चार-पाँच दिनों से जय पढ़ने नहीं आया है , पता नहीं क्या बात है ? हमेशा आता है । उसके आसपास का कोई और बच्चा मालती के पास आता नहीं है । मालती के घर से करीब दो-ढाई किलोमीटर की दूरी पर एक छोटी सी बस्ती है , वहीं रहता है जय । फोन भी नहीं है उसके घर की उसका हालचाल जान लेती । जो दूसरे बच्चे पढ़ने आते हैं , वो भी जय को पहचानते नहीं हैं ।
बच्चों को पढ़ाकर अभी फारिग हुई है मालती । सारा कमरा अस्त-व्यस्त पड़ा है । पाँचवीं से नवमी कक्षा के बच्चों को गणित, विज्ञान पढ़ाती है मालती । दो बार ,दो घंटे की कक्षा रखती है । कुल दस-बारह बच्चे होते हैं ।
उन बच्चों के बीच उसका अपना मन लगा रहता था ।
उनके साथ वह भी , एक बार फिर पुराने समय को जी लेती थी ।
सोफे पर कुशन ठीक से लगाए और मेज़ पर पड़ा अखबार नीचे रखा । कुर्सियाँ सब जगह पर व्यवस्थित करने के बाद , देखा तो बच्चों की पेन और पेंसिल छूट गई हैं । यह तो रोज का ही काम है , कोई घर पर भूल आता तो कोई यहाँ छोड़ जाता । वही उनको याद से देती थी ।
रसोई की ओर जाते हुए सोचने लगी कि सुरेखा भी दो दिनों से आई नहीं है । फोन भी बंद आ रहा है । गैस पर चाय का पानी रखकर वह अदरक कूटने लगी । कुछ मठरियाँ प्लेट में डाल लिया और प्याली में चाय छानकर बरामदे में आ गई । बारिश के अलावा सभी मौसम में यह जगह उसकी पसंदीदा है । बारिश में भी वो चाय तो यहीं पीती है । बादलों की आवाजाही , बूँदा बाँदी , सामने आम के पेड़ पर अपने आपको बचाते पक्षियों को देखकर , लगता था कि उन्हें अपने घर में आश्रय दे दूँ ।
बेंत की कुर्सी पर फैलकर बैठते हुए सोचने लगी कि रात खाने में क्या बनाऊँगी ? सुरेखा कभी कभी भाजी साफ कर दिया करती है । दो दिनों से घर का काम , बच्चों की पढ़ाई में मालती थक जा रही है । अभी बच्चों के लिए कुछ नाश्ता बना देना चाहिए नहीं तो आने के बाद उनको खाने की जल्दी रहती है ।
रवि को आने में आठ बज जाते हैं । वो आने के बाद समाचार देखते हुए ही खाना खाते हैं । सोनू ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता है और नेहा सातवीं में । सोनू विज्ञान लेकर पढ़ रहा है , नवमी तक तो वो खुद सब विषय पढ़ाती थी परंतु दसवीं के लिए सोनू को बाहर कक्षा लगवाया था । रवि एक कंप्यूटर इंजीनियर हैं और सोनू को कंप्यूटर में जो भी कठिनाई होती थी वही समझा देते हैं ।
हलुआ की कढ़ाई में चम्मच घुमाते हुए मालती को फिर जय याद आ गया । जब वह पहली बार आया था तो मालती ने उसको हलुआ दिया था । कितना खुश हुआ था वह । ऊपर से मना कर रहा था पर खाने का मन भी था , जबरदस्ती उसके हाथ में प्लेट थमा कर अंदर आ गयी थी ।
सातवीं में पढ़ने वाला , एक होनहार बच्चा है जय । गरीब परिवार की तीसरी संतान , पिता किसी कारखाने में काम करते थे और माँ बर्तन , कपड़े किया करती ।
सोलह साल की उम्र में ही बड़ी बहन की शादी कर दी गई । जय से बडा भाई नवमी की पढ़ाई अधूरी छोड़कर कुछ छोटा-मोटा काम करने लगा । छोटे दोनों भाई-बहन जय के ही शाला में पढ़ते हैं ।
बच्चों की आवाज से मालती की सोच को विराम लग गया । नेहा ने आते ही शिकायत की _"मम्मी , मैंने सब सही लिखा था फिर भी टीचर ने पूरे नंबर नहीं दिए । पूजा ने भी वैसा ही लिखा , उसको मुझसे ज्यादा दिए ।"
