रविवार, 22 फ़रवरी 2026

अब तक प्रकाशित एकल एवं साझा साहित्य, प्राप्त पुरस्कारों का विवरण।

जीवनवृत्त (सहपत्र)

९ . अब तक प्राप्त पुरस्कारों का विवरण -

2020-21 "मुट्ठी भर क्षितिज" कहानी संग्रह को अखिल भारतीय लेखिका संघ म.प्र. द्वारा गिरजावती देवी पुरस्कार।

2023-24 "मुट्ठी भर क्षितिज" कहानी संग्रह को स्व. सिद्धार्थ वाटवे स्मृति विद्योत्तमा साहित्य शिरोमणि सम्मान नासिक महाराष्ट्र में प्राप्त।

2025 कथा समवेत अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता सुल्तानपुर में कहानी "गंध" को प्रथम पुरस्कार।

2025 शब्द निष्ठा लघु कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत।

2024 विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान दिल्ली द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में कहानी "दायरे" पुरस्कृत।

2024 "रोशनी की अमरबेल" कहानी संग्रह को क्षितिज कृति सम्मान।

2024 सुरेश शर्मा स्मृति सम्मान क्षितिज साहित्य संस्था इंदौर द्वारा प्रदत्त।

2023 निरंजन जमींदार स्मृति लघुकथा सम्मान क्षितिज साहित्य संस्था इंदौर द्वारा प्रदत्त।

2023 सिरसा हरियाणा द्वारा सुगनचंद मुक्तेश स्मृति लघुकथा सम्मान में लघुकथा "किरायेदार" को प्रथम स्थान प्राप्त।

2023 अहिल्यानगर महाराष्ट्र में लघुकथा "बदलते ज़ायके" को आचार्य जगदीश चंद्र स्मृति लघुकथा पुरस्कार प्राप्त।

2022- साहित्य समीर दस्तक पुरस्कार भोपाल प्राप्त।

"हकीकत" को श्रीमती कृष्णा देवी सारस्वत लघुकथा सम्मान भोपाल प्राप्त।

अंतरा समूह लेखन स्पर्धा में पुरस्कृत।

2021 कथा दर्पण साहित्य लघुकथा में लघुकथा "शक्ति" को प्रथम पुरस्कार।

2020 अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में "सोंधी महक" को प्रथम पुरस्कार प्राप्त।

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 जीवनवृत्त (सहपत्र)

८ . प्रकाशित साहित्य - 

एकल संग्रह -

2019-  मुट्ठी भर क्षितिज (कहानी संग्रह)

2024- रोशनी की अमरबेल (कहानी संग्रह)

2024- सोंधी महक (लघुकथा संग्रह)

प्रकाशनाधीन -

 काके लागूं पाय (व्यंग्य संग्रह)
गंध (कहानी संग्रह)

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साझा संकलन -

2025- "आरथ अमित अति" 100शबदों की लघुकथाओं का संकलन।
लेखनी महोत्सव 25 में लघुकथाओं का साझा ई-संकलन।

2023- "काम जु आवै कामरी‌" मुहावरों की लघुकथाओं का संकलन।

 लघुकथाएं: इक्कीसवीं सदी के दो दशक।

"बोझ हम उठाते हैं" ( कुली जीवन पर संकलन)

2022- "हिंदी हाइकु कोश" संकलन।
 "आगाज़" साझा ग़ज़ल संकलन।
 "कतौता की कलियांँ" संकलन।

2021- "ज़िंदगी ज़िंदाबाद" कोरोना काल पर संकलन।

 "विभाजन त्रासदी की लघुकथाएं" संकलन।

 "समसामयिक लघुकथाएं"  संकलन।

2020- "सेदोका की सुगंध" संकलन।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

खुली फाइल पड़े छींटे (अट्टहास हेतु)

खुली फाइल, पड़े छीटे 

रंग, गुलाल के साथ कीचड़ के छीटे तो आम आदमी रोज ही झेलता है और इससे ज़्यादा रंगीनी उसके क्लास में फिट नहीं बैठती। खास लोगों को खास प्रकार के छींटों से सज्जित होने की आदत होती है जब तक छींटों की बौछार ना हो वो खास किस्म की कैटेगरी में नहीं रखे जा सकते। समाचार-पत्रों, टेलीविजन और सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके खास जीवन के रंगों की झलकियांँ देखने वाला आम आदमी ही होता है।‌आम लोगों की तरह आम दाग, धब्बों से परहेज करने वाला खास वर्ग के दागों की महिमा भी उनकी तरह अपार होती है।

अक्सर होली के रंग-बिरंगे त्यौहार पर साफ-सफेद कपड़ों में, चुटकी भर रंग चिपकाए घूमने वाले लोगों को, बड़ी फ़ाइलों, बड़े केस के खुलने से लगने वाले छींटे पसंद आते हैं। कोई सामान्य थोड़े ही हैं कि बस पोत लिए रंग, गुलाल दस-बीस रूपयों का और बन गए रंगीला रे। रंगीलेपन के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, तुम क्या जानो आम आदमी। 

बांकेलाल भी आम आदमी ही थे। होली के दो दिन पहले सड़क पार करते समय, पीठ पर फचाक..करता गुब्बारा फूटा। तैश में आकर हाई वाल्यूम में चिल्लाए, "अभी से रंग मार रहे हो, हिम्मत है तो सामने आओ। पीठ पर वार करते हो।" उन्होंने सारी कोशिशें कर लीं कि कमीज़ किस रंग से रंगी है देख पाएं परंतु असफल रहे। मन ही मन खुश हो रहे थे कि अभी पचास की उम्र में भी उनको रंगने वालों की कमी नहीं है। आम आदमी तो चंद रंगों से भीगकर ही, खुशी से पूरा जीवन निकालने के लिए पैदा होता है। 

घर पहुँच कर अपने रंगने के रंगीन किस्सों का रंग, पत्नी पर चढ़ाते कि सामने का दृश्य देख बांकेलाल का रंग उतर गया।
"होली पर दीवाली की सफाई क्यों कर रही हो?" आलमारी की सारी डायरियांँ, पुरानी नयी फाइलों का ढेर लगाए बैठी पत्नी से बांकेलाल ने पूछा।
"सफाई तो करनी ही पड़ेगी ना, ना जाने किस फाइल में क्या मिल जाए?" उसकी आँखों के पैनेपन‌ ने बांकेलाल को और खास बना दिया। किसी की फाइलें निकाली जाए, जाँच-पड़ताल हो, आस-पड़ोस में कुछ कानाफूसी हो, आम आदमी बैठे ठाले खास बन जाता है।
खास किस्म की दबी-छुपी फ़ाइलों के पन्ने बाद में खुलते हैं पहले उनके खुलने का संदेश, सोशल मीडिया पर वाइरस की तरह वाइरल हो जाता है।‌ हर चैनल, हर पोस्ट अपनी अपनी रंगीन कहानियों का पिटारा खोले, टी.आर.पी.और लाइक्स कमेंट्स बटोरने में लग जाते हैं। 
बांकेलाल की पत्नी ने डायरियों के पन्ने खोले और व्रत त्यौहार की कथा की तरह बांचने लगीं। पोंछा लगाती सहायिका, बच्चों के ट्यूशन टीचर खड़े होकर चटकारे लेकर, बांकेलाल जी के अतीत का स्वाद चख रहे थे।

"पुरानी बातों को क्यों पढ़ रही हो, दूसरे की डायरी पढ़ना सभ्यता नहीं है।" बांकेलाल ने डायरी छीनते हुए कहा।
"तुम आदमियों को अच्छी तरह समझती हैं औरतें, कितने दिनों दौरे में निकालते थे, भूली नहीं हूँ।" बड़बड़ाती हुई वो बिस्तर पर मुँह लपेटे सो गईं।

खास किस्म के लोगों की, खास समय, खास अवसर की विदेश में फाइल क्या खुली, छोटे बड़े सरकारी, गैर-सरकारी कार्यरत, सेवानिवृत्त सभी आम लोगों के जीवन में झांकने वालों की संख्या में अकस्मात इजाफा हो गया।

सात दिनों तक की बढ़ी टी. आर. पी. ने, टेलीविजन के समाचारों को फुल टाइम उस फाइल का कवर पेज बना दिया। उसका असर आम आदमी की जिंदगी को बदरंग कर देगा, बांकेलाल से बेहतर कौन समझ सकता है। दूसरों की खुलती फाइल ने उनकी होली में संदेह की फुलझड़ी, आरोपों के फटाके फोड़ दिए हैं।

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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

चुनावी बिगुल पर लुढ़कते लोटे..नई दुनिया अधबीच रायपुर 17/2/2026

चुनावी बिगुल पर लुढ़कते लोटे


ताँबे, पीतल, कांँसे और स्टील के लोटों की तरह, अपनी विशिष्टता लिए बिना पेंदी के लोटे, चुनावी समर के पालों में लुढ़कते देखे जा सकते हैं। गुणवत्ता के मामले में पानी से भरते ही डोलने वाले इन लोटों से स्थिर सरकार की इच्छा रखना, जनमानस की मृगतृष्णा वृत्ति का एक बढ़िया उदाहरण है। खेतों में सुबह-सुबह फारिग होने के लिए भी बिन पेंदी के लोटे साथ लेना, आने वाली विपदा को बुलावा देना है। अपना मत देकर अपने पाँच साल इनको सौंपना, कितनी विपदाओं को  आमंत्रित करना है, समझा जा सकता है।

 इस गुणवत्ता से परिपूर्ण बांकेलाल ने पिछली पार्टी छोड़ दी और इस पार्टी की ओर लुढ़क गए। कार्यक्रमों में दरी बिछाने से लेकर नेताजी की कार का दरवाजा खोलना, रात-रात भर गाँव शहर की गलियों की धूल छानने से मंच का संचालन करना और सबके आगे-पीछे चिपककर फोटो खींचवाने वाले कर्मठ, वाकपटु बांकेलाल को जब पार्टी टिकट नहीं मिली तब उन्हें दूसरी ओर लुढ़कने में अपने भविष्य नज़र आया।

नगरपालिका के चुनावों की घोषणा हुई और नुक्कड़ की टपरी पर, चाय सुड़कते बांकेलाल ने हमें रोक लिया।

"इस बार जीत गई पार्टी तो ये कचरे का ढेर, खुला नाला, पीने के पानी की समस्या दूर हो जाएगी।" उन्होंने गर्दन लचकाई।
"आपकी पार्टी का चिन्ह घोड़ा है ना।" हमने पक्का किया।
"अजी घोड़ा अमीरों की शान है। हम तो गरीब, साधारण लोगों के आदमी हैं तो हमने वो भाई-भतीजावाद वाली पार्टी ही छोड़ दी। अब हमारी पार्टी का चिन्ह है..।" दूर चरती भैंस की ओर उन्होंने अँगुली दिखा दी।
"अच्छा।" हमारे नैन पिटारे के ढक्कन से खुल गए।

पहली पार्टी गुलाब चिन्ह को त्याग घोड़े की ओर लुढ़के अब भैंस पर रीझे बांकेलाल ने भैंस के लाभ, उसकी ग्रामीणता संग पार्टी को जोड़ने का अद्भुत प्रयास किया।

टपरी पर मजमा जमाकर उन्होंने भैंस को राष्ट्रीय प्राणी घोषित कर दिया।
चुनाव सिर पर खड़ा हुआ और गली-मोहल्लों पोस्टरों से सज गए। बेरोज़गारी इन दिनों दुम दबाए, मुँह छिपाए बैठी थी।

 समोसा, कचौड़ी और शाम को मिलने वाले सौ रूपयों ने इलाके के सभी नवजवानों की बेरोजगारी समाप्त कर दी थी।

जिसकी दीवारों, छतों पर  जिस पार्टी का बैनर, पोस्टर फड़फड़ाता, उसकी जेब में नोट भी फड़फड़ाते। कई घरों की दीवारें एक साथ दो-दो, तीन-तीन उम्मीदवारों के पोस्टर सीने से लगाए, घर मालिक की जेबें भारी कर रही थीं।

पोस्टरों के बाज़ार में, कोने की जगह में बाँकेलाल की तस्वीर नज़र आई।  चुनाव चिन्ह देखकर हमने चश्मा साफ किया। भैंस की जगह चूहा देखकर, हमें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। 

उनके द्वारा प्रदत्त रोजगार वाले दो युवक, आटो रिक्शा पर चिल्लाते हुए घूम रहे थे।

"इस क्षेत्र के निर्दलीय प्रत्याशी बांकेलाल जी को, गणेश जी के वाहन  'चूहा' निशान पर वोट देकर विजयी बनाइए।" 

गुलाब से घोड़ा, घोड़े से भैंस और अब चूहे पर लुढ़कते इस पोस्टर पर चिपके बांकेलाल, शायद इस नये चिन्ह पर विरदावली तैयार करने में जुट गए थे।


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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

जोगीरा..होली

होली पर जोगीरा


1.फागुन में फगुनाता आया, छैला बांकेलाल।
कहीं निगाहें कहीं निशाना, डगमग होती चाल।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

2 .मंद हुई है गुंडागर्दी, बढ़ता यूपी आज।
दुनिया देख रही है सारी, बुलडोजर का राज।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

3 . जमकर ढ़ोल बजाता आता, हर मौसमी चुनाव।
जनता सब कुछ जान गई है, उल्टे पड़ते दाँव।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

4 .पीकर भांग मस्त चुन्नू ने, कुत्ते से की बात।
 तू तो जंगल का था राजा, कबसे बदली जात।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

5 .रासरंग में डूबे बांके, रंग लगाते लाल।
बीबी नहीं पड़ोसन थी वो, सिर पर बचे न बाल।
जोगीरा सा रा रा रा रा...

6 . भारत की इक ओल्ड पार्टी, जाती हार चुनाव।
ईवीएम को दोषी कहती, डूबी उनकी नाव।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

7 .नया बखेड़ा रोज उठाते, बांके जी का जोश।
हाथ जेब में डाले रहते, दुनिया का ना होश।
जोगीरा सा रा रा रा रा..
8 .तंत्र बुद्धि से खींची फोटो, खूब मारते शान।
पास दिखे पहचान न आए, झूठा गढ़ते ज्ञान।
जोगीरा सा रा रा रा रा..
9 . मुँह पर रंग लगाकर आए, घर में बांकेलाल।
भैया कहती आई पत्नी, होली बड़ी कमाल।
जोगीरा सा रा रा रा रा...

