गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

कारीगरी

थोड़ा सा चावल लिए , सूप में फटकती रधिया के कानों में मोटर की आवाज आई । गर्दन उठाकर देखा, तो उसकी ही झोपड़ी के आगे एक सुंदर , लंबी गाड़ी खड़ी हुई । ऐनक को साड़ी के पल्लू से घसकर साफ किया और फिर से पहनकर देखने लगी । गाड़ी से एक गोरी, सुंदर सी स्त्री उतर रही थी । रधिया ने अपनी बूढ़ी आँखो से उसे पहचानने की नाकामयाब कोशिश की ।

सहसा , उसनेे आकर रधिया के दोनों हाथ अपने हाथ में लेकर, उसी खनकती आवाज में कहा_"माई , ऐसे टुकुर-टुकुर क्या देख रही हो ? पहचाना नहीं, लल्ली हूँ तुम्हारी। " वह मुस्करा रही थी ।
"अरे...! मेरी मैया ।" रधिया ने सिर पर हाथ लगाया । "लल्ली ,बिट्टो कितनी बदल गई हो , अपनी अम्माँ जैसी दिखने लगी हो । बस आवाज जस की तस है बिटिया ।"
"बात ही करोगी , मुझे कुछ खाने को नहीं दोगी ।" हँसते हुए लाली ने कहा ।
"अरी बिटिया ,आ बैठ ,लाती हूंँ कुछ ।" कह तो दिया रधिया ने पर घर में "कुछ" होगा या नहीं , उसे पता नहीं था ।
अचानक ध्यान आया कि परसों काम करते वक्त किसी ने गुड़ की डली दी थी , सो आधा बचा लाई थी । परसों जो शाल ओढ़ी थी उसके पल्लू से वो गुड़ का टुकड़ा निकाल कर लोटा भर पानी लेकर लाली के सामने खड़ी हो गई ।बचपन की तरह ही लाली ने गुड़ एक बार में ही पूरा मुंँह में डाल लिया ।

"लल्ली ,बिट्टो थोड़ा थोड़ा खा , गले में अटक पडे़गा ।"कहते हुए रधिया हँस पड़ी ।
"माई ,घर आना । मुन्ने को देखोगी नहीं । मुझे तुमसे काम भी है कुछ । आना जरुर । अभी दस-बारह दिन मैं हूँ यहाँ ।" पानी का घूँट भरते हुए लाली ने कहा ।
"क्यों नहीं बिट्टो , जरुर आऊँगी । अपनी लाली के लल्ले को देखे बगैर मन मानेगा मेरा ।" रधिया ने हँसकर कहा ।
हाथ हिलाती लाली गाड़ी में बैठ वापस चली गई और रधिया को अपनी यादों में डूबने-उतराने के लिए छोड़ गई । वहीं नीचे बैठ रधिया , पुरानी बातों को चलचित्र की तरह देखने लगी ।
चौंसठ-पैंसठ साल की रधिया , छोटी कद-काठी ,साँवला रंग ,बाल सफेद-काले खिचड़ी से ,आँखों में काले फ्रेम का चश्मा , घुटने से थोड़ी नीचे साड़ी , सिर पर  पल्लू , होंठों पर सदा खेलने वाली मुस्कुराहट ।

धरमू को गए अब दस-बारह साल हो गए । यह लाली उनके सामने ही पैदा हुई थी । सेठजी ने खूब धूमधाम से उसका बारसा किया था । पूरा गाँव दोनों जून खाया ,बचा तो बाँध भी लाए ।

सेठानी ने कई बार उनसे गुदड़ी बनवाई थी । धरमू बहुत उम्दा नमूने निकालता था । सफेद-रंगीन , छोटे-बडे़ कपड़ों को जोड़कर खूबसूरत गुदड़ी बनाते थे दोनों । हर गुदड़ी अपने आप में एक बेहतरीन नमूना होती थी । आसपास के गाँवों में भी लोग उनको मानते थे । लाली के बारसे में अपनी तरफ से उन्होंने गुदड़ी ही भेंट दी थी।

