बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

" मधुमालती "

हवा का एक हल्का सा झोंका , नथुने से सारे अंत: को तरोताजा कर  गया । ऐसी मदमस्त सुगंध , मानो मृत देह में भी एक श्वास भरने की चाहत पैदा कर दे ।

लोपा ने आगे बढ़कर परदा एक तरफ सरका दिया जिससे हवा बेरोकटोक आ-जा सके । अच्छा है कि चीजों की बागडोर भगवान ने संभाल रखी है वरना लोगों का बस चले तो हवा , पानी , प्रकाश पर भी हुकुम चलाने लगें ।

फूलों का बहुत शौक है लोपा को , इस मधुमालती के पौधे को उसने बड़े प्यार से लगाया था । घर के आसपास की छोटी सी जगह में वह अपना बागवानी का शौक पूरा करती थी ।

उसका पति सुजीत , काम के सिलसिले में अक्सर शहर के बाहर रहता था । लोपा अपना बहुत समय इस खिड़की के पास व्यतीत करती थी ।

आठ साल पहले उसका विवाह सुजीत के साथ हुआ था ।

वह एक ग्रामीण बैंक में नौकरी करती थी । तीन भाई बहनों में सबसे बड़ी थी वह । एक भाई और छोटी बहन । पिताजी का कपड़ों का छोटा सा व्यापार था और वैसा ही छोटा घर द्वार ।

माँ ने बच्चों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनका उसूल था कि एक समय खाना मत मिले तो चलेगा परंतु पढ़ाई-लिखाई में कोई बहाना नहीं चलेगा ।

ग्रेजुएट होते ही लोपा को ग्रामीण बैंक में नौकरी मिल गई । परिवार में अब आर्थिक स्थिरता आने लगी थी ।

खिड़की का पर्दा हट जाने से , सामने घर के रसोई की खिड़की सीधे दिखती है । चिर परिचित दोनों चेहरे , एक नया जोड़ा रहने आया है । करीब छह महीने पहले आए थे वो दोनों , साथ घर -गृहस्थी का थोड़ा सामान था ।

दोनों नौकरी करते थे , सुबह साथ ही जाते और करीब आगे-पीछे ही लौटते हैं । अपनी दुनिया में मग्न रहते हैं , किसी की कोई पहचान नहीं ना ही आना जाना ।

छुट्टी के दिन बाहर घूमते फिरते हैं और बाकी दिन दोनों मिलकर रसोई में खाना बनाते हैं । उनके चहकने की आवाज लोपा के कानों में गूंज रही थी ।

एक नि:श्वास भरकर लोपा ने खिड़की की ओर पीठ फेर लिया ।
उसने पीठ दिखाई परंतु उसकी प्रिय सखी ने अपनी खुशबू देना बंद नहीं किया ।

" कैसी हो दीदी ? " परिचित आवाज सुनकर लोपा चौंककर पलटी ।  हाथ  दिखाते हुए काली जा रही थी ।
" अच्छी हूँ । तू कैसी है ? आना कभी , दीदी को भूल गई क्या ? " लोपा ने प्रेम से कहा ।

" नहीं दीदी , भूली नहीं । आजकाल खूब काम हो गया । चार-पांच घोर का काम । मेरा होता है तो घोरवाले के काम में थोड़ा मदद देती हूं ।  कागज का थैला बनाता है वो । " रूककर उसने लोपा से बताया ।

अभी लोपा आगे कुछ बोलती कि झनझनाती , कर्कश आवाज ने मधुमालती के सुगंध में ऐसा कड़वापन घोल दिया , जिसे आत्मसात करना उसकी मजबूरी है ।

" सारा दिन खिड़की पर खड़े होकर किससे बात करती है रे बेशरम औरत ? सुजो रहता है तो मुंह से आवाज नहीं निकालती । बाद में मौज-मजा कोरती है ।" गरम सीसे की तरह कानों में बोल उतरते चले गए ।