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

रंग ले चुनरिया - व्यंग्य

रंग ले चुनरिया (व्यंग्य यात्रा के लिए भेजी)


फागुन का खुमार प्रकृति की हर चीज़ पर हावी था। पेड़-पौधों, मौसम ने होली का रंगीलापन शुरू किया तो बांकेलाल भी, फगुनाई की बयार से बौरा गए। टेलीविजन चालू किया तो लोकसभा में विराजमान  खास सभासदों के बीच, छींटें-बौछार का नज़ारा देखने को मिला। एक ने उठकर सामने बैठे विपक्षी के तीन-चार पीढ़ियों तक रंग डाल दिया और खुद बेदाग बैठ गए।

मेजों पर हाथ पटककर, आने वाली होली के ढोल-नगाड़ों का पूर्वाभ्यास, ललामी पर था। कुछ अपने मन की भड़ास निकाल कर, जेब में हाथ डाले घर की चाबी खोजते तुरंत निकल गए। 
पक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप के गुब्बारे फेंके जा रहे थे जिन्हें कभी-कभी सामने बैठे स्पीकर महाशय पकड़ लेते। अक्सर तो इन गुब्बारों से बचकर वो भी बेदाग दिखने को लालायित रहते। इस भवन में कई रंगों की चूनर लहरा रही थी। भगवा, हरी, नीली के बीच तीन रंगों की वो चूनर जो माँ भारती को पसंद है, कहीं दब गई थी।

रोज-रोज की चिल्ल-पों से परेशान पत्नी ने तीखी बौछार की, "दिन-रात इनकी महाभारत में बैठे संजय की तरह कॉमेंट्री करते हो, जरा कभी कुछ अच्छा भी देख लिया करो।" बांकेलाल ने आज्ञा का पालन करते हुए चैनल बदला तो समाचार लग गया।
तूफानी गति से शब्दों की बरसात करते उस प्रवक्ता की सांसें फूल रही थीं। बांकेलाल को लगा कि उसका विकराल रूप, उनकी ही  धड़कन बंद ना कर दे, उन्होंने झट चैनल बदल दिया।

सामने मंच पर कवि जाति के चार लोग बैठे थे। प्रायोजित कार्यक्रम में श्वेत कुर्ता, गालों पर करीने से लगाया लाल, गुलाबी और पीला रंग, होली की वास्तविकता से दूर फिल्मी लग रहा था। सामने प्लेट में ए.आई. से बने सजे गुझियों को देखकर पत्नी भिनभिनाईं।

"औरों के घर बन गए गुझिया, हमारे यहाँ तो बस अकेले मरो खपो।" फिर कहने लगीं, "तुम्हारी कविताओं से कम परेशान हैं क्या हम, जरा कुछ ढ़ंग का लगाओ।" 

अच्छे चैनल, अच्छा समय, अच्छा कार्यक्रम, अच्छे दिन को तलाशते बांकेलाल ने एक चैनल पर विराम लिया।
सामने हीरो-हीरोइन बगीचे में होली की धूम मचा रहे थे। हीरो की पत्नी‌ और हीरोइन का पति, दोनों की इस मस्ती में कभी इसको देखते कभी उसको। बांकेलाल को लगा यही हाल देश की जनता का है जो कभी सरकार की बातों पर मुड़ती है तो कभी विपक्षी दल की ओर देखती है।
"ये फूहड़ गाना लगाकर क्या दिखाना है। बताओ, पत्नी सामने बैठी है और दूसरे की बीबी को रंग लगा रहा है।" बांकेलाल की पत्नी गुर्राई।

बांकेलाल कोई बहस नहीं चाहते थे। बस चैनल बदलने ही वाले थे कि बिजली बंद हो गई। आसपास सबके घर टेलीविजन चालू देख, बांकेलाल के दिमाग की बत्ती जल गई। पिछले दो महीनों से बिजली बिल भरा नहीं था उन्होंने, चप्पल पहने और तुरंत बाहर हो गए।
"अंकल, नगरपालिका के चुनाव में जीत गए तो अगले साल पूरे वार्ड के‌ लिए होली का आयोजन करवा देंगे। खाना, गाना और पीना भी फ्री..!" उस नवयुवक ने रंग-बिरंगा जाल फेंका।
उस रंग-बिरंगे जाल को अपनी झक सफेद बत्तीसी से काटते हुए बांकेलाल मंजिल की ओर बढ़ गए।

बिल भरकर बांकेलाल ने कर्मचारी से कहा, "बिल तो भर दिया, तुरंत बिजली चालू करवा दो। त्यौहार का समय है।" 
"आपने दो महीने सोचा फिर पैसे भरे, हमको दो दिन की तो मोहलत दो।"  कर्मचारी को भी तो रंगारंग होली करने का अधिकार था।
"दो दिन क्यों भाई, जैसे काटा वैसे जोड़ दो‌ अभी।" बांकेलाल अर्दली की तरह मिमियाने लगे।

"काटने और जोड़ने में फ़र्क है साहब।" उसने दार्शनिकता की चूनर ओढ़ ली थी।‌ 
"बिजली चालू करने वाला आज छुट्टी पर है।" काउंटर पर बैठे उस कर्मचारी ने बेफिक्री से कहा।
"कमाल करते हो, एक आदमी पर पूरा बिजली विभाग टिका है क्या?" बांकेलाल का रंग गुस्से से बदलने लगा।
"साहब, एक आदमी पर पूरा देश टिका है। दूसरे आदमी पर पूरा विपक्ष टिका है तो क्या बिजली विभाग इस देश से बाहर है?" अब उसकी चूनर विशुद्ध राजनैतिक थी।

