शनिवार, 5 मई 2018

"परछाईयाँ "

सोनल जब नहाकर बाहर आई तो  फूलदान में सजे , सुंदर, चटकीले रंग के पहाड़ी फूलों को देखकर हैरान हो गई । कुछ देर पहले यह फूलदान खाली था ।
"किसने सजाया इस फूलदान को ? बहुत ही खूबसूरत फूल हैं ।" फूलों की ओर निहारते हुए सोनल ने कहा ।

"एक लड़की आई थी , बिना कुछ कहे चुपचाप फूल सजा गई । शायद गेस्ट हाउस की ओर से होगी ।" अमित ने अखबार पलटते हुए कहा ।
" अच्छा! अब चलो , बाहर जाना है ना घूमने । तुम तैयार हो ही नहीं रहे ।" प्यार से सोनल ने कहा ।

" अरे...कल शाम तो आए हैं । अभी आठ दिन यहीं रहना है । आराम से घूमेंगे । जीजाजी ने माॅल रोड , बाजार और भीड़ भाड़ से दूर यह जगह हमारे हनीमून के लिए पक्की की है । शांति से यहीं गुजारते हैं ये आठ दिन ।" अमित ने मस्ती से कहा ।

"ठीक है मैं ही घूम आती हूँ , तुम अकेले बैठे रहो ।" सोनल ने जरा तुनकते हुए कहा ।
"अच्छा बाबा , चलते हैं । सिर्फ दस मिनट ‌लगेंगे मुझे ।" कहते हुए अमित बाथरूम में घुस गया ।

थोड़ी देर बाद दोनों हाथों में हाथ डालकर बाहर निकल पड़े । शादी के एक माह हुए , यह जोड़ा हनीमून के लिए कौसानी आया है।

कौसानी , जिसकी सुंदरता ने पंतजी को "प्रकृति का सुकुमार कवि" बना दिया । दूर दूर तक फैली पर्वत श्रृंखलाऐं , नंदा देवी के  उत्तुंग शिखर , हरी भरी वादियाँ , सीधे खड़े चीड़ और देवदार के वृक्ष , मानो उचक कर बादलों को छूना चाहते हैं । फूलों और झाड़ियों से टकराकर आने वाली ठंडी हवाऐं , मन को प्रसन्न कर देती हैं । यूँ ही इस जगह को भारत का स्विट्जरलैंड नहीं कहते।

ठंडी हवाओं को अंदर तक महसूस करने के बाद सोनल ने अपनी शाॅल अच्छी तरह लपेट ली। धूप का एक छोटा-सा टुकड़ा भी शरीर पर  बहुत सुकून दे रहा था ।

दिसंबर की पहाड़ी ठंड का लुत्फ उठाते हुए यह नया जोड़ा , अपने जीवन के सुनहरे सपने बुन रहा था ।

चार दिन तो जैसे चार पलों में निकल गए । एक दूसरे में मस्त , वे प्रकृति की गोद में छिपे बैठे हैं। ना परिवार और रिश्तेदारों की झंझट , ना नौकरी का तनाव । एक दूसरे को करीब से समझने का सबसे अच्छा समय बीता रहे हैं ।

सुबह से ही हल्की सी धुंध छाई है। दोपहर को अमित ने कहा _" मुझे प्रोजेक्ट के बारे में कुछ बात करनी है ।यहाँ नेटवर्क ठीक नहीं आता । मैं माॅल रोड के किसी जगह से , काम कर के आता हूंँ । तुम यहीं आराम करो , मैं जल्दी वापस आ जाऊँगा ।"

"ठीक है लेकिन जल्दी आना । आज काफी धुंध छाई हुई है ।शाम मत करना । दोपहर में ही शाम लग रही है।"सोनल ने चिंता करते हुए कहा ।
" अरे..बस गया और दो घंटे में आ ही जाऊँगा । गेस्ट हाउस की कार में ही जा रहा हूँ ।" कहते हुए अमित बाहर निकल आया और सोनल ने हाथ हिलाकर उसे विदा किया ।

