कई सालों से, मेरे मन में
एक विचार कौंधता रहता था ।
घर के आँगन में खड़ा,
वह मूक-सा लगने वाला दरख़्त
"पीपल"इस नाम से परिचय था मेरा ।
मेरे बचपन, परिवार और जीवन
सबसे अटूट नाता था उसका ।
कृशकाय था पहले
फिर मेरी ही तरह देह भर गयी ।
डालियों पर अपनी, कंधों की तरह
चढ़ा लेता था अक्सर ।
मेरे बचपन को सहमति
वही देता था खुलकर ।
वसंत के पहले,वह मुंडा हो जाता
बिना पत्तियों की सूखी देह उसकी
भाती नहीं थी मुझको ।
गर्मियों की वो उमस भरी रातें,
उसी के सहारे गुजरती थी ।
सर- सर हिलते उसके पत्ते
सुराही का पानी और आत्मा
सब तृप्त कर देते ।
आज वह कहानी बन गया ,
गाँव का वो मकान बिक गया ।
माल-असबाब की तरह ,
वह बेजुबान भी ।
आज जब उस गली से गुजर रही हूं ,
उसका कटा शरीर पुकार रहा है ,
"मैं मूक नहीं था "
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