मंगलवार, 30 सितंबर 2025

चौखट के पार (कहानी)

चौखट के पार (कहानी)

"चंदा, जा ज़रा देख के आ वो तेरी दीदिया क्या कर रही हैं?"  कपड़ों की सलवटों को हाथ से सीधा करती हुई, इस घर की वर्तमान मालकिन बीना ने घर की पुरानी सहायिका को आदेश दिया।
अपने स्थूल और अधबूढ़े शरीर को तकरीबन ढोती हुई चंदा, छूटे हुए कैदी की तरह बाहर की ओर लपकी। उसके इस उतावलेपन पर बीना को कुछ जलन सी होने लगी।

"ऐसी मरी जाती है कि जैसे तोते के प्राण उस कोठरी में बसते हों!" भुनभुनाती हुई बीना ने सीधे किए कपड़ों को आलमारी में ठूंस दिया। 

अपनी काया को ढोती चंदा, तेजी से अपनी दीदिया तक पहुंच जाना चाहती थी। कमरे के दरवाजे पर चढ़ी सांकल निकालते हुए बड़बड़ाने लगी।

"हड्डी का ढांचा बनी पड़ी हैं बिस्तर पर फिर भी सांकल चढ़ा जाती है! कहाँ भाग जाएंगी पता नहीं।" दो-तीन बार की खींचतान के बाद सांकल खुली। 
बंद सांकलों को खोलना बड़ा मुश्किल काम है। कुछ छुपाए रखती हैं ये सांकलें, जनम भर चढ़ी रहें तो भी थकती नहीं और जिस पर लगाई जाती हैं वो तो अपनी गुलामी की कीमत जीवन भर चुकाएं, उनसे अनचाहा रिश्ता जोड़ लेता है।

"बताओ भला, दिन दोपहरी यहाँ अमावस बनी है। खिड़की को बोरे दरी पहना दिया है जिससे वह भी साँस ना ले।" चंदा ने खिड़की का लिबास निकाल फेंका और चारपाई के पैताने बैठ गई।

चारपाई पर हड्डियों का ढांचा साँस गिनते पड़ा था जिसे वह "दीदिया" कहती थी।
"चिंता न करो दीदिया, तुम्हें कुछ नहीं होने देगी चंदा। तुम परबस चंदा भी परबस। तुम्हारे प्रेम में पड़ी रही यहाँ, तो आज तुम्हें ऐसे पड़ी देखती हूँ।" कंठ से आवाज़ की घरघराहट, हृदय की पीड़ा का परिचय दे रही थी।

कृशकाय दीदिया की आँखों में जीवन चमकने लगा। हाथ उठे और चंदा की आँखों को पोंछने लगे। दीदिया की तरलता तो कतरा-कतरा जम गई थी। अब किसी भी ऊष्मा से फिर आँखों का बहना, संभव नहीं जान पड़ता था।

दो स्त्रियों ने एक-दूसरे का हाथ बरसों पहले थामा था और आज भी निभा रही थीं।
"घर में  छोटी बहूरानी आ गई है लेकिन तुम्हारी बहूरानी को किसी बात का लिहाज नहीं।" घर का सारा हालचाल बताती चंदा को तीक्ष्ण गंध का भान हुआ।

चंदा के माथे पर एक शिकन नहीं थी। उसने लकड़ी की आलमारी खोली और दूसरी चादर निकाली। इस चादर को तीन-चार जगहों पर उसी ने सिली थी। 

"सारे कमरों के पर्दे, बिस्तरों की चादरें हर सप्ताह धुल जाए तो बड़ा अच्छा लगता है घर।" दो छोटे बच्चों की माँ दीदिया के ऐलान पर, घर की दोनों सहायिकाएं, चंदा की ओर देखा करतीं।
"दीदिया, चादरों का तो ठीक है इतने भारी पर्दे कौन धोता है हर सप्ताह।" चंदा, दीदिया के मायके की थी, संग ही आई थी बाल विधवा होने के कारण, तो वही समझाया करती। 
खैर, चादरें सप्ताह में और परदे महीने में धुलेंगे, इस बात पर मुहर लग गई।
 आज वही अपने खाट पर गीले बिस्तर में पड़ी हुई है। 

चंदा ने दरवाजा टिकाया और दीदिया के शरीर को कपड़े से पोंछने लगी। जिसकी एडी तक कभी किसी को नहीं दिखती थी, जमीन को स्पर्श करती रेशमी साड़ी पहनने वाली आज बेबस पड़ी है। 
शरीर को पोंछकर सुखाया, पावडर के डिब्बे को झडाकर बचा-खुचा महीन चूर्ण कमर से नीचे तक लगाते चंदा बोलने लगी।