लोपा ने खिड़की बंद कर दी । क्या किस्मत है ? फूल अपनी खुशबू से उसमें जीवन संचार करने का प्रयास कर रहा है और वो खुशियों के सारे दरवाजे बंद करती जा रही है ।

बोझिल कदमों से बरामदे में आई तो सुजीत की काकू माँ चारपाई पर पड़े पड़े उसको गालियों से निशाना बना रही थी ।

अपने शरीर को खुद उठा नहीं सकती परंतु अपशब्द , गंदी गालियां और भद्दे व्यंग्य के भंडार से  लगातार वार करती रहती है ।

बिना कुछ कहे सुने लोपा ने मेज़ पर रखा पानी का बर्तन उठाया और रसोई में जाकर पीने का पानी भर लाई ।
भरा लोटा रख ही रही थी कि उसने पीतल का गिलास फेंककर मारा । कानों के पास से गुजर कर गिलास दरवाजे पर जा टकराया ।
उसकी छनछनाहट ने लोपा को संज्ञाशून्य सा कर दिया ।

उसके कान शून्य से हो गए । रोज रोज सुनकर उन्होंने हार मान ली है और  दिमाग से अपना संबंध तोड़ लिया है । अब सिर्फ दिल की सुनते और समझते हैं ।

लोपा ने गिलास उठाकर रखा तो घूरती हुई दो लाल हिंसक आंखें  मानो शक्ति होती तो लील जाती उसको ।

" दिन भर खिड़की पर खड़ी लोगों से बात कोरती है सुअर की बच्ची। सुजो रोहता नहीं , तू मौज मजा कोर । बांझ कहीं की , एक बच्चा भी नहीं जना । सुजो का नाम कौन कोरेगा ? " मानो शरीर की शक्ति सिमटकर जीभ में आ गई है ।

लोपा ने घूरकर उसको देखा और फिर रसोई में आ गई ।
दलिया का डिब्बा निकाला और छलनी से छानने लगी ।
महीन छिद्रों से झरते दलिए की तरह कई महीन यादें आसपास बिखरने लगीं ।

शादी के समय ही सुजीत ने प्रस्ताव रखा था कि उसको काम से बाहर जाना पड़ता है और वह अपनी काकू मां को अपने साथ रखेगा ।
मां बाबा तो थे नहीं उसके , यही एक काकू है ।
शादी बहुत ही साधारण ढंग से हुई। बाराती के नाम पर सुजीत के पांच-छह दोस्त ही थे ।
मां ने लोपा की पगार से ही बचाकर कुछ जेवर बना रखे थे ।

बाबा ने व्यापारी संघ से कर्जा उठाया था । कहते थे _ " एक मौसम अच्छा हो जाएगा तो सब चुक जाएगा । बेटी की शादी रोज तो नहीं होगी ।"

बाबा का कर्जा तो कब का चुक गया होगा पर वो जिस दलदल में फंस गई , पता नहीं कब मुक्ति होगी ।

छलनी थाली के किनारे से टकराई और लोपा वर्तमान में आ गई । खाली छलनी उसपर मुस्करा रही थी ।
लोपा ने स्टोव जलाया और फटाफट पतला , नमकीन दलिया बनाकर कटोरे में डालकर बरामदे की ओर बढ़ गई ।

सामने की टेबल सरकाकर , उसपर कटोरा रख दी ।
अभी अभी जिस औरत ने उसको गालियों से स्नान कराया था , उसे हाथ से सहारा देकर पीठ पर तकिया लगा कर बैठाने की कोशिश की ।

कटोरा देखते ही उसके तनबदन में आग लग गई ।
" कमबख्त , रोज नमकीन बनाती है । मीठा तेरे बाप को देगी । तेरे को जोमीन में गाड़ देगा सुजो । आने दे उसको ।" नमकीन दलिए  से जुबान और  नमकीन चटकीली हो गई थी ।

" किसी काम की नहीं कामचोर ... अरे...मर जा.. क्यों बैठी है इस घोर में....।" लोपा ने सामने अपने  कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया ।

