गुरुवार, 11 सितंबर 2025

हिंदी गौरव गान

"हिंदी गौरव गान" (दोहावली)
(२१२१ कविता संग्रह हेतु)


सुंदर मोहक प्रिय बड़ी, हिंदी भारत नार।
अलंकार रस छंद से, करती नित श्रृँगार।।१।।

होती आवृति वर्ण की, उपमा बने मिसाल।
चिपके अर्थ अनेक हैं, श्लेष यमक के जाल।।२।।

मीठी तेज लगे कटुक, निर्मल सब रसधार।
पाठक भी आनंद लें, श्रोता अनहद पार।।३।।

विलोम पर्यायी लिए, शब्द संपदा खास।
छिपे शब्द के अर्थ हैं, बस हिंदी के पास।।४।।

रोला दोहा सोरठा, चौपाई से छंद।
गणना मात्रा भार की, जानकार हैं चंद।।५।।

संगी साथी बोलियांँ, भोजपुरी ब्रज रूप।
अवधी मगही मालवी, सबकी छटा अनूप।।६।।

बोली जाती ठेठ जब, कहावतों की शान।
बातों बात मुहावरे, हिंदी तेरी  जान।।७।।

जोड़ तोड़ निर्माण नव, करते संधि समास।
भावों की न्यारी छटा, शब्दों का विन्यास।।८।।

कविता गद्य शाख तने, विविध विधाएँ पर्ण।
भाव मूल थामे रहे, नव कुसुमित हर वर्ण।९।।

 संस्कृत जननी रूप है, देशज सखियाँ साथ।
अँग्रेजी और फारसी, चली मिलाते हाथ।।१०।।

हिंदी निज की जानकर,  सदा लगाना प्रीत।
कमतर बस ना आँकना, तब हिंदी की जीत।।११।।

******************


कवयित्री -शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)४००६१०
मो.नं. 9967674585

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें