मंगलवार, 19 मार्च 2019

"मेरा बक्सा "

सफाई करते हुए, आज मुझे एक बक्सा मिला ।
बक्सा जो ना जाने किस धातु से बना है,
सिर्फ उसके ऊपर फूल बने हैं,
जो अब आधे अधूरे दिखाई देतें हैं
गर्द काफी जमी हुई है ,
बहुत दिनों से किसी ने छुआ नहीं है ।

अब खोलने पर चिचियाने भी लगा है ,
शायद कहता हो ,मेरी जरूरत ही क्या है ?
एक जमाने में यह राजा हुआ करता था ,
आलमारी के सारे असबाबों में बेशकीमती ।
सोने, मोतियों को अपने में समेटे हुए ।

आज भी मैंने उसे उतने ही प्यार से खोला ,
पुराने समय में झांकने लगी थी मैं ।
मेरे बच्चों की कुछ खास चीजें ,
मुझे उनके बचपन में ले जा रही थी ।
रंगीन कलमें, कुछ सूखी पत्तियां
सितारे ,बटनें और चिकने पत्थर ।

तमाम नदियों, झीलों के किनारों से उठाये पत्थर ,
उन्हें सहलाकर मैं वापस वहीं जा रही हूं ।

बक्से को प्यार से गोद में लेकर मैंने कहा_
"बेशकीमती हो तुम आज भी ,
जब जब तुमको झांकती हूं ,
बीता समय, याद बन महकने लगता है ।"

मेरा बक्सा अब मुस्कुराने लगा है।

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