" हाँ , तेरे से तो दुश्मनी है टीचर की । खुद ठीक से काम करती नहीं और फिर शिकायत भी करती है ।"
सोनू ने उसको डाँटते हुए कहा ।
" अच्छा चलो अब हाथ पैर धोकर आओ , मैंने आज हलुआ बनाया है ।" मालती ने बचाव करते हुए कहा ।
बच्चे खेलने के लिए बाहर गए और मालती फिर रसोईघर में । पुलाव के लिए सब्जियांँ काटते हुए वह फिर पुरानी बातें याद करने लगी । एक दिन सब्जी साफ करते समय ही सुरेखा ने जय के बारे में उसे बताया था _ " दीदी , मेरे पड़ोस में एक बच्चा रहता है । जय नाम है उसका । बहुत होशियार है दीदी । गणित में थोड़े कम नंबर मिलते हैं । आप तो सब बच्चों को पढ़ाती हो , उसको भी पढ़ा दो ना दीदी । गरीब घर का लड़का है आपको फीस नहीं दे सकता , पर उपकार जरूर मानेगा ।" मैंने सहज ही कह दिया _" ठीक है ले आना उसे ।"
अगले दिन ही वह जय को ले आई । साँवला रंग , भोला- भाला चेहरा , प्यारी सी मुस्कान । आते ही पैरों में झुककर प्रणाम किया । उसके संस्कार ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं अनजाने ही दूसरे बच्चों से उसकी तुलना करने लगी । हाथ जोड़ कर नमस्कार करने में भी आज बच्चे कतराते हैं ।
"आप मुझे गणित समझा देंगी टीचर ? " उसकी आशा भरी आवाज मेरे दिल में उतरती चली गई ।
" तुम कैसे आओगे , तुम्हारी बस्ती तो यहाँ से दूर है ?"
मैंने प्रश्न किया ।
"मैं रोज आऊँगा । आपको मालूम है कि स्कूल में दौड़ में मैं हमेशा प्रथम आता हूँ । मैं भागते भागते पढ़ने आ जाऊँगा ।" चमकते चेहरे से उत्तर दिया ।
" ठीक है तुम अगले सप्ताह से आ जाना ।"हँसते हुए मालती ने कहा ।
तभी उसने उसे खाने के लिए हलुआ दिया था ।
" मम्मी , कल स्कूल में चार्ट बनाना है । मुझे कागज दो ।" नेहा की आवाज से मानो मालती वापस आज में आ गई ।
" खुद लो नेहा । अपने काम स्वयं करना सीखो ।" गुस्से से मालती ने कहा ।
सोनू भी कंम्पयूटर पर बैठा काम कर रहा था ।
रवि के आने पर सब खाना खाने बैठे । हलुआ मुँह में डालकर रवि ने कहा _" स्वादिष्ट बना है हमेशा की तरह ।" " पापा मुझे आपसे कुछ समझना है , कल मुझे कंप्यूटर का काम जमा करना है " सोनू ने तुरंत अपनी बात रखी । "ठीक है बाबा , पहले खाना तो खाने दो । " अनमने मन से रवि ने कहा ।
ऑफिस से आने के बाद रवि को टेलीविजन पर प्रसारित समाचारों के अलावा कुछ और अच्छा नहीं लगता ।
रवि और सोनू कमरे में गए और नेहा सुबह के लिए बैग ठीक करने लगी । टेबल पर से बर्तन हटाकर मालती ने साफ-सफाई की , सुबह के लिए सब्जी तोड़ते हुए नेहा को आवाज दी _" नेहा , बैग जमा लिया तो अब सो जाओ ना । सुबह उठती नहीं तुम । सो जल्दी से ।"
रवि ने कोई समाचार चैनल लगाया था , सामने ही बैठकर वह सब्जी साफ करने लगी । किसी बस्ती का दृश्य है , खूब लोग जमा थे । संवाददाता जोर जोर से सबके सामने जाकर पूछ रहा था ।
" ओहो ! कितने जोर जोर से चिल्लाए जा रहा है ।"
मन में गुस्सा करते हुए उसने टेलीविजन बंद करने के लिए कदम उठाए ।
"अरे ! यह तो जय लगता है ।" अपने परिचित चेहरे को देखकर हड़बड़ा गई । उसी भीड़ में सुरेखा भी नजर आई । "हे भगवान ! क्या हुआ इनके साथ ? " मन में सोचते हुए मालती ने ध्यान से देखा ।
