रंग ले चुनरिया (व्यंग्य यात्रा के लिए भेजी)
फागुन का खुमार प्रकृति की हर चीज़ पर हावी था। पेड़-पौधों, मौसम ने होली का रंगीलापन शुरू किया तो बांकेलाल भी, फगुनाई की बयार से बौरा गए। टेलीविजन चालू किया तो लोकसभा में विराजमान खास सभासदों के बीच, छींटें-बौछार का नज़ारा देखने को मिला। एक ने उठकर सामने बैठे विपक्षी के तीन-चार पीढ़ियों तक रंग डाल दिया और खुद बेदाग बैठ गए।
मेजों पर हाथ पटककर, आने वाली होली के ढोल-नगाड़ों का पूर्वाभ्यास, ललामी पर था। कुछ अपने मन की भड़ास निकाल कर, जेब में हाथ डाले घर की चाबी खोजते तुरंत निकल गए।
पक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप के गुब्बारे फेंके जा रहे थे जिन्हें कभी-कभी सामने बैठे स्पीकर महाशय पकड़ लेते। अक्सर तो इन गुब्बारों से बचकर वो भी बेदाग दिखने को लालायित रहते। इस भवन में कई रंगों की चूनर लहरा रही थी। भगवा, हरी, नीली के बीच तीन रंगों की वो चूनर जो माँ भारती को पसंद है, कहीं दब गई थी।
रोज-रोज की चिल्ल-पों से परेशान पत्नी ने तीखी बौछार की, "दिन-रात इनकी महाभारत में बैठे संजय की तरह कॉमेंट्री करते हो, जरा कभी कुछ अच्छा भी देख लिया करो।" बांकेलाल ने आज्ञा का पालन करते हुए चैनल बदला तो समाचार लग गया।
तूफानी गति से शब्दों की बरसात करते उस प्रवक्ता की सांसें फूल रही थीं। बांकेलाल को लगा कि उसका विकराल रूप, उनकी ही धड़कन बंद ना कर दे, उन्होंने झट चैनल बदल दिया।
सामने मंच पर कवि जाति के चार लोग बैठे थे। प्रायोजित कार्यक्रम में श्वेत कुर्ता, गालों पर करीने से लगाया लाल, गुलाबी और पीला रंग, होली की वास्तविकता से दूर फिल्मी लग रहा था। सामने प्लेट में ए.आई. से बने सजे गुझियों को देखकर पत्नी भिनभिनाईं।
"औरों के घर बन गए गुझिया, हमारे यहाँ तो बस अकेले मरो खपो।" फिर कहने लगीं, "तुम्हारी कविताओं से कम परेशान हैं क्या हम, जरा कुछ ढ़ंग का लगाओ।"
अच्छे चैनल, अच्छा समय, अच्छा कार्यक्रम, अच्छे दिन को तलाशते बांकेलाल ने एक चैनल पर विराम लिया।
सामने हीरो-हीरोइन बगीचे में होली की धूम मचा रहे थे। हीरो की पत्नी और हीरोइन का पति, दोनों की इस मस्ती में कभी इसको देखते कभी उसको। बांकेलाल को लगा यही हाल देश की जनता का है जो कभी सरकार की बातों पर मुड़ती है तो कभी विपक्षी दल की ओर देखती है।
"ये फूहड़ गाना लगाकर क्या दिखाना है। बताओ, पत्नी सामने बैठी है और दूसरे की बीबी को रंग लगा रहा है।" बांकेलाल की पत्नी गुर्राई।
बांकेलाल कोई बहस नहीं चाहते थे। बस चैनल बदलने ही वाले थे कि बिजली बंद हो गई। आसपास सबके घर टेलीविजन चालू देख, बांकेलाल के दिमाग की बत्ती जल गई। पिछले दो महीनों से बिजली बिल भरा नहीं था उन्होंने, चप्पल पहने और तुरंत बाहर हो गए।
"अंकल, नगरपालिका के चुनाव में जीत गए तो अगले साल पूरे वार्ड के लिए होली का आयोजन करवा देंगे। खाना, गाना और पीना भी फ्री..!" उस नवयुवक ने रंग-बिरंगा जाल फेंका।