"बीना को बताया है कि पावडर खत्म हो गया है। कुछ बोलती ही नहीं, बोली तो कहती है कि सबका ठेका मैंने लिया है क्या? मेरे ऊपर छोड़ कर चले गए, पहले दोनों माँ-बेटे की मिलीभगत होती थी, मुझे हमेशा पराया ही रखा। तुम तो गवाह हो परंतु उनके साथ आई हो तो उनकी तरफ झुकोगी।" चंदा ने लंबी साँस भरी, "जाने किस माटी की बनी है। बबुआ रहा तो कम से कम दिन में एक दो बार मिल लेता, जरूरत का सामान तुरत ला देते रहा, भगवान उसको भी उठा लिया।" चंदा की आँखें फिर भरने लगीं। दीदिया के बच्चों में अपना परिवार देखने वाली चंदा दीदिया के बेटे की असमय मृत्यु से दुखी थी।

दीदिया की देह को अलट-पलट कर चंदा ने, गीली चादर निकाल दी और दूसरी बिछा दी‌ और एक अगरबत्ती जलाकर खाट के नीचे धर दी। 

खिड़की से आनेवाली हवा में धीरे-धीरे मलय के चंदन की सुवास भरने लगी। चंदा जोर-जोर से सांसें भरने लगी। पसीने से उसकी देह नहा गई। अब दीदिया अस्सी के पास हैं तो वो भी तो सत्तर होने चली है। 

चारपाई पर हलचल हुई, अस्थियों के पंजर में से उठकर फिर हाथ बाहर आया। दोनों की हथेलियों में संवेदनाओं का संचार होने लगा। चंदा के गिरते अश्रुओं ने, दोनों बँधी हथेलियों को नम कर दिया।

"दादी, मैं आ जाऊँ अंदर?" आवाज़ से कमरे के अंदर की दोनों स्त्रियांँ चौंक पड़ीं।
"आओ ना बिटिया, तुम्हारी ददिया सास तो अपनों का इतंजार करते पथरा गई हैं।" उठकर चंदा ने दीदिया की पोत बहू शिल्पा का स्वागत किया।

"दादी प्रणाम।" कहती शिल्पा खाट पर पड़ी अपनी दादी सास के दुर्बल पैरों को देखकर चुप हो गई।
"ये क्या लाई हो बिटिया?" शिल्पा के हाथों के पैकेट देखकर चंदा ने पूछा।
"आप मम्मी से बता रही थीं ना कि दादी के पास पावडर खत्म हो गया है तो मैं दादी के लिए पावडर और कुछ सामान लाई हूँ।" दो-तीन प्रकार के पावडर के डिब्बों को आलमारी के ऊपर रखती शिल्पा, गीली चादर से आने वाली दुर्गन्ध से विचलित हो गई। 

"चंदा काकी, आपने बताया नहीं कि दादी उठकर बाथरूम तक नहीं जा पाती हैं। मुझे तो यहाँ आने का कभी मौका नहीं मिलता। आज आ गई तो देख रही हूंँ कि कितना अस्वास्थ्यकर और बंद सा कमरा है।" शिल्पा के स्वर से क्षोभ व्यक्त हो रहा था।

"बिटिया, अभी तो हमने खिड़की खोल दिया, वरना तो अँधेरा ही रहता है यहाँ।" चंदा के मुँह से निकल गया।
"बाथरूम तक अब चल नहीं सकती हैं तो करीब दो महीने से मैं ही चारपाई पर पोंछ-अंगोछ देती हूँ।" आलमारी खोलकर एक पुरानी फोटो फ्रेम निकाल लाई चंदा।

"जब तुम्हारी सास बहू बनकर आई थी तब की फोटो है यह।" श्वेत श्याम फोटो में दीदिया का लुनाई लिया चेहरा, बहू के सौंदर्य को फीका कर रहा था। 
"यश ने भी बताया था कि दादी बहुत सुंदर लगती थीं, सबसे सुंदर।" काम के सिलसिले में कंपनी से विदेश गए अपने पति और दीदिया के पोते यश के बारे में बोल रही थी शिल्पा।

"कब आएगा यश वापस?" पूछी तो चंदा परंतु उत्तर के लिए बेसब्र दीदिया लगी।
"अभी चार महीने बाद, डेढ़ साल के लिए गए थे ना काकी। अब तो वापसी का समय पास आ रहा है।" शिल्पा के गाल लाल हो गए।

"हाँ बिटिया, विवाह के तीन महीने बाद ही तो चला गया,अब आ जाएगा तो बड़ा अच्छा लगेगा सबको।" शिल्पा ने उस एक स्वर में, दो स्त्रियों की प्रेम लहरियों को महसूस किया।

"अब चलती हूँ दादी, कल फिर आऊंगी मिलने इसी समय। ऑफिस से वापस आने में देर हो जाती है। अब आप आराम करो।" शिल्पा के नर्म मुलायम हथेलियों का स्पर्श माथे पर हुआ और कुछ जमी बर्फ़ इस स्नेह ऊष्मा से रूप बदलने की तैयारी करने लगी। 

