आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ मेरा भी एक प्रयास 🙏
फ़िलबदीह 72
दूसरा चरण
221 2121 1221 212
हो शांति सारे विश्व में है कामना यही
ईश्वर सहाय हों सदा बस प्रार्थना यही।।1।।
पल भर में ढहता ताश के पत्तों सा घर भवन
विपदा में थामते प्रभो थी याचना यही।।2।।
दर्शन तुम्हारे कर सकें उल्लास कल जो था
क्यों मौन सब वो हो गया है जानना यही।।3।।
पर्वत बहा है तिनके सा कैसा प्रकोप यह
जीवन के ऐसा अंत हुआ वेदना यही।।4।।
चरणों में कल जो पहुंचे थे हैं आज लापता
अपराध उनका क्या था हमें पूछना यही।।5।।
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शर्मिला चौहान
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