गुरुवार, 21 अगस्त 2025

सात समुंदर पार से - कहानी

सात समुंदर पार से

बचपन में सुना गीत, आज भी मीरा के हृदय का मंथन करता है। रेडियो में जब-जब यह गाना बजता, पापा आवाज़ बढ़ा देते और चार साल की मीरा अपने छोटे भाई की अँगुली पकड़े, रेडियो वाले टेबल से जा चिपकती। शब्दों का मेल पापा से था परंतु न जाने क्यों मम्मी की आँखें भीग जातीं। 
मीरा को चंद शब्द याद हो गए थे और छोटा जय उसका मुँह देखकर, खुशी से तालियांँ बजाता।
"सात समंदर पार से, गुड़ियों के बाज़ार से।
छोटी सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना..
पापा जल्दी आ जाना।"

"पापा, सात समुंदर कैसा होता है?" अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से पापा की आँखों में मीरा झांकने लगती।
"क्या पता बेटी, मैंने तो एक समुंदर भी नहीं देखा आजतक।" अपनी छोटी आमदनी में, घर और परिवार तक सीमित रहने का दुःख पापा के चेहरे पर हुआ करता था।

गाँव से एक करीबी छोटे शहर में आया यह परिवार, एक-एक कदम सोचकर उठाता था। हर महीने पापा गाँव जाते, दादा-दादी, बड़े बाबूजी के परिवार से मिलकर आते। अक्सर गांँव से वापसी के बाद, उनका व्यवहार उखड़ा-उखड़ा सा रहता। वो मम्मी से बार-बार कहते, "क्या मालूम हमने इस शहर में आकर सही किया या ग़लत। घर जाता हूँ तो सब उलाहना भरी नजरों से देखते हैं। उन्हें लगता है कि हम बहुत आराम से जीते हैं।" 
"अब छोटी सी खेती-बाड़ी में कितने लोग पल सकते थे। वो तो भला हो कि तुम्हें शहर में नौकरी मिल गई। धीरे-धीरे तनख्वाह भी बढ़ जाएगी। कम से कम बच्चों को तो अच्छी शिक्षा दे सकेंगे।" मम्मी बात और पापा, दोनों संभाल लेतीं।

समय का पहिया सरकता रहा, उसकी गति से कदम मिलाते इस परिवार ने रास्तों की मुश्किलों का अनुभव किया, उनका सामना करते हुए अपने कदम बढ़ाते रहे। 

मीरा के हाईस्कूल में आने पर, उसके लिए साइकिल खरीदना और जय के हाथों में घड़ी लेने के लिए, कितने महीनों की योजना बनाई गई थी, आज भी मीरा भूली नहीं है।

"मम्मा..! हाऊ मैनी टाइम्स यू हीयर दिस सांग? चेंज ना मॉम!" अपनी चार साल की बेटी शीना की आवाज़ सुनकर मुस्कुराती हुई मीरा ने कोई दूसरा गाना लगा दिया और खुद भी गुनगुनाती हुई कार ड्राइव करने लगी। 

ऐसा ही जय भी कहता था।
"कितने बार बजता है यह गाना, समंदर देखने तो कोई ले जाता नहीं, बस गाना सुनो।" वह अपने किशोर होने की पुष्टि,हल्के गुस्से से करता।
"तू पढ़-लिखकर नौकरी करना फिर ले जाना सबको समुंदर दिखाने।" पापा उससे कहते।
"ये दीदी बड़ी है ना, गाना भी इसी को पसंद है तो ये ले जाएगी ना।" वह कुढ़ कर बोलता था।

गाँव धीरे-धीरे छूटने लगा। दादा-दादी के बाद, बड़े बाबूजी के ना रहने से वहाँ का गणित-रसायन बदलने लगा था।
"अब चाचा हर महीने किससे मिलने आते हैं। जो जमीन में हिस्सेदारी का सोचते हों तो साफ़ कह देना कि हम यहाँ रहते हैं, देखभाल करते हैं उनको हिस्सा किस बात का? बूढ़ों की देखभाल हमने की, वो तो शहर निकल गए थे।" एक बार पापा के कानों में ऐसी कच्ची-पक्की बातों का रस पड़ गया और तब से शहर से गाँव का रास्ता कठिन होता गया।

