसों पुरानी पहचान है । शिक्षिका दीदी भी मंत्रमुग्ध हो गई।
अंत में उन्होंने अपना परिचय लिखा था _
" आपकी श्रद्धा भाभी "
एम. ए. ( हिन्दी साहित्य )
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
" ओह..! इतनी पढ़ी लिखी लड़की इस घर की बहू बनकर आई है , जिस घर में पढ़ाई के क , ख , ग , घ से भी परहेज है ।" दीदी चीत्कार उठी ।
अम्माँ और पिताजी भी दुखी हो गए कि एक शिक्षित , सुंदर और शालीन लड़की को उसके माता-पिता ने उस लड़के के साथ ब्याह दिया जिसका ना कोई चरित्र है , ना ही कोई अच्छी पहचान , ना कोई संस्कार है ना कोई सही विचार । आए दिन कोर्ट कचहरी का चक्कर रहता है , मां-बाप पैसे के दम पर बचाते फिरते हैं ।
बच्चे को पहनाने के कपड़े दाई मां को देकर रानी ने पूछा _" दाई मां , मिश्रा चाचा के घर का क्या हालचाल है ? नई भाभी कैसी है ? "
दाई मां एकटक देखती रही फिर बोली _" तुम्हारे मिश्रा चाचा को लकवा मार गया है बिटिया । नौकर रखें है जो उनका सब काम करता है । चाची माला फेरते बैठी रहतीं हैं । धीरे धीरे सब खेती बाड़ी बिक गई । लडके के गुण तो सबको पता ही था , बाप की कमाई से कितने दिन तक चलता। "
" सरकारी जमीन का तबेला भी बंद हो गया। बड़ी रकम देकर , किसी तरह घर बैठी उस लड़की को ससुराल भेजा । " लंबी सांस भरकर दाई मां ने अपनी बात पूरी की ।
" नई भाभी कैसी हैं ? " रानी ने अपना प्रश्न दोहराया ।
" नई भाभी कब तक नई रहेगी बिटिया । फूल थी गुलाब का , मुरझा गई बेचारी । " उदास स्वर में दाई ने कहा ।
" तुमको याद करती है । उनके लंबे बाल हैं ना और अब तो उठना बैठना कठिन हो गया है उनका । जब बाल धोने होते हैं मैं ही जाती हूंँ । बालों को धोकर , सुखाकर तेल लगाकर चोटी बांध देती हूँ । " दाई मां ने बताया _ " मैंने बताया था कि रानी बिटिया आने वाली है , सो कहने लगी कि मुझसे मिलने जरूर भेज देना । "
जाते समय दाई मां ने फिर याद दिलाया कि मैं भाभी से मिलने चली जाऊं ।
दूसरे दिन जब जाने के लिए तैयार हो गई तो पिताजी ने कहा _ " क्यों जा रही हो ? फ़ालतू लोग हैं । बच्चे को तो बिल्कुल नहीं ले जाना । " कहते हुए मुन्ने को करीब करीब छीन ही लिया ।
रानी मिश्रा चाचा के दरवाजे पर पहुँची , भयावह सन्नाटा पसरा था । वह आंगन , जहां कभी चौपाल लगती थी , मजमे होते थे , जलसे मनाए जाते थे आज एक आदमी को तरस रहा है ।
एक लड़का चौकीदारी करते बैठा था पूछने पर बताया कि पुराने चौकीदार का बेटा है ।
रानी अंदर आ गई । बरामदे में चाचा आराम कुर्सी पर पड़े हुए थे। आँखे खुली थी और शरीर शांत था । रानी ने सामने जाकर हाथ जोड़कर " नमस्ते" की ।
एक क्षण ताकते रहे फिर आँखों की कोरों से पानी बहने लगा मानो अंदर की व्यथा द्रव रूप में बना चाहती हो ।
आँगन में लगी तुलसी सूख गई थी। आम का पेड़ भी मौन मूक सा खड़ा था । अब मानो पक्षियों को भी यहां बसेरा बनाना रास नहीं आता है ।
एक कोने में चाची सिमटी बैठी हुई थी हाथ में माला लिए कुछ बुदबुदा रही थी । चेहरे पर कितनी झुर्रियां पड गई है , हर एक की अपनी कोई कहानी जरूर होगी ।
रानी को सामने देखकर पहचानने की कोशिश करने लगी फिर अचानक सिर पर पल्ला डालकर सुबकने लगी ।
रानी के पैर अपने आप ही " नई भाभी " के कमरे की तरफ उठ गए । अंधकार और उमस का साम्राज्य था । एक क्षण सांस लेना भी कठिन लग रहा था ।
अंदर जाकर रानी ने उस खिड़की को खोलने की कोशिश की जो शायद कई दिनों से बंद पड़ी थी । चार-पाँच ताकतवर धक्कों से खुली , रानी ने परदा सरका दिया।
कमरे में हल्की सी रोशनी बिखर गई । पलंग पर पीली पड़ी , कृशकाय , हड्डियों का ढांचा हुई भाभी पड़ी थी । अचानक प्रकाश हो जाने से उनकी आँखें चौंधिया गई थी ।
रानी झपटकर पलंग के पास गई , उसकी प्यारी , दूध के समान गोरी , मक्खन के समान चिकनी " नई भाभी " ; असहाय , कमजोर और अमरबेल सी पीली पड़ गयी है ।