आसपास का क्षेत्र काफी गंदा नजर आ रहा था । संवाददाता बोल रहा था कि जहरीली शराब पीने से इस बस्ती के कई लोगों की मौत हो गई ।
मिलों , कारखानों में काम करने वाले लोगों की बस्ती है और तो और रोज़ी-मजदूरी करके अपना जीवन व्यतीत करते हैं यहाँ के लोग । औरतें भी आसपास की कॉलोनी में घर के काम करतीं हैं । सुरेखा ने कई बार बताया था कि _" क्या करें दीदी , सबको शराब की आदत है । जो कमाते हैं थोड़ा-बहुत ही घर में देते हैं बाकी शराब पीने में बरबाद कर देते हैं । घर परिवार, बच्चों की कोई फ़िक्र ही नहीं ।"
अनिष्ट की आशंका से हाथ-पैर काँपने लगे । घबराकर उसने टेलीविजन बंद कर दिया । भारी कदमों और बोझिल मन से अपने कमरे तक आई । जय का चेहरा उसकी आँखों से ओझल ही नहीं हो रहा था ।
खिड़की से आमों की खुशबू लिए हवा आ रही थी , जो मालती को बहुत आनंद दिया करती थी । आज वही हवा भयावह लग रही है । पत्तों की सरसराहट दहला रही है । हर आहट कुछ अनचाहा कह रही थी । उठकर खिड़की बंद कर दिया , जब मन अस्थिर हो तो कुछ अच्छा नहीं लगता ।
रवि आकर कब सो गए , पता ही नहीं चला । बहुत रात तक वह छटपटाती रही कि पता नहीं क्या हुआ है ?
छः महीने से वह जय को पढ़ा रही है और अब अगले सप्ताह से उसकी वार्षिक परीक्षा होनी है । मालती पहले ही दिन समझ गई थी कि वह बहुत होशियार और मेहनती लड़का है । हमेशा गृहकार्य करके लाता , एकाग्रतापूर्वक सब समझता था ।
जब पहली बार उसने गृहकार्य करके नहीं लाया तब मालती ने बहुत गुस्से से कहा था _" ऐसे नहीं चलेगा कि मैं तुम्हारे लिए अपना समय और दिमाग लगाऊँ और तुम दिया काम ना करके लाओ ।"
सिर नीचा करके उसने कहा था _" टीचर , कोई कॉपी नहीं है मेरे पास । जो स्कूल से मिलीं हैं वो वहीं के लिए हैं । मैं कॉपी खरीद नहीं सकता । मैंने गृहकार्य किया है सच बोल रहा हूंँ । घर के सामने आँगन में मैंने लकड़ी के टुकड़े से मिट्टी में गणित किया है । आप कोई भी करवा लीजिए , मुझे आएगा ।"
ना जाने क्यों उसकी निष्कपट , भोली और आत्मविश्वास से भरी बातें मेरे मन को छू गई । मैंने उसे सोनू और नेहा की पुरानी आधी लिखी कॉपियाँ दे दीं ।
इतना खुश हुआ मानो गड़ा हुआ खजाना मिला हो ।
अब तो गृहकार्य के अलावा भी मेरे पास रखी दूसरे लेखकों की गणित पुस्तकों के गणित करता था । उसकी लगन देखकर लगता कि "काश ऐसे बच्चे को थोड़ी सुविधा , अच्छी देखभाल मिल जाती तो यह क्या नहीं कर सकता ।"
मन उन बच्चों के बारे में सोचने पर बाध्य हो गया जो तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद पढ़ाई से जी चुराते हैं । अत्याधिक लाड़-प्यार एवं मनमानी पैसों के कारण , किसी भी वस्तु का मूल्य समझते नहीं ।
सुबह काम जल्दी जल्दी निपटाया और रवि तथा बच्चों के जाने के बाद वह जय का हालचाल जानने निकल पड़ी । उसे रास्ता मालूम नहीं था क्योंकि बस्ती में जाने की कभी जरुरत ही नहीं पड़ी ।
एक आॅटो वाले को बताया तो उसने सही जगह पर पहुँचा दिया । कल टेलीविजन पर इसी इलाके को दिखाया गया था । चौक पर कुछ लोग बैठे थे उनसे जय का नाम , उम्र बता कर उसके घर का पता पूछा ।
