बरामदे में बाबूजी ने थैले पलटे ,
छोटे-बड़े ,कलमी, दसहरी
लुढ़ककर करतब करने लगे ।
उन्हें उठाकर प्यार से अम्माँ
पानी में डाल नहलाने लगीं ।
अमिया से भरे टोकरे गर्मियों में सजा करते थे,
और ऐसे अचार बना करते थे....
बिन्नो दौड़ी , न्यौता दे आई
मिसराईन चाची,गौरी बुआ
दोपहर ,सज धज कर आईं ।
नुमाइश में रखे आम इठलाया करते थे ,
और ऐसे अचार बना करते थे...
कलमी फाँकने के बहाने ,
भैय्या भी मौका पा जाते ।
तिरछी निगाहों से भाभी को
जी भर निहार जाते ।
अनजाने ही सही पल्लू सरकने लगते थे ,
और ऐसे अचार बना करते थे....
चाची,अम्माँ और बुआ के
बतियाने का सिलसिला जारी रहता ।
नमक,हल्दी,राई, कलौंजी
आँखों से तुलता रहता ।
हींग की छौंक से दिल गमकने लगते थे ,
और ऐसे अचार बना करते थे....
मसाले में लिपटी आमों की फांँकें
चटखारे लेकर बाबूजी ने चखी ।
अम्माँ ने जब आँख तरेरी ,
चाची झट आँचल मुंँह पे धरी ।
रिश्तों पर जब ये रंग चढ़ा करते थे ,
और ऐसे अचार बना करते थे....
मर्तबान में सजी फांँकें ,
श्वेत,महीन चुनरी से बँधी ।
धूप सेंकने को तैयार ,
बिन्नो छत पर रखने चली ।
पड़ोस की छत पर निगाहें घूम रहीं थी,
किसी को मानो आसपास ढूँढ रहीं थी ।
कागज़ों के पुर्जे छतों के बीच उड़ा करते थे ,
और ऐसे अचार बना करते थे...
गली, मोहल्ले में अचार घूमने लगे,
कटोरियों में ढंक कर बंँटने लगे ।
खट्टे आमों में, अनुभव का मसाला
प्यार का तेल भरा करते थे ,
और ऐसे अचार बना करते थे....
आज अचार तैयार मिलते हैं ,
सजी-संवरी दुकानों, माॅल में बिकते हैं ।
पूछने पर मेरे,वो बेबाक कहते हैं ,
अचार तो पहले ही बना करते थे ।
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