बुधवार, 12 जुलाई 2017

"बारिश और बचपन"

ये बारिश और वो बचपन , दोनों में बड़ा दोस्ताना है
बारिश के मौसम में अक्सर ,बचपन का आना-जाना है ।

कंधों पर बस्ते उठाए , चेहरों पर आशा सजाए
मौज से चप्पल चटकाते, भीगते हुए घर आ जाते ।
किताबों के भीगने का कोई ग़म नहीं होता,
कागज की नाव के साथ चलना कम नहीं होता ।

छतरी लेकर गरम चने बेचती थकी उम्र ,
उम्मीद से निहारता , मासूम-सा बचपन ।
चार मिलकर दस पैसों का इंतजाम कर पाते
चने हाथ में पकड़ने की होड़ में लग जाते ।

एक एक चने का सच्चा हिसाब होता था ,
कम ज्यादा होने पर बचपन रोता था ।
वह हिसाब दिमाग आज तक समझता नहीं
किसी किताब में कोई सूत्र मिलता नहीं ।

घटाऐं आज भी इठलाती हुई बरस जाती हैं
पानी से सबकुछ सराबोर कर जाती है ।
दिल का वो कोना रीता रह जाता है ,
अपने आप को जब सूखा ही पाता है ।

इस मासूम से कोने को थोड़ा मचलने दो।
इस बारिश में बचपन को पूरा भीगने दो ।

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