"अर्जेंट हो तो पूरे हजार लगेंगे, आपके घर पहुँचने से पहले, महंगाई की तरह तेजी से दौड़ती बिजली पहुँच जाएगी।" वह जीते हुए उम्मीदवार की तरह मुस्कुरा रहा था।
पत्नी का कुपित चेहरा ध्यान आते ही बांकेलाल ने जेब से गुलाबी रंग की शॉल वाले तीन बापू, नीले रंग से सजे चार निकालकर काउंटर पर रख दिए। बापू को सफेद रुमाल में लपेटकर फौरन उसने जेब के हवाले कर लिया। 
"वाह बापू, लकड़ी टेककर, सहारा लेकर चलते थे लेकिन अब तो सरपट एक जेब से दूसरी जेब में भागते हो। लगता है मेरी जेब आपको आरामदायक नहीं लगी।" मन ही मन सोचते बांकेलाल घर की ओर वापस हुए।

रास्ते में मिठाई की दूकान देखकर जेब टटोली। एक गुलाबी बापू अभी भी पैर जमाए मिले। 
"लड्डू कैसे भाई?" बांकेलाल ने मिठाई वाले से पूछा। 
"शुद्ध घी के बारह सौ  रुपए किलो, दूसरे हजार।" उसने बताया।
"बाप रे बाप, दो महीने पहले तो दाम आधे थे।" बांकेलाल की आँखें रसगुल्लों की तरह फ़ैल गई।
"बजट देखा ना आपने, किस चीज में कमी मिली जो आपको मिठाई कम में चाहिए।" बेफिक्री से बोला, "जो चाँदी का वर्क लगा हुआ लड्डू है उसका तो आप दाम ही मत पूछो। वह आपके जेब का नहीं है।"  आम आदमी की जेब का पता उसके चेहरे से हो जाता है।

गुलाबी बापू को सीने से लगाए बांकेलाल घर आ रहे थे। सोसायटी के लोगों ने घेरकर प्रश्नों की बारिश कर दी।
"आपने होली के आयोजन का पैसा दिया?" एक बोला।
"आप तो रंग स्पांसर करने वाले थे ना, आज शाम तक दे दीजिएगा। कल सुबह से ही ड्रम में घोल देंगे।" दूसरे ने कहा।
"कौन-कौन सा रंग लाना है?" बांकेलाल पूछने लगे।
"जिस रंग में आप अपने को रंगे देखना चहते हो, वही ले आना।" पहले ने कहा। 
घर आते हुए, खूबसूरत रंगों की दुनिया में विचरते बांकेलाल, सोसायटी के फैले पानी पर फिसल गए। चेहरे का रंग धूसर, श्यामल हो गया।
घर का दरवाजा खुला तो पत्नी टेलीविजन पर चलते गाने के साथ सुर मिला रही थी।
"लाल ना रंगाऊं मैं हरी ना रंगाऊं, श्याम रंग में रंग दे चुनरिया..।" 

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

लघु कहानी - बदलाव

कहानी - बदलाव 


जब से लड़कियों ने क्रिकेट का बल्ला दुनिया में घुमाया, तीन बच्चों की अम्माँ सुनीता का मन भी अपनी दोनों बड़ी बेटियों के प्रति पलटने लगा है। अब अपने दिल का दस प्रतिशत टुकड़ा, वो छोटी संतान और इकलौते बेटे हीरा के मोहजाल से निकाल कर दोनों बेटियों सोना और नीलम को देने की कोशिश करतीं।‌

"स्कूल में खेलकूद और पी.टी.का पीरियड होता है ना?" खेलकूद के नाम से चिढ़ने वाली अपनी अम्माँ का रंग बदलते देखा, बेटियांँ आश्चर्य करतीं।
"अम्माँ, सप्ताह में दो बार ही होता है पी.टी.और खेलकूद का पीरियड। आपसे जूते लाने को कहा तो वो तो मंगाती नहीं हो, हम दोनों को डाँट पड़ती है।" छोटी बेटी नीलम ने कहा।
"तुमसे तो बात करना पाप है, रोज नयी चीज़ चाहिए दोनों को।" कहती हुई अम्माँ सात साल के हीरा को मुनक्का डला दूध पिलाने लगी।

चौदह की सोना और बारह की नीलम बताना चाहती थीं कि ऐसा दूध उनके लिए भी जरूरी है। साथ की बाकी लड़कियाँ बोर्नविटा, बूस्ट डालकर रोज दूध पीती थीं पर उनकी अम्माँ समझती ही नहीं।
अब तीन बच्चों की अम्माँ सुनीता समझती तो सब थी परंतु नौकरीपेशा पति की सीमित कमाई में क्या-क्या पूरा करती।  इकलौते बेटे हीरा को वंश का दीपक जानकर उसे ही मेवा, दूध दिया करती। आखिर बेटियों को तो ब्याह कर दूसरे घर जाना है।