यादों के सागर में गोते लगाती रधिया उठकर चारपाई पर बैठ गई । एक दिन जब दूकान वाले लाला के घर दोनों काम कर रहे थे तब गुदड़ी का नमूना देख रधिया ने कहा _" ना जाने तुम कैसे सोच पाते हो ? कितना सुंदर जोड़ा है कपड़ों को । मुझे तो समझ ही नहीं आता।"
ठहाकर धरमू बोला _" अरी ,तू कुछ कम है क्या ? कितने महीन धागे भरती है । एक समान सिलाई ,वह तो मुझे नहीं आती ।" दोनों खिलखिलाकर हंँस पड़े थे ।
वो दोनों मिलकर एक-डेढ़ दिन में ही गुदड़ी पूरी कर लेते थे ।

धरमू के जाने के बाद रधिया अकेली पड़ गई । उसने धरमू के सिखाए मुताबिक कपड़े लगाने की कोशिश की। पहले पहल तो मुश्किल हुई ,पर बाद में काम जमने लगा । अब जमाना भी बदल रहा है । लोग बड़ी , मोटी , आरामदायक  गद्दियों में सोना पसंद करते हैं । कभी कभी कोई बुला लेता , तो रधिया उसी के आँगन में बैठ कर काम करती ।

चारपाई से उठकर रधिया ने चूल्हा जलाया । सूप में से एक मुट्ठी चाँवल लेकर पकने  धर दिए । थोड़ा चाँवल कल के लिए बचाकर रखा , आजकल काम कम ही मिलता है । काम करते वक्त कोई गुड़ रोटी देता है तो भी वह थोड़ा रात के लिए बचाकर रखती है । मेहनताना कभी मुँह से माँगा नहीं रधिया ने । कोई दो रुपए दे देता , कोई तीन । वह खुशी से रख लेती । उस परिवार के आँगन में बिताए चार-पाँच दिन ही उसके लिए मेहनताना थे ।

बाल-बच्चे तो थे नहीं ।अकेली पेट के लिए क्या झिकझिक करना । धरमू से वह हमेशा कहती थी कि_"ना जाने कौन सा करम किए हैं कि भगवान ने अपनी कोई औलाद नहीं दी ?" धरमू शांति से कहता_"अरी ,गाँव भर के बच्चे क्या अपने नहीं हैं ? हर घर का बच्चा हमारी सिली गुदड़ी पर सोता है । उसको ओढ़ता है , उसपर लोटता है । हमारी गुदड़ी उनके जीवन में भर-भर खुशियांँ  लाएगी । क्यों ,तू हमेशा बच्चे की सोच लेकर बैठती है ? "
सचमुच धरमू ने उसके मन से बच्चे का ख्याल निकाल दिया। गाँव भर के बच्चे अब उसे अपने ही लगते ।

देगची में चाँवल उबल रहे थे और रधिया के मन में बातें।
इसी लल्ली के जन्म पर धरमू के साथ मिलकर उसने पालने पर बिछाने के लिए गुदड़ी सी थी । नरम , मुलायम और सुंदर नमूने की थी । रधिया को सख्त हिदायत दी थी कि धागे महीन , सिलाई बारीक रखे जिससे बच्चे को चुभे नहीं । मोर-मोरनी का जोड़ा निकाला था ,जो देखता देखते ही रह जाता । किनारी भी झालरदार थी ।

गरम भात में नमक डालकर ,प्याज के टुकड़ों के साथ रधिया ने खा लिया । चूल्हा साफ कर , लीप पोतकर बर्तन किनारे सरका दिया । रात में बर्तन साफ करने का मन नहीं हुआ । कल सेठजी के घर जाऊँगी , क्या लेकर  जाऊँगी ? मुन्ने को खाली हाथ तो नहीं देखूँगी ।

आले पर रखा पीतल का डिब्बा ,कुंडी खोलकर देखा तो डेढ़ रुपए थे । क्या करुं , नये कपड़े भी नहीं है कि छोटी गुदड़ी ही सी देती । सवा रुपया ही दे दूँगी ।
इतने बड़े बंगले में सवा रुपए लेकर जाने की बात सोच कर ही उसका सिर नीचा हो रहा था ।

विचारों में डूबते-उतराते रात बीत गई । सुबह घर कामकाज निपटाकर उसने अपनी सबसे अच्छी साड़ी और चोली  पहन ली । पल्लू में सवा रुपए बाँध लिए और बची चवन्नी का ढ़ेला भर गुड़ ले लिया ।
बंगले के सामने उसे किसी ने रोका नहीं । एक नौकर उसको अंदर ले गया । बीमार सेठानी लेटी थी , बाजू के पालने में लल्ली का मुन्ना सोया था ।