सोनल , वहीं बरामदे में बैठ गई । बाँस की जालियों से छनकर ठंडी हवा आ रही थी । सूर्य को आज बादलों ने ढंक रखा है । कोहरे की पतली सी चादर , वादी के सब रंगों को , लपेटे हुए थी ।

सहसा ,सोनल का ध्यान फूलदान की ओर गया । आज फूल बदले नहीं किसी ने । उठकर वह फूलों को निहारने लगी । ऐसे फूल शहरों में नहीं मिलते । दरवाजे पर  दस्तक हुई , पलट कर देखा तो वो लड़की खड़ी थी । हाथों में चटकीले , रंग-बिरंगे फूलों का गुच्छा लिए , उसी की हमउम्र , बहुत सुंदर , गोरी , लंबी , छरहरी काया , तीखे नैन-नक्श की पहाड़ी युवती सामने थी । कानों में बड़ी बड़ी बालियांँ और माथे पर गुलाबी रंग की बिंदी थी ।

सोनल उसको ठगी सी देखती रह गई ।'भगवान ने बड़ी फुर्सत में बनाया है इसको ' मन ही मन सोनल ने सोचा ।

" फूल लगाने आई हो?" हाथों में फूल देखने के बाद भी बेतुका सवाल किया ।
" जी हाँ , आज देर हो गई ।धुँध के कारण फूल अभी तोड़ी ।" फूलदान की ओर बढ़ते हुए उसने कहा ।
फूलदान साफ करके , बड़े ही प्यार से उसने फूल लगाए । पुराने फूल लेकर वापस जाने लगी तो सोनल का मन उससे बात करने का हुआ ।

" यहीं रहती हो आसपास ? फूल कहां से लाती हो ? बहुत ही खूबसूरत हैं ।" उसे बातों में उलझाते हुए सोनल ने पूछा ।
"हाँ , यहीं रहती हूँ , नीचे गाँव में । पहाड़ियों में ये फूल सब तरफ होते हैं । शहर वालों को अच्छे लगते हैं इसलिए हम फूल सजाते हैं ।" उसने बड़ी शांति और शालीनता से कहा ।
" पहाड़ों के बारे में जितना सुना और पढ़ा था , उससे भी कहीं ज्यादा खूबसूरत हैं ये पहाड़ और यहांँ के लोग ।" उसकी सुंदरता निहारते हुए सोनल ने कहा ।

" आज साहब नहीं हैं क्या ?" उसने सीधा प्रश्न किया ।
" बाहर गए हैं काम से । शाम के पहले आ जाएँगे । तुम बैठो ना , मुझे यहाँ के बारे में कुछ जानकारी लेना है ।" उससे सोनल ने आग्रह किया ।

सोनल ने लकड़ी का दरवाजा टिका दिया परन्तु ठंडी हवा जालियों से घुसपैठ कर रही थी ।वह पुराने फूल हाथ में लिए , वहीं जमीन पर बिछे गलीचे पर बैठ गई ।

" अरे.. ऊपर बैठो ना । कितनी ठंड है  ।" अपनेपन से सोनल ने कहा ।
" हम पहाड़ों में रहने वाले नीचे ही बैठते हैं । आदत है हमें ।" उसने कहा ।
"मुझे यहांँ के बारे में कुछ बताओ।
जानना है मुझे , फिल्मों और अखबारों से ही जाना है । अब तुम कुछ बताओ  ।" उत्सुकता से सोनल ने पूछा ।
" क्या बताऊँ , क्या सुनेंगी आप ?" सधी आवाज में बोली ।
" कुछ भी , कोई सच्ची घटना , कोई कहानी जो यहाँ की छाप छोड़ दे ।" बच्चों की तरह सोनल ने कहा ।
" एक कहानी है जो पहाड़ी कहते हैं , पर आप शहरी लोग विश्वास नहीं करते ।" उसने कहा ।
" नहीं नहीं , मैं विश्वास करूँगी ।" सोनल ने मन ही मन सोचा कि अमित के आते तक अच्छे से समय कट जाएगा ।