सोना और नीलम, बहुत होशियार, सुंदर, सुगठित देह की लड़कियां हैं।‌ पहले तो अम्माँ खेलकूद की सख्त विरोधी थीं और अब क्रिकेट खेलने के पीछे पड़ गईं हैं।

"दीदी, मुझे क्रिकेट अच्छा नहीं लगता। मुझे खो-खो, कबड्डी पसंद है परंतु अम्माँ खेलने ही नहीं देती।" नीलम ने कहा।
"पहले तो जूते और कपड़े लेने के डर से हमें खेलकूद प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लेने देते थे, अब क्रिकेट के भक्त बन गए। लगता है कि बस आज खेलो कल पैसे मिल जाएंगे।" सोना ने छोटी बहन को बताया, "मालूम कोच सर ने सबको क्रिकेट किट लेने कहा है। अच्छे जूते, बैट सब कितना महंगा है।" बेचारी बढ़ती बच्ची अपने घर का बजट समझती थी।

ऐसा नहीं है कि उन दोनों को अपने घर परिवार में अपने लिए लड़ना पड़ता था, आस-पड़ोस भी मौके के ताक में रहते।
"सुनीता, तेरी बेटियों की कद-काठी तो बड़ी अच्छी है।‌ अभी से सत्रह-अठारह की लगती हैं। संभालना, आजकल जमाना अच्छा नहीं है।" पड़ोस की शर्मा आंटी जब-जब लड़कियों को देखतीं, अपनी चिंता जाहिर कर देतीं।‌

सोना और नीलम मन मसोसकर रह जातीं। कई बार मुँह तक आ जाता कि कह दें, "आंटी जी, अपने बेटे की फ़िक्र करो जो लड़कियों के स्कूल के पास खड़ा हर लड़की को छेड़ता है। चार दिनों पहले ही उसकी जमकर पिटाई की थी लड़कियों ने।" 
बोलते तो अम्माँ बवाल कर देतीं।
लड़कियों को सलाह देने वाले, रोक-टोक करने वालों की कभी कमी नहीं होती। बालिका से किशोरी होती लड़कियों के शारीरिक बदलाव, बदलती जरूरतों के कारण वे सबकी दृष्टि के केंद्र में रहती हैं।

समय के साथ सुनीता ने लड़कियों की ओर से ध्यान हटाकर, बेटे के पालन-पोषण की ओर केंद्रित कर लिया था। उसके लिए अँग्रेजी ट्यूशन, रोज उबला अंडा और दूध, रात को भिगोया बादाम, मुनक्का नियमित करने के लिए, सुनीता ने अचार बनाकर बेचने का घरेलू काम भी शुरू कर दिया।

पिताजी सब कुछ समझते थे परंतु अपनी कमाई की सीमाएं जानते थे। बड़ी होती बेटियों के लिए कुछ नहीं कर पाने का उनको दुःख सताता था।
"कभी-कभी बादाम, दूध दोनों बच्चियों को भी दे दिया कर सुनीता। उनको इस उम्र में जरूरत है।" बेटियां आगे मातृत्व संभालेंगी, इस बात से पिता उनके स्वास्थ्य के चिंता दिखाते।

"मुझे तो कुछ समझता ही नहीं है बेकार ही तीन-तीन बच्चे पैदा करके बड़ा कर रही हूँ। अरे, जितने पैसे घर में आते हैं उसमें किसी एक को ही दूध मेवा मिल सकता है।  अब इन दोनों के बाद एक बेटा हुआ है तो उसे ही देती हूँ। दुश्मन नहीं हूँ लड़कियों की, मैं खुद तो नहीं खाती।"कहती हुई सुनीता रो पड़ती।

अपनी माँ की चौथी और अंतिम संतान थी सुनीता। चार-चार बेटियों के चलते, उनकी माँ को सास-ससुर, परिवार के, आस-पड़ोस की कटु बातों को झेलना पड़ता था।‌ लड़कियों के नाम से डरने लगी थी सुनीता और उसे भी पहले दो बेटियांँ ही हुईं।

सोना ने क्रिकेट में और नीलम ने कबड्डी में नाम लिखा लिया।‌ दोनों दौड़ने में, प्रेक्टिस में बहुत मेहनत करने लगीं। पिताजी ने इस बार ओव्हर टाइम करके, दोनों बेटियों को नए जूते भी दिलवा दिए।

दोनों लड़कियों के हौंसलों को बल मिला। अपने पिता का समर्थन, उनका प्रेम मिलते ही वो खिल उठीं।‌ सुबह उठकर दौड़तीं, स्कूल से आकर गृहकार्य करके फिर शाम को स्कूल में प्रेक्टिस करने चली जातीं। 