मीरा को याद है कि उसने पढ़ाई के साथ, खेलकूद में बहुत मेहनत की थी। उसका कसा शरीर, फुर्ती उसे और लड़कियों से अलग करती थी।
"पापा, कॉलेज की  एथलेटिक्स टीम सिंगापुर जा रही है। मेरा भी नाम है, आप जाने दोगे?" एक दिन कॉलेज से वापस आकर मीरा ने पूछा था। 
एक साधारण परिवार की लड़की, अपने हुनर के दम से विदेश जाने वाली थी इस बात की खुशी पूरे परिवार को थी परंतु साथ ही लड़की को देश के बाहर भेजने का मानसिक द्वंद्व भी चल रहा था।
आखिरकार, साधारण परिवार के हृदय में होते मंथन से निकला माखन एक ऐसा निर्णय रहा जिसके घृत की स्निग्धता पूरे परिवार ने हमेशा महसूस की।

मीरा की टीम, दिल्ली हवाई अड्डे से जाने वाली थी। वहाँ तक रेलगाड़ी से आने के बाद, पहली बार हवाई जहाज में बैठने का वो अनुभव, आज भी उसे गुदगुदा देता है। टीम को कई प्रतियोगिताओं में हार का सामना करना पड़ा परंतु मीरा का व्यक्तिगत प्रदर्शन बढ़िया रहा। उसके दौड़ने का समय, बेहतर हुआ और वह अपने देश के खेलप्रेमियों की नज़र में आ गई।

घर वापसी पर मीरा ने सबसे बताया कि उसने सिंगापुर में समुंदर देखा। उसके जलडमरूमध्य के विस्तार वर्णन से, पूरे परिवार ने यात्रा का चरम आनंद महसूस किया।
मीरा ने नौकरी के लिए आवेदन शुरू किए और एक शासकीय संस्थान में उसे शारीरिक क्रिया प्रशिक्षक की नौकरी मिल गई। नौकरी ने पैसा और अपने शौक को पूरा करने का अवसर दिया। 

"मॉम! प्लीज़ स्टॉप द कार। आई वांट आइसक्रीम।" शीना ने अपनी मम्मा का हाथ पकड़ते हुए कहा।‌
"हम्मम! यू आलरेडी एट आइसक्रीम टू टाइम्स इन दिस वीक बेटा।" मीरा एक सजग माँ थी।
"दिस लास्ट टाइम मम्मा, छोती सी गोड़िया लाहना..!" बच्ची माँ के पसंदीदा गाने के शब्द बोलने की कोशिश कर रही थी।
"नौटंकी बच्चा!" कहते हुए मीरा ने आइसक्रीम पार्लर के सामने गाड़ी पार्क करके, आइसक्रीम ले लिया।

शीनू बड़ी ही तन्मयता से आइसक्रीम चाट रही थी और मीरा को उसमें, अपने बर्फ़ के गोले खाने की छबि नज़र आ रही थी।

जवान लड़की का खेल प्रशिक्षक होना, जगह-जगह  अपनी टीम के साथ घूमना, उस समय के समाज को दिल से स्वीकार नहीं था। अब तो जय भी ग्रेजुएट हो गया था और बैंक की नौकरी के लिए तैयारी कर रहा था। 
सरकारी खर्चे पर, कुछ प्रशिक्षकों को विदेश भेजने की सूचना आई और राज्य भर की क्रीड़ा संस्थाओं में हलचल शुरू हो गई। फ़ार्म भरकर, अपने सार्टिफिकेट सहित मीरा ने भी साक्षात्कार दिया। राज्य से चयनित बारह लोगों में अपना नाम देखकर, उसे अपना भविष्य सुखद नज़र आने लगा। जय की भी दिल्ली के एक सरकारी बैंक में नियुक्ति का आदेश आ गया और अब पापा को गाँव छोड़ने का अपना निर्णय, सही लगने लगा।