उस रंग-बिरंगे जाल को अपनी झक सफेद बत्तीसी से काटते हुए बांकेलाल मंजिल की ओर बढ़ गए।
बिल भरकर बांकेलाल ने कर्मचारी से कहा, "बिल तो भर दिया, तुरंत बिजली चालू करवा दो। त्यौहार का समय है।"
"आपने दो महीने सोचा फिर पैसे भरे, हमको दो दिन की तो मोहलत दो।" कर्मचारी को भी तो रंगारंग होली करने का अधिकार था।
"दो दिन क्यों भाई, जैसे काटा वैसे जोड़ दो अभी।" बांकेलाल अर्दली की तरह मिमियाने लगे।
"काटने और जोड़ने में फ़र्क है साहब।" उसने दार्शनिकता की चूनर ओढ़ ली थी।
"बिजली चालू करने वाला आज छुट्टी पर है।" काउंटर पर बैठे उस कर्मचारी ने बेफिक्री से कहा।
"कमाल करते हो, एक आदमी पर पूरा बिजली विभाग टिका है क्या?" बांकेलाल का रंग गुस्से से बदलने लगा।
"साहब, एक आदमी पर पूरा देश टिका है। दूसरे आदमी पर पूरा विपक्ष टिका है तो क्या बिजली विभाग इस देश से बाहर है?" अब उसकी चूनर विशुद्ध राजनैतिक थी।
"अर्जेंट हो तो पूरे हजार लगेंगे, आपके घर पहुँचने से पहले, महंगाई की तरह तेजी से दौड़ती बिजली पहुँच जाएगी।" वह जीते हुए उम्मीदवार की तरह मुस्कुरा रहा था।
पत्नी का कुपित चेहरा ध्यान आते ही बांकेलाल ने जेब से गुलाबी रंग की शॉल वाले तीन बापू, नीले रंग से सजे चार निकालकर काउंटर पर रख दिए। बापू को सफेद रुमाल में लपेटकर फौरन उसने जेब के हवाले कर लिया।
"वाह बापू, लकड़ी टेककर, सहारा लेकर चलते थे लेकिन अब तो सरपट एक जेब से दूसरी जेब में भागते हो। लगता है मेरी जेब आपको आरामदायक नहीं लगी।" मन ही मन सोचते बांकेलाल घर की ओर वापस हुए।
रास्ते में मिठाई की दूकान देखकर जेब टटोली। एक गुलाबी बापू अभी भी पैर जमाए मिले।
"लड्डू कैसे भाई?" बांकेलाल ने मिठाई वाले से पूछा।
"शुद्ध घी के बारह सौ रुपए किलो, दूसरे हजार।" उसने बताया।
"बाप रे बाप, दो महीने पहले तो दाम आधे थे।" बांकेलाल की आँखें रसगुल्लों की तरह फ़ैल गई।
"बजट देखा ना आपने, किस चीज में कमी मिली जो आपको मिठाई कम में चाहिए।" बेफिक्री से बोला, "जो चाँदी का वर्क लगा हुआ लड्डू है उसका तो आप दाम ही मत पूछो। वह आपके जेब का नहीं है।" आम आदमी की जेब का पता उसके चेहरे से हो जाता है।
गुलाबी बापू को सीने से लगाए बांकेलाल घर आ रहे थे। सोसायटी के लोगों ने घेरकर प्रश्नों की बारिश कर दी।
"आपने होली के आयोजन का पैसा दिया?" एक बोला।
"आप तो रंग स्पांसर करने वाले थे ना, आज शाम तक दे दीजिएगा। कल सुबह से ही ड्रम में घोल देंगे।" दूसरे ने कहा।
"कौन-कौन सा रंग लाना है?" बांकेलाल पूछने लगे।
"जिस रंग में आप अपने को रंगे देखना चहते हो, वही ले आना।" पहले ने कहा।
घर आते हुए, खूबसूरत रंगों की दुनिया में विचरते बांकेलाल, सोसायटी के फैले पानी पर फिसल गए। चेहरे का रंग धूसर, श्यामल हो गया।
घर का दरवाजा खुला तो पत्नी टेलीविजन पर चलते गाने के साथ सुर मिला रही थी।
"लाल ना रंगाऊं मैं हरी ना रंगाऊं, श्याम रंग में रंग दे चुनरिया..।"
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शर्मिला चौहान