सेठानी ने उठते हुए कहा_"आओ रधिया , तुम तो रास्ता ही भूल गई । लल्ली ना जाती , तो शायद तुम आती ही नहीं ।"
"नहीं नहीं मालकिन ,ऐसी बात नहीं है । थोड़ा-बहुत काम जो मिलता है उसी को पूरा करती रहती हूँ । आप  लेटी रहिए ।" कहते हुए रधिया , सेठानी के पांँव के पास बैठ गई ।
"मुन्ने को तो देखो माई , मुझ पर गया है या अपने पापा पर ... कहते हुए लाली , रधिया का हाथ पकड़ कर पालने के पास ले गई ।

पालने में गोल-मटोल ,गोरा-चिट्टा मुन्ना सोया था । जी-भरकर उसे निहारने के बाद रधिया ने "सवा रुपए"मुन्ने की मुट्ठी में पकड़ा दिए और गुड़ की डली लाली के हाथ धर दी ।
" बिटिया मुन्ना तो हुबहू तुम्हारी तरह दिखता है । दूध-सा गोरा  , गोल-मटोल , छोटी सी नाक और बड़ी बड़ी आँखें । है ना मालकिन , अपनी लल्ली ऐसे ही दिखती थी ना बिल्कुल ।" खुशी से दमकते हुए रधिया ने कहा ।

पालने की गुदड़ी पर नजर जैसे जमकर रह गई  । चौबीस-पच्चीस साल पहले की कारीगरी पालने पर बिछी थी । मोर-मोरनी का जोड़ा अभी भी उम्दा है ।अचकचाकर कह पड़ी _" लल्ली इतने सालों इस गुदड़ी को जतन करके रखे रही ।" आँखों में पानी भर आया ।पल्लू से ऐनक साफ किया ।
"गुदड़ी नहीं है ये , माई और  बाबा का आशीर्वाद है । मेरे बच्चे को भी उसमें लोटने का मौका मिला है ।" खिलखिलाती लाली ने कहा । मुन्ने को पालने से उठाकर रधिया की गोद में डाल दिया । मुन्ने को निहारती  रधिया के कानों में धरमू की बात गूँज रही थी "पूरे गाँव के बच्चे अपने ही तो हैं ।"

लल्ली ने जबरदस्ती उसे खाना खिलवाया , खुद गुड़ के टुकड़े चबा रही थी । वापसी में सुंदर सी साड़ी और साथ एक शाल भी दिया ।
" बिटिया , ऐसा गजब ना करो । लड़की से कोई लेता है क्या ?  उल्टी गंगा तो मत बहाओ ।" रधिया ने सकुचाते हुए कहा ।
" माई , कमाती हूँ मैं । शहर में एक दूकान है मेरी , जहाँ कपड़े और कई चीजें बिकती हैं । ये कुछ सफेद-रंगीन नये कपड़े और धागे लाई हूँ । तुम घर पर ही बैठ कर गुदड़ी बनाया करना । महीने में एक बार मेरा आदमी आकर सिली गुदड़ी ले जाएगा और कपड़ा -धागा दे जाएगा ।" लाली ने समझाते हुए कहा ।

रधिया के हाथ में सौ रुपए का नोट रखते हुए बोली_"
ये  पेशगी है माई , बाकी गुदड़ी बिकने के बाद । तुम अपनी मर्जी से जितना काम कर सकती हो करना । तुम्हारी मेहनत की सही कीमत है यह ।" रधिया को तो जैसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था ।
गाड़ी में कपड़े, धागे का बंडल रखकर ड्रायवर व्यक्ति से कहा _" माई को घर तक छोड़ आओ ।"
रधिया के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर लाली कहने लगी _" माई , तुम्हारी कारीगरी बेशकीमती है । आजकल शहरों में लोग फिर से गुदड़ी उपयोग कर रहे हैं । तुम आराम से काम करो । घर- घर जाने की जरूरत नहीं ।"

गाड़ी में बैठ कर रधिया के झुर्रीदार चेहरे पर चमक आ गई । मुड़ कर देखा तो उसकी लल्ली हाथ हिलाकर विदा कर रही थी ।

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