 दो माह के विदेशी प्रशिक्षण ने मीरा के लिए, बहुत से मार्ग खोल‌ दिए। प्रशिक्षण के दौरान उसकी मुलाकात अपने ही साथ आए टीम सदस्य प्रकाश से हुई। मिलनसार, काम के प्रति समर्पित और मृदुभाषी प्रकाश, कब कैसे उसे अच्छा लगने लगा, पता ही नहीं चला।
प्रशिक्षण के बाद, अपने शहरों, घरों का पता लेकर वो अलग हुए थे। 

मीरा ने अपनी पसंद के बारे में घर पर बताया।‌ लड़का स्वधर्मी तो था ही,  मिलने पर स्वभाव, व्यवहार और परिवार सब एक दूसरे को भा गए। 
सिंगापुर में काम करने की दोनों की ही इच्छा थी अतः प्रशिक्षण के दौरान ही कुछ संस्थाओं से उन्होंने बात की थी। विवाह की तारीख तय हुई और प्रकाश का सिंगापुर से नियुक्ति पत्र आ गया। विवाह में शामिल सभी लोग विशेषकर गाँव से आए भाई-बहनों ने, मीरा के विदेश जाने पर बहुत से प्रश्न उठाए थे। 

पापा-मम्मी के साथ अब तो जय भी सुदृढ़ता से अपनी दीदी के साथ खड़ा था। विवाह के बाद प्रकाश ने सिंगापुर में गृहस्थी की शुरुआत की और बाद में मीरा भी चली गई।

"हमारा गाना तो उल्टा हो गया बेटा। पापा जल्दी आ जाना था ना, अब हम गाएंगे बिटिया जल्दी आ जाना।" पापा ने भरे गले से कहा था।
छोटे से गाँव से छोटे एक शहर, छोटे उस शहर से भारत के बाहर विदेश में रहने जाना, यायावरी की विशेष दास्तां बना रही थी।

कुछ घंटों आगे-पीछे क्यों ना चले, पर समय अखिल ब्रह्माण्ड में अपनी गति बनाए रखता है। जय का ब्याह भी हो गया, उसकी पत्नी सुनीता भी दिल्ली में ही शिक्षिका थी। दोनों की गृहस्थी दिल्ली में जम गई और अब उस छोटे शहर के नाज-नखरे झेलने के लिए मम्मी-पापा रह गए थे। 

पापा अब आराम से घर पर ही रहते, बचत किए पैसों का बैंक से ब्याज मिलता और ऊपर वाला हम बच्चों की पढ़ाई के कमरे को किराए पर दे दिया था। कम पैसों में गृहस्थी चलाने वाली मम्मी के लिए यह बहुत अलग सा काम नहीं था, हो आराम से चलने लगी थी उन दोनों की गृहस्थी।

मीरा-प्रकाश और जय-सुनीता का आना-जाना, इस गृहस्थी की ऊर्जा में उत्प्रेरक का काम कर देता। 

"मम्मी-पापा, आप अपना पासपोर्ट तैयार करवा लो। अब आपको मेरे साथ सिंगापुर आना है।" शीनू के गर्भ में आने की पुष्टि होते ही मीरा ने उन दोनों को बता दिया था।

नए उत्साह का संचार हुआ, नव पीढ़ी के आगमन की सूचना ने इस पीढ़ी की सारी थकान दूर कर दी। मम्मी ने बच्चे के कपड़े, झबले और छोटी-छोटी गुदडियाँ  सिल लीं। मीरा और प्रकाश ने टिकट करवा दी, जय उन्हें छोड़ने सिंगापुर आया।

