बुधवार, 4 अप्रैल 2018

"अचार"

बरामदे में बाबूजी ने थैले पलटे ,

छोटे-बड़े ,कलमी, दसहरी

लुढ़ककर करतब करने लगे ।


उन्हें उठाकर प्यार से अम्माँ 

पानी में डाल नहलाने लगीं ।

अमिया से भरे टोकरे गर्मियों में सजा करते थे,

और ऐसे अचार बना करते थे....


बिन्नो दौड़ी , न्यौता दे आई 

मिसराईन चाची,गौरी बुआ

दोपहर ,सज धज कर आईं ।

नुमाइश में रखे आम इठलाया करते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे...


कलमी फाँकने के बहाने ,

भैय्या भी मौका पा जाते ।

तिरछी निगाहों से भाभी को

जी भर निहार जाते ।

अनजाने ही सही पल्लू सरकने लगते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे....


चाची,अम्माँ और बुआ के

बतियाने का सिलसिला जारी रहता ।

नमक,हल्दी,राई, कलौंजी 

आँखों से तुलता रहता ।

हींग की छौंक से दिल गमकने लगते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे....


मसाले में लिपटी आमों की फांँकें 

चटखारे लेकर बाबूजी ने चखी ।

अम्माँ ने जब आँख तरेरी ,

चाची झट आँचल मुंँह पे धरी ।

रिश्तों पर जब ये रंग चढ़ा करते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे....


मर्तबान में सजी फांँकें ,

श्वेत,महीन चुनरी से बँधी ।

धूप सेंकने को तैयार ,

बिन्नो छत पर रखने चली ।

पड़ोस की छत पर निगाहें घूम रहीं थी,

किसी को मानो आसपास ढूँढ रहीं थी ।

कागज़ों के पुर्जे छतों के बीच उड़ा करते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे...


गली, मोहल्ले में अचार घूमने लगे,

कटोरियों में ढंक कर बंँटने लगे ।

खट्टे आमों में, अनुभव का मसाला 

प्यार का तेल भरा करते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे....


आज अचार तैयार मिलते हैं ,

सजी-संवरी दुकानों, माॅल में बिकते हैं ।

पूछने पर मेरे,वो बेबाक कहते हैं ,

अचार तो पहले ही बना करते थे ।

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