।🙏(संशोधित)
फ़िलबदीह 47
1222 1222 122
क़ाफिया - ए का स्वर
रदीफ - हैं
मिरे पैरों में जो छाले पड़े हैं
कहानी वो सफ़र की बोलते हैं।।1।।
उगी जो घास बंजर में तो देखो
खड़े पत्थर भी उसको घूरते हैं।।2।।
ज़मी से रोज दिखते चाँद सूरज
मगर तीनों में अब भी फासले हैं।।3।।
कभी सुंदर कभी भद्दा है चेहरा
समय के भी तो अपने आइने हैं।।4।।
घरों में कम नज़र आते हैं बच्चे
वो दुनिया नापने को उड़ चले हैं।।5।।
तरही मिसरा
लिखो अपनी कलम से दास्तां तुम
हम अपने ऐब खुद गिनवा रहे हैं।।
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शर्मिला चौहान
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