"दिमाग खराब हो गया क्या तेरा सुनीता, जो लड़कियों को क्रिकेट, कबड्डी खेलने भेजती है। दो-दो घंटे प्रेक्टिस करती हैं दोनों।‌ कुछ ऊँचनीच हो जाएगी, तब पछताएगी।" सुनीता की सहेलियां, दूर पास के रिश्तेदार बोलते।
अब सुनीता अपने किए पर पछताती कि क्यों उसी ने लड़कियों को खेलकूद की ओर ढकेला।
किशोर बच्चियों की अपनी अलग ही समस्याएं होती हैं। वो शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रुप से अपने आपसे, बाहरी और आंतरिक बदलावों से लड़ती रहती हैं। ना वो व्यस्क होती हैं ना बालिका।‌ दुनिया उन्हें नहीं समझती और वो दुनिया को समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होते।

स्कूल की जिलास्तरीय टीम में सोना का चयन हो गया और सब खुश हो गए।‌
"हमारे स्कूल टीम की आलराउंडर है आपकी बेटी।‌ कम साधनों में, कड़ी मेहनत से उसने टीम में जगह बनाई है।" स्कूल के कोच ने सोना के पिता से कहा।

आज पिताजी तीनों बच्चों के लिए फल‌ और मिठाईयां लेकर आए थे। 
"सुनीता, हमारी तीनों ही बच्चे रतन हैं।‌ सोना, नीलम और हीरा, हमने नाम भी तो ऐसा लगा है। सोना पढ़ाई के साथ स्कूल क्रिकेट टीम में आ गई। नीलम पढ़ती भी है और कबड्डी भी खेलती है। आज कोच सर बता रहे थे।" पिताजी ने कुछ रूककर कहा, "अपनी बेटियों को समझकर, हम ही साथ नहीं देंगे तो कौन देगा, और दोनों बहनों को देखकर हीरा भी बढ़िया ही करेगा। अब से घर में जो भी फल, मेवा, दूध रहे, तीनों को बराबर देना।" पिताजी ने अम्माँ की ओर देखा और कहा, "बच्चियों को समानता का अधिकार सबसे पहले घर में मिले तो बाहर तो वो खुद लड़ लेंगी।" बात अम्माँ ने महसूस की।‌

किशोर होती बेटियांँ पिताजी और अम्माँ के पास चिपक गईं जैसे आश्वासन देती हों कि आपका साथ है तो अब वे सारी दुनिया जीत ही लेंगी।


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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं.9967674585

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

बिठूर

बिठूर - एक पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक शहर (यात्रा वृत्तांत)


कानपुर से 25  किलोमीटर उत्तर में स्थित ऐतिहासिक एवं पौराणिक शहर बिठूर की यात्रा का सौभाग्य मिला। कानपुर से दोपहर कार द्वारा हम बिठूर की ओर चल पड़े। पवित्र नदी गंगा के किनारे स्थित इस शहर का जनजीवन साधारण है। जाते समय नये बने बड़े रिसोर्ट्स की सुंदरता आकर्षित करती है। संकरी गलियों से, बड़ी कठिनाई से कार जा रही थी और अंततः हम गंगाजी के ब्रह्मवर्त घाट पर पहुँच गए। 

घाट पर सुंदर मंच सजा था और राम लीला का मंचन हो रहा था। परशुराम-राम संवाद का दृश्य सामने था, कुछ देर हमने कलाकारों की इस विलुप्त होती कला का आनंद लिया और फिर घाट की ओर निकल गए। घाट पर पता चला कि आज शाम रावण दहन किया जाएगा।
"विजयादशमी तो हो गई, आज शरद पूर्णिमा है। आज रावण दहन होगा?" मैंने आश्चर्य से वहाँ के लोगों से पूछा।
"जी हाँ, यहां की परंपरा रही है। आज सुबह से रामलीला हो रही है और शाम को रावण दहन किया जाएगा। हर वर्ष यह  पूर्णिमा को मनाया जाता है।" लोगों के उत्तर से, एक नयी बात का पता चला।

 सूर्योदय के बाद सूर्य अपने बाल रूप में गगन में विचरण कर रहा थे। माँ गंगा अपने आवेग को समेटती, किनारों से टकराती अनवरत आगे बढ़ रही थीं। चौड़े पाट के दूसरी ओर कछार पर शुभ्र कांस जैसे शरद के आगमन का बखान करने में रत थी। 
ओह! प्रकृति का अप्रतिम सौंदर्य मंत्रमुग्ध कर देता है।  फूल, दीपक सब अपने अंक में समेटे गंगा की लहरों पर कुछ नौकाएं चल रही थीं। हमने भी नौका विहार करके ब्रह्मवर्त घाट पर बने विभिन्न घाटों के दर्शन किए। दशरथ घाट, कौशल्या घाट, सीता घाट, लक्ष्मण घाट जैसे और भी कई साफ-सुथरे घाट बने थे। 

वर्षा में गंगाजी के द्वारा लाई गई बालू किनारों और घाटों की सीढ़ियों तक जम गई थी। यहाँ ब्रह्मा जी का मंदिर है जहांँ उनकी पादुकाओं को पूजा जाता है। मान्यता यह है कि मनुष्यों की उत्पत्ति के पूर्व ब्रह्मा जी ने यहाँ तपस्या की थी।

