मंगलवार, 4 मार्च 2025

गणतंत्र दिवस पर मनहरण घनाक्षरी

हिमानी किरीट साजे, सागर पैंजनी बाजे,
जमुना-गंगा की धार, भारती संवारती।

वाटिका हरित बाग, मृगों की वो भोली चाल,
पंछियों का कलरव, सबको निहारती।

धूप-छाँव गोद पले, शीतल पवन चले,
बारिश बरसे जब, बूँदों  से पुकारती।

मंदिरों में लोग आते, संत मुनि गीत गाते,
घड़ियाल घंटे ढ़ोल, होती नित आरती।।

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पन्ना जैसी धाय जहाँ, अंजनी सी मात वहाँ,
जीजा संस्कार भरी, धन्य धन्य भारती।

दुर्गा चंडी काली रूप, अनंत शक्ति स्वरूप,
दुनिया है आस लिए, आँचल पसारती।

साधना सनातन की, सुधा विष मंथन सी,
मंगल से नित नव, जीवन निखारती।

हीरे मोती गोद भरी, सैनिकों की बांँह धरी,
तीन रंग ध्वजा लिए, भारती  हुंकारती।।

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बंदूक बिराजे काँधे, पदक सीने पे साजे,
सिपाही सीमा पे डटा, भारती जुहारती।

चौकस हमेशा रहे, मौसम की मार सहे,
सामने जो खड़ी बाधा, सैनिकों से हारती।

भूमि पर काया ढही, लहू की है धार बही,
अंत तक आत्मा तो, भारती उच्चारती।

तिरंगा लपेट आया, लथपथ पड़ी काया,
भारती माँ थाल लिए, आरती उतारती।।

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🖋️शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

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