सुबह अखबार देखा ,
हर तरफ हड़ताल, धरना ।
अपने अधिकारों के लिए ,
लोग कह रहे "बंद करना" ।
मुझे भी अपने "गृहिणी अधिकार" याद आ गए ।
बस्स ..मेरे दिलो-दिमाग पर
विद्रोह के बादल छा गए ।
दिन भर काम ना करने की जैसे ही मैंने "भीष्म प्रतिज्ञा ली ,
वैसे ही महरी ने अपने आपातकाल की सूचना दी ।
ऐसे बड़े संकल्प के सामने
कैसे बाई ने रोड़ा किया ।
आनन फानन में मैंने ,
सारा काम निपटा लिया ।
गुनगुनी धूप ,चाय की प्याली
अपने को आराम के लिए तैयार किया ,
फोन पर आए मैसेज ने ,
मेरी प्रतिज्ञा को तार तार किया
बीस की मटर दस के भाव,
मैंने आराम की बात छोड़ दी
महाभारत में भगवान ने खुद
प्रतिज्ञा तोड़ दी ।
आधे कीमत की खूबसूरत मटर
मेरे मन को भा गई ।
पाँच किलो का झोला उठाए
मैं वापस घर को आ गई ।।
मटर के साथ मटरगश्ती में
सारा दिन आराम से बीत गया
घंटी बजी, द्वार खोला तो..
सपरिवार मेहमान पे मन रीझ गया ।।
वो अचानक आ जाने के ,
बीसियों कारण बतला रहे थे
"भीष्म प्रतिज्ञा"के इस हश्र पर
हम सौ-सौ आँसू बहा रहे थे ।।
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