" कहाँ से शुरू करूँ ?  चलो इन पहाड़ी फूलों से ही करती हूंँ ।" कहते हुए मानो वो उस कहानी का अनुभव करने लगी ।

" पहाड़ी फूलों की तरह ही सुंदर , चटकीली और खुशनुमा थी वो । नाम भी  था फुलवा । अपने पति के साथ नीचे वाले गांव में रहती थी । बंगलों और गेस्ट हाउस की साफ-सफाई और देखभाल करते थे दोनों । गेस्ट हाउस से बंधी तनख्वाह मिल जाती थी और आने वाले लोगों से बख्शीश भी।

मंगलू बहुत प्यार करता था उसको , कहता_" ना जाने , कौन सा जल चढ़ाया था कि तेरे जैसी घरवाली दी भोलेनाथ ने ।" फुलवा शरमा कर लाल हो जाती । बड़ी खुश थी मंगलू के साथ ।

सुबह से शाम तक काम करते थे । घर से रोटी लाते और दोपहर को दोनों साथ बैठकर किसी पेड़ की छांव में खाते । एक दिन मंगलू ने कहा_" ऐ फुलवा ! अरी दिन भर फूल पत्ते देखती हो , कमरों में सजा दिया कर । ये शहरी लोग पहाड़ी फूलों को बड़ा पसंद करते हैं । खुश रहेंगे तो बख्शीश भी ज्यादा मिलेगी फिर तेरे लिए पायल ले दूँगा । छम छम करती घूमना ।" मंगलू ने राज की बात बताई ।

"  ठीक है तू कहता है तो सजा दिया करूँगी । सिर्फ गेस्ट हाउस में ही , वो ही हमें तनख्वाह देते हैं।" बड़ी इतराती हुई बोली फुलवा ।
" ठीक है बाबा , गेस्ट हाउस में ही लगा दिया करना ।"  बात खत्म करते हुए मंगलू ने कहा ।

अब फुलवा को उसका मनपसंद काम मिल गया था । रोज लाल-पीले , सफेद-बैंगनी , फूलों का गुलदस्ता बनाकर रख दिया करती । एक दिन जब मंगलू ने उनमें से एक फूल लेकर उसके बालों में लगा दिया , तो शरमा कर भाग गई फुलवा ।

" ये बारिश का मौसम बड़ा खतरनाक होता है पहाड़ों पर मेमसाब ।"पीठ सीधी करते हुए वह बोली ।
" पैर सीधे कर लो , दर्द हो रहा होगा ।" सोनल ने कहा ।
" नहीं मैं ठीक हूँ । साहब जल्दी आ जाते तो अच्छा होता । एक बार घनी धुँध ने घेर लिया तो रास्ता दिखता नहीं ।" अमित के प्रति उसकी ये चिंता , ना जाने क्यों सोनल को अच्छी लगी ।

" हां , काम होते ही आ जाएंगे । अब मंगलू और फुलवा के बारे में आगे बताओ ना ।" उत्सुक सोनल ने पूछा ।

" आप दोनों की तरह ही खुश और एक दूसरे में डूबे रहते थे ।" मुस्कुराते हुए वह बोली ।
जाने क्यों सोनल शरमा गई ।
आगे वह कहने लगी _" एक दिन गेस्ट हाउस में कुछ बड़े लोग आए थे ।बादल छाए हुए थे और हल्की बारिश हो रही थी । मंगलू को कुछ सामान लेने के लिए उन्होंने नीचे गाँव में भेजा था । फुलवा काम करके मंगलू का इंतजार कर रही थी कि वह जल्दी आए और बारिश तेज होने के पहले वो घर पहुँच जाएंँ ।" ये शहर के लोगों को मौसम का कुछ पता नहीं होता , कभी भी काम बता देते हैं भोला है मेरा मंगलू जो ऐसे मौसम में 'ना' नहीं कर सका । " मन ही मन वह बड़बड़ा रही थी।