" सामने गली के आखिरी घर में रहता है टीचर जी ।" एक नौजवान ने गली की ओर इशारा करते हुए कहा ।
" तुमने मुझे टीचरजी क्यों कहा ? क्या तुम मुझे जानते हो ? " मालती ने आश्चर्य से पूछा ।
" आपके बारे में जय हमेशा सबको बताता है । आपके पढ़ाने की तारीफ करते नहीं थकता । आप जो सिखाती हैं वो दूसरे बच्चों को भी सिखाता है , जिनको गणित कठिन लगता है वो सब उसके पास आते हैं ।" सहजता से उसने कहा ।
आज ना जाने क्यों मालती को अपने शिक्षिका होने पर और जय के विद्यार्थी होने पर गर्व महसूस हो रहा था ।
"धन्यवाद " के साथ उसने कदम गली की ओर बढ़ा
लिए ।
आख़िरी मकान के सामने पहुँचकर उसने इधर उधर देखा । छोटा-सा घर , सामने एक पानी से भरी टंकी ,
वही शायद स्नानघर है । दीवारों पर चिपका पोस्टर , जो चुनाव के बाद भी अब तक पैर जमाये रखा है । दरवाजे पर एक मोटी चादर , जो कुछ जगहों से फटी हुई थी , परदे का काम कर रही थी ।
यहाँ -वहाँ बेतरतीबी से फैली चीजें , जिनपर गंदगी दिखाई दे रही थी । ऐसे जगह में कैसे रहते हैं ये लोग ? साफ तो रख सकते हैं । अंदर से कई लोगों की मिली-जुली आवाजें आ रही हैं ।
एक बच्चा अंदर जाकर मालती के आने का समाचार दे आया । अगले ही क्षण जय तेजी से दौड़ता हुआ बाहर निकला । एकाएक मालती ने उसको पहचाना नहीं । इन तीन दिनों में वो कितना बदल गया है ।
बिखरे बाल , सूजी हुई आँखें , सूखे होंठ , बेजान और निस्तेज चेहरा , मानो कभी इसमें मुस्कुराहट थी ही नहीं । यकायक वह मालती से चिपट कर रोने लगा _" मैं अब नहीं पढ़ सकता टीचर जी । मेरे बाबा मर गए । मेरा बड़ा भाई भी जहरीली शराब पीने के कारण अस्पताल में भर्ती है । डॉक्टर कहते हैं कि वो भी नहीं बचेगा । मेरी माँ , मेरे छोटे भाई-बहन की देखभाल मुझे करनी है । काम करना पड़ेगा मुझे । मुझे माफ कर देना टीचर जी । मुझे अपने परिवार का सवाल हल करना है , जिंदगी का गणित सीखना होगा ।" मालती ने उसे कसकर चिपटा लिया ।
थोड़ी देर बाद बिना किसी से कुछ बोले मालती वापस आने वाली थी कि जय की माँ सामने आ गई । कमजोर , थकी हुई, जिंदगी से लड़ते हुए अपनी हार स्वीकार करती । आँखों में आँसू भरकर कहने लगी _" बहुत से लोग मर गए । कितने परिवार बर्बाद हो गए टीचर जी । सुरेखा का घरवाला भी नहीं रहा । पिछली गली में उसका घर है । अब यहाँ नहीं रहेगी । अपनी माँ के गाँव चली जाएगी । मेहनत मजदूरी करके बच्चों को पालेगी । सब कुछ खत्म हो गया । " वह सुबकने लगी ।
मालती ने उसके कंधों पर हाथ रखा , कहने के लिए शब्द नहीं थे । सुरेखा से भी मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी । क्या इन औरतों को सांत्वना देने के लिए उसके पास शब्द हैं ? जिंदगी के हर दिन जो नए सवालों का सामना कर रहीं हैं , बिना किसी सूत्र के अनजाने समीकरण हल करतीं हैं , उन्हें उसके किताबी ज्ञान से क्या शांत कर पाएगी वो?
जय और उसकी माँ की ओर एक दृष्टि डालकर मालती ने मुँह फेर लिया । तेज गति से कदम बढ़ाते हुए मानो परिस्थिति से भाग जाना चाहती हो । नज़रों के सामने एक धुंँधलका सा छा रहा है , आगे का कुछ साफ नजर नहीं आता ।
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