" नई भाभी " क्या हाल बना रखा है आपने ? कितनी कमजोर हो गई हो ? डाॅक्टर के पास क्यों नहीं जाती ? " एक साथ कई प्रश्न कर दिए रानी ने ।
" गुड़िया बैठो ना मेरे पास । अकेली आई हो , छोटे को नहीं लाई ? " थकी , कराहती आवाज में भाभी ने कहा ।
" अभी अभी सोया है भाभी । पिताजी के पास छोड़कर आई हूँ । " पता नहीं क्यों , आज यह छोटा सा झूठ रानी को मनों भारी लग रहा था ।
" आपको क्या हुआ है भाभी ? " रानी ने उनका हाथ थामकर पूछा ।
" हम चार बहनें थीं , बिना मेरी मर्जी जाने इस घर में मेरा विवाह कर दिया गया । यहां कभी किसी ने मुझे इंसान नहीं समझा । मैं हाड़ मांस की " बहू " ही रह गई । " भाभी ने नि:श्वास लिया ।
" जब जब गर्भवती हुई तब तब जाँच करवाते । चार बार लड़की ही थी और इन सबने एक को भी दुनिया में नहीं आने दिया ।" दिल का नासूर फटने लगा ।
" भैया , वो क्यों कुछ नहीं बोले ? आखिर वो पति हैं आपके ? " ना जाने आज रानी ने पूछ लिया ।
" पति ऐसे नहीं होते बिन्नो । अब तो तुम भी किसी की पत्नी हो , तुम भी इस रिश्ते को समझती हो ।" भाभी ने बात पूरी करते हुए कहा _ " अपनी बुरी आदतों , फिजूलखर्ची और काम ना करने की सोच ने सब बरबाद कर दिया । जमीन जायदाद बिक गई , पिछले छह महीने से जेल में हैं । अब पिताजी भी असमर्थ हैं , ना शरीर साथ देता है ना ही पैसे ही हैं कि अपने सपूत को छुड़ा सकें ।" ज्वालामुखी सा फट गया नाजुक मन ।
" वो आलमारी खोलो । " भाभी ने आज्ञा दी ।
अनमने से उठकर रानी ने आलमारी खोली । भाभी की बताई जगह पर एक थैला रखा था ।
थैले में से भाभी ने लाल रंग का एक स्वेटर और टोपी निकाली ।
" अपने बेटे को पहना देना । तुम्हारी शादी के बाद ही बुन लिया था मैंने । " एक क्षण के लिए उनके चेहरे पर वही चमक आ गई जो सालों पहले स्कार्फ देते समय थी ।
स्वेटर , टोपी हाथ में लेते हुए रानी की आँखें बरस गई ।
कितना प्रेम , कितना वात्सल्य भरा है और क्रूर लोगों ने इनसे " माँ " बनने का अधिकार भी छीन लिया ।
चार बार जिनके प्रेमांकुर को निर्दयता से उखाड़ फेंका । इतना जुल्म सहने वाले मन को कौन सा डॅाक्टर और इलाज ठीक करेगा ।
रानी ने कसकर " भाभी " को अपने से चिपटा लिया मानो समा लेना चाहती थी उनके अस्तित्व को , उनके दर्द को और नारीत्व के अपमान को ।
कुछ देर बाद रानी वापस आ गई।
दूसरे दिन देखा तो खिड़की फिर बंद हो गई थी । भाभी को रोशनी , हवा , खुशी और जिंदगी की कोई चाह नहीं रही थी ।
चार-पाँच दिनों बाद रानी ससुराल वापस चली गई । एक महीने का समय देखते ही देखते गुज़र गया और बारिश की शुरुआत हो गई थी ।
बाहर बारिश हो रही है , कमरे में ठंडक हो गई थी । खाना खाकर सब लोग बादलों की गड़गड़ाहट , बिजली का तांडव दिल थामकर देख रहे थे ।
रानी ने लाल स्वेटर और टोपी निकाला और मुन्ने को पहना दिया। गोरा-गोरा मुन्ना " नई भाभी " की भेंट से सजा किलकारी मार रहा था ।
अचानक फोन की घंटी बजी , मम्मी ने फोन उठाया और आवाज लगाई _ " बहू , तुम्हारे पिताजी का फोन है । आओ बात करो ।"
रानी का दिल धड़क उठा कि पिताजी की तबियत तो ठीक है ना ।
" हैलो पिताजी , कैसे हो आप ? इतनी रात फोन किया , क्या बात है ? " एक ही सांस में रानी ने पूछा।
" मैं ठीक हूँ बेटी । आज शाम तुम्हारी " नई भाभी " गुजर गई । कल सुबह उनका अंतिम संस्कार है । माँ- बाप और बहन आने वाले हैं , तभी संस्कार करेंगे । " पिताजी ने ठंडे स्वर में कहा ।
बिना कुछ कहे रानी ने फोन रख दिया ।
" यह कैसा नियम है समाज का ? जब तक बेटी जिंदा थी , कभी कोई मिलने नहीं आया ।
" लड़की के घर का पानी भी नहीं पीते हमारे यहां तो ।" ऐसा कहा जाता है ।
अब उस बेजान काया को क्या और क्यों देखेंगे ?
समाज , परिवार और अपनों ने इस अधिकार को क्यों मान लिया।
धीरे धीरे रानी बच्चे के पास आई और उसके स्वेटर टोपी पर प्रेम से हाथ फेर कर अपनी " नई भाभी " को दिल से विदाई दे रही थी ।
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