हमारे नौकाचालक ने यह भी बताया कि भक्त ध्रुव ने इसी स्थान पर तपस्या की थी। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर तारे के रूप में उन्हें अपने पास स्थान दिया।
अब समय था कि कुछ देर रूककर, गंगा मैया के सौंदर्य को निहारते रहे। ऐसे ही सबसे पवित्र नदी नहीं बन गई। लोगों की बुराईयों, कमियों और लापरवाहियों के बावजूद उनका पालन-पोषण करने वाली, अपने किनारों पर संसार बसाने वाली माँ गंगे को प्रणाम करके हमने उनका आभार व्यक्त किया।
गंगा जी के बड़े और चौड़े पाटों के ऊपर से पुल बनाया गया है। बिठूर-परियर गंगा पुल उत्तर प्रदेश में गंगा जी पर बना सबसे बड़ा पुल है।
कुछ दूरी पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम स्थित है। लवकुश की जन्मस्थली और माँ सीता की कर्मस्थली यहाँ है। जगह-जगह रामायण की चौपाइयां अंकित हैं जो वाल्मीकि जी की अद्भुत देन का परिणाम हैं।

हम चलते घूमते कुछ तक गए थे। आगे भूनी मूंगफलियांँ बिक रही थीं, तो बैठकर उसका स्वाद लिया और हम बिठूर के ऐतिहासिक महत्व वाले स्थान पर जा पहुंँचे। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का एक मुख्य स्थान नाना राव साहब का महल। अब इसे संग्रहालय में तब्दील किया गया है। सोमवार को यह संग्रहालय पर्यटकों के लिए बंद होता है।

बड़े मुख्य द्वार से अन्दर आते हुए झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (मनु) की विशाल प्रतिमा दिखी। सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी उस लोकप्रिय कविता को, जिसे दीवार पर लगाया था पढ़कर रानी के सामने नतमस्तक हो गए।  शौर्य, अद्भुत पराक्रम और अपार देशभक्ति की प्रतिमा सामने थी।

चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लगी मरदानी वह तो झांसी वाली रानी थी।

 बहुत सुंदर संग्रहालय जिसमें संग्राम की तलवारें, ढाल, कपड़े, कटारों और कई महत्वपूर्ण वस्तुओं को संग्रहित किया गया है। बड़ा सा बगीचा, जिसमें बेल, नीम, आम के पेड़ और फूलों की क्यारियां थीं। घूमते हुए एक मोर ने इस वातावरण को और खूबसूरत बना दिया।

आगे बड़ी छतरी और उसके नीचे नाना साहब की दिव्य भव्य प्रतिमा बनी थी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपनी पूरी शक्ति से भारत को आजादी दिलाने का प्रयास करने वाले, विभिन्न मनसूबों को एकजुट करने वाले, अँग्रेजों को नाकों चने चबवा देने वाले नाना राव साहब के सामने सिर श्रद्धा से झुक गया। लक्ष्मीबाई का बचपन यहीं गुजरा था।

"नाना के संग खेली थी वह नाना के संग पढ़ती थी, 
बरछी ढाल कृपाण कटारी उसकी यही सहेली थी।"

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की तिकड़ी नाना साहब, तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई के समर्पण को देश हमेशा याद रखेगा। 
एक सुंदर, सार्थक यात्रा के असीम आनंद को अनुभूत करते हम शाम को वापस आ गए। 


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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

1222 1222 122पर दो ग़ज़लें



1222 1222 122

हमारे बीच अब कुछ भी नहीं है 
ज़मी दिल की मगर सूखी नहीं है।।1।।

मुखौटे लाख बदलें लोग चाहे
कभी फितरत मगर जाती नहीं है।।2।।

कहानी एक सी बचपन के सबकी
पुरानी हो नयी, बदली नहीं है।।3।।

एक दुनिया! लादवा हैं दांव तेरे
तेरी दी चोट भर पाती नहीं है।।4।।

उड़ा पंछी तड़पकर पिंजरे से 
जगत नश्वर में कुछ बाकी नहीं है।।5।।


तरही मिसरा-

चले आते हैं वो अक्सर गली में 
मगर वो बात पहले सी नहीं है।


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1222 1222 122

ज़रा जब मैं किसी के काम आया 
मिरे दिल को बहुत आराम आया।।1।।

सुबह ही गाँव में पहुंचा था अपने
लगा मुझको मैं चारों धाम आया।।2।।

भटकता *खोज में था नौकरी की*
नकारा हूँ यही इल्ज़ाम आया।।3।।


गया था गाँव अपना छोड़कर मैं
सुबह का भूला घर को शाम आया।।4।।
 

किया है प्यार उसने सिर्फ़ मुझसे
लिफाफे में अभी पैगाम आया।।5।।

जतन करता रहा काया का अपने
जली जब देह केवल राम आया।।6।।

किये उपवास पूजा और जप-तप
समय अंतिम नहीं प्रभु नाम आया।।7।।

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