सब दरवाजे बंद हो गए थे उसके लिए । मायके में भी कोई  आसरा नहीं है । दोनों बेटियों की शादी करके बाबा थक गए थे ।
माँ भी साथ छोड़ गई थी । बाबा और छोटू दा साथ रहते कारोबार और घर चला रहे थे ।

सुजीत के व्यवहार से क्षुब्ध होकर वो अब बेटी से भी संबंध नहीं रखना चाहते थे ।

एक बार राखी में छोटू दा आया था । लोपा ने भाई के लिए हलुआ बनाया और राखी बांधी । उसी समय सुजीत आ गया और जो मुंह में आया बकता गया ।

" सालीऽऽ.. भाई को हलुआ खिलाती है । मैं दिन भर काम करता हूं । मेरी कमाई इसको खिला रही है ।" आगे गुस्से से हांफते हुए कहा _ " तेरी मां ने बेटा पैदा किया तू तो बांझ है बांझ । खाली , खोखली , बंजर ....।" शराब के नशे में धुत्त उसकी बड़बड़ पूरी सुने बिना ही छोटू दा निकल गया और फिर कभी नहीं आया ।

बंद कमरे में दम घुटने सा लगा उसका । इस बेकार जिंदगी को खत्म कर लेने का साहस भी नहीं था उसे । अपनी माँ का चेहरा आंखों के सामने आ जाता और उनके शब्द कानों में गूंजने लगते _ " तू ससुराल जा रही है लोपी , वहां सब मिल जाएगा पर माँ नहीं। खुद अपना ध्यान रखना। भूखे पेट कभी मत सोना । गुस्सा पी लेना , चाय समझकर । तू तो मेरी बड़ी आस है रे ।"  नैनों से जलधारा बह चली ।

बाहर बच्चों के खेलने की आवाज आ रही है । गेंद को मारकर एक दिशा से दूसरी ओर ले जाते । उसकी भी ज़िंदगी इस मार खाती गेंद की तरह है जो ठोकरें खा कर भी जी रही है ।

खिड़की का पल्ला बंद है फिर भी दरारों से मधुमालती की महक नथुनों में समां रही है ।

शादी के बाद एक महीने वे गांव के घर में रहे । परिवार के नाम पर  तीन लोग थे । काकू मां ज्यादा उम्र की लगती नहीं थी । सुजीत से कोई आठ-दस साल की बड़ी होगी ।

सुजीत ने बताया कि वो बालविधवा है और  हमारे घर में रहेंगी । उसने कहा कि उनकी सेवा करना ही लोपा का धर्म है ।

एक महीने बाद वो दोनों इस घर में आ गए । कुछ ही दिनों में सुजीत के बर्ताव में  अंतर आने लगा । पहले देर रात घर लौटता , बाद में दो-दो , तीन-तीन दिन घर आता ही नहीं था । हमेशा शराब के नशे में चूर रहता । कुछ भी समझाने की कोशिश के बदले लोपा के बदन को एक नया घाव मिलता ।

हैवान बन गया था वो । ना लोपा से प्यार था ना रिश्ते की कोई अहमियत। शादी में माँ -बाबा से मिले सारे गहने जेवर गांव में काकू के पास रखवा दिया था जो फिर कभी लोपा को देखने ना मिले ।

जेवरों का ध्यान आते ही लोपा का मन वितृष्णा से भर गया ।
" क्यों बनवाया था इतना जेवर माँ ने ? कितने मुश्किल से पैसे जोड़े थे । क्या मिला ? क्यों इतना देने के बाद भी बेटियां रीती रह जाती हैं ?  क्योंऽऽऽ..? "

घबराकर लोपा ने खिड़की खोल दी और गहरी गहरी सांसें भरने लगी । कुछ क्षण बाद मानो सारी कड़वाहट मधुमालती ने अपनी खुशबू में घोल ली ।