उसी शाम उनका पूरा परिवार समुद्र किनारे पर खड़ा था सिर्फ सुनीता की कमी थी।
दूर-दूर तक दिखता स्वच्छ, नीलाभ पानी। आतुर होती लहरों का तटों पर लहराते हुए आना और अपना नेह उड़ेलकर वापस सकुचा जाना, पापा टकटकी बांधे देख रहे थे। एक-एक पल ऐसा कि जैसे बरसों की चाह अपने पंख सिकोड़ रही हो। क्षितिज को अपनी आँखों में डुबो लेने की लालसा पापा के चेहरे पर थी। 
"कितना विशाल है समुंदर, सुंदर। जमीन से आसमान तक नीला हरा, जमीन को आसमान से जोड़ देने वाला सेतु है यह तो।" वो मुड़ मुड़ कर देखते जाते। 
"कितनी नदियों का पानी समाया होगा इनमें, हमारे गाँव के पास बहने वाली भागा नदी भी समुंदर में ही तो समाती होगी।" पापा के मन में दुनिया भर के प्रश्न, लहरों की तरह आ जा रहे थे।

करीब तीन महीने रहे थे मम्मी-पापा, शीनू के जन्म के डेढ़ महीने बाद वो वापस चले गए थे। सवा महीने की शीनू को घर के बाहर ले जाने के लिए पहली शुभ जगह  मंदिर थी, जो सिंगापुर का प्राचीन हिंदू मंदिर था। वापसी में पापा ने उसे समुद्र किनारे ले चलने को कहा।

"मेरी नातिन पहली बार घर से बाहर आई है, समुंदर तो देखेगी। जिस नाना को सारी जिंदगी इंतजार रहा, उसी नाना की गोद में बैठकर वह पहली बार समुद्र देखेगी।" अब समुद्र के किनारे खड़े, अपनी बाँहों में शीनू को झुलाते पापा गुनगुना रहे थे।

"छोटी सी गुड़िया लाना, प्यारी सी गुड़िया लाना,
पापा अब जब भी आना।।"

मीरा ने देखा, आज भी मम्मी की आँखें छलछला रही थीं। 
कैसे एक गीत, एक परिवार की पीढ़ियों तक रिसता रहता है। उसका माधुर्य, उसकी लय और भाव परिवार को बाँध लेता है।

"मॉम, सीइईई..नानू नानी आर नीयर द वॉटर।" कार से उतरती शीनू दौड़ती हुई नाना-नानी के पास पहुँच गई।

अपने हाथ में आइसक्रीम का पार्सल लिए मीरा उनके पास पहुँच गई।

"ये आइसक्रीम खा लो आप लोग। जिम्नास्टिक क्लास से आते हुए शीनू ने खा लिया है। इसकी क्लास के दिन, आप दोनों का समुद्र किनारा और इस चतुर चिड़िया का आइसक्रीम खाना तो पक्का है।" नानी के हाथों की आइसक्रीम चाटती शीनू को देखकर मीरा ने उसे पकड़ते हुए कहा।

"अब इसी सप्ताह के अंत में तो वापसी है हमारी फिर अगले साल मिलेंगे शीनू से।" नानी बोली।
"अगले साल क्यों? शीनू मामा-मामी और न्यू बेबी से मिलने दिल्ली आएगी ना।" मीरा ने कहा।

सुनीता माँ बनने वाली थी और उसी समय मीरा ने सपरिवार दिल्ली जाने का तय किया था।

"मम्मा, हम इंडिया जाएंगे। आय वांट टू सी द स्मॉल लेक एंड कैनल, नानू ने बोला।" शीनू खुश थी।
"हम सब देखेंगे, नानू का गाँव, मामा-मम्मा का स्कूल, कॉलेज शहर और पूरा इंडिया।" मीरा की आँखें झिलमिलाने लगीं, अपनी बिटिया के हृदय में अपनी मातृभूमि के प्रति स्नेह के उमड़ते सागर को वह अपलक निहार रही थी।

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