आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏
फ़िलबदीह 49
द्वितीय चरण
1212 1122 1212 22
हृदय में अपने कभी झांकना ज़रूरी है
समय के साथ यही साधना ज़रूरी है।।1।।
मिले जो राह में पर्वत तो ठान लो मन में
कि पार होने को इक सामना ज़रूरी है।।2।।
नदी में धार सा बहता है बर्फ़ पर्वत पर
समय से खुद को यहां ढालना ज़रूरी है।।3।।
गिनाते ऐब थे अक्सर जो गैरों के तुम ही
तो अपनी खामियांँ भी मानना ज़रूरी है।।4।।
हो हौंसला तो उड़ानें कभी भरो ऊंची
पँखों को अपने ज़रा जाँचना ज़रूरी है।।5।।
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शर्मिला चौहान
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