पिछले साल सुना गांव में काकू फिसलकर गिर गई और कमर में चोट आई है । दो दिन बाद ही , सुजीत यह कहकर कि यहीं रहेंगी और देखभाल करना , उनको ले आया ।

ये  "काली" तब पहली बार इस घर में आई । सुजीत लाया था उसको ।

" काकू की देखभाल तुम करना । ये काली है , ये तेल मालिश करेगी । काकू जल्दी अच्छी होनी चाहिए। " सुजीत ने मानो हुक्म दागा ।

काली अपने नाम की तरह श्याम वर्ण की , चपटी नाक , बड़ी बड़ी आंखें और होंठ से बाहर झांकते हुए दांत । शरीर एकदम गठा , कसा ।आकर उसने लोपा को प्रणाम किया ।
" दीदी , मैं सब काम करुंगी । आप सिर्फ बता देना ।" उसने कहा ।

" सोब काम क्यों करेगी तू ?  तेरी दीदी ने हाथों में मेहंदी और पांव में आलता लगाया है जो वो काम नहीं कोरेगी । तू सिर्फ मेरा काम कोरेगी , सोमझी ।" दहाड़ते हुए काकू ने कहा _ " खाली फोकट बैठी रहती है पोत्थर का पुतला ।" अपमान का बड़ा कड़वा घूंट अन्दर पी लिया लोपा ने ।

दूसरे के सामने इतना अपमान , मानो गरम चाय की चुस्की से मुंह को चटका लग गया हो । वह समझ गई कि अब तो आगे रोज़ ही यह आएगी और काकू की जबान उस समय अपनी चरम सीमा पर काम करेगी ।

अच्छा हुआ जो लोपा ने इस मधुमालती के पौधे को खिड़की के बाहर थोड़ी जगह दी । उसके हर नए पत्ते की जानकारी रहती थी उसको । जब जब उसको स्पर्श करती लगता गोपा और छोटू दा के पास है । वह भी हवा के झोंको से झूमकर उससे चिपट जाना चाहता है मानो मौन प्यार को अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रहा हो ।

काली सुबह दस बजे और शाम पांच बजे , दिन में दो बार आती थी । तेल गरम करके काकू की मालिश करती थी ।

तेल गरम करते समय ही वह लोपा से बात कर पाती थी । एक दिन थोड़ा समय खड़ी हो गई तो _ " अरी ! मोर गई क्या ? उस चुड़ैल से बात कोरने आती है या मुझे मालिश कोरके ठीक करने? सिर्फ मुंह चलाती है हाथ में शोक्ति नहीं । दिन दिन मेरा कोमर ढ़ीला पोड़ता जा रहा । " काकू का उबाल तेल से ज्यादा खतरनाक था ।

काली भागकर उनके पास खड़ी हो गई ।
धीरे धीरे , काली ने सुजीत के चरित्र , चाल-चलन , व्यवहार और काम धंधे का खुलासा किया ।
लोपा का संशय अब विश्वास में  बदल गया ।

एक शराबी , जुआरी , चरित्रहीन व्यक्ति के साथ जीवन की डोर क्यों बांध दिया भगवान ने । कैसे जिएगी वो आगे ?
किसी गैंग के लिए काम करता था , पैसा वसूली और कभी अवैध चीजों का लेन-देन भी ।

काली का हर एक शब्द , तीर की तरह हताहत कर रहा था उसको । उसकी आत्मा तक बींध गई थी ।

मायके जाने की मनाही थी उसको ।  ना कोई मिलने आता ना वो किसी से अपने दिल की बात कह पाती । उम्रकैद भुगत रही थी यहां।
गांव में भी सुजीत के कर्मों के किस्से फैल गए थे । माँ -बाबा के कानों तक बात पहुंच गई तो उन्होंने अपने और बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए लोपा से दूरी बनाने में ही भलाई समझी ।

माँ की मौत की खबर भी देर से आई और जब वह पहुंची तो सिर्फ राख शेष थी । अपने ही मायके में दो दिन वह मेहमान की तरह रही और फिर सुजीत आकर सारी बिरादरी के सामने गाली-गलौज करने लगा  । उसी समय लोपा ने चुपचाप सामान बांधा और हमेशा के लिए इस पिंजरे में कैद होने के लिए वापस आ गई ।

उसी समय गोपा ने उसको बताया कि माँ के सामने ही उसका रिश्ता तय हो गया था । बाबा ने इस बार पूरी जांच-पड़ताल खुद की ।

कहते हैं कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है शायद यही वजह है कि गोपा के साथ काम करने वाले और उसको पसंद करने वाले लड़के की भी बाबा ने खुद तहकीकात की ।

गोपा और वो लड़का एक दूसरे को बहुत दिनों से जानते थे ।
शादी सादी और कोर्ट में होगी , किसी रिश्तेदार और मेहमान को आमंत्रित नहीं करने का फैसला लिया है ।

जब माँ को गुजर कर साल हो गया और मायके से गोपा की शादी का कोई संदेश नहीं आया तब लोपा समझ गई कि "किसी भी  रिश्तेदार और मेहमान " में वो भी शामिल है ।

चिक-चिक , चिक-चिक की आवाज से लोपा चौंक पड़ी ।
" अरे ऽऽ..अरे...हुर्रर...भाग.शशशऽऽ..।" लोपा ने ताली बजा बजा कर शोर मचाया ।
एक गिलहरी अपने नुकीले पैने दांतों से , उसकी सखी के शरीर को नोच-खसोट रही है । लोपा ने उसको भगाकर ही दम लिया । मधुमालती के पत्तों को प्यार से सहलाकर मानो मरहम लगाया और सामने बरामदे में चली गई ।

बरामदे में देखा तो काकू खर्राटे भर रही थी । सिर्फ खाती और सोती है ,जब जागती है तो कैंची से भी तेज़ जुबान चलाती है ।

साल भर से बिस्तर पर पड़ी है तो शरीर भारी हो गया है । कमर के नीचे का भाग सुन्न हो गया और एक हाथ बहुत थरथराने लगा है ।

जब जोर जोर से गालियां देती है तब हांफने लगती है और मुंह से झाग आ जाता है ।

डाक्टर ने कहा था कि _"इनका शरीर ढीला पड़ते जा रहा है । तेल मालिश और दवाइयों के बावजूद दिन दिन हालत बिगड़ ही रही है । कमर की मार का बुरा असर हुआ है ।"

"अरे... मालिश ये करती है कलमुंही । हाथ में दोम ही नहीं है । काली भी नहीं आती , मोर गई कमबख्त ..उसका सत्यानाश..."  और बीच में ही हांफने लगी ।
डाक्टर ने कुछ नई दवाइयां लिख दी और चला गया ।

काली ने  छह महीने काम किया और वो लोपा के बहुत करीब आ गई थी । सुजीत के कारनामों से वाकिफ थी और लोपा के प्रति सहानुभूति थी उसको ।

छह माह होने पर बोली _" दीदी , मेरी शादी हो रही है । घोर पर बूढ़ी सास है । मेरा पति कागज के थैले बनाता है । शादी के बाद मैं भी उसकी मदद करूंगी ।"

कुछ दिनों बाद उसने काम छोड़ दिया ।

खांसने की आवाज सुनकर लोपा के कान खड़े हो गए । काकू जाग गई थी ।

उसकी ओर घूरती रही फिर बोली _ " तेल गरम कर और मालिश कोर मेरी । मुझे खड़ा होना है वो कमबख्त तो भाग गोई । कामचोर साली.. । " और लोपा गालियों के बौछार से मुख मोड़ कर रसोई में तेल गरम करने लगी ।