धीरे धीरे बारिश तेज हो गई । बीच-बीच में बिजली चमक जाती। बादलों के गर्जन पर बिजली का नर्तन , पूरी वादी खामोशी से देख रही थी ।

लंबी सांस भरकर  , पहाड़ों की ओर देखते हुए उसने कहा _" ये सुन्दर पहाड़ , बारिश में भयानक लगने लगते हैं  ।" आगे बताने लगी _" अचानक गेस्ट हाउस की बिजली कट हो गई । बारिश में अक्सर ऐसा होता है । गेस्ट हाउस के लोग आवाज देने लगे कि मोमबत्ती कहाँ है ?

फुलवा भागकर कमरे में गई । "अभी जला देती हूँ साहब " कहते हुए फूलदान के नीचे के भाग में रखी मोमबत्ती और दियासलाई निकाल ली।"
वह एक क्षण के लिए रूक गई । बाहर देखते हुए बोली _"   धुँध बहुत गहरी हो गई मेमसाब , देखो बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं देता ।"

सोनल ने उचककर बाहर देखा तो सचमुच सामने के पहाड़ , बड़े बड़े देवदार और चीड़ के पेड़ , कुछ भी नजर नहीं आ रहे थे । "  चार बज गए अमित को  आ जाना चाहिए कितना घना कोहरा है लगता है जैसे रात के आठ बज गए हो "सोनल ने चिंता करते हुए फोन लगाया पर नेटवर्क आ नहीं रहा था ।

" चिंता मत करो आप,  आ जाएंगे साहब । गाड़ी यहीं की है तो कोई बात नहीं । " उसने समझाया ।
" आगे बताओ ना ?" सोनल ने पैर ऊपर समेटते हुए कहा ।

" मोमबत्ती जलाकर फुलवा पलटी तो तीन जोड़ी वहशी आँखें उसे  घूर रही थीं । दरिंदगी टपकाते वो आगे बढ़े , फुलवा भागने की कोशिश में गिर पड़ी । उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया और बादलों की गड़गड़ाहट में फुलवा की मासूम आवाज दब गई।

देर रात जब भीगता , हाँफता मंगलू वापस आया तो फुलवा सीढ़ियों पर पड़ी थी । उसे उठाकर देखा तो नाक -मुँह से बहुत खून बह रहा था । जैसे ही मंगलू की बाँह में आई , दम तोड़ दिया ।
उसको छाती से चिपका कर मंगलू जोर जोर से रोता रहा ।जब तक उसके शरीर में जान रही , फुलवा को लेकर बैठा रहा और उसकी फुलवा खुली पथराई आँखों से देख रही थी ।

"  फिर क्या हुआ ?" दुःखी स्वर में , आँखें पोंछती सोनल ने पूछा ।
" क्या होगा मेमसाब ?  दूसरे दिन जब बारिश थमीं तब लोगों ने दोनों को मृत पाया ।
एक दूसरे के पास , अकड़ गए थे ठंड और पानी से । मर गए , पर साथ नहीं छोड़ा । सच्चा प्यार करते थे एक-दूसरे से । "

लंबी साँस लेकर कहने लगी _" उनके प्रेम की मिसाल देते हैं पहाड़ियों में । इस बात को आज चालीस-पचास साल हो गए हैं और तब से आज तक हर दिन फूल बदलती हूँ  । कोई दिन , किसी भी मौसम में छुट्टी नहीं करती । प्यार है मुझे अपने मंगलू से और फूलों से । आखिर उसकी फुलवा हूँ मैं ।" पुराने फूल उठाकर दरवाजे से बाहर निकलते हुए उसने पलट कर देखा तो सोनल की चीख निकल गई ।

सत्तर-पचहत्तर  साल का , बूढ़ा, थका निस्तेज चेहरा , पथराई आँखों से उसे अलविदा कह सामने की धुँध में विलीन हो गया।

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