द्वार से बाहर जाती हुई शिल्पा के ओझल होते 
तक दीदिया उसे देखती रहीं ‌
"अब आराम करो, मैं थोड़ी देर बाद दाल रोटी लाऊंगी। कुछ और खाने का मन हो तो बताना, मैं बाहर से मंगवा दूंगी।" चंदा उनके कानों में फुसफुसाई , "वो झाडू बुहारू करने आता है ना मंगल, उससे बोल दिया है कि कभी कुछ मंगाऊं तो ला देना।" अपने आँचल में बँधें नोट का स्पर्श दीदिया को कराया।

रूपैये की ताकत कौन नहीं जानता, ये तो घास को भी खास बना दे। माटी के ढेर को सोने में बदल दे परंतु कंकाल बनती दीदिया को विरक्ति के घेरे से बाहर लाना, रूपैये के बस की बात नहीं थी।

बाहर से आती आवाजों ने कमरे में बैठी दोनों स्त्रियों को विचलित कर दिया।  बीना की आवाज़ कलेजा छीलने के लिए बहुत धारदार थी।

"उस बदबूदार कमरे में क्यों गई तुम शिल्पा? कोई संक्रमण हो गया तो तुम्हें कौन संभालेगा, यश क्या कहेगा?" एक सास अपनी बहू को अपनी सास से घुलता-मिलता देख, पारा को चुकी थी।
"दादी हैं उस कमरे में मम्मी। उनसे मिलने चली गई थी आज वरना कहाँ जाती हूँ।" शिल्पा की आँखों में दादी वाला कमरा घूम गया जहाँ एक वृद्धा जीवन के आखिरी दिनों को ढो रही थी। 

कमरे के खुले दरवाजे से, जहाँ मलय की शुद्ध हवा का आगमन हो रहा था, अचानक कडुवाहट बिखर गई। चंदा ने दौड़कर दरवाजा बंद कर दिया पर अंदर का जो बिखरना था वो एक बार फिर बिस्तर पर फैल गया।

"रूको दीदिया, सब चादर गीली हो गई है। मैं अपनी चादर ले आती हूँ, मेरे पास दो रखी हैं।" चंदा की आँखों में सागर लहरा रहा था।
प्रत्युत्तर में दीदिया ने हाथ पकड़ लिया। 
कुछ देर गीले बिस्तर पर पड़ी वृद्धा अपनी सखी को थामे रही। 
चंदा ने उठकर फिर से जितनी कर सकती थी सफाई की और कुछ खाना लाने चली गई।

रसोई की खिड़की से ढलते सूरज की ओर ताकती चंदा ने शिल्पा की आवाज़ सुनी‌
"आज ऑफिस नहीं गई क्या शिल्पा?" बीना की आवाज़ थी।
"गई थी मम्मी, परंतु मन नहीं लगा तो वापस आ गई।" कहती हुई अपने हाथ में कुछ सामान, पैकेट लिए वह चंदा के पास आ गई।

"चलो, दादी के लिए मैं ऐसी चीज लाई हूँ कि आपको और दादी दोनों को बहुत आराम हो जाएगा।" चंदा को लगभग खींचती हुई वह दीदिया के कमरे की ओर चल पड़ी।

टेलीविजन पर पिक्चर देखती बीना ने उनको तिरछी नज़रों से देखा और फिर टेलीविजन पर दृष्टि जमा दी।

दरवाजे पर आज बाहर से सांकल नहीं चढ़ी थी। धक्के से दरवाजा खुल गया और शिल्पा भागकर दादी के पास गई।

"दादी, ये बड़ों के लिए डायपर मिलते हैं। अब बार-बार बिस्तर गीला नहीं होगा। कल से एक सेविका भी आएगी, आखिर चंदा काकी से भी सब नहीं हो पाता है दादी, वो भी बूढ़ी  हो रही हैं।" कहती हुई शिल्पा ने डायपर के दो-तीन बड़े पैकेट, नर्म  टॉवेल और बिस्तर पर बिछाने का रबरशीट सब किनारे पर रख दिया।

चंदा ने दीदिया की ओर देखा, शांत पड़ी थीं वो। आँखें की कोरों पर हृदय की जमी बर्फ़ पिघलकर बह रही थी। 
"चंदा काकी, क्या हुआ दादी को? उठती नहीं, आँखें भी नहीं खोल रही।" शिल्पा हड़बड़ा कर चंदा को झिंझोड़ने लगी।

"हृदय तो सूखा था बिटिया, बिस्तर गीला रहता था। आज तुमने हृदय में नमी पैदा कर दी।  सूखी आँखों को तुम्हारे स्नेह के आँसू भिगो गए।"  चंदा पलंग पर से अपनी सखी को उतारने लगी।

कुछ देर बाद लोगों के कंधों पर चढ़कर एक औरत बड़े शहर की तंग गलियों से, अपनी अंतिम यात्रा का आनंद ले‌ रही‌ थी आखिरकार कब से उसने बंद कमरे की चौखट पार नहीं की थी।

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