गरम तेल में एक पूडा़ दवाई का मिलाया और ठंडा होने का इंतजार करने लगी ।

जिस दिन काली ने काम छोड़ा था , लोपा ने उसे अपने पास रखा सोने का एक कर्णफूल देते हुए कहा था _" ये रख ले । एक ही है , बेचकर छोटे-छोटे दो ले लेना । मेरी मां की निशानी है , जब भी पहनेगी मुझे याद करेगी ।"

" नहीं नहीं दीदी , इतनी बोड़ी चीज मैं कैसे ले सकती हूंँ ? " पीछे हटते हुए काली बोली ।

लोपा ने जबरदस्ती से उसके हाथों में पकड़ाया और फिर उसको गले लगा लिया ।
काली के जाने के बाद लोपा घर काम भी करती और काकू की मालिश भी ।
सुजीत कभी आठ-दस दिनों में आता था तो काकू के हाथ में पैसे-रूपए धर देता । काकू की शिकायत पर लोपा को जानवरों की तरह पीटता ।

हाथ में आए पैसे और लोपा को पड़ती मार , काकू के अंग अंग में मानो नई जान फूंक देते थे ।

अंगुली घुमाकर देखा तो तेल ठंडा हो गया था और कटोरी उठाकर लोपा बरामदे में आ गई । तेल लगाने के बाद दवाई देना रहता है , जो शायद कड़वी है इसलिए दूध में मिलाकर पीती है ‌।

मालिश के लिए कमर में हाथ लगाया तो लोपा को सालों पहले का वह दिन चलचित्र की तरह आंखों के सामने घूम गया ।

शादी के बाद , गांव के घर में लोपा काकू मां को खाने के लिए बोलने गई थी ।
कमरे का दरवाजा टिका था तो धकेलकर अंदर चली गई ।अंदर का दृश्य उसको आहत कर गया ।

" ये कैसा रिश्ता , ये कैसे लोग हैं ?  किन जानवरों के बीच आ गई मैं भगवान ? " घबराकर उसने आंखें बंद कर ली ।

सुजीत अपनी लुंगी बांधता हुआ तेजी से बाहर निकल गया । वो औरत जिसे वह सुजीत की मां का दर्जा दे रही थी , लोपा के गहनों से लदी बैठी थी । रंगीन साड़ी और गहनों से सजकर  सुजीत के साथ रंगरेलियां मना रही थी ।

एक कर्णफूल उस समय लोपा के पैरों के पास आ गिरा , उसने चुपचाप उठाया और बाहर निकल आई ।
" तेल तो लोग गया , अब दवाई  देगी या ऐसे ही खोड़ी रहेगी । खुद के मोन से तो कोई काम करती नहीं । इस घोर में कामवाली है तू ...बोस्स्.. और कुछ नोई ...।" वाक्य पूरा करते करते उसकी आवाज कांपने लगी और सांस उखड़ने लगी ।

बिना कुछ कहे लोपा रसोई में चली गई , दूध बरतन में डाला और हल्का गुनगुना किया ।गिलास में भरकर , चम्मच भर दवाई एक पैकेट से निकालकर उसमें डाली और घोलने लगी ।

गिलास के दूध में मानो लहरें उठ रही थी जो सूखी दवाई को अपने में समेट लेना चाहती थी ।

ऐसी ही लहरें लोपा के  हृदय में मचल रही थी जो खामोशी से , इस अवैध नगरी को खत्म कर देना चाहती थी , जिसमें ना नैतिकता है , ना संस्कार , ना विचार और ना ही रिश्तों की कोई मर्यादा ।

आंखें उठाकर दवाई के पैकेट की लिखावट पढ़ी _" अधिक मात्रा में लगातार सेवन से लकवा , मिर्गी और दिल का दौरा पड़ सकता है।"

काली को कर्णफूल देने के बाद की गले मिलाई , ज्यादा मंहगा सौदा नहीं था ।

दवाई का गिलास उस औरत के मुंह में लगाकर , बिना खत्म होने का इंतज़ार किए लोपा गुनगुनाती हुई अपनी प्रिय सखी के पास आ गई और दरवाजा